बिना टिकट लड़की को First AC में ले गया TTE! फिर कांप उठी लड़की

सफर का विश्वासघात: जब रक्षक ही बना भक्षक

15 फरवरी की वह तारीख भारतीय रेलवे के इतिहास में एक काले अध्याय की तरह दर्ज हो गई। यह दिन प्यार के त्योहार यानी वैलेंटाइन डे के ठीक एक दिन बाद का था, लेकिन उत्तर प्रदेश के मऊ और गोरखपुर के बीच दौड़ रही एक ट्रेन में जो हुआ, उसने मानवता और पेशेवर नैतिकता को शर्मसार कर दिया। यह कहानी है एक ऐसी लड़की की, जिसने वर्दी पहनने का सपना देखा था और चलती ट्रेन में एक वर्दीधारी के ही असली और डरावने चेहरे का सामना किया।

अध्याय 1: सपनों की उड़ान और मऊ की वो सुबह

कहानी की नायिका, जिसे हम ‘आरती’ (परिवर्तित नाम) कहेंगे, मऊ जिले की रहने वाली एक 22 वर्षीय आत्मविश्वासी लड़की थी। वह कोई साधारण युवती नहीं, बल्कि एक एनसीसी (NCC) कैडेट थी। आरती की आँखों में एक ही सपना था—भारतीय सेना की वर्दी पहनना और देश की सेवा करना। इसके लिए वह गोरखपुर में रहकर कठिन परिश्रम कर रही थी।

15 फरवरी को वह मऊ में अपनी एनसीसी ‘सी’ सर्टिफिकेट की परीक्षा देकर वापस गोरखपुर लौटने के लिए रेलवे स्टेशन पहुंची। स्टेशन पर भारी भीड़ थी। परीक्षार्थियों का हुजूम उमड़ा हुआ था और जनरल बोगी की हालत ऐसी थी कि पैर रखने की जगह भी नहीं थी। आरती ने सोचा कि एक सुरक्षित सफर के लिए वह एसी कोच में चढ़ जाए और नियमानुसार टीटीई को जुर्माना भरकर अपना टिकट बनवा ले। उसे क्या पता था कि रेलवे का यही ‘नियम’ उसके लिए एक जाल बन जाएगा।

अध्याय 2: रक्षक के भेष में भेड़िया

आरती अहमदाबाद-गोरखपुर एक्सप्रेस (19489) के एसी कोच में सवार हुई। ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी और कुछ ही देर बाद एक शख्स उसके पास आया। काले कोट और नेम प्लेट के साथ वह शख्स था—टीटीई राहुल कुमार।

आरती ने बड़ी ईमानदारी से अपनी स्थिति बताई। उसने कहा, “सर, मेरे पास टिकट नहीं है, मुझे जुर्माना काटकर रसीद दे दीजिए।” राहुल कुमार ने आरती की वर्दी और उसकी ईमानदारी को उसकी ताकत नहीं, बल्कि कमजोरी समझा। उसने बड़े ही मीठे स्वर में कहा, “अरे बेटा, आप तो देश की सेवा करने वाली हैं। चलिए, फर्स्ट एसी में एक केबिन खाली है, वहां आराम से बैठिए, मैं वहीं आकर आपका टिकट बना दूंगा।”

आरती को लगा कि रेलवे का कर्मचारी उसकी मदद कर रहा है। वह उसके पीछे-पीछे फर्स्ट एसी कोच की ओर चल पड़ी। फर्स्ट एसी का वो गलियारा बिल्कुल शांत था। राहुल ने उसे एक कूपे (दो सीटों वाला केबिन) में बिठाया और खुद बाहर चला गया।

अध्याय 3: बंद दरवाजे और टूटता भरोसा

कुछ देर बाद राहुल कुमार वापस लौटा। उसके चेहरे के भाव अब पूरी तरह बदल चुके थे। उसने आरती से कुछ सामान्य सवाल पूछे, जैसे वह कहाँ रहती है और क्या करती है। लेकिन अचानक, उसने केबिन का भारी स्लाइडिंग दरवाजा बंद किया और उसे अंदर से लॉक कर दिया।

आरती का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने घबराकर पूछा, “सर, दरवाजा क्यों बंद किया?” राहुल की आँखों में अब वह मदद करने वाला टीटीई नहीं, बल्कि एक शिकारी था। उसने आरती पर अनुचित दबाव बनाना शुरू किया और अपनी मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।

