प्रेमी से धोखा मिलने पर लड़की ने प्रेमी को पेड़ से बांध कर दी सजा/

विश्वासघात का विष और प्रतिशोध की भीषण ज्वाला
अध्याय १: डूंगरपुर की खुशहाली और एक पिता का गर्व
मध्य प्रदेश के इंदौर जिले की धूल भरी सड़कों से दूर, हरियाली के बीच बसा है डूंगरपुर गाँव। यहाँ की हवा में मिट्टी की सोंधी महक और लोगों के दिलों में सादगी बसी थी। इसी गाँव के एक प्रतिष्ठित किसान थे धीरज कुमार। धीरज कुमार ने अपना पूरा जीवन मिट्टी से सोना उगाने में बिता दिया था। उनके पास ७-८ एकड़ की उपजाऊ भूमि थी, जिसे उन्होंने खून-पसीने से सींचा था। गाँव में धीरज कुमार का नाम बड़े ही आदर और सम्मान के साथ लिया जाता था। उनके लिए उनकी इज्जत उनकी जान से बढ़कर थी।
धीरज कुमार के दो बच्चे थे—बेटी कोमल और छोटा बेटा किशन। कोमल बचपन से ही शांत स्वभाव की थी, लेकिन उसकी आँखों में ऊँचे सपने तैरते थे। जब उसने १२वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की, तो पूरे गाँव में मिठाई बांटी गई। कोमल ने अपने पिता के पास जाकर संकोचवश कहा, “पिताजी, मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ। शहर के बड़े कॉलेज में जाकर अपना भविष्य बनाना चाहती हूँ।”
धीरज कुमार अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। उन्होंने सुना था कि शहर की चकाचौंध में मासूम जिंदगियाँ अक्सर भटक जाती हैं। लेकिन कोमल ने अपने पिता के चरणों को छूकर प्रतिज्ञा ली, “पिताजी, मैं वादा करती हूँ कि आपकी पगड़ी पर कभी आंच नहीं आने दूंगी। आपकी इज्जत मेरी पहली प्राथमिकता होगी।” बेटी के इन शब्दों ने पिता का दिल जीत लिया और उन्होंने उसे शहर के कॉलेज में प्रवेश दिलाने की अनुमति दे दी।
अध्याय २: शहर की डगर और प्रीतम का ‘मसीहा’ अवतार
कोमल का कॉलेज जीवन शुरू हुआ। वह सुबह ८:०० बजे बस पकड़ती और शाम को ४:०० बजे तक घर लौट आती। शुरू में सब कुछ सामान्य था। लेकिन एक दिन बस में बहुत ज्यादा भीड़ थी। कोमल एक कोने में खड़ी थी, तभी कॉलेज के दो /लु/च्चे/ लड़कों ने उसे घेर लिया। वे जानबूझकर कोमल से सटकर खड़े होने लगे और उसे /गं/दे/ इशारे करने लगे। जब कोमल ने विरोध किया, तो उन्होंने उसकी /चु/न्नी/ खींचने की कोशिश की।
तभी बस की पिछली सीट से एक युवक बिजली की तेजी से उठा। उसका नाम प्रीतम था। प्रीतम ने न केवल उन लड़कों को जमकर फटकारा, बल्कि अपने बैग से एक धारदार चाकू निकालकर उनकी गर्दन के पास ले गया। उसने दहाड़ते हुए कहा, “अगर आइंदा इस लड़की की तरफ आँख उठाकर भी देखा, तो तुम दोनों को यही /का/ट/ डालूँगा।” लड़के डर के मारे अगले ही स्टॉप पर उतर गए।
कोमल के लिए प्रीतम उस समय किसी भगवान से कम नहीं था। उसने प्रीतम का आभार व्यक्त किया। प्रीतम ने बड़ी शालीनता से बात की और कोमल का विश्वास जीत लिया। यहीं कोमल से पहली बड़ी भूल हुई। उसने प्रीतम को अपना मोबाइल नंबर और घर का पता दे दिया। उसे लगा कि जो इंसान उसकी रक्षा के लिए जान जोखिम में डाल सकता है, वह कभी गलत नहीं हो सकता।
अध्याय ३: दोस्ती, प्रेम और विश्वास का मायाजाल
