पत्नी को शर्म आती थी पति से… लेकिन सच्चाई सामने आई तो सब रो पड़े

अदृश्य कवच: एक रक्षक की अनकही दास्तान

अध्याय 1: रोहिणी का वह पुराना फ्लैट

दिल्ली की सर्द हवाओं के बीच रोहिणी सेक्टर-8 की वह चार मंजिला इमारत किसी बूढ़े दरख्त की तरह खड़ी थी। पेंट उतरी हुई दीवारें, सीढ़ियों पर जमा धूल और ऊपर-नीचे होती लिफ्ट की चरचराहट—सब कुछ बहुत ही साधारण था। फ्लैट नंबर 302 के दरवाजे पर एक छोटी सी नेमप्लेट लगी थी, जिस पर लिखा था: अजय शर्मा

अंदर की दुनिया बाहर से भी ज्यादा खामोश थी। प्रिया किचन में चाय बना रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर वह चमक नहीं थी जो एक 28 साल की युवती के चेहरे पर होनी चाहिए। वह एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में टीचर थी। उसकी दिनचर्या किसी घड़ी की सुई की तरह सटीक थी—सुबह उठना, नाश्ता बनाना, बस पकड़ना, बच्चों को पढ़ाना और शाम को वापस लौटकर उसी खामोशी का हिस्सा बन जाना।

प्रिया अक्सर बालकनी में खड़े होकर नीचे की सड़क देखती। वहां से गुजरती महंगी गाड़ियाँ, हँसते-खेलते जोड़े और चमकती हुई रोशनी उसे चिढ़ाती थी। तभी उसे अपनी सहेली रश्मि का कल वाला मैसेज याद आता— “प्रिया, विकास ने मुझे सालगिरह पर नई एसयूवी गिफ्ट की है, अगले हफ्ते डिनर पर घर आना!”

प्रिया ने एक ठंडी आह भरी। वह रश्मि के घर कैसे जाएगी? वह अजय के साथ साइकिल पर तो जा नहीं सकती थी और टैक्सी का खर्चा उनके बजट से बाहर था।

अध्याय 2: वर्दी का बोझ

शाम के साढ़े छह बज रहे थे। दरवाजे की घंटी बजी। अजय घर लौटा था। नीली वर्दी, कंधों पर लगे ‘सिक्योरिटी’ के बैज, पैरों में भारी जूते और चेहरे पर दिनभर की थकान। अजय 30 साल का था, लेकिन उसकी आँखों में जो गंभीरता थी, वह उसे उम्र से बड़ा दिखाती थी।

“प्रिया, चाय मिलेगी?” अजय ने जूते उतारते हुए पूछा।

प्रिया ने बिना मुड़े जवाब दिया, “किचन में रखी है, खुद ले लो। मैं थकी हुई हूँ।”

अजय चुपचाप किचन में गया। उसने चाय ली और प्रिया के पास आकर बैठ गया। “आज स्कूल में कैसा रहा?”

“हमेशा की तरह,” प्रिया ने तल्ख लहजे में कहा। “आज फिर एक पैरेंट ने पूछा कि मेरे हस्बैंड क्या करते हैं। मैंने फिर वही झूठ बोला कि आप एक प्राइवेट फर्म में मैनेजर हैं। अजय, आखिर कब तक? मुझे शर्म आती है यह बताने में कि मेरा पति एक गार्ड है। लोग हँसते हैं मुझ पर।”

अजय की पकड़ चाय के कप पर मजबूत हो गई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसके दिमाग में एक फ्लैशबैक चल रहा था—दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल का हेडक्वार्टर, चारों तरफ लगे मॉनिटर्स, नक्शे और हथियारों की तस्वीरें। लेकिन वह वर्तमान में लौट आया।

“काम छोटा-बड़ा नहीं होता प्रिया। मैं मेहनत कर रहा हूँ,” अजय ने धीमे स्वर में कहा।

“मेहनत?” प्रिया चिल्लाई। “16,200 रुपये की नौकरी को मेहनत कहते हैं? मेरी सहेलियाँ विदेशों में छुट्टियाँ मना रही हैं और मैं यहाँ बिजली का बिल बचाने के लिए हीटर नहीं चलाती। मुझे तुम्हारी इस सादगी से नफरत हो गई है!”

