पती जेल में था और पत्नी के साथ यह क्या हो रहा था /

गुलाबचंद और रेशमा: प्रतिशोध, त्याग और पुनर्मिलन की अमर गाथा
यह कहानी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की उन गलियों से निकलती है, जहाँ धूल और सादगी के बीच एक ऐसा प्रेम पनपा जिसने कानून, समाज और समय की सीमाओं को चुनौती दे दी। यह महज एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि एक पुरुष के स्वाभिमान और एक स्त्री के अटूट धैर्य की गाथा है, जिसका समापन हाल ही में अयोध्या की पावन भूमि पर हुआ।
1. मासूमियत का अंत और विछोह की पहली रात
साल 2003 की बात है। 19 साल का गुलाबचंद एक सीधा-साधा, कम बोलने वाला युवक था। उसका विवाह 17 साल की रेशमा से हुआ। दोनों के मन में नए जीवन के हजारों सपने थे। शादी के बाद रेशमा जब पहली बार अपने ससुराल आई, तो गुलाब को लगा जैसे उसके घर में साक्षात लक्ष्मी आ गई हो। लेकिन परंपरा के अनुसार, शादी के महज सात दिन बाद रेशमा के मायके वाले उसे ‘गौना’ (विदाई) कराकर वापस ले गए।
गुलाब के लिए वे सात दिन सात जन्मों जैसे थे। रेशमा के जाने के बाद उसका मन किसी काम में नहीं लगता था। उस दौर में न तो हर हाथ में मोबाइल था और न ही बात करने का कोई और जरिया। विछोह की तड़प जब बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो शादी के कुछ ही दिनों बाद एक शाम 5 बजे गुलाब ने अपनी पुरानी साइकिल उठाई। 40 किलोमीटर का रास्ता, कच्ची सड़कें और गहराता अंधेरा भी उसके कदमों को नहीं रोक सका। रात के 10 बजे, जब पूरा गांव सो चुका था, गुलाब ने रेशमा के घर का दरवाजा खटखटाया।
जब रेशमा ने दरवाजा खोला और अपने पति को पसीने से लथपथ, साइकिल के साथ देखा, तो उसकी आंखों में हैरानी और प्यार के आंसू एक साथ छलक पड़े। वह रात उनके जीवन की सबसे सुखद लेकिन आखिरी सामान्य रात साबित होने वाली थी।
2. खौफनाक सच और मर्यादा का चीरहरण
अगली सुबह जब गांव में शोर हुआ कि गुलाबचंद रात को ही ससुराल आ गया है, तो पड़ोस में रहने वाले दबंग मंटू और उसके पिता दत्तू के सीने पर सांप लोटने लगे। उनका रेशमा के परिवार के साथ जमीन का एक पुराना विवाद था। वे उस उपजाऊ जमीन को हड़पना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने रेशमा के परिवार को हमेशा कमजोर समझकर प्रताड़ित किया था।
गुलाब जब घर के बाहर निकला, तो मंटू और दत्तू ने गाली-गलौज शुरू कर दी। बात हाथापाई तक पहुंच गई। मंटू ने गुलाब के ससुर को धक्का देकर गिरा दिया। जब गुलाब ने बीच-बचाव किया, तो मंटू ने पूरे गांव के सामने वह जहर उगला जिसने गुलाब के भीतर के शांत इंसान को एक शिकारी में बदल दिया।
मंटू ने अट्टहास करते हुए कहा, “तू किस बात की धौंस दिखा रहा है? अपनी इस ‘सती-सावित्री’ पत्नी से पूछ, जब तू यहाँ नहीं था, तब मैंने इसके साथ क्या-क्या किया है। अगर तू मर्द है, तो पूछ इससे… और सुन, पहले जो किया वो तो तूने देखा नहीं, पर अब जो करेंगे वो तेरी आंखों के सामने करेंगे।”
दत्तू ने अपने बेटे की पीठ थपथपाते हुए कहा, “हाँ, अब देखते हैं तेरी मर्दानगी कितनी बड़ी है।”
गुलाब के लिए यह सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि उसकी आत्मा पर किया गया प्रहार था।
3. खूनी प्रतिशोध और 20 साल का कठोर कारावास
रेशमा ने रोते हुए गुलाब को वह काली सच्चाई बताई, जिसे सुनकर किसी भी पत्थर का दिल पिघल जाए। मंटू ने उस समय रेशमा का शारीरिक शोषण किया था जब उसके माता-पिता घर पर नहीं थे। लोक-लाज के डर से और पुलिस की मिलीभगत के कारण रेशमा का परिवार चुप रह गया था।
गुलाब के कानों में दत्तू के वे शब्द गूंज रहे थे— “तेरे सामने करेंगे।” उस रात गुलाब सो नहीं सका। उसका खून खौल रहा था। आधी रात को उसने चुपके से अपने ससुर के घर में रखी तेज धार वाली कुल्हाड़ी उठाई। वह अंधेरे में दीवार फांदकर दत्तू के घर में घुसा। मंटू और दत्तू दोनों बेखौफ सो रहे थे। गुलाब ने एक के बाद एक कई प्रहार किए और दोनों बाप-बेटों को मौत के घाट उतार दिया।
सुबह होते ही पूरे बाराबंकी में हड़कंप मच गया। गुलाब भागा नहीं; वह कुल्हाड़ी लेकर वहीं खड़ा रहा। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। जब जज ने उससे पूछा कि उसने दो हत्याएं क्यों कीं, तो गुलाब का जवाब था, “मैंने एक पापी को मारा और दूसरे उस जड़ को, जिसने उस पाप को सींचा था।” कोर्ट ने उसे 20 साल की उम्रकैद सुनाई और उसे नैनी सेंट्रल जेल भेज दिया गया।
4. रेशमा का निर्वासन और समाज की क्रूरता
गुलाब के जेल जाने के बाद रेशमा की दुनिया उजड़ गई। समाज ने उसे ‘डायन’ और ‘कुलक्षणी’ करार दिया। उसके मायके वालों पर भी दबाव बनाया गया। रेशमा को उसके मामा के घर भेज दिया गया, जहाँ उसे जानवरों से भी बदतर रखा गया। उस पर दूसरी शादी करने का दबाव डाला गया।
जब वह जेल में गुलाब से मिलने गई, तो लोहे की सलाखों के पीछे दोनों का विलाप देखकर जेलर की आंखें भी नम हो गई थीं। रेशमा ने कहा, “मैं अब और नहीं जी सकती।” लेकिन गुलाब ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “रेशमा, अगर तुम मर गई तो मेरा ये बलिदान व्यर्थ हो जाएगा। तुम कहीं भी रहो, बस जीवित रहना। मैं तुम्हें एक बार फिर से मुक्त देखना चाहता हूँ।”
जेल से लौटते समय, उनके केस के वकील ने भी रेशमा की बेबसी का फायदा उठाने की कोशिश की। चारों ओर से दरिंदों से घिरी रेशमा एक दिन गांव के बाहर के मंदिर में बेहोश मिली। वहाँ एक महिला संत (साध्वी) ने उसे सहारा दिया। जब साध्वी को पूरी सच्चाई पता चली, तो उन्होंने रेशमा को नया नाम और नया जीवन देने का फैसला किया और उसे अपने साथ अयोध्या ले गईं।
5. 2024: एक चमत्कारिक पुनर्मिलन
समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा। 20 साल बीत गए। फरवरी 2024 में गुलाबचंद जेल की ऊंची दीवारों से बाहर निकला। उसके पास न घर था, न माता-पिता, और न ही कोई संपत्ति। उसकी बड़ी बहन शारदा ने उसे गले लगाया, लेकिन गुलाब की आँखों में आज भी वही एक तलाश थी।
जब उसे पता चला कि रेशमा का किसी को पता नहीं है, तो वह पागलों की तरह उसे ढूंढने लगा। अंततः वह उसी पुराने मंदिर पहुंचा जहाँ रेशमा आखिरी बार देखी गई थी। वहां एक वृद्ध महात्मा ने उसे संकेत दिया— “वह कन्या अब सरयू की शरण में है।”
गुलाब अयोध्या पहुंचा। हजारों की भीड़, संतों के भेष में घूमते लोग… वहां उसे ढूंढना नामुमकिन था। लेकिन कहते हैं कि आत्माएं एक-दूसरे को पहचान लेती हैं। एक आश्रम के बाहर, एक प्रौढ़ महिला चूल्हे पर बड़े बर्तन में चाय बना रही थी। उसका सिर मुंडाया हुआ था, केसरिया वस्त्र थे और चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
गुलाब उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया और धीमी आवाज में पुकारा— “रेशमा!”
वह आवाज सुनते ही रेशमा के हाथ से चाय का बर्तन छूट गया। उसने मुड़कर देखा। 20 साल की उम्र ने दोनों के चेहरों पर झुर्रियां लिख दी थीं, लेकिन आंखों की चमक वही थी। रेशमा दहाड़े मारकर रो पड़ी और गुलाब के पैरों में गिर गई। वह सिर्फ इतना कह सकी, “मेरे राम ने मेरी सुन ली… मुझे पता था आप आएंगे।”
6. वर्तमान: भक्ति और वैराग्य का साझा जीवन
आज मार्च 2026 है। पिछले दो वर्षों से गुलाबचंद और रेशमा अयोध्या में ही एक छोटी सी कुटिया में रहते हैं। वे अब पति-पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि दो साधकों के रूप में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे हनुमानगढ़ी के पास एक छोटी सी दुकान पर प्रसाद और मालाएं बेचते हैं।
गुलाबचंद अब शांत है। उसके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं है। वह कहता है, “मैंने अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए 20 साल दिए, और ईश्वर ने मुझे उपहार में मेरी रेशमा वापस दे दी। अब हमें और कुछ नहीं चाहिए।”
निष्कर्ष और सामाजिक सवाल
यह सच्ची कहानी हमारे कानून और समाज पर कई सवाल खड़े करती है। क्या गुलाबचंद का अपराध वाकई इतना बड़ा था कि उसे 20 साल तक अपनी पत्नी से दूर रहना पड़ा? क्या वह समाज दोषी नहीं है जिसने रेशमा को सुरक्षा देने के बजाय उसे मरने पर मजबूर कर दिया?
कानून ने शायद न्याय किया हो, लेकिन समय ने उन दोनों के जीवन के सबसे खूबसूरत साल छीन लिए। फिर भी, अयोध्या की गलियों में आज जब ये दोनों साथ चलते हैं, तो वे दुनिया को यह संदेश देते हैं कि सच्चा प्रेम और न्याय की भूख कभी नहीं मरती।
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