फुटपाथ वाली लड़की का सच्चा प्यार 😢 | हैसियत नहीं दिल देखो

फुटपाथ से वर्दी तक: एक अनकही दास्तां

प्रस्तावना

शाम का समय था और आसमान में नारंगी आभा बिखरने लगी थी। ऑफिस से घर लौटते हुए आर्यन अपनी मोटरसाइकिल की रफ्तार थोड़ी धीमी करके मोहल्ले की उस भीड़भाड़ वाली सड़क से गुजर रहा था। दिनभर की भागदौड़ और ऑफिस की फाइलों के बोझ से उसका शरीर थक कर चूर हो चुका था। गाड़ियों के हॉर्न का शोर और धुएं का गुबार उसके सिर में दर्द पैदा कर रहा था। उसका मन बस यही कर रहा था कि किसी तरह जल्दी से घर पहुंचे, मां के हाथ की चाय पिए और सुकून की सांस ले। लेकिन जैसे ही उसकी बाइक उस पुराने शिव मंदिर के पास वाले मोड़ पर पहुंची, उसकी नजरें बरबस ही फुटपाथ के किनारे खिसक गई।

वहां एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे वह लड़की बैठी थी। उसके कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे। बाल ऐसे उलझे हुए थे मानो हफ्तों से सुलझाए ना गए हों और चेहरे पर धूल की एक परत जमी थी। लेकिन उस धूल के पीछे भी उसके नैन नक्श में एक अजीब सी तीक्ष्णता थी। उसके सामने एक छोटा सा स्टील का कटोरा रखा था जिसमें गिने-चुने सिक्के पड़े थे।

वह पहली मुलाकात

आर्यन का हाथ अपने आप बाइक के ब्रेक पर गया। वह पिछले कई महीनों से रोज इसी रास्ते से गुजरता था और हर रोज उसे उसी जगह उसी मुद्रा में बैठे देखता था। ना जाने क्यों आज उसे देखकर आर्यन के मन में दया का एक ज्वार सा उमड़ पड़ा। उसने सोचा— “हे ईश्वर, यह भी किसी की बेटी होगी। ना जाने किन हालातों ने इसे सड़क पर ला बिठाया है।”

उसने बाइक को किनारे खड़ा किया, अपनी जेब टटोली और 10 का एक नोट निकालकर उसके कटोरे में डालते हुए बड़े ही नम्र भाव से कहा, “फिलहाल छुट्टे पैसे नहीं हैं, यह रख लो। शायद कुछ काम आ जाए।”

उस लड़की ने बिना एक शब्द कहे धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें जो काजल के बिना भी गहरी थीं, सीधे आर्यन की आंखों में झांकने लगीं। उसने नोट उठाया और एक हल्की, बहुत ही हल्की मुस्कान उसके होठों पर तैर गई। वह मुस्कान इतनी रहस्यमई थी कि आर्यन पल भर के लिए असहज हो गया। उसकी आंखें आर्यन के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं, जैसे वह उसके भीतर चल रहे विचारों को पढ़ रही हो। आर्यन को एक सिहरन महसूस हुई। उसने बिना कुछ और कहे तुरंत बाइक स्टार्ट की और घर की ओर बढ़ गया।

रिश्तों की अनकही शुरुआत

अगले दिन फिर वही हुआ। जैसे ही शाम को आर्यन ऑफिस से लौटकर मंदिर के पास वाले मोड़ पर पहुंचा, वह लड़की अपनी जगह से उठकर थोड़ा आगे आ गई। इस बार उसने हाथ नहीं फैलाया, बस खड़ी रही। आर्यन ने फिर अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और उसकी हथेली पर रख दिए। सिक्के देते समय आर्यन की उंगलियां उस लड़की की हथेली से छू गईं। उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। आर्यन ने मन ही मन सोचा, “आखिर यह लड़की मुझे ऐसे क्यों देखती है? क्या यह सिर्फ पैसों की उम्मीद है या फिर इसके पीछे कोई और बात है?”