प्रिया उठकर बेडरूम में चली गई और दरवाजा धड़ाम से बंद कर लिया। अजय अकेला रह गया। उसने अपनी जेब से एक पुराना, घिसा हुआ फोन निकाला। यह फोन साधारण दिख रहा था, लेकिन इसके भीतर ‘एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन’ का एक जटिल जाल था। एक मैसेज फ्लैश हुआ: ‘टारगेट एक्टिव। मीटिंग कल शाम 8 बजे, ग्रैंड प्लाजा होटल। बैकअप तैयार रखें।’

अध्याय 3: गहरा राज और काला साया

अजय शर्मा कोई साधारण गार्ड नहीं था। वह दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल का एक अंडरकवर सब-इंस्पेक्टर था। पिछले तीन सालों से वह भारत के सबसे खतरनाक अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स और हथियार तस्करी सिंडिकेट ‘द कोबरा नेटवर्क’ को खत्म करने के मिशन पर था।

उसका कवर इतना गहरा था कि उसके विभाग के कमिश्नर और दो करीबी साथियों के अलावा कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ है और क्या कर रहा है। यहाँ तक कि उसकी पत्नी प्रिया को भी यही पता था कि वह एक छोटी सी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड है।

अजय के मन में अक्सर वह रात आती थी, जब उसने यह मिशन स्वीकार किया था। उसके सीनियर ने कहा था, “अजय, यह सिंडिकेट बहुत बेरहम है। अगर उन्हें जरा भी शक हुआ, तो वे सबसे पहले तुम्हारे परिवार को खत्म करेंगे। तुम्हें अपना अस्तित्व मिटाना होगा।”

अजय ने तब अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए अपनी पहचान की बलि दे दी थी। वह चाहता तो उसे आलीशान फ्लैट और सरकारी सुविधाओं में रख सकता था, लेकिन ‘द कोबरा’ के जासूस हर जगह थे। एक साधारण गार्ड की बीवी होना प्रिया के लिए सबसे बड़ा ‘कवच’ था।

अध्याय 4: होटल ग्रैंड प्लाजा की वह शाम

अगले दिन प्रिया की कजिन सिस्टर की सगाई थी। वेन्यू था—दिल्ली का सबसे आलीशान होटल, ‘ग्रैंड प्लाजा’। प्रिया बहुत उत्साहित थी, लेकिन एक डर भी था।

“तुम मत आना अजय,” प्रिया ने तैयार होते हुए कहा। “वहाँ सब बड़े लोग होंगे। तुम्हारी वह पुरानी सफेद शर्ट और काली पैंट… मुझे सबके सामने नीचा दिखाएगी।”

अजय ने उसकी आँखों में देखा। “प्रिया, आज तुम्हारी सुरक्षा के लिए मेरा वहाँ होना जरूरी है।”

“सुरक्षा? मेरी सुरक्षा के लिए पुलिस है वहाँ। तुम बस मेरा मजाक मत बनवाना,” प्रिया ने गुस्से में कहा और अकेले ही टैक्सी लेकर निकल गई।

अजय ने उसे जाते हुए देखा। उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक रक्षक की दृढ़ता थी। उसने अलमारी के एक गुप्त कोने से एक छोटा सा उपकरण निकाला, कान में छिपाया और अपना ‘सिक्योरिटी गार्ड’ वाला रूप धारण कर होटल की ओर चल पड़ा।

अध्याय 5: तानों की बौछार

होटल के हॉल में हर तरफ चमक-धमक थी। प्रिया अपनी मासी और रिश्तेदारों के बीच बैठी थी। तभी मासी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “अरे प्रिया, अजय बेटा नहीं आया? सुना है किसी बड़े होटल की सिक्योरिटी देख रहा है आजकल?”