धीरे-धीरे प्रीतम और कोमल के बीच बातचीत बढ़ने लगी। प्रीतम ने खुद को एक बहुत ही सभ्य और धनी परिवार का लड़का बताया। वह कोमल से घंटों बातें करता, उसकी तारीफों के पुल बांधता। कोमल उसके प्रेम के जाल में इस कदर उलझ गई कि उसे प्रीतम के व्यवहार में छिपी /म/क्का/री/ नजर ही नहीं आई।
प्रीतम और कोमल अक्सर कॉलेज के बाद मिलने लगे। यहाँ तक कि प्रीतम एक-दो बार कोमल के गाँव भी गया, जहाँ वह धीरज कुमार से बहुत ही आदर के साथ मिला। धीरज कुमार को लगा कि उनकी बेटी की पसंद बहुत अच्छी है। लेकिन उन्हें क्या पता था कि प्रीतम एक /शा/तिर/ और /चरित्रहीन/ युवक था, जिसकी नजर केवल कोमल की /म/र्या/दा/ पर थी।
अध्याय ४: २ जुलाई २०२५ – काली रात की शुरुआत
वक्त बीतता गया और २ जुलाई २०२५ का वह मनहूस दिन आ गया। शाम के ५:०० बजे प्रीतम का फोन आया। उसकी आवाज में एक अजीब सा उत्साह था। उसने कहा, “कोमल, आज मेरा जन्मदिन है। मैंने जानबूझकर सुबह नहीं बताया क्योंकि मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था। आज शाम को शहर के एक नामी होटल में मैंने एक छोटा सा जश्न रखा है। तुम्हें वहां आना ही होगा।”
कोमल पहले तो झिझकी, क्योंकि उसे रात में घर लौटने में डर लग रहा था। लेकिन प्रीतम ने इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए कहा, “क्या तुम अपने रक्षक के लिए इतना भी नहीं कर सकती?” कोमल मान गई। उसने अपने पिता से झूठ बोला कि उसकी सहेली रिया का जन्मदिन है और वह रात ९:०० बजे तक लौट आएगी। धीरज कुमार ने अपनी बेटी पर अटूट विश्वास करते हुए उसे जाने दिया।
जब कोमल होटल पहुँची, तो उसने देखा कि वहाँ प्रीतम अकेला नहीं था। उसके साथ उसका एक दोस्त विकास भी था। विकास की आँखें कोमल को देखकर /ह/वस/ से चमक रही थीं। कोमल ने असहज महसूस किया, लेकिन प्रीतम ने उसे बातों में बहला लिया।
अध्याय ५: /ह/वस/ का तांडव और /दु/रा/चा/र/
होटल के कमरे में संगीत बज रहा था। प्रीतम और विकास ने बीयर की बोतलें खोल लीं। उन्होंने कोमल पर भी पीने का दबाव बनाया। जब कोमल ने मना किया, तो प्रीतम ने कहा, “आज मेरा दिन है कोमल, क्या तुम मेरा साथ नहीं दोगी? यह सिर्फ एक कोल्ड ड्रिंक जैसा है।” कोमल ने दबाव में आकर एक गिलास पी लिया।
उसे नहीं पता था कि उस बीयर में नशीली गोलियाँ मिलाई गई थीं। धीरे-धीरे कोमल का सिर चकराने लगा। उसकी दृष्टि धुंधली हो गई और शरीर शिथिल पड़ गया। वह /बे/सु/ध/ होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। यही वह क्षण था जिसका उन दोनों /है/वानों/ को इंतजार था।
रात के सन्नाटे में, प्रीतम ने अपनी ही ‘प्रेमिका’ के साथ /अ/मा/न/वीय/ /कु/कृत्य/ किया। विकास भी पीछे नहीं रहा। उन दोनों ने मिलकर कोमल की /आ/बरू/ को /नो/चा/। कोमल /अ/र्ध/मू/र्छि/त/ अवस्था में /क/राह/ती/ रही, लेकिन उन /रा/क्ष/सों/ को दया नहीं आई। उन्होंने पूरी रात कोमल का /श/री/रि/क/ /शो/ष/ण/ किया।
अध्याय ६: विश्वास का कत्ल और /क/लं/कि/त/ सुबह
अगली सुबह जब कोमल की आँख खुली, तो उसने खुद को /नि/र्व/स्त्र/ पाया। उसके शरीर पर /नी/ल/ के निशान थे और आत्मा छलनी हो चुकी थी। वह फूट-फूटकर रोने लगी। प्रीतम ने उसे दिलासा देने के बजाय धमकी भरे लहजे में कहा, “चुप रहो! अगर किसी को बताया तो तुम्हारी तस्वीरें वायरल कर दूँगा। वैसे भी मैं तुमसे शादी कर लूँगा, तो रोने की क्या बात है?”
