पत्नी ने रचा ऐसा प्लान… कोई सोच भी नहीं सकता था | मध्य प्रदेश |

विश्वासघात की दो दास्तां: समाज का काला चेहरा

आज हम जिन दो घटनाओं की बात करने जा रहे हैं, वे हमारे समाज के उस अंधेरे पक्ष को उजागर करती हैं जहाँ निजी स्वार्थ और अनैतिक/इच्छाएं खून के रिश्तों पर भारी पड़ जाती हैं। ये कहानियाँ मध्य प्रदेश के शिवपुर और उत्तराखंड के ऋषिकेश की हैं, जहाँ प्यार के नाम पर रची गई साजिशों ने हँसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया।

भाग 1: शिवपुर का रमाकांत पाठक हत्याकांड

मध्य प्रदेश के शिवपुर जिले में एक शांत इलाका है—कराहल। यहाँ के नाई मोहल्ले में रमाकांत पाठक (49 वर्ष) अपनी पत्नी साधना पाठक और अपने तीन मासूम बच्चों के साथ रहते थे। रमाकांत चकरामपुरा के एक स्कूल में कर्मचारी थे, जबकि साधना आंगनबाड़ी में काम करती थी। बाहर से देखने पर यह एक सुखी और आत्मनिर्भर परिवार लगता था, लेकिन इस घर की नींव के नीचे विश्वासघात की एक खौफनाक पटकथा लिखी जा रही थी।

रहस्यमयी गुमशुदगी और खौफनाक खुलासा

26 दिसंबर 2025 की सुबह करीब 5:15 बजे रमाकांत यह कहकर घर से निकले कि वे किसी जरूरी काम से सेसईपुरा जा रहे हैं और जल्द लौट आएंगे। जब वे रात तक नहीं लौटे, तो परिवार ने उनकी तलाश शुरू की। अगले दिन 27 दिसंबर को नौनपुरा घाटी में एक अज्ञात शव मिलने की सूचना से हड़कंप मच गया। खाई में एक क्षतिग्रस्त बाइक और पास में ही रमाकांत का शव पड़ा था।

शुरुआत में पुलिस ने इसे महज एक सड़क दुर्घटना माना, लेकिन परिजनों के संदेह और पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने मामले को पलट दिया। डॉक्टरों ने पाया कि रमाकांत के सिर पर किसी भारी और कुंद वस्तु से प्रहार किया गया था, जो दुर्घटना की चोटों से मेल नहीं खाता था। यह साफ हो गया कि यह एक नृशंस/हत्या थी जिसे एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की गई थी।

पेट्रोल पंप, मुस्कान और साजिश

पुलिस ने जब तकनीकी जांच और सीसीटीवी फुटेज खंगाले, तो एक पेट्रोल पंप की फुटेज में रमाकांत को मनीष साकेत और उसके एक दोस्त के साथ बात करते देखा गया। मनीष वही 24 साल का युवक था जो रमाकांत के घर के पास वाले पेट्रोल पंप पर काम करता था।

जांच में यह चौकाने वाला सच सामने आया कि साधना और मनीष के बीच पिछले डेढ़ साल से अवैध/संबंध चल रहे थे। साधना मनीष के साथ अपनी अनैतिक/दुनिया बसाने के लिए इतनी उतावली थी कि उसने अपने पति को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया। उन्होंने मनीष के दोस्त सतनाम को इस काम के लिए 4 लाख रुपये देने का वादा किया, जबकि मनीष की मासिक आय मात्र 8-10 हजार रुपये थी। साधना ने वादा किया था कि काम होने के बाद वह पैसों का इंतजाम कर देगी।

अंत का मंजर

साजिश के तहत, मनीष ने रमाकांत से झूठी दोस्ती बढ़ाई। घटना वाली रात वे रमाकांत को अपनी कार (Swift Dzire) में बैठाकर सुनसान जंगल की ओर ले गए। वहां बहाने से गाड़ी रोककर सतनाम ने रमाकांत के सिर पर डंडे से घातक वार किया। जब वे अचेत हो गए, तो उनका मुंह/दबाकर तब तक नहीं छोड़ा गया जब तक उनकी सांसें नहीं थम गईं। सबूत मिटाने के लिए उन्होंने शव और बाइक को खाई में फेंक दिया। आज मनीष, सतनाम और साधना तीनों अपने किए की सजा जेल में काट रहे हैं।

