पत्थर तोड़ रही महिला के सामने क्यों झुक गया करोड़पति?

रोटी, रिश्ते और रजनी: एक टूटी कुटिया से दिल्ली तक का सफर

प्रस्तावना

मसूरी की तपती दोपहर, एक टूटी-फूटी कुटिया, भूख से बेहाल दो बच्चे और उनकी मां रजनी, जो पत्थर तोड़कर अपने बच्चों का पेट भरने की कोशिश कर रही थी। इस कहानी की शुरुआत वहीं से होती है, जहां ज़िंदगी की सबसे बड़ी सजा – भूख – रजनी और उसके बच्चों को झेलनी पड़ रही थी। लेकिन उसी दोपहर एक अमीर आदमी अभिमन्यु राठौर की गाड़ी रजनी की कुटिया के सामने खराब हो जाती है, और दोनों की किस्मतें एक-दूसरे से टकरा जाती हैं।

भाग 1: रजनी की दुनिया

रजनी की जिंदगी संघर्षों से भरी थी। उसका पति तान्या के जन्म के बाद उसे छोड़ गया था। मां-बाप बचपन में ही गुजर गए थे। रजनी ने अपनी पूरी जिंदगी मजदूरी करते हुए गुजार दी। उसके पास दो बच्चे थे – आठ साल का कृष और पांच साल की तान्या। दोनों बच्चे भूख से बेहाल थे। रजनी के पास खाने को केवल दो मुट्ठी आटा बचा था। वह पत्थर तोड़ती थी, ताकि शाम को मजदूरी मिले और बच्चों के लिए दूध ला सके। दो दिन से बच्चों ने कुछ नहीं खाया था, सिर्फ पानी पीकर सो गए थे।

उस दिन भी रजनी पत्थर तोड़ रही थी, तभी एक चमकदार काली कार उसकी कुटिया के सामने आकर रुकती है। उसमें से एक आदमी उतरता है, जो महंगे सूट और चमकते जूतों में था, लेकिन चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। वह आदमी अभिमन्यु राठौर था, जो दिल्ली से एक प्रॉपर्टी डील के सिलसिले में मसूरी आया था।

भाग 2: एक अजनबी की दस्तक

अभिमन्यु राठौर ने रजनी से गाड़ी खराब होने की वजह से थोड़ी देर कुटिया में बैठने की इजाजत मांगी। रजनी हैरान थी, क्योंकि ऐसे लोग उसकी बस्ती में कभी नहीं आते थे। लेकिन उसने मना भी नहीं किया। अभिमन्यु ने चारों ओर देखा – टूटी दीवारें, फटी चटाई, कोने में डरे-सहमे बच्चे। रजनी ने टूटे गिलास में पानी दिया। अभिमन्यु ने पानी पीते हुए रजनी से उसका नाम पूछा। रजनी ने बताया – “मेरा नाम रजनी है।” अभिमन्यु ने भी अपना नाम बताया।

अभिमन्यु ने बच्चों की हालत देखकर पूछा – “बच्चे बीमार लगते हैं?” रजनी की आंखों में आंसू आ गए, “नहीं, भूखे हैं। दो दिन से कुछ नहीं खाया है। मजदूरी नहीं मिली तो घर में खाना खत्म हो गया।”

अभिमन्यु ने अपना बैग खोला और पैसे देने की कोशिश की, लेकिन रजनी ने मना कर दिया, “मैं भीख नहीं लेती, हम गरीब हैं लेकिन इज्जत से जीते हैं।” अभिमन्यु को रजनी की बात चुभ गई। उसने पैसे वापस रख दिए और माफी मांगी। फिर उसने पूछा कि क्या वह बच्चों के लिए खाना मंगवा सकता है। रजनी ने सिर हिला दिया। अभिमन्यु ने ड्राइवर को फोन किया, लेकिन वहां कोई होटल नहीं था और ड्राइवर गाड़ी ठीक कराने गया था।

अभिमन्यु ने रजनी से पूछा, “घर में क्या है?” रजनी ने बताया, “सिर्फ दो मुट्ठी आटा।” अभिमन्यु ने कहा, “उसी से कुछ बना दीजिए। मैंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया।”

भाग 3: रूखी रोटी और रिश्तों की मिठास

रजनी ने चूल्हा जलाया, आटे में नमक मिलाकर दो रोटियां बनाई। घर में प्याज तक नहीं था। उसने रोटियां टूटे प्लेट में रखकर अभिमन्यु के सामने रख दीं। अभिमन्यु ने रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा और मुंह में रखा। सूखी, बेस्वाद, सिर्फ नमक का स्वाद। लेकिन उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने रोटी खाना बंद कर दिया और रजनी से पूछा, “आप यह खाकर कैसे जीती हैं?” रजनी ने आंखें झुका ली, “मजबूरी है साहब। जब पेट में आग लगती है तो पत्थर भी खा लेते हैं।”

