बनारस के लड़के और रशियन एलिना की दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी

बनारस से रूस तक: एक रूहानी प्रेम गाथा

अध्याय 1: गंगा की लहरें और वह अजनबी

उत्तर प्रदेश का दिल कहे जाने वाले शहर बनारस की सुबह दुनिया के किसी भी कोने से अलग होती है। यहाँ की सुबह सूरज की किरणों से नहीं, बल्कि मंदिरों की घंटियों और ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष से होती है। अस्सी घाट पर कोहरे की चादर बिछी थी और गंगा की लहरें नावों से टकराकर एक संगीत पैदा कर रही थीं।

इसी घाट पर खड़ा था किशन। 26 साल का किशन, जिसके चेहरे पर बनारसी अल्हड़पन था और आँखों में एक ऐसी सच्चाई जो किसी का भी भरोसा जीत ले। किशन एक साधारण टूरिस्ट गाइड था। वह बहुत पढ़ा-लिखा तो नहीं था, लेकिन उसे बनारस के हर पत्थर का इतिहास पता था। वह टूटी-फूटी अंग्रेजी में विदेशियों को “असली भारत” दिखाता था।

दिसंबर की उस सुबह, किशन अपनी नाव के पास खड़ा ग्राहकों का इंतज़ार कर रहा था, तभी उसने उसे देखा। सुनहरे बाल, नीली आँखें और चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट। वह एलीना थी। रूस से आई एक शांत स्वभाव की लड़की, जो पहली बार भारत आई थी। कुछ स्थानीय दुकानदार उसे घेरकर ऊँचे दामों पर सामान बेचने की कोशिश कर रहे थे।

किशन आगे बढ़ा। “ए भाई! काहे परेशान कर रहे हो मेहमान को? जाओ अपना काम करो,” उसने कड़क आवाज़ में कहा। फिर एलीना की तरफ मुड़कर अपनी सबसे बेहतरीन मुस्कान के साथ बोला, “मैडम, नो वरी। आई एम गाइड। गवर्नमेंट अप्रूव्ड। आई हेल्प यू।”

एलीना की आँखों में जो डर था, वह एक पल में गायब हो गया। उसे लगा जैसे भीड़ में कोई अपना मिल गया हो। यहीं से शुरू हुआ वह सिलसिला, जिसने इतिहास बदलना था।

अध्याय 2: सारनाथ की शांति और गहराता रिश्ता

अगले पंद्रह दिनों तक किशन और एलीना परछाई की तरह साथ रहे। किशन ने उसे केवल मंदिर नहीं दिखाए, बल्कि उसे बनारस की रूह से रूबरू करवाया। वह उसे गोदौलिया की तंग गलियों में ले गया जहाँ उसने पहली बार मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पी। वह उसे सारनाथ ले गया, जहाँ बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था।

सारनाथ के शांति स्तूप के पास बैठे हुए एलीना ने पूछा, “किशन, यहाँ इतना मौन क्यों है? जैसे वक़्त ठहर गया हो।” किशन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैडम, यहाँ शोर बाहर नहीं, अंदर खामोश हो जाता है। जब मन शांत होता है, तभी तो खुदा या भगवान की आवाज़ सुनाई देती है।”

एलीना उसे देखती रह गई। उसे ताज्जुब हुआ कि एक साधारण सा दिखने वाला लड़का इतनी गहरी बातें कैसे कर लेता है। भाषा की दीवार धीरे-धीरे ढह रही थी। अब एलीना ‘नमस्ते’, ‘शुक्रिया’ और ‘चाय’ जैसे शब्द बोलने लगी थी। उसने माथे पर लाल बिंदी लगाना और हाथों में कांच की चूड़ियाँ पहनना शुरू कर दिया था। बनारस के रंगों ने उस रूसी लड़की को पूरी तरह से भारतीय बना दिया था।

अध्याय 3: दशाश्वमेध घाट की वह शाम

एलीना के जाने में अब केवल दो दिन बचे थे। शाम का वक्त था और दशाश्वमेध घाट पर विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती की तैयारी चल रही थी। हज़ारों दिए जल रहे थे, शंख बज रहे थे और हवा में चंदन और कपूर की खुशबू घुली थी। किशन एलीना को नाव पर लेकर बीच गंगा में ले गया।

चारों तरफ दीयों की रोशनी ऐसी लग रही थी जैसे आसमान के तारे पानी पर उतर आए हों। किशन का दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसने अपनी जेब से एक चांदी की पायल निकाली, जो उसने अपनी महीनों की कमाई बचाकर खरीदी थी।

“एलीना,” किशन की आवाज़ कांपी। “रूस बहुत दूर है। तुम चली जाओगी, शायद भूल जाओगी। पर मैं… मैं तुम्हें इन गलियों में हमेशा ढूंढता रहूँगा। आई… आई लव यू।”

एलीना की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने अपना पैर आगे बढ़ाया और किशन ने उसे वह पायल पहना दी। एलीना ने उसका हाथ थामते हुए कहा, “किशन, दूरी केवल नक्शों पर होती है, दिलों में नहीं। आई लव यू टू।” उस रात गंगा मैया उन दो प्रेमियों के अटूट वादे की गवाह बनीं।

अध्याय 4: जुदाई का सन्नाटा और रहस्यमयी चुप्पी

वाराणसी एयरपोर्ट पर विदाई का दृश्य हृदयविदारक था। एलीना ने जाते समय एक कागज़ पर अपना पता और लैंडलाइन नंबर लिखकर किशन को दिया। “वादा करो, तुम आओगे,” उसने सिसकते हुए कहा। किशन ने उसके माथे को चूमा और कहा, “वादा रहा। दुनिया इधर की उधर हो जाए, किशन अपनी एलीना के पास ज़रूर आएगा।”

शुरुआत के कुछ हफ्ते अच्छे बीते। हर रात वीडियो कॉल होती थी। लेकिन फिर अचानक एक दिन एलीना का फोन लगना बंद हो गया। किशन ने हज़ारों बार कोशिश की। कभी नंबर बिजी आता, तो कभी स्विच ऑफ। एक महीना बीता, फिर दो। किशन का हाल पागलों जैसा हो गया। वह दिन भर एयरपोर्ट रोड पर खड़ा रहता कि शायद वह वापस आ जाए।

गाँव वाले ताने मारने लगे, “अरे वह विदेशी थी, मन भर गया होगा, चली गई। तू तो गाइड था, उसने तुझे नौकर समझा होगा।” लेकिन किशन का मन कह रहा था कि एलीना बेवफा नहीं है। वह किसी बड़ी मुसीबत में है।

अध्याय 5: सब कुछ दांव पर

किशन ने रूस जाने का फैसला किया। लेकिन रूस जाना कोई मज़ाक नहीं था। वीज़ा, टिकट और वहां रहने के लिए कम से कम 5 लाख रुपये चाहिए थे। किशन के पास केवल एक ही मूल्यवान चीज़ थी—उसके दादा की दी हुई पुश्तैनी ज़मीन।

जब उसने ज़मीन बेचने की बात की, तो घर में तूफ़ान आ गया। उसके पिता रामेश्वर जी चिल्लाए, “एक अनजानी लड़की के लिए तू घर की इज़्ज़त और पुरखों की निशानी बेचेगा? अगर उसने तुझे पहचानने से मना कर दिया तो हम कहाँ जाएंगे?”

किशन पिता के पैरों में गिर गया। “बाबूजी, वह मेरी सासों में बसी है। अगर मैं नहीं गया, तो मैं ज़िंदा लाश बन जाऊंगा। मुझे एक बार जाने दीजिए।” पिता ने बेटे की आँखों में वह पागलपन देखा जिसे दुनिया ‘इश्क’ कहती है। भारी मन से ज़मीन बिकी और किशन अपनी एलीना को खोजने निकल पड़ा।

अध्याय 6: मॉस्को की बर्फीली शाम और काला सच

किशन जब मॉस्को पहुँचा, तो वहां का तापमान -15 डिग्री था। उसने कभी बर्फ नहीं देखी थी। पतली जैकेट में वह ठिठुर रहा था। उसके पास न इंटरनेट था, न भाषा का ज्ञान। वह टैक्सी वालों को वह पर्ची दिखाता, पर कोई उसकी बात नहीं समझता।

दो दिनों तक स्टेशन पर भूखे-प्यासे भटकने के बाद, एक दयालु अजनबी की मदद से वह उस शहर पहुँचा जिसका पता एलीना ने दिया था। वह एक बहुत बड़ा विला था। किसी महल जैसा। लेकिन वहां का नज़ारा देख किशन के पैर जम गए।

घर के बाहर एलीना की एक बड़ी फोटो लगी थी जिस पर फूलों का हार था। पास ही रशियन भाषा में कुछ लिखा था और नीचे दो तारीखें थीं। किशन का दिमाग सुन्न हो गया। क्या एलीना मर चुकी है? वह वहीँ ज़मीन पर गिर पड़ा।

तभी उसकी नज़र एक व्हीलचेयर पर बैठी लड़की पर पड़ी जो पीठ करके खड़ी थी। उसने धीरे से पुकारा— “एलीना?”

