“पुलिस की लाठी ने 9 साल के मासूम को रौंदा… लेकिन फिर हुआ चौंकाने वाला सच!

“वर्दी का सच: पंकज की इंसाफ़ की लड़ाई”

भूमिका

अगर सुरक्षा के लिए पहनी गई वर्दी ही जुल्म की पहचान बन जाए तो फरियाद किससे की जाए? क्या वर्दी पहनना किसी को जुल्म करने का लाइसेंस दे देता है? यह कहानी है सत्ता के नशे में चूर पुलिस वालों की, जिन्होंने एक गरीब और मासूम बच्चे पंकज पर जुल्म की सारी हदें पार कर दीं। लेकिन वे यह भूल गए कि वक्त बदलता है, और जब न्याय की घड़ी आती है, तो तख्ते पलट जाते हैं। यह कहानी सिर्फ पंकज की नहीं, बल्कि उस हर इंसान की है जो जुल्म के खिलाफ लड़ता है।

बारिश का दिन, स्टेशन की कहानी

शाम के चार बजे थे। आसमान पर काले बादल छाए हुए थे और रेलवे स्टेशन की छत पर गिरती बारिश की बूंदें किसी बेतरतीब ताल पर बज रहे ढोल की तरह थीं। प्लेटफार्म पर यात्रियों की आवाजें इस शोर में दब गई थीं। उसी भीड़ में, एक कोने में 9 साल का पंकज अपनी गीली प्लास्टिक की बोरी को हसरत भरी निगाहों से देख रहा था। उसके कपड़े, जो कभी किसी और के रहे होंगे, बारिश में भीग कर उसके कमजोर शरीर से चिपक गए थे। उसकी उंगलियां ठंड से नीली पड़ रही थीं, लेकिन उसकी चिंता अपने शरीर की नहीं थी, बल्कि उस बोरी की थी जिसमें आज की कमाई थी—कुछ गीले अखबार, प्लास्टिक की खाली बोतलें, एक टूटा खिलौना और लोहे के कुछ जंग लगे टुकड़े।

पंकज का मन बार-बार अपनी मां कविता देवी की तरफ जाता था, जो पिछले एक हफ्ते से तेज बुखार और खांसी से जूझ रही थी। डॉक्टर की दवाइयों की कीमत पंकज की बोरी में मौजूद कबाड़ से कहीं ज्यादा थी। उसने अपनी कमजोर आवाज में पुकारा, “कबाड़ वाला… कबाड़ वाला…” लेकिन स्टेशन की गहमागहमी में उसकी आवाज किसी को सुनाई नहीं दी।

गरीबी की सबसे बड़ी सजा यही है कि इंसान जिंदा होते हुए भी दूसरों की नजरों में अदृश्य हो जाता है।

पुलिस वालों की सनक

स्टेशन के दूसरे छोर पर, जहां बारिश की बौछार कम थी, पांच पुलिस वाले खड़े थे। उनकी वर्दी पर लगी पट्टियां और कंधों पर चमकते सितारे उनके ताकतवर होने का सबूत थे। इंस्पेक्टर राठौर, जिसके चेहरे पर घमंड साफ दिखता था, अपने चार जूनियरों—शर्मा, यादव, तिवारी और पटेल के साथ ठहाके लगा रहा था। वे अपने मोबाइल फोन पर कोई वीडियो देख रहे थे और ऊंची आवाज में हंस रहे थे।

अचानक राठौर की नजर पंकज पर पड़ी, जो अपनी बोरी घसीटता हुआ उनके करीब से गुजरने की कोशिश कर रहा था। राठौर के दिमाग में एक शैतानी शरारत आई। “ओए छोटे, इधर आ!” राठौर ने कड़कती आवाज में कहा। पंकज ठिठक गया। उसके दिल में एक पल के लिए उम्मीद जागी—शायद ये बड़े साहब उसका कबाड़ खरीद लेंगे या उसे कुछ दान दे देंगे।

वो डरते-डरते उनके पास पहुंचा। “जी साहब…” पंकज ने अदब से सिर झुकाया।

“इस बोरी में क्या छुपा रखा है? कहीं बम तो नहीं है?” राठौर ने ताना मारा। बाकी पुलिस वाले जोर से हंस पड़े।

