बिहारी मजदूर और कॉलेज की लड़कियां एक ही बस में जाती थीं और फिर जो हुआ |
बस का वो सफर और बिहारी बाबू का रहस्य
अध्याय 1: चिलचिलाती गर्मी और 236 नंबर की बस
जून 2023 की वह दोपहर दिल्ली की मशहूर गर्मी से तप रही थी। नांगलोई स्टैंड पर 236 नंबर की बस खड़ी थी, जिसमें पैर रखने की भी जगह नहीं थी। लोग पसीने से तर-बतर थे और उमस ऐसी कि सांस लेना दूभर था। इसी भीड़ में एक सीट पर बैठा था 28 वर्षीय प्रेम कुमार। प्रेम मूल रूप से बिहार के बेगूसराय का रहने वाला था, जो दिल्ली में पिछले कई सालों से रह रहा था। उसका पहनावा साधारण था—एक सूती शर्ट और कंधे पर एक पुराना सा बैग।
बस जब कुछ किलोमीटर आगे बढ़ी, तो ‘आनंद पर्वत’ स्टैंड से चार लड़कियां बस में चढ़ीं। वे दिल्ली के अंबेडकर कॉलेज की छात्राएं थीं। उनमें सबसे प्रमुख थी सारिका, जिसकी उम्र करीब 25 साल थी। उसके साथ उसकी सहेलियां—तृषा, