नौकरी करने अमेरिका गया था , वहां एक लड़की ने उसके साथ ऐसा कुछ किया ,जो उसने कभी सोचा भी नहीं था

सात समुंदर पार की चमक
प्रस्तावना
क्या सात समुंदर पार की चमक इतनी तेज होती है कि इंसान को अपने घर का दिया दिखाई देना बंद हो जाए? क्या डॉलर की खनक में मां की लोरी और पिता की खांसी की आवाज दब जाती है? यह कहानी एक ऐसे बेटे की है, जो अपने माता-पिता की उम्मीदों को पूरा करने अमेरिका गया, लेकिन वहां की रंगीन दुनिया और एक अनजान इश्क में इतना खो गया कि उसे याद ही नहीं रहा कि पीछे कोई उसकी राह देख रहा है। जब वक्त की मार पड़ी, तो उसे समझ आया कि असली दौलत बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि वह रिश्ते हैं, जो आपके खाली हाथ लौटने पर भी आपको गले लगा लेते हैं।
अध्याय 1: भारत के आंगन में अभिनव
भारत के एक मध्यमवर्गीय परिवार में अभिनव का जन्म हुआ था। उसके पिता रामेश्वर जी एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे, और मां सुमित्रा देवी एक सीधी-साधी गृहिणी। रामेश्वर जी ने अपनी पूरी जिंदगी एक पुरानी साइकिल और कुछ जोड़ी कपड़ों में गुजार दी थी। उनका सिर्फ एक ही सपना था—उनका बेटा खूब पढ़े और बड़ा अफसर बने। अभिनव पढ़ाई में होशियार था। उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और फिर उसका चयन अमेरिका की एक बड़ी आईटी कंपनी में हो गया।
यह खबर सुनते ही रामेश्वर जी की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी। पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी गई। सुमित्रा देवी की आंखों से खुशी के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। लेकिन इस खुशी के पीछे एक बड़ा त्याग भी छिपा था। अभिनव को अमेरिका भेजने के लिए उसके वीजा और शुरुआती खर्चों के लिए रामेश्वर जी ने अपनी रिटायरमेंट की जमा पूंजी और बैंक से लोन लेकर ₹15 लाख का इंतजाम किया था।
जिस दिन अभिनव की फ्लाइट थी, उस दिन हवाई अड्डे पर माहौल बड़ा भावुक था। रामेश्वर जी ने अभिनव के कंधे पर हाथ रखकर कहा था, “बेटा जा रहे हो तो अपनी जड़ें मत भूलना। बस तुम वहां जाकर हमारा नाम रोशन करना, और जल्दी ही घर का लोन उतारने में मदद करना।” अभिनव ने पिता के पैर छुए और वादा किया कि वह हर महीने पैसे भेजेगा और दो साल के अंदर सारा कर्जा उतारकर उन्हें भी अमेरिका घुमाने बुलाएगा। सुमित्रा देवी ने उसे दही-चीनी खिलाई और रोते हुए विदा किया।
अध्याय 2: न्यूयॉर्क की चकाचौंध
अमेरिका पहुंचकर अभिनव की दुनिया ही बदल गई। न्यूयॉर्क की ऊंची इमारतें, सड़कों पर दौड़ती महंगी गाड़ियां और वहां की आजाद हवा ने उसे मंत्रमुग्ध कर दिया। शुरुआती कुछ महीने उसने बहुत मेहनत की। वह समय पर काम पर जाता, घर आकर खाना बनाता और हर रविवार अपने माता-पिता से वीडियो कॉल पर बात करता। उसने अपनी पहली तनख्वाह से कुछ पैसे घर भी भेजे। रामेश्वर जी और सुमित्रा देवी बहुत खुश थे। उन्हें लगा कि उनका बेटा जिम्मेदार हो गया है।
लेकिन कहते हैं ना, जवानी और पैसा जब एक साथ मिलते हैं, तो अक्सर इंसान के कदम डगमगा जाते हैं। ऑफिस में अभिनव की दोस्ती कुछ ऐसे लोगों से हुई जो वीकेंड पर पार्टियों में जाना पसंद करते थे। धीरे-धीरे अभिनव भी उनके रंग में रंगने लगा। उसे लगने लगा कि यही असली जिंदगी है—क्लब जाना, शराब पीना और महंगे कपड़े पहनना।
इसी दौरान एक पार्टी में उसकी मुलाकात जेसिका से हुई। जेसिका एक अमेरिकन लड़की थी, दिखने में बेहद खूबसूरत और बातें करने में बहुत चतुर। अभिनव, जो एक साधारण भारतीय परिवेश से आया था, वह जेसिका के आकर्षण में पूरी तरह खो गया। उसे लगा कि उसे अपने सपनों की राजकुमारी मिल गई है।
जेसिका को घूमना, फिरना और महंगी चीजें पसंद थी। अभिनव ने उसे खुश करने के लिए अपनी जेब ढीली करनी शुरू कर दी। उसका प्यार धीरे-धीरे जुनून में बदल गया। वह जेसिका के साथ लिव-इन में रहने लगा। जेसिका ने उसे कहा कि उसे भारतीय लड़कों का स्वभाव बहुत पसंद है। लेकिन वह चाहती थी कि अभिनव पूरी तरह से अमेरिकन लाइफस्टाइल अपना ले। अभिनव ने वैसा ही किया—भारतीय खाना छोड़ दिया, हिंदी बोलना कम कर दिया, और अपनी संस्कृति से दूर होता गया।
सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उसने घर पैसे भेजना बंद कर दिया। शुरुआत में जब रामेश्वर जी ने फोन करके पैसों के बारे में पूछा, तो अभिनव ने झूठ बोल दिया, “यहां महंगाई बहुत बढ़ गई है, टैक्स कटने के बाद कुछ बचता नहीं है।” पिता ने बेटे की मजबूरी समझी और कहा, “कोई बात नहीं बेटा, तू अपना ख्याल रख।”
अध्याय 3: घर की दीवारों में दरार
असलियत यह थी कि अभिनव की पूरी कमाई जेसिका की शॉपिंग, वेकेशन और पार्टियों में उड़ रही थी। जेसिका उसे हर हफ्ते नए रेस्टोरेंट ले जाती, हर महीने किसी नई जगह घूमने की जिद करती। अभिनव उसके प्यार में इतना अंधा था कि उसे अपने बूढ़े माता-पिता की याद भी नहीं आती थी।
भारत में रामेश्वर जी पर बैंक के लोन का दबाव बढ़ता जा रहा था। वे बैंक की किस्तें चुकाने के लिए अपनी पेंशन का बड़ा हिस्सा दे देते थे, जिसके कारण घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था। सुमित्रा देवी बीमार रहने लगी थी, लेकिन दवाइयों के पैसे बचाने के लिए वे घरेलू नुस्खों से काम चलाती थी। वे अक्सर अभिनव को फोन करतीं, लेकिन अभिनव या तो फोन उठाता नहीं था या फिर दो मिनट बात करके रख देता था। वह कहता कि वह बहुत बिजी है, बहुत काम है। जबकि उस वक्त वह जेसिका के साथ किसी बीच पर बैठा होता या सिनेमा हॉल में होता।
दो साल, तीन साल, चार साल बीत गए। अभिनव एक बार भी भारत नहीं आया। उसने हर बार कोई ना कोई बहाना बनाया। उधर जेसिका के साथ उसका रिश्ता गहरा तो दिख रहा था, लेकिन वह पूरी तरह से पैसों पर टिका था। जेसिका को जब भी किसी चीज की जरूरत होती, अभिनव तुरंत हाजिर कर देता। उसने जेसिका के लिए एक महंगी कार भी फाइनेंस करवाई थी, जिसकी किस्तें वह खुद भरता था। अभिनव को लगता था कि जेसिका उससे बेइंतहा प्यार करती है और वे जल्द ही शादी कर लेंगे।
उसने जेसिका से शादी की बात भी की थी, लेकिन जेसिका हर बार यह कहकर टाल देती कि अभी हम लाइफ एंजॉय कर रहे हैं, शादी की क्या जल्दी है?