“नहीं साहब, ये तो सिर्फ कबाड़ है। अखबार और बोतलें हैं। मैं इन्हें बेचकर अपनी बीमार मां के लिए दवा लूंगा,” पंकज ने कांपती आवाज में अपनी बोरी खोलने की कोशिश की।

शर्मा ने आगे बढ़कर एक झटके से बोरी पंकज के हाथ से छीन ली। “दिखा हमें, पहले हमें चेक करना होगा कि इसमें कोई गैरकानूनी चीज तो नहीं।” उसने बोरी को उल्टा कर दिया और सारा कबाड़ गीले फर्श पर बिखर गया।

पंकज बदहवास होकर अपना सामान समेटने लगा। “साहब, प्लीज, ये गंदा हो जाएगा तो कोई नहीं खरीदेगा। मेरी मां बहुत बीमार है। मुझे शाम तक पैसे जमा करने हैं।”

राठौर ने अपने जूते की नोक से एक प्लास्टिक की बोतल को ठोकर मारी। “पैसे? तुझे पता है इस प्लेटफार्म पर खड़े होने के लिए टिकट लगती है? ये सारा सामान अब हमारा है। चल भाग यहां से!”

पंकज की आंखों में आंसू आ गए। उसने हिम्मत जुटाई और राठौर की वर्दी का कोना पकड़ लिया। “साहब, ऐसा मत कीजिए। मैंने सारा दिन बारिश में भीग कर ये इकट्ठा किया है। मेरी मां मर जाएगी अगर मैं दवा न ले गया।”

“तेरी ये हिम्मत?” राठौर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने पंकज को धक्का दिया और फिर अपने भारी जूते से उसके सीने पर जोर की लात मारी। 9 साल का बच्चा फर्श पर लगी रेलिंग से जा टकराया। यादव और तिवारी ने भी मौका हाथ से नहीं जाने दिया और पंकज को थप्पड़ जड़ दिए।

“बड़े साहब से जुबान लड़ाता है, जेल जाना है क्या?”

स्टेशन पर मौजूद एक चाय वाले काका ने ये मंजर देखा तो उससे रहा नहीं गया। “साहब, वो बच्चा है, उसे छोड़ दें। मैं इसके कबाड़ के पैसे दे देता हूं।”

“तू हमें कानून सिखाएगा?” राठौर ने गुस्से से काका की तरफ देखा। “पटेल, इस चाय वाले को भी पकड़ो और थाने ले जाओ। इसका स्टॉल भी जब्त कर लो।”

पंकज जमीन पर पड़ा दर्द से करा रहा था। उसे शरीर के दर्द से ज्यादा इस बात का दुख था कि उसकी मेहनत बेकार हो गई थी। उसे पुलिस वालों की वर्दी से डर लगने लगा। वो वर्दी, जो सुरक्षा की पहचान होनी चाहिए थी, आज जुल्म का लिबास बन चुकी थी।

राठौर ने आखिरी बार उसे धमकी दी, “अगर दोबारा स्टेशन पर नजर आया तो ऐसी जगह डालूंगा जहां से तेरी हड्डी भी बाहर नहीं आएगी। जल्दी भाग यहां से।”

पंकज रोता हुआ खाली हाथ और लंगड़ाता हुआ बारिश में बाहर की तरफ भाग निकला।

पंकज की झोपड़ी, मां का संघर्ष

पंकज अपनी छोटी सी झोपड़ी में पहुंचा, जो शहर के गंदे नाले के पास थी। अंदर कविता देवी एक पुरानी चारपाई पर लेटी बुरी तरह खांस रही थी। पंकज को देखते ही उनकी ममता तड़प उठी।

“पंकज, मेरे बच्चे, तू इतना भीगा हुआ क्यों है? और तेरी आंख के पास ये नीला निशान कैसा है?” कविता देवी ने गिरते-पढ़ते उसे अपने सीने से लगा लिया।

पंकज ने अपनी मां की गोद में सिर रख दिया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसने वह सब कुछ बता दिया जो स्टेशन पर हुआ था। कविता देवी के पास देने को कुछ नहीं था सिवाय अपने आंसुओं और दुआओं के।

“कोई बात नहीं बेटा, भगवान इंसाफ करेगा। तू फिक्र ना कर, मैं ठीक हो जाऊंगी।” उन्होंने झूठ बोला, हालांकि उनका सीना दर्द से फट रहा था।

सच तो ये था कि कविता देवी पंकज की सगी मां नहीं थी। 6 साल पहले मेले के पास कचरे के ढेर के करीब उन्हें ये बच्चा रोता हुआ मिला था। उन्होंने इसे थाने ले जाने की कोशिश की थी, लेकिन वहां मौजूद सिपाही ने उन्हें भगा दिया था। कविता देवी, जो खुद बेऔलाद और विधवा थी, इस बच्चे को घर ले आई और उसे अपना नाम दिया। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की जमा पूंजी इस बच्चे को पालने में लगा दी। वह अक्सर सोचती कि इस बच्चे का असली परिवार कितना तड़प रहा होगा, लेकिन उनके पास उसे ढूंढने का कोई जरिया ना था।

सच का वीडियो, वायरल तूफान

जिस समय रेलवे स्टेशन पर पंकज को पीटा जा रहा था, वहां एक नौजवान लड़का राहुल खामोशी से ये सब देख रहा था। राहुल एक स्थानीय अखबार में इंटर्नशिप कर रहा था और अपने नए कैमरे की टेस्टिंग के लिए स्टेशन आया था। डर की वजह से वह बीच-बचाव तो ना कर सका, लेकिन उसने अपने कैमरे का रुख उन पुलिस वालों की तरफ कर दिया। उसने हर दृश्य रिकॉर्ड कर लिया—राठौर का लात मारना, पंकज का गिड़गिड़ाना, और पुलिस वालों के चेहरों पर वैशी मुस्कान।

घर पहुंचकर राहुल ने जब वो वीडियो देखी तो उसका खून खौलने लगा। “ये रक्षक नहीं, ये तो दरिंदे हैं,” उसने सोचा। उसने फैसला किया कि वो ये वीडियो अपने एडिटर को देगा। लेकिन फिर उसे ख्याल आया कि ताकतवर पुलिस वाले इस खबर को दबवा देंगे। उसने एक बड़ा कदम उठाया—वो वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी और उसके नीचे एक दिल दहला देने वाली बात लिखी।

रात के 10 बजे तक वो वीडियो कुछ 100 लोगों ने देखी थी। लेकिन सुबह होते-होते इस वीडियो ने पूरे देश में एक तूफान खड़ा कर दिया। Facebook, Twitter और WhatsApp के हर ग्रुप में वही दर्दनाक दृश्य घूम रहा था जिसमें एक वर्दीधारी व्यक्ति एक कमजोर बच्चे को ठोकर मार रहा था। जनता का गुस्सा चरम पर था। लोग सड़कों पर निकल आए थे और #JusticeForPoorBoy ट्रेंड करने लगा।

जज राघवेंद्र की दहलीज पर न्याय

जज राघवेंद्र अपने नियम के मुताबिक नाश्ते की मेज पर बैठे अखबार देख रहे थे कि उनके पर्सनल सेक्रेटरी तेजी से कमरे में दाखिल हुए। उनके हाथ में आईपैड था और चेहरे पर घबराहट।

“सर, आपको ये देखना चाहिए। पूरा शहर इस घटना पर विरोध कर रहा है।”

राय ने वीडियो प्ले कर दी। राघवेंद्र ने खामोशी से वीडियो देखना शुरू किया। जैसे ही राठौर ने पंकज को लात मारी, राघवेंद्र के हाथ में मौजूद चाय का कप कांपने लगा। एक जज होने के नाते उन्होंने हजारों केस देखे थे, लेकिन इस बच्चे की आंखों में मौजूद दर्द ने उनके दिल को छलनी कर दिया।

“ये दरिंदगी है। ये वर्दी का अपमान है।” राघवेंद्र की आवाज कड़क उठी। “राय, तुरंत डीजीपी को फोन मिलाओ। मुझे इन पांचों पुलिस वालों की सस्पेंशन और गिरफ्तारी की रिपोर्ट 1 घंटे में चाहिए और इस बच्चे को ढूंढो। मुझे खुद उससे मिलना है।”

जज साहब की टीम काम पर लग गई। पुलिस, जो अब तक खामोश थी, जनता के दबाव और जज साहब के आदेश पर एक्टिव हो गई। अपने मुखबिरों के जरिए पंकज के घर का पता लगाया गया। दोपहर के समय जज राघवेंद्र की गाड़ी उस कच्ची बस्ती के रास्ते पर खड़ी थी जहां पंकज रहता था।

मिलन, पहचान और सच्चाई

जब राघवेंद्र उस छोटी सी झोपड़ी में दाखिल हुए तो वहां की बदहाली देखकर उनकी आंखें भर आईं। पंकज एक कोने में बैठा अपनी मां के सिर पर गीली पट्टियां रख रहा था। जज साहब को देखकर पंकज डर कर पीछे हट गया।

“साहब, मैंने कुछ नहीं किया। मैं दोबारा स्टेशन नहीं जाऊंगा,” उसने हाथ जोड़ लिए।

राघवेंद्र उसके सामने फर्श पर बैठ गए। “बेटा, डरो मत। मैं तुम्हें सजा देने नहीं, इंसाफ देने आया हूं।”

जज साहब की नजर पास लेटी कविता देवी पर पड़ी। उनकी हालत बहुत नाजुक थी। उन्होंने तुरंत सरकारी एंबुलेंस बुलवाई और कविता देवी को शहर के सबसे बेहतरीन अस्पताल भेजने का आदेश दिया।

जब पंकज को एंबुलेंस में बिठाया जा रहा था, तो उसकी शर्ट की आस्तीन थोड़ी ऊपर सरक गई। राघवेंद्र की नजर पंकज के दाहिने हाथ पर पड़ी, जहां कोहनी के पास एक गहरे भूरे रंग का निशान था—जो बिल्कुल एक छोटे से सितारे जैसा था। राघवेंद्र का दिल जोर से धड़कने लगा। उनके बेटे अर्जुन के हाथ पर भी बिल्कुल ऐसा ही जन्मजात निशान था।

“यह… यह निशान?” राघवेंद्र ने कांपती आवाज में पूछा।

कविता देवी ने अस्पताल के बेड पर लेटे हुए कमजोर आवाज में कहा, “साहब, यह बच्चा मुझे छह साल पहले मेले में मिला था। इसके पास यही निशान इसकी असली पहचान है। मैंने बहुत ढूंढा इसके मां-बाप को, लेकिन मैं गरीब औरत क्या करती?”

राघवेंद्र की दुनिया जैसे घूम गई। उन्होंने कांपते हाथों से पंकज का चेहरा अपने हाथों में लिया। वही नैन-नक्श, वही माथा। सिर्फ छह साल की तंगहाली ने इस मासूम चेहरे को वक्त से पहले बड़ा कर दिया था।

“अर्जुन…” राघवेंद्र की आवाज रुंध गई। “पंकज, तुम पंकज नहीं हो। तुम मेरे अर्जुन हो।” उन्होंने उसे गले से लगा लिया और वह जज, जिसके सामने बड़े-बड़े अपराधी रोते थे, आज एक बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो रहा था।

अदालत की सुनवाई: वर्दी की सच्चाई

तीन दिन बाद अदालत का कमरा खचाखच भरा हुआ था। मीडिया के कैमरे बाहर लगे थे और अंदर सन्नाटा था। कटघरे में इंस्पेक्टर राठौर, शर्मा, यादव, तिवारी और पटेल खड़े थे। उनके चेहरों से वह घमंड गायब था। आज वे आम मुजरिमों की तरह सिर झुकाए खड़े थे।

केस की सुनवाई शुरू हुई। पत्रकार राहुल ने अपनी गवाही दी और वह वीडियो रिकॉर्ड पर लाई गई। चाय वाले काका ने भी पुलिस वालों के खिलाफ बयान दिया। लेकिन सबसे अहम पल वो था जब अर्जुन (पंकज) कटघरे में आया। उसने जज साहब की तरफ देखा, जो आज न्याय की कुर्सी पर नहीं बल्कि एक फरियादी के तौर पर सामने बैठे थे।

अर्जुन ने अपनी मासूम जुबान में वो सारा जुल्म बताया जो उस पर बीता था। “साहब, मैं सिर्फ अपनी मां की दवा के लिए पैसे मांग रहा था। लेकिन उन्होंने मेरा कबाड़ भी छीन लिया और मुझे मारा भी।”

अर्जुन के इन शब्दों ने वहां मौजूद हर इंसान की आंख को नम कर दिया।

राठौर के वकील ने बचाव की कोशिश की। “माय लॉर्ड, ये सिर्फ एक मामूली अनुशासनात्मक कार्यवाही थी। पुलिस का इरादा बुरा नहीं था।”

“खामोश हो जाइए!” कार्यवाहक जज ने डेस्क बजाया। “वीडियो में जो हिंसा दिख रही है, वह कार्यवाही नहीं, बल्कि इंसानियत के खिलाफ अपराध है। और सबसे बड़ा अपराध यह है कि आपने उस शपथ का अपमान किया जो आपने जनता की सुरक्षा के लिए ली थी।”

अदालत ने अपना फैसला सुनाने के लिए सबको शांत कराया।

न्याय का फैसला

“यह अदालत इंस्पेक्टर राठौर को इस घटना का मुख्य जिम्मेदार मानते हुए 5 साल की कड़ी कैद और ₹5 लाख जुर्माने की सजा सुनाती है। बाकी चारों पुलिस वालों को अपराध में साथ देने पर तीन-तीन साल जेल की सजा सुनाई जाती है। इसके साथ ही इन पांचों को हमेशा के लिए नौकरी से बर्खास्त किया जाता है।”

फैसला सुनते ही राठौर के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जिस वर्दी के नशे में उसने एक गरीब बच्चे को कुचला था, आज वही वर्दी उसके शरीर से उतार दी गई।

नया जीवन, नई शुरुआत

अदालत के बाहर राघवेंद्र ने अर्जुन का हाथ थाम रखा था। कविता देवी जिनका इलाज जज साहब ने अपनी देखरेख में करवाया, अब काफी बेहतर थी। राघवेंद्र कविता देवी के पास गए और उनके सिर पर आदर से हाथ रखा।

“मां जी, आपने मेरे बेटे को मरने से बचाया और उसे एक नेक इंसान बनाया। अर्जुन मेरा बेटा जरूर है, लेकिन आप उसकी वो मां हैं जिसने उसे मुश्किल वक्त में सहारा दिया। अब आप हमारी हवेली में रहेंगी, मेरे बेटे की दादी बनकर।”

कविता देवी की आंखों में खुशी के आंसू थे। अर्जुन ने एक हाथ अपने असली पापा का पकड़ा और दूसरा कविता देवी का। बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन आज वह इंसाफ लेकर आई थी।

रेलवे स्टेशन के कबाड़ से उठाकर कुदरत ने अर्जुन को उसके असली मुकाम तक पहुंचा दिया था। किस्मत का पहिया घूम चुका था। जुल्म जेल की दीवारों के पीछे था और सच्चाई अपनी पूरी शान के साथ जीत कर उभरी थी।

कहानी का संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि वक्त कभी एक जैसा नहीं रहता। आज जिस कमजोर को आप अपने पैरों तले रौंद रहे हैं, हो सकता है कल वही आपकी तकदीर का फैसला करने वाले का सबसे प्यारा हो। न्याय की चक्की धीरे चलती है, लेकिन पीसती बहुत बारीक है।

पंकज (अर्जुन) की कहानी हर उस बच्चे की आवाज है, जो गरीबी, अन्याय और जुल्म का शिकार होता है। यह कहानी हमें जगाती है कि समाज, कानून और मीडिया की ताकत मिलकर किसी भी पीड़ित को न्याय दिला सकती है।

समाप्ति

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क्योंकि असली ताकत वर्दी में नहीं, इंसानियत में है।
जुल्म चाहे जितना भी बड़ा हो, सच और न्याय की जीत हमेशा होती है।