वह लड़की मुड़ी। वह एलीना ही थी! लेकिन उसका चेहरा पीला पड़ा था और वह व्हीलचेयर पर थी। उसकी गोद में एक छोटा बच्चा था। किशन को देखते ही एलीना की आँखों से सैलाब बह निकला।

अध्याय 7: कहानी का असली मोड़

जब एलीना के रसूखदार पिता मिस्टर इवान वहां आए, तो उन्होंने किशन को धक्का देकर बाहर निकालने की कोशिश की। लेकिन एलीना व्हीलचेयर से नीचे गिर गई और घिसटते हुए किशन तक पहुँची। दोनों एक-दूसरे को पकड़कर बर्फ पर बैठकर रोने लगे।

एलीना ने बताया, “किशन, वह फोटो मेरी नहीं, मेरी जुड़वाँ बहन नाताशा की है। जब मैं बनारस से लौटी, तो नाताशा मुझे लेने आई थी। रास्ते में हमारा एक्सीडेंट हो गया। नाताशा और उसके पति की मौत हो गई। मैं बच गई, लेकिन मेरी रीढ़ की हड्डी टूट गई। डॉक्टरों ने कहा मैं अब कभी नहीं चल पाऊंगी। यह बच्चा नाताशा का है—एलेक्स। वह अनाथ हो गया था, इसलिए मैंने इसे अपना लिया।”

मिस्टर इवान ने किशन से कहा, “देखो लड़के, मेरी बेटी अब कभी चल नहीं सकती। उसे हर पल देखभाल की ज़रूरत है। तुम एक गाइड हो, तुम इसे क्या दोगे? यह चेक लो और वापस चले जाओ।”

किशन ने वह चेक फाड़ दिया और गर्व से कहा, “साहब, मैं अपनी ज़मीन बेचकर आया हूँ। अगर एलीना चल नहीं सकती, तो क्या हुआ? मेरे पास दो पैर हैं। मैं इसे अपनी पीठ पर बिठाकर पूरी दुनिया घुमाऊंगा। और यह बच्चा? यह आज से मेरा बेटा है।”

इवान की आँखों में पहली बार किसी भारतीय के लिए सम्मान दिखा।

अध्याय 8: बनारस वापसी और समाज का सामना

किशन एलीना और नन्हे एलेक्स को लेकर वापस बनारस आ गया। गाँव में फिर से कानाफूसी शुरू हुई। “एक अपाहिज औरत और किसी और का बच्चा उठा लाया है।” किशन के पिता भी नाराज़ थे।

लेकिन एलीना ने हार नहीं मानी। उसने व्हीलचेयर पर बैठकर घर का काम करना शुरू किया। वह रोज सुबह गंगा मैया की प्रार्थना करती। किशन ने अपनी मेहनत दुगनी कर दी। वह दिन भर गाइड का काम करता और रात को एलीना के पैरों की मालिश करता। वह उसे गंगा किनारे ले जाता और उसे रेत पर खड़ा करने की कोशिश करता।

“किशन, मुझसे नहीं होगा,” एलीना अक्सर रोती। “होगा एलीना, तुम्हें मेरे साथ सात फेरे जो लेने हैं,” किशन हौसला बढ़ाता।

अध्याय 9: ममता का चमत्कार

छह महीने बीत गए। होली का दिन था। पूरे गाँव में रंग उड़ रहे थे। नन्हा एलेक्स आंगन में खेल रहा था। अचानक, एक आवारा सांड गली से तेज़ी से भागता हुआ आया। एलेक्स सांड के रास्ते में था। किशन दूर था और चिल्लाया— “एलेक्स भागो!”

एलीना ने देखा कि उसका बच्चा खतरे में है। उस पल, चिकित्सा विज्ञान हार गया और ‘ममता’ जीत गई। एलीना, जो महीनों से खड़ी नहीं हो पाई थी, झटके से अपनी व्हीलचेयर से उठी। वह लड़खड़ाई, लेकिन गिरी नहीं। वह दौड़ी और एलेक्स को सांड के सामने से खींच लिया।

पूरा गाँव स्तब्ध था। एलीना अपने पैरों पर खड़ी थी। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। किशन की आँखों में खुशी के आंसू थे। उसकी तपस्या सफल हुई थी।

अध्याय 10: सात फेरे और नई शुरुआत

कुछ दिनों बाद, अस्सी घाट पर एक भव्य शादी हुई। एलीना लाल जोड़े में किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। वह व्हीलचेयर पर नहीं, बल्कि अपने पैरों पर चलकर मंडप तक आई। किशन और एलीना ने गंगा की लहरों के सामने सात फेरे लिए। एलेक्स को किशन ने गोद में उठाया था।

किशन के पिता ने गर्व से कहा, “बेटा, तूने सच कहा था। प्यार ज़मीन-जायदाद से नहीं, दिल से किया जाता है।”

आज किशन बनारस का सबसे मशहूर गाइड है। उसने अपनी ज़मीन वापस खरीद ली है और वहां ‘एलीना होमस्टे’ बनाया है, जहाँ दुनिया भर से लोग आते हैं। यह कहानी केवल एक लड़के और लड़की की नहीं है, यह उस भरोसे की है जो सात समंदर की दूरी को भी मिटा देता है।

अंत: कहते हैं कि बनारस की गलियों में आज भी अगर आप शाम को टहलें, तो आपको एक जोड़ा दिखेगा जो हाथ पकड़कर गंगा की आरती देख रहा होता है। लोग कहते हैं कि वह किशन और एलीना हैं, जिनका प्यार आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उस पहली गुलाबी ठंड वाली सुबह में था।