अध्याय 4: बुरे वक्त की दस्तक
भारत में हालात बदतर होते जा रहे थे। बैंक वालों ने रामेश्वर जी के घर पर नोटिस लगा दिया था। इज्जतदार मास्टर साहब को अब लोगों से नजरें चुरा कर चलना पड़ता था। पड़ोसी ताने मारते थे कि बेटा अमेरिका में मजे कर रहा है और बाप यहां पाई-पाई को तरस रहा है। सुमित्रा देवी रो-रो कर अपनी आंखें खराब कर चुकी थी। वे बस एक ही दुआ मांगतीं कि मरने से पहले एक बार अपने बेटे का मुंह देख लें।
लेकिन अभिनव अपनी ही दुनिया में मस्त था। उसे लगता था कि उसके पास बहुत वक्त है, बाद में सब ठीक कर लेगा।
फिर अचानक वक्त का पासा पलटा। अमेरिका में आर्थिक मंदी की आहट सुनाई देने लगी। कंपनियों ने कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी। साथ ही वीजा के नियमों में कुछ सख्त बदलाव आए। अभिनव जिस कंपनी में काम करता था, वो एक बड़े संकट में फंस गई। एक दिन सुबह जब वह ऑफिस पहुंचा, तो उसे एचआर मैनेजर ने केबिन में बुलाया और टर्मिनेशन लेटर थमा दिया। उसकी नौकरी चली गई थी।
अमेरिका में नौकरी जाने का मतलब था कि अगर उसे अगले 60 दिनों में नई नौकरी नहीं मिली, तो उसे देश छोड़कर जाना पड़ेगा। वो घबराया हुआ घर आया और उसने जेसिका को सब कुछ बताया। उसे उम्मीद थी कि जेसिका उसे सहारा देगी, तसल्ली देगी। लेकिन जेसिका का रिएक्शन बिल्कुल ठंडा था। उसने कहा, “अब तुम कार की किस्तें और घर का किराया कैसे भरोगे?”
अभिनव ने कहा कि उसके पास कुछ सेविंग्स नहीं है क्योंकि सब कुछ तो हम खर्च कर देते थे। मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। जेसिका ने साफ कह दिया कि वह अपने खर्चे खुद बड़ी मुश्किल से उठाती है, वह अभिनव का बोझ नहीं उठा सकती।
अध्याय 5: टूटन और पश्चाताप
अगले एक महीने तक अभिनव ने पागलों की तरह नौकरी ढूंढी, लेकिन मंदी के कारण कहीं भी वैकेंसी नहीं थी। उसके पास पैसे खत्म होने लगे थे। क्रेडिट कार्ड के बिल पेंडिंग थे। जब जेसिका ने देखा कि अब अभिनव के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं बचा है, तो उसने अपना असली रंग दिखाया। एक शाम जब अभिनव थका-हारा इंटरव्यू देकर घर लौटा, तो उसने देखा कि जेसिका अपना सामान पैक कर रही है।
अभिनव ने हैरान होकर पूछा, “तुम कहां जा रही हो?”
जेसिका ने बिना किसी भाव के कहा, “मैं यह रिश्ता खत्म कर रही हूं। मैं एक ऐसे आदमी के साथ नहीं रह सकती, जिसके पास ना नौकरी है, ना पैसा और ना ही कोई भविष्य।”
अभिनव गिड़गिड़ाया, रोया। उसने अपने प्यार का वास्ता दिया। याद दिलाया कि कैसे उसने अपनी सारी कमाई उस पर लुटा दी। जेसिका ने हंसते हुए कहा, “वह तुम्हारी चॉइस थी। मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम अपना सब कुछ मुझ पर उड़ा दो। तुमने एंजॉय किया, मैंने भी एंजॉय किया। अब बात खत्म।”
जेसिका अपना बैग उठाकर चली गई। खाली घर में अकेला रह गया। वो घर, जो जेसिका ने अपने पसंद से सजाया था, आज उसे खाने को दौड़ रहा था। उसे अपनी मूर्खता पर रोना आ रहा था। जिन दोस्तों पर उसने पैसे उड़ाए थे, उन्होंने भी उसके फोन उठाने बंद कर दिए थे। अब उसके पास ना नौकरी थी, ना लड़की, ना पैसा और ना ही रहने का ठिकाना। वीजा की मियाद खत्म हो रही थी। आखिरकार उसे भारत वापस लौटने का आदेश मिल गया।
उसके पास फ्लाइट की टिकट खरीदने तक के पैसे नहीं थे। उसे अपनी कार, फर्नीचर, लैपटॉप सब कुछ ओने-पौने दाम में बेचना पड़ा। सब कुछ बेचने के बाद उसके पास सिर्फ एक बैग और भारत जाने की टिकट बची।
जिस अभिनव ने सोचा था कि वह अमेरिका से राजा बनकर लौटेगा, आज वह एक भिखारी से भी बदतर हालत में था। फ्लाइट में बैठे-बैठे पूरी यात्रा के दौरान उसकी आंखों से आंसू बहते रहे। उसे जेसिका की बेवफाई का उतना दुख नहीं था, जितना इस बात का डर था कि वह अपने माता-पिता को क्या मुंह दिखाएगा।
अध्याय 6: वापसी और माफी
दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरकर उसने बस पकड़ी और अपने शहर की तरफ चल पड़ा। रास्ते भर उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। जब वह अपने मोहल्ले में पहुंचा, तो उसे सब कुछ बदला-बदला सा लगा। सड़कें वही थीं, लेकिन उसके घर का रंग उड़ गया था। उसके घर के गेट पर जंग लगा हुआ था।
उसने कांपते हाथों से घंटी बजाई। काफी देर बाद दरवाजा खुला। सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था—बाल पूरी तरह सफेद, कमर झुकी हुई, आंखों पर मोटा चश्मा। वे रामेश्वर जी थे। अभिनव उन्हें पहचान नहीं पाया। पांच सालों में वे बीस साल बूढ़े हो गए थे। रामेश्वर जी ने अपनी धुंधली आंखों से देखा और एक पल के लिए ठिठक गए।
अभिनव ने कांपती आवाज में कहा, “पापा…”
रामेश्वर जी बोले, “अभिनव?”
