नौकर ने महिला टीचर संग किया करनामा/पुलिस भी सोचने पर मजबूर हो गई/

विश्वासघात का अंधेरा और न्याय की जीत

राजस्थान का उदयपुर अपनी झीलों और सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। लेकिन इसी जिले के भिंडर शहर की शांत गलियों में एक ऐसी घटना घटी, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया। यह कहानी है भिंडर की ‘शिव कॉलोनी’ के मकान नंबर 31/16 में रहने वाली रूबी देवी की।

अध्याय 1: एक कर्मठ शिक्षिका का जीवन

रूबी देवी पेशे से एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका थीं। वे न केवल अपने काम के प्रति समर्पित थीं, बल्कि स्वभाव से अत्यंत सुशील और मेहनती भी थीं। उनके परिवार में उनका नौ साल का बेटा सचिन और उनकी बुजुर्ग माँ सरोज देवी रहती थीं। सरोज देवी अक्सर बीमार रहती थीं, जिसके कारण रूबी पर घर और स्कूल दोनों की दोहरी जिम्मेदारी थी।

रूबी के जीवन में एक खालीपन भी था। तीन साल पहले उनका अपने पति दिनेश कुमार से अलगाव हो गया था। वैचारिक मतभेदों के कारण हुए इस तलाक ने रूबी को मानसिक रूप से काफी अकेला कर दिया था, लेकिन उन्होंने अपनी पूरी ताकत अपने बेटे के भविष्य को संवारने में लगा दी थी।

अध्याय 2: एक मददगार की तलाश

रूबी सुबह 8 बजे सचिन को लेकर स्कूल निकल जाती थीं और शाम को 4-5 बजे तक वापस आती थीं। घर लौटने के बाद बीमार माँ की देखभाल और घर के काम उन्हें पूरी तरह थका देते थे। उन्होंने तय किया कि उन्हें एक भरोसेमंद सहायक की जरूरत है जो घर के काम देख सके और उनकी माँ का ध्यान रख सके।

कई दिनों की तलाश के बाद उनकी मुलाकात सुरिंदर नाम के एक युवक से हुई, जो पास की ही एक कपड़े की दुकान पर काम करता था। सुरिंदर देखने में सीधा-सादा और ईमानदार लगता था। रूबी ने उसे दुकान से ज्यादा वेतन का लालच देकर अपने घर पर सहायक के रूप में रख लिया।

अध्याय 3: पड़ोस की सीमा और सुरिंदर की असलियत

रूबी की एक पड़ोसन थी—सीमा देवी। सीमा एक विधवा महिला थीं, लेकिन उनका व्यवहार और नीतियां समाज की नजर में कुछ संदिग्ध थीं। जब सुरिंदर ने रूबी के यहाँ काम करना शुरू किया, तो सीमा की नजर उस पर पड़ गई। सुरिंदर भी स्वभाव से चंचल था और जल्द ही वह सीमा के प्रभाव में आ गया।

सुरिंदर दिन में रूबी के घर का काम करता था, लेकिन रूबी की गैरमौजूदगी में वह सीमा के घर जाकर समय बिताने लगा। सीमा उसे पैसे और अन्य प्रलोभन देकर अपनी जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने लगी। धीरे-धीरे सुरिंदर की नीयत खराब होने लगी। उसे लगने लगा कि रूबी अकेली है और वह उसका फायदा उठा सकता है।

अध्याय 4: साजिश का आगाज़

दिसंबर 2025 का महीना था। सुरिंदर अब रूबी के घर में ही एक कमरे में रहने लगा था। उसने रूबी का विश्वास पूरी तरह जीत लिया था। इसी विश्वास की आड़ में उसने एक भयानक साजिश रची। एक दिन मौका पाकर उसने रूबी के शयनकक्ष की चाबियों का एक नकली सेट (Duplicate keys) बनवा लिया।

इतना ही नहीं, उसने स्थानीय बाजार से कुछ ऐसी दवाइयां खरीदीं जिनसे गहरी नींद आती है। वह अब बस एक सही मौके के इंतजार में था।