आरती ने विरोध किया, वह चिल्लाई, उसने राहुल को पीछे हटने को कहा। लेकिन राहुल को पता था कि ट्रेन की रफ्तार और एसी कोच की दीवारों के बीच आरती की आवाज़ बाहर जाना मुश्किल है। उसने आरती को डराने के लिए उसके करियर की धमकी दी। उसने कहा, “चुपचाप बैठ, तू बिना टिकट है, मैं तेरा आर्मी का सपना एक पल में खत्म कर सकता हूँ।”

अध्याय 4: डर पर भारी पड़ती हिम्मत

आरती डरी हुई थी, लेकिन वह टूटी नहीं थी। उसकी एनसीसी की ट्रेनिंग ने उसे सिखाया था कि अन्याय के सामने झुकना नहीं है। राहुल कुमार उसे धमकी देकर केबिन से बाहर निकल गया, यह सोचकर कि वह लड़की अब खौफ में चुप रहेगी।

लेकिन आरती ने अपना फोन निकाला और कांपते हाथों से ‘112’ डायल किया। उसने पुलिस कंट्रोल रूम को अपनी लोकेशन और टीटीई की करतूत की जानकारी दी। उधर राहुल कुमार को जैसे ही भनक लगी कि आरती ने पुलिस को खबर कर दी है, उसका सारा ‘रौब’ हवा हो गया। जैसे ही ट्रेन देवरिया स्टेशन पर धीमी हुई, वह आरोपी टीटीई अंधेरे का फायदा उठाकर भाग निकला।

अध्याय 5: इंसाफ की जंग और सिस्टम का प्रहार

गोरखपुर स्टेशन पहुंचते ही आरती सीधे जीआरपी थाने गई। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उसकी आवाज में न्याय की मांग थी। पुलिस तुरंत हरकत में आई। मामला दर्ज किया गया और आरोपी राहुल कुमार को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया।

जांच में पता चला कि राहुल कुमार बिहार के पटना जिले के बेहट्टा थाना क्षेत्र के समसारा गांव का रहने वाला था। एसपी रेलवे लक्ष्मी निवास मिश्र ने उसकी गिरफ्तारी पर 10,000 रुपये का इनाम घोषित कर दिया। रेलवे प्रशासन और पुलिस की टीमें बिहार और उत्तर प्रदेश के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी करने लगीं।

अध्याय 6: समाज के लिए एक बड़ा सबक

यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं है, बल्कि हमारे सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान है। अगर सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले ही इस तरह की हरकत करेंगे, तो बेटियां कैसे सुरक्षित रहेंगी?

आरती ने जो किया, वह हर उस व्यक्ति के लिए एक मिसाल है जो जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना चाहता है। उसने समाज की ‘बदनामी’ के डर को अपनी हिम्मत के नीचे कुचल दिया।

इस कहानी से मिलने वाले महत्वपूर्ण सबक:

    अंधविश्वास न करें: चाहे कोई वर्दी में हो या किसी ऊंचे पद पर, अगर उसकी नीयत पर शक हो, तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
    हेल्पलाइन नंबर का उपयोग: हमेशा अपने फोन में 112 (पुलिस), 139 (रेलवे) और 1091 (महिला हेल्पलाइन) जैसे नंबरों को तैयार रखें।
    एकांत से बचें: यात्रा के दौरान, खासकर अगर आप अकेले हैं, तो किसी अनजान व्यक्ति द्वारा दिए गए एकांत स्थान के प्रस्ताव को कभी स्वीकार न करें।
    हिम्मत ही हथियार है: अगर कुछ गलत होता है, तो चुप रहने के बजाय शोर मचाएं और कानून की मदद लें।

आरती आज भी अपनी तैयारी कर रही है। उसे उम्मीद है कि एक दिन वह सेना की वर्दी पहनेगी और देश की बेटियों को यह संदेश देगी कि असली ताकत डर में नहीं, बल्कि उस डर का सामना करने में है।

निष्कर्ष: राहुल कुमार जैसे अपराधी समाज और विभाग के लिए कलंक हैं। प्रशासन को चाहिए कि ऐसे मामलों में इतनी सख्त सजा दी जाए कि दोबारा कोई अपनी वर्दी का ऐसा गलत इस्तेमाल करने की सोच भी न सके। आरती की यह कहानी हमें सतर्क रहने और अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की प्रेरणा देती है।

सत्य घटना पर आधारित – इस कहानी का उद्देश्य जागरूकता फैलाना है।