दिन बीतते गए और यह एक नियम सा बन गया। आर्यन का उस रास्ते से गुजरना, बाइक रोकना और उस लड़की की मदद करना। वह पैसे देता, कभी-कभी फल या बिस्किट दे देता और वह लड़की बिना कुछ कहे बस उसे निहारती रहती। एक शाम आर्यन जब घर लौटा तो वह अपनी बालकनी में खड़ा होकर चाय पी रहा था। अचानक उसकी नजर नीचे गली में पड़ी। उसने देखा कि वही लड़की आज उसके घर के आसपास मंडरा रही थी। वह कभी खंभे के पीछे छिपती तो कभी उसके घर की खिड़कियों की ओर देखती।

आर्यन का दिल फिर पसीज गया। उसने ऊपर से ही आवाज लगाई, “रुको वहीं रुको, मैं अभी आता हूं।” उसने अपनी मां से रोटियां और सब्जी पैक करवाई और नीचे दौड़कर आया। जैसे ही उसने वह टिफिन उस लड़की की ओर बढ़ाया, लड़की ने खाना थाम लिया। लेकिन खाना लेते वक्त भी उसकी निगाहें सिर्फ और सिर्फ आर्यन के चेहरे पर टिकी थीं। उन आंखों में भूख कम और कोई गहरी कहानी ज्यादा नजर आ रही थी।

वह अजीब इकरार

एक शाम, जब मंदिर में आरती की घंटियां बज रही थीं, उस लड़की ने अचानक आगे बढ़कर आर्यन का हाथ पकड़ लिया। आर्यन बुरी तरह चौंक गया। उसने झटके से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन उस लड़की की पकड़ में गजब की मजबूती थी।

उसने बहुत ही धीमी और कंपकपाती आवाज में कहा, “डरिए मत बाबूजी। मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं।”

आर्यन ने हड़बड़ाहट में कहा, “यह क्या बदतमीजी है? हाथ छोड़ो मेरा।”

लड़की ने धीरे से उसका हाथ छोड़ दिया और बोली, “मुझे आपके पैसों की भूख नहीं है बाबूजी। मुझे तो आपके मन की जरूरत है। मैं… मैं आपको पसंद करने लगी हूं। जब भी आपको देखती हूं तो लगता है कि मेरा सूनापन खत्म हो गया।”

आर्यन गुस्से से लाल हो गया। उसने उसे डांटते हुए कहा, “तुझे शर्म नहीं आती? अपनी हालत देखी है? एक सड़क पर रहने वाली होकर ऐसी बातें करती है? मैं इंसानियत के नाते तेरी मदद करता रहा और तूने उसका यह मतलब निकाला?”

लड़की की आंखों में कोई डर नहीं आया। उसने बेहद गंभीर स्वर में बोली, “प्रेम हैसियत और कपड़े देखकर नहीं होता बाबूजी। जब मन किसी से जुड़ जाए तो फिर सामने वाला राजा हो या रंक, कोई फर्क नहीं पड़ता।”

शक और जुदाई

आर्यन वहां से गुस्से में निकल गया, लेकिन उसके शब्द उसका पीछा करते रहे। उसने अपने दोस्त सुमित को यह बात बताई। सुमित ने कहा, “यार, ये सब इन लोगों की चाल होती है। वह तुझे फंसाना चाहती है। संभल जा भाई।”

आर्यन को सुमित की बात सही लगी। अगले दिन उसने उस लड़की को पुलिस की धमकी दी। लड़की खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली, “आप चाहे तो पूरी दुनिया से डरा दें बाबूजी, मगर मुझे मौत का भी डर नहीं है। क्या आपके मन में मेरे लिए रत्ती भर भी जगह नहीं है?”