अभिमन्यु ने गहरी सांस ली और पूछा, “रजनी, आपके पति कहां हैं?” रजनी की आंखों से आंसू बह निकले, “नहीं हैं, साहब। छोड़कर चले गए। जब तान्या पैदा हुई थी।” अभिमन्यु ने मायके वालों के बारे में पूछा। रजनी ने बताया, “कोई नहीं है, साहब। मां-बाप बचपन में ही गुजर गए थे। पति ने भी छोड़ दिया। अब बस ये दोनों बच्चे हैं।”

भाग 4: एक पुरानी तस्वीर

अभिमन्यु ने अपना बैग खोला और एक पुरानी तस्वीर निकाली। “रजनी, यह तस्वीर देखिए।” रजनी ने तस्वीर देखी और उसके हाथ से तस्वीर गिर गई। तस्वीर में एक जवान लड़की थी, जो हूबहू रजनी जैसी लगती थी। अभिमन्यु की आंखों में आंसू थे, “यह मेरी बहन प्रिया है। 15 साल पहले घर से भाग गई थी एक लड़के के साथ। उसके बाद हमने उसे कभी नहीं देखा। आज जब मैंने आपको देखा तो लगा जैसे प्रिया सामने खड़ी है।”

रजनी ने कहा, “मेरा नाम प्रिया नहीं है, साहब। मैं रजनी हूं।” अभिमन्यु ने कहा, “मुझे पता है, लेकिन आप प्रिया से बिल्कुल मिलती हैं। और कृष भी मेरे भतीजे जैसा दिखता है, जो प्रिया के साथ की तस्वीर में था।”

अभिमन्यु ने रजनी से उसके बचपन के बारे में पूछा। रजनी ने बताया, “मैं अनाथालय में रही हूं।” अभिमन्यु ने पूछा, “कौन सा अनाथालय?” रजनी ने बताया, “देहरादून का सेवा सदन अनाथालय।” अभिमन्यु ने अपने फोन पर एक पुरानी खबर की कटिंग दिखाई, जिसमें लिखा था कि एक सड़क हादसे में एक लड़की और उसका साथी मारे गए थे, लेकिन उनके साथ एक बच्चा भी था, जिसे सेवा सदन अनाथालय भेज दिया गया था।

भाग 5: सच की तलाश

अभिमन्यु ने कहा, “वह लड़की मेरी बहन प्रिया थी और वह बच्चा आप हो।” रजनी डर गई, “नहीं, यह झूठ है।” अभिमन्यु ने बताया, “प्रिया जब घर से भागी थी, तो वह प्रेग्नेंट थी। हमें बाद में पता चला उसने एक बच्ची को जन्म दिया था और फिर एक्सीडेंट हो गया। उस बच्ची का नाम भी रजनी था, क्योंकि प्रिया ने अपनी डायरी में लिखा था कि वह अपनी बेटी का नाम रजनी रखेगी।”

रजनी रोने लगी, “अगर यह सच है तो आपने 15 साल में मुझे ढूंढा क्यों नहीं?” अभिमन्यु ने बताया, “हमने बहुत ढूंढा, लेकिन अनाथालय वालों ने कोई जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा कि बच्ची को गोद दे दिया गया है, लेकिन किसे दिया यह नहीं बताया।”

अभिमन्यु ने कहा, “अगर तुम सच में मेरी भतीजी हो तो मैं तुम्हें और बच्चों को वापस ले जाऊंगा। तुम्हें वह सब मिलेगा जो तुम्हारा हक है। लेकिन पहले हमें डीएनए टेस्ट करवाना होगा।”

भाग 6: डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट

अगली सुबह अभिमन्यु, रजनी और बच्चों को लेकर देहरादून के अस्पताल गया। डॉक्टर ने दोनों के सैंपल लिए, रिपोर्ट चार दिन में आने वाली थी। अभिमन्यु ने रजनी को वापस मसूरी छोड़ा, साथ में राशन, कपड़े और पैसे भी दिए। रजनी ने पूछा, “अगर यह सब गलत निकला तो मैं आपका कर्ज कैसे चुकाऊंगी?” अभिमन्यु ने कहा, “कोई कर्ज नहीं है, रजनी। अगर तुम मेरी भतीजी नहीं भी हुई तो भी तुम मेरे लिए परिवार जैसी हो।”