तभी पास खड़े एक दूर के रिश्तेदार ने ठहाका लगाया, “हाँ-हाँ, कम से कम घर की सिक्योरिटी तो फ्री में मिल जाती होगी! प्रिया, उसे यहाँ बुला लेती, होटल की एंट्री गेट पर किसी गार्ड की कमी होगी तो वह काम आ जाता।”

पूरा हॉल हँस पड़ा। प्रिया का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह जमीन में गड़ जाना चाहती थी। तभी उसने देखा कि अजय हॉल के दरवाजे पर खड़ा है। वही साधारण सफेद शर्ट, वही सादगी। वह सीधा प्रिया के पास आया।

“क्यों आए तुम?” प्रिया ने दांत पीसते हुए फुसफुसाया।

अजय ने कुछ नहीं कहा। उसने जेब से एक छोटी सी सोने की चेन निकाली। “हमारी शादी की तीसरी सालगिरह है आज। कल मैं भूल गया था, यह तुम्हारे लिए।”

प्रिया सन्न रह गई। वह गुस्से में यह बात भूल ही गई थी। उसे याद आया कि अजय ने पिछले कई महीनों से अपनी चाय और नाश्ते के पैसे बचाकर यह चेन खरीदी होगी। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, अचानक पूरे होटल की लाइटें बुझ गईं।

अध्याय 6: मौत का साया और असली चेहरा

अंधेरा होते ही हॉल में चीख-पुकार मच गई। अचानक जनरेटर चला और जो दृश्य सामने था, उसने सबके होश उड़ा दिए।

स्टेज पर पांच नकाबपोश आतंकवादी खड़े थे, जिनके हाथों में AK-47 और ग्रेनेड्स थे। “कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा!” लीडर की आवाज हॉल में गूंजी। “सब अपने फोन और जेवर इस बैग में डाल दो। अगर किसी ने होशियारी दिखाई, तो लाशें बिछा देंगे।”

यह ‘द कोबरा नेटवर्क’ का वह दस्ता था जिसकी खबर अजय को मिली थी। उनकी डील फेल हो गई थी और अब वे अमीर मेहमानों को बंधक बनाकर सरकार से सौदा करना चाहते थे।

प्रिया डर के मारे अजय से चिपक गई। उसका शरीर कांप रहा था। “अजय… ये लोग हमें मार देंगे। कुछ करो अजय!”

अजय ने प्रिया का हाथ कसकर पकड़ा। उसकी आँखों में अब वह थकान नहीं थी, बल्कि एक शिकारी की चमक थी। “घबराओ मत प्रिया। बस मेरी तरफ देखो और यहीं बैठी रहो।”

अजय ने धीरे से अपना हाथ प्रिया के हाथ से छुड़ाया। “मैं वॉशरूम जा रहा हूँ,” उसने कहा।

“क्या? तुम इस वक्त मुझे छोड़कर भाग रहे हो?” प्रिया की आँखों में नफरत भर गई। “तुम सच में कायर हो!”

अजय कुछ नहीं बोला और भीड़ में गायब हो गया।

अध्याय 7: रक्षक का उदय

बाहर गलियारे में पहुँचते ही अजय का व्यक्तित्व पूरी तरह बदल गया। उसने अपना पुराना फोन निकाला। “डेल्टा-1 कॉलिंग। होस्टेज सिचुएशन कंफर्म्ड। सस्पेक्ट्स की संख्या 5। पोजीशन: मेन हॉल। बैकअप को 5 मिनट तक रोको, मैं अंदर से न्यूट्रलाइज कर रहा हूँ।”

अजय ने होटल के फायर सिस्टम और बिजली के पैनल के साथ कुछ तकनीकी छेड़छाड़ की। अचानक हॉल में धुआं फैलने लगा। नकाबपोश घबरा गए। “यह क्या हो रहा है?” लीडर चिल्लाया।

तभी अंधेरे और धुएं के बीच से एक परछाईं निकली। अजय ने बिजली की गति से पहले आतंकवादी पर वार किया। एक सेकंड के भीतर वह जमीन पर था। बिना किसी शोर के अजय ने दूसरे और तीसरे को भी ठिकाने लगा दिया।

हॉल के भीतर लोग बस परछाइयां देख रहे थे। नकाबपोशों को समझ नहीं आ रहा था कि उन पर हमला कौन कर रहा है। अंत में सिर्फ लीडर बचा था। उसने अपनी बंदूक प्रिया की तरफ तान दी। “बाहर आओ! वरना इस लड़की को मार दूँगा!”