आर्यन ने कठोर होकर कहा, “मेरे लिए तुम सिर्फ एक अनजान भिक्षुक हो और उससे ज्यादा कुछ नहीं।”

इतना सुनते ही उस लड़की के चेहरे के भाव बदल गए। उसने खाना वापस आर्यन की ओर बढ़ाते हुए कहा, “अगर आप यही समझते हैं तो ठीक है। मुझे अब आपके दिए अन्न या धन की कोई जरूरत नहीं। लेकिन इतना जरूर जान लीजिएगा, मेरे मन में आपके लिए जो भाव थे, वे गंगाजल की तरह पवित्र थे।” इतना कहकर वह अंधेरे की ओर बढ़ गई।

महीने बीत गए, वह लड़की गायब हो गई। आर्यन का मन अशांत रहने लगा। उसे अपनी कठोरता पर पछतावा होने लगा। वह उसे हर जगह ढूंढने लगा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

बारिश की रात और सत्य का खुलासा

सावन की पहली बारिश के दिन, आर्यन ने उसे फिर उसी पीपल के पेड़ के नीचे भीगते हुए पाया। वह बीमार थी। आर्यन दौड़कर उसके पास गया और माफी मांगी। लड़की ने फिर पैसे लेने से मना कर दिया और कहा, “बस अपनी नाराजगी छोड़ दीजिए।”

उनके बीच एक बिना नाम का रिश्ता पनपने लगा। आर्यन ने उसे अपनाने का मन बना लिया था। उसने सोचा कि वह उसे इस नरक से निकालेगा और एक नई पहचान देगा। लेकिन तभी वह फिर गायब हो गई। इस बार वह हफ्तों तक नहीं मिली। आर्यन टूट गया।

घर पर उसकी शादी की बात चलने लगी। मां की कसम की वजह से वह लड़की (सलोनी) को देखने के लिए तैयार हो गया। जिस दिन मेहमान आए थे, आर्यन का मन कहीं और था। वह “ना” कहने ही वाला था कि घर के बाहर पुलिस की जीप रुकी।

क्लाइमैक्स: एसीपी गौरी सिंह

दरवाजा खुला और एक महिला पुलिस अफसर अंदर आई। खाकी वर्दी, कंधे पर चमकते सितारे। उसने चश्मा हटाया—वह वही लड़की थी!

आर्यन हक्का-बक्का रह गया। “तुम?”

उसने मुस्कुराते हुए कहा, “आर्यन, मैं एसीपी गौरी सिंह हूं।”

उसने बताया कि वह एक अंडरकवर मिशन पर थी। शहर में बच्चों को अगवा करने वाले एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश करने के लिए उसने भिखारी का रूप धरा था। छह महीने उसने फुटपाथ पर बिताए, अपमान सहा, लेकिन उस दौरान केवल आर्यन ही था जिसने उसकी रूह को देखा।

गौरी ने भावुक होकर कहा, “तुम इकलौते थे आर्यन जिसने उस गंदे लिबास के पीछे एक इंसान को देखा। तुमने मुझे इज्जत दी। तुमने मुझसे तब प्यार किया जब मैं एक भिखारी थी, न कि अब जब मैं इस वर्दी में हूं।”

उसने बताया कि वह मुठभेड़ में घायल हो गई थी और अस्पताल में थी, इसलिए वापस नहीं आ पाई। वह आज यहां किसी को गिरफ्तार करने नहीं, बल्कि आर्यन के सामने अपने प्यार का इजहार करने आई थी।

सुखद अंत

सलोनी का परिवार और आर्यन की मां सब हैरान थे। गौरी ने सलोनी के पिता की ओर देखकर कहा, “आप जिस लड़के का रिश्ता ठुकराने की सोच रहे थे, उसने एक बेसहारा की जान बचाई है और उसे निस्वार्थ प्रेम दिया है। ऐसा हीरा आज के जमाने में मिलना मुश्किल है।”

आर्यन की मां की आंखों में गर्व के आंसू थे। उन्होंने गौरी का हाथ थामा और कहा, “मुझे मेरी बहू मिल गई है।”

आर्यन और गौरी की कहानी ने साबित कर दिया कि प्रेम वास्तव में हैसियत, कपड़े या ओहदे का मोहताज नहीं होता। वह तो बस दो रूहों का मिलन है जो एक-दूसरे को उनकी सादगी में पहचान लेते हैं। मंदिर की सीढ़ियों से शुरू हुआ वह सफर अब एक अटूट बंधन में बदल चुका था।