कोमल भारी मन से घर लौटी। धीरज कुमार परेशान थे, लेकिन कोमल ने फिर झूठ बोला कि वह सहेली के यहाँ सो गई थी। वह दिन-रात घुटने लगी। प्रीतम ने अब उसका फोन उठाना बंद कर दिया था। वह समझ गई थी कि उसे /लू/टा/ गया है।
अध्याय ७: /ग/र्भ/ और पिता का प्रतिशोध
एक महीने बाद, कोमल को कॉलेज में चक्कर आए। जब उसकी सहेलियां उसे डॉक्टर के पास ले गईं, तो रिपोर्ट ने कोमल के जीवन को राख कर दिया। वह /ग/र्भ/व/ती/ थी। कोमल अब और नहीं सह सकी। उसने घर आकर रोते हुए सब कुछ अपने पिता और भाई किशन को बता दिया।
धीरज कुमार की दुनिया उजड़ गई। उनकी पगड़ी धूल में मिल चुकी थी। किशन का हाथ गुस्से से कांपने लगा। धीरज कुमार ने अपनी बेटी को गले लगाया और कहा, “बेटी, तू रो मत। जिसने तेरे साथ यह किया है, उसे सजा मैं दूँगा। कानून बहुत धीमा है, लेकिन एक पिता का न्याय तुरंत होगा।”
अध्याय ८: मौत का निमंत्रण
धीरज कुमार ने एक योजना बनाई। उन्होंने कोमल से कहा कि वह प्रीतम को आखिरी बार मिलने के लिए घर बुलाए। कोमल ने प्रीतम को फोन किया और कहा, “पिताजी और भाई बाहर गए हैं। मैं अकेली हूँ और तुम्हारे साथ रात बिताना चाहती हूँ।” प्रीतम की /ह/वस/ एक बार फिर जाग गई और वह तुरंत मोटरसाइकिल उठाकर डूंगरपुर के लिए निकल पड़ा।
जैसे ही प्रीतम घर के अंदर घुसा, धीरज कुमार और किशन ने पीछे से दरवाजा बंद कर दिया। प्रीतम कुछ समझ पाता, उससे पहले ही किशन ने एक भारी डंडे से उसके सिर पर वार किया। प्रीतम जमीन पर गिर पड़ा। उन्होंने उसे घसीटकर आंगन के पुराने पेड़ के पास ले जाकर मोटी रस्सियों से बांध दिया।
अध्याय ९: /वी/भ/त्स/ न्याय और अंत
धीरज कुमार की आँखों में खून उतर आया था। उन्होंने एक तेज धार वाला /गं/डा/सा/ निकाला। उन्होंने कोमल को बुलाया और उसके हाथ में एक छोटा चाकू दिया। धीरज कुमार दहाड़े, “कोमल! जिस अंग की वजह से इसने तेरी जिंदगी बर्बाद की, आज उसे तू खुद /का/टे/गी/!”
कांपते हाथों लेकिन जलती हुई आँखों के साथ कोमल ने प्रीतम का /गु/प्तां/ग/ /का/ट/ डाला। प्रीतम की /ची/खें/ रात के सन्नाटे को चीरने लगीं, लेकिन धीरज कुमार ने उसके मुँह में कपड़ा ठूंस दिया था। इसके बाद धीरज कुमार ने अपनी बेटी से चाकू लिया और एक ही झटके में प्रीतम का /ग/ला/ /रे/त/ दिया। प्रीतम का तड़पता हुआ शरीर शांत हो गया।
रात के १:३० बजे, धीरज कुमार, कोमल और किशन के साथ थाने पहुँचे। धीरज कुमार ने खून से सना चाकू मेज पर रखा और कहा, “साहब, मैंने एक /है/वान/ का अंत किया है। मुझे और मेरे बच्चों को गिरफ्तार कर लीजिए।”
उपसंहार
पुलिस ने प्रीतम का शव बरामद किया। पूरे गाँव में मातम और सन्नाटा पसर गया। धीरज कुमार और उनका परिवार आज जेल में है। समाज इस घटना पर बंटा हुआ है। कुछ कहते हैं कि धीरज कुमार ने जो किया वह सही था, जबकि कुछ इसे कानून का उल्लंघन मानते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी खड़ा है—क्या कोमल जैसी मासूमों को इंसाफ के लिए इतना /भी/ष/ण/ रास्ता अपनाना चाहिए? क्या समाज और कानून मिलकर ऐसी /है/वा/नि/य/त/ को पहले नहीं रोक सकते?
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