भाग 2: ऋषिकेश का खौफनाक ‘टॉयलेट’ मर्डर

दूसरी कहानी उत्तराखंड के ऋषिकेश की है, जहाँ चंद्रशेखर नगर जैसे पवित्र क्षेत्र में एक ऐसी घिनौनी/वारदात हुई जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया। यहाँ कुसुम राठी अपने टैक्सी ड्राइवर बेटे नरेंद्र राठी, बहू पूजा और दो छोटे पोतों के साथ रहती थीं।

10 दिनों का रहस्य और ‘अमन’ की एंट्री

1 जुलाई 2020 को नरेंद्र अचानक घर से निकला और फिर कभी वापस नहीं लौटा। नरेंद्र शराब का आदी था और अक्सर पूजा के साथ शारीरिक/मारपीट करता था, जिससे पूजा के मन में उसके प्रति गहरी नफरत भर चुकी थी। जब 10 दिनों तक नरेंद्र का कोई पता नहीं चला, तो मां कुसुम ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस को जांच में पता चला कि नरेंद्र की गैर-मौजूदगी में घर पर अमन नाम का एक प्लंबर अक्सर आता-जाता था।

साजिश का जाल और ‘जिंदा’ होने का नाटक

पुलिस की जांच को भटकाने के लिए 20 जुलाई को पूजा खुद थाने पहुँची और एक नया नाटक रचा। उसने पुलिस से शिकायत की कि नरेंद्र ने उसे फोन कर जान से मारने की धमकी दी है। पुलिस को शक हुआ कि जो आदमी हफ्तों से लापता है और जिसका फोन बंद है, वह अचानक धमकी कैसे दे सकता है? जब सर्विलांस टीम ने कॉल डिटेल्स निकालीं, तो पाया कि जिस फोन से धमकी दी गई थी, उसमें पहले अमन का सिम इस्तेमाल हुआ था। पूजा और अमन अब मुख्य संदिग्ध बन चुके थे।

टॉयलेट के नीचे दफन सच

सख्ती से पूछताछ के बाद पूजा और अमन टूट गए। पूजा ने बताया कि वह नरेंद्र की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी और इसी बीच उसकी मुलाकात अमन से हुई थी, जिसके साथ उसके अवैध/शारीरिक/रिश्ते बन गए थे। 1 जुलाई की रात, जब नरेंद्र नशे में धुत होकर सोया था, अमन ने दुपट्टे से उसका गला/घोंट दिया और पूजा ने उसके पैर मजबूती से पकड़े रखे।

हत्या के बाद उन्होंने लाश को एक बोरे में भरकर घर में ही छिपा दिया। अगले दिन अमन ने एक मजदूर बुलाकर टॉयलेट की सीट तुड़वाई और नीचे बने गड्ढे में नरेंद्र की लाश को दफन कर दिया। इसके ऊपर नई सीट और टाइल्स लगाकर सब कुछ पहले जैसा कर दिया गया। दुनिया को गुमराह करने के लिए वे हरिद्वार गए और वहां से नरेंद्र के सिम से फोन कॉल्स किए ताकि लगे कि वह अभी जीवित है।

निष्कर्ष

जब पुलिस ने टॉयलेट के गड्ढे की खुदाई करवाई, तो वहां से नरेंद्र की सड़ी-गली लाश बरामद हुई। पूजा और अमन को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।

सीख: ये दोनों कहानियाँ हमें यह कड़वा सबक सिखाती हैं कि अनैतिक/संबंध और हिंसा कभी भी शांतिपूर्ण जीवन की नींव नहीं हो सकते। यदि रिश्तों में कड़वाहट इतनी बढ़ जाए कि साथ रहना नामुमकिन हो, तो कानूनी रास्ते खुले हैं, लेकिन हत्या का रास्ता केवल जेल की कोठरी और जीवन भर के पछतावे की ओर ले जाता है। इन घटनाओं में सबसे ज्यादा नुकसान उन मासूम बच्चों का हुआ, जिनके सिर से पिता का साया उठ गया और माँ जेल की सलाखों के पीछे पहुँच गई।

जय हिन्द