अजय धुएं से बाहर निकला। अब उसके हाथ में एक अत्याधुनिक पिस्तौल थी जो उसने मरे हुए आतंकवादी से ली थी।

“अजय?” प्रिया की आवाज गले में ही अटक गई। वह जिस इंसान को कायर समझ रही थी, वह यमराज की तरह सामने खड़ा था।

“बंदूक नीचे डाल दो,” अजय की आवाज हॉल में किसी पत्थर की तरह भारी थी। “खेल खत्म हो गया है।”

लीडर ने ट्रिगर दबाना चाहा, लेकिन अजय की गोली पहले चली। गोली सीधे आतंकवादी के हाथ पर लगी और बंदूक गिर गई। अगले ही पल अजय ने उसे दबोच लिया।

अध्याय 8: सच का सामना

बाहर से पुलिस और कमांडो की टीम हॉल में घुसी। दिल्ली पुलिस के कमिश्नर सबसे आगे थे। उन्होंने अजय के पास आकर उसे सल्यूट किया।

“वेल डन, इंस्पेक्टर अजय! आपने अकेले ही इस नेटवर्क की कमर तोड़ दी। पूरे देश को आप पर गर्व है।”

हॉल में मौजूद हर शख्स की नजरें अजय पर थीं। वे रिश्तेदार, जो चंद मिनट पहले उसका मजाक उड़ा रहे थे, अब अपनी गर्दन झुकाए खड़े थे। मासी की बोलती बंद थी।

प्रिया बस पत्थर बनी अजय को देख रही थी। वह अजय, जो ₹16,200 कमाता था? वह अजय, जो साइकिल चलाता था? वह वास्तव में देश का सबसे जांबाज सिपाही था?

अध्याय 9: प्रायश्चित और नया सवेरा

अगली सुबह, रोहिणी के उस फ्लैट में खामोशी थी, लेकिन यह खामोशी अलग थी। अजय अपनी वर्दी (असली पुलिस वाली) पहनकर तैयार हो रहा था। उसे आज राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया जाना था।

प्रिया उसके पीछे आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। “तुमने मुझसे इतना बड़ा सच क्यों छुपाया अजय? तुमने मुझे अपने तानों से क्यों जलने दिया?”

अजय मुड़ा और उसने प्रिया के आंसू पोंछे। “प्रिया, अगर तुम यह सच जानती, तो तुम्हारे चेहरे पर वह डर नहीं होता जो एक साधारण नागरिक के चेहरे पर होता है। कोबरा के जासूस तुम्हें देख रहे थे। तुम्हारी सादगी और तुम्हारी नफरत ही तुम्हारी सबसे बड़ी सुरक्षा थी। मैं तुम्हें खोने का जोखिम नहीं ले सकता था।”

प्रिया ने अजय को कसकर गले लगा लिया। “मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हें पहचान नहीं पाई। मैं दुनिया की सबसे खुशनसीब औरत हूँ कि मुझे तुम जैसा रक्षक मिला।”

अजय मुस्कुराया। “मैंने कहा था न प्रिया, सादगी में ही असली ताकत होती है।”

उपसंहार

आज अजय शर्मा को दिल्ली पुलिस का ‘गेलंट्री अवार्ड’ मिला है। वे अब एक शानदार सरकारी आवास में रहते हैं। प्रिया अभी भी स्कूल में पढ़ाती है, लेकिन अब जब कोई पूछता है कि उसके पति क्या करते हैं, तो वह सिर उठाकर कहती है— “मेरे पति इस देश के अदृश्य कवच हैं।”

रिश्तेदारों के ताने अब तारीफों में बदल गए हैं, लेकिन अजय आज भी वही सादा इंसान है। क्योंकि उसने सिखाया कि असली नायक वह नहीं जो सूट-बूट पहनकर चमकता है, बल्कि वह है जो खामोशी से आपके चारों ओर सुरक्षा का एक घेरा बुन देता है, भले ही इसके लिए उसे दुनिया की नजरों में गिरना ही क्यों न पड़े।

शिक्षा: किसी व्यक्ति की बाहरी स्थिति से उसकी आंतरिक शक्ति का अंदाजा कभी न लगाएं। सच्चा प्यार और कर्तव्य अक्सर खामोशी और त्याग की भाषा बोलते हैं।