अध्याय 5: अंधेरी रातों का रहस्य

26 दिसंबर की रात, सुरिंदर ने रात के खाने में चुपके से नींद की दवाइयां मिला दीं। रूबी, सचिन और सरोज देवी ने जैसे ही खाना खाया, उन्हें गहरी नींद आने लगी। जब पूरा घर सन्नाटे में डूब गया, तब सुरिंदर ने अपनी नकली चाबी का इस्तेमाल किया।

वह चुपके से रूबी के कमरे में गया। रूबी पूरी तरह बेहोश थीं। सुरिंदर ने उस रात उनके साथ मर्यादा की सीमाओं को लांघने का प्रयास किया। अगली सुबह जब रूबी उठीं, उन्हें शरीर में भारीपन और कुछ अजीब निशानों का अहसास हुआ, लेकिन उन्होंने इसे थकान या वहम समझकर नजरअंदाज कर दिया।

अध्याय 6: साजिश में शामिल हुआ एक और साथी

सुरिंदर की हिम्मत बढ़ चुकी थी। उसने अपने एक दोस्त प्रमोद को भी इस साजिश में शामिल कर लिया। प्रमोद नशे का आदी था और अपराध की दुनिया में उसका पुराना नाता था। सुरिंदर ने उसे भी रूबी के घर ‘दोस्त’ बताकर बुला लिया। रूबी ने सुरिंदर पर विश्वास करते हुए उसे रहने की इजाजत दे दी।

अब यह सिलसिला और भी भयानक हो गया। सुरिंदर और प्रमोद मिलकर घर के सदस्यों को दवा देते और रात के अंधेरे में अपनी घिनौनी करतूतों को अंजाम देते। रूबी की तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ने लगी। उनके मन में अब डर बैठ गया था कि उनके बंद कमरे में रात को कुछ तो ऐसा होता है जो सामान्य नहीं है।

अध्याय 7: ममता और साहस की जीत

एक सुबह रूबी ने अपनी माँ को सब बताया। सरोज देवी ने पहले तो इसे वहम कहा, लेकिन रूबी का अंतर्मन कह रहा था कि उनके साथ धोखा हो रहा है। रूबी ने हार नहीं मानी। उन्होंने तुरंत हिम्मत जुटाई और भिंडर थाने पहुँच गईं।

वहाँ उनकी मुलाकात दरोगा रमेश पंवार से हुई। रमेश पंवार एक अनुभवी अधिकारी थे। जब रूबी ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और यह भी बताया कि कमरे का दरवाजा अंदर से बंद होने के बावजूद उन्हें ऐसा महसूस होता है, तो दरोगा तुरंत समझ गए कि अपराधी घर के भीतर ही है।

अध्याय 8: न्याय का प्रहार

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। दरोगा रमेश पंवार अपनी टीम के साथ रूबी के घर पहुँचे और सुरिंदर व प्रमोद को हिरासत में ले लिया। थाने ले जाकर जब उनसे सख्ती से पूछताछ की गई, तो सुरिंदर टूट गया।

उसने कबूल किया कि कैसे उसने नकली चाबियाँ बनवाई थीं और कैसे वह नींद की गोलियों का इस्तेमाल कर रूबी के साथ विश्वासघात कर रहा था। पुलिस ने सुरिंदर के कमरे से नकली चाबियाँ और दवाइयां भी बरामद कीं।

उपसंहार: जागरूकता ही सुरक्षा है

उदयपुर की इस घटना ने पूरे राजस्थान को हिला दिया। पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ कड़ी धाराओं में मामला दर्ज किया और उन्हें जेल भेज दिया। रूबी देवी के साहस की सराहना की गई, जिन्होंने लोक-लाज के डर से ऊपर उठकर अपराधी को सजा दिलवाई।

निष्कर्ष: यह घटना हमें सिखाती है कि किसी भी अजनबी पर आँख मूंदकर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। अपने आसपास के प्रति सतर्क रहना और किसी भी असामान्य घटना को तुरंत रिपोर्ट करना ही सुरक्षा का एकमात्र उपाय है। रूबी देवी ने साबित कर दिया कि एक अकेली महिला भी यदि साहस दिखाए, तो वह बड़े से बड़े अपराधी को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती है।

जय हिंद, वंदे मातरम।