अभिनव के मुंह से शब्द नहीं निकले। वह बस सर झुकाए खड़ा रहा।
पीछे से सुमित्रा देवी लाठी टेकती हुई आई। बेटे को देखते ही उनकी लाठी हाथ से छूट गई। अभिनव को लगा था कि अब सवालों की बौछार होगी—पैसा कहां है? इतने साल क्यों नहीं आया? हमें क्यों भूल गया? वह अपमान के लिए तैयार खड़ा था।
लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी। सुमित्रा देवी दौड़ीं जितना उनके बूढ़े शरीर से हो सका और अभिनव को कसकर गले लगा लिया। वे फूट-फूट कर रोने लगीं, “मेरा बेटा आ गया। मेरा लाल आ गया।” रामेश्वर जी की आंखों से भी आंसू बह निकले। उन्होंने आगे बढ़कर अभिनव के सिर पर हाथ रखा।
अभिनव अब और बर्दाश्त नहीं कर सका। वह अपने माता-पिता के पैरों में गिर पड़ा। बच्चों की तरह बिलक-बिलख कर रोने लगा, “मुझे माफ कर दो पापा। मुझे माफ कर दो मां। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मैं बर्बाद हो गया। मैं खाली हाथ आया हूं। मैंने तुम्हारा सब कुछ डुबो दिया। मैं बहुत बुरा बेटा हूं।”
रामेश्वर जी ने झुककर उसे उठाया। अपनी धोती के कोने से अभिनव का चेहरा पोंछा और जो शब्द उन्होंने कहे, वे अभिनव के दिल पर मरहम की तरह लगे।
“पगले, तू आ गया। हमारे लिए यही सबसे बड़ी दौलत है। पैसा तो हाथ का मैल है, आता है जाता है। हमें लगा था कि हमने अपना बेटा खो दिया है। तू सही सलामत है, हमारे पास है। अब हमें और कुछ नहीं चाहिए।”
सुमित्रा देवी ने कहा, “हां बेटा, लोग कहते थे कि अमेरिका जाकर बेटे मां-बाप को भूल जाते हैं। पर मेरा दिल कहता था कि मेरा अभिनव लौटेगा। देख, तू आ गया ना?”