तीन दिन रजनी के लिए सदियों जैसे बीते। चौथे दिन अभिमन्यु का फोन आया, “रिपोर्ट आ गई है।” रजनी घबराई हुई बाहर खड़ी थी। अभिमन्यु ने रिपोर्ट देखी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया। “रजनी, तुम मेरी भतीजी नहीं हो।” रजनी के हाथों से रिपोर्ट गिर गई। “तो फिर सब झूठ था। मैं कोई नहीं हूं आपकी।”

अभिमन्यु ने रजनी का हाथ पकड़ा, “रुको। मैंने पूरी बात नहीं कही।” अभिमन्यु की आंखों से आंसू बह रहे थे, “तुम मेरी भतीजी नहीं हो, रजनी। तुम मेरी बेटी हो।”

रजनी को विश्वास नहीं हुआ। “क्या आप क्या कह रहे हैं?” अभिमन्यु ने रिपोर्ट दिखाई, “हमारे बीच पैरेंट-चाइल्ड रिलेशनशिप है। तुम मेरी बेटी हो।”

भाग 7: सच्चाई का उजास

अभिमन्यु ने रजनी को पास बिठाया और सच बताया, “प्रिया मेरी पत्नी थी, बहन नहीं। कृष तुम्हारा बेटा है, मेरा पोता है। 15 साल पहले मेरे परिवार ने हमारी शादी को स्वीकार नहीं किया। मुझे घर से निकाल दिया गया। हम देहरादून में रहते थे। प्रिया प्रेग्नेंट थी। एक दिन जब मैं दिल्ली गया था, उसी दिन सड़क हादसा हो गया। प्रिया चली गई, तुम बच गई। सोशल वेलफेयर की टीम तुम्हें अनाथालय ले गई। मेरे पिताजी ने रिकॉर्ड बदलवा दिए और मुझे तुमसे दूर कर दिया।”

“मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। तुम्हारा नाम बदल दिया गया था। तुम्हें किसी और के नाम से गोद दे दिया गया था। किस्मत ने आज हमें मिला दिया।”

रजनी रोने लगी, “अगर मैं आपकी बेटी हूं तो मेरी जिंदगी इतनी बर्बाद क्यों हुई?” अभिमन्यु ने उसे गले लगा लिया, “क्योंकि मैं तुम्हें बचा नहीं पाया। लेकिन अब मैं सब कुछ ठीक करूंगा। तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को वह सब मिलेगा जो तुम्हारा हक है।”

भाग 8: नई शुरुआत

अभिमन्यु ने रजनी और बच्चों को दिल्ली ले जाने का फैसला किया। रजनी ने डरते हुए पूछा, “समाज मुझे क्या कहेगा?” अभिमन्यु ने कहा, “समाज को जो कहना है कहने दो। तुम मेरी बेटी हो, तुम्हारी इज्जत मेरी इज्जत है। जिसने तुम्हें छोड़ा उसकी गलती है, तुम्हारी नहीं।”

दो महीने बाद रजनी दिल्ली के बड़े घर में रहने लगी। कृष और तान्या अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे। रजनी ने पढ़ाई शुरू की और एक एनजीओ में काम करने लगी, जहां वह गरीब औरतों की मदद करती थी।

भाग 9: जीवन का नया अर्थ

एक दिन अभिमन्यु ने रजनी से कहा, “बेटी, तुमने अपनी जिंदगी में इतना दर्द झेला है, लेकिन हार नहीं मानी। मुझे तुम पर गर्व है।” रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा, अगर वह दर्द नहीं होता तो मैं इतनी मजबूत नहीं बन पाती। किस्मत ने मुझसे सब कुछ छीना, लेकिन आखिर में आप दे दिए।”

अभिमन्यु की आंखों में खुशी के आंसू थे, “अब हम साथ हैं और हमेशा साथ रहेंगे।”

भाग 10: संदेश

उस दिन रजनी ने समझा कि जिंदगी में कितनी भी मुसीबतें आएं, लेकिन अगर हम हार नहीं मानते तो एक दिन खुशियां जरूर लौट आती हैं। कभी-कभी वह खुशियां उस रूप में आती हैं जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती।

समाप्ति

यह कहानी सिर्फ रजनी की नहीं, हर उस इंसान की है जो जिंदगी की कठिनाइयों से लड़कर आगे बढ़ता है। भूख, गरीबी, अकेलापन, समाज की नजरें – सब कुछ झेलने के बाद भी अगर इंसान हार नहीं मानता, तो किस्मत उसे वह दे जाती है जिसकी उसने कभी उम्मीद नहीं की थी।

रजनी की कहानी हमें सिखाती है कि रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं। एक टूटी कुटिया से दिल्ली के बड़े घर तक का सफर रजनी ने अपने हौसले, मेहनत और अपने पिता के प्यार से तय किया।

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