अभिनव हैरान था—ना कोई शिकायत, ना कोई ताना। जिस बेटे ने उन्हें पांच साल तक नर्क जैसी जिंदगी दी, उसे वे ऐसे अपना रहे थे जैसे वह कोई जंग जीतकर आया हो।
उस पल अभिनव को एहसास हुआ कि अमेरिका की उस चकाचौंध में उसने क्या खोया था, और भारत की इस टूटी-फूटी दहलीज पर उसने क्या पाया है।
अध्याय 7: एक नई शुरुआत
उस रात अभिनव अपने पिता की गोद में सिर रखकर सोया जैसे बचपन में सोता था। उसे ऐसी नींद सालों बाद आई थी। अगले सुबह अभिनव ने एक नई कसम खाई। उसे पता चला कि पिता ने घर को नीलाम होने से बचाने के लिए अपनी बची-खुची पुश्तैनी जमीन भी बेच दी थी।
अभिनव ने तय किया कि वह अब दोबारा विदेश नहीं जाएगा। वह अपने देश में, अपने लोगों के बीच रहकर काम करेगा। उसने अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री और तजुर्बे का इस्तेमाल किया। शुरुआत में उसे छोटी नौकरी मिली। तनख्वाह कम थी, लेकिन सुकून बहुत था। वह ऑफिस से सीधा घर आता, मां के साथ सब्जी काटता, पिता के पैर दबाता।
उसने अपनी मेहनत और लगन से धीरे-धीरे तरक्की की। दो साल के अंदर उसने एक अच्छी कंपनी में मैनेजर की पोस्ट हासिल कर ली। उसने पाई-पाई जोड़कर पिता का सारा कर्जा चुका दिया। उसने उस घर की मरम्मत करवाई, जिसकी दीवारें उसकी बेरुखी से दरक गई थीं।
अभिनव की जिंदगी अब सादी थी। कोई क्लब नहीं, कोई पार्टी नहीं। लेकिन उसके चेहरे पर जो चमक थी, वह अमेरिका के टाइम्स स्क्वायर की रोशनी से भी ज्यादा थी।
अध्याय 8: रिश्तों की असली कीमत
एक दिन शाम को वह अपने माता-पिता को लेकर उसी पार्क में गया, जहां बचपन में खेला करता था। वहां बैठकर उसने अपने पिता से पूछा, “पापा, जब मैं खाली हाथ लौटा था, तो आपने मुझे डांटा क्यों नहीं? आपने मुझे घर से क्यों नहीं निकाला?”
रामेश्वर जी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, हम मां-बाप हैं, व्यापारी नहीं। व्यापार में नफा-नुकसान देखा जाता है, रिश्तों में नहीं। तू भटक गया था, यह हम जानते थे। अगर हम भी दरवाजे बंद कर लेते, तो तू सुधरता नहीं। टूट जाता, और टूटी हुई चीजों को जोड़ा जा सकता है, लेकिन टूटे हुए इंसान को जोड़ना बहुत मुश्किल होता है।”
अभिनव की आंखें भर आईं। उसने आसमान की तरफ देखा। वहां एक हवाई जहाज उड़ रहा था, शायद अमेरिका जा रहा था। अभिनव ने मन ही मन उसे अलविदा कहा। उसने महसूस किया कि असली जन्नत सात समुंदर पार नहीं, बल्कि मां-बाप के चरणों में है।
जेसिका और अमेरिका अब उसके लिए एक बुरे सपने की तरह थे, जो सुबह होते ही गायब हो गया था। उसने जान लिया था कि दुनिया में हर चीज की कीमत लग सकती है, लेकिन परिवार के प्यार की नहीं।
अध्याय 9: कहानी का सबक
यह कहानी किसी एक अभिनव की नहीं है, बल्कि उन हजारों नौजवानों के लिए एक आईना है, जो चमक-दमक के पीछे भागते हुए अपनों को पीछे छोड़ देते हैं। अभिनव को देर से ही सही, लेकिन यह समझ आ गया कि जिन लोगों के लिए हम अपनों को ठुकराते हैं, वे अक्सर हमारे बुरे वक्त में सबसे पहले हाथ छुड़ाते हैं, और जिन्हें हम नजरअंदाज करते हैं, वही हमारे गिरने पर हमें थामते हैं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि करियर बनाना जरूरी है, पैसा कमाना भी जरूरी है, लेकिन उन रिश्तों की कीमत पर नहीं, जिन्होंने आपको चलना सिखाया। अगर आप भी अपने घर से दूर हैं, तो आज ही अपने माता-पिता को फोन करें, उनसे बात करें, क्योंकि एक दिन ऐसा आएगा जब आप बात करना चाहेंगे, लेकिन दूसरी तरफ सुनने वाला कोई नहीं होगा।
असली अमीरी वह नहीं जो बैंक में पड़ी हो, असली अमीरी वह है जब आप घर लौटें तो कोई मुस्कुराकर आपका दरवाजा खोले।
समापन
सात समुंदर पार की चमक बहुत आकर्षक होती है, लेकिन वह कभी-कभी इंसान को इतना अंधा कर देती है कि उसे अपने घर का दिया दिखाई देना बंद हो जाता है। अभिनव की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में असली कमाई वे रिश्ते हैं, जो आपके खाली हाथ लौटने पर भी आपको गले लगा लेते हैं।
(कहानी समाप्त)
अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो अपने विचार जरूर साझा करें। क्या आपको पिता की माफी ने या अभिनव के पश्चाताप ने ज्यादा छू लिया? इस कहानी को उन दोस्तों के साथ जरूर साझा करें, जो विदेश जाने का सपना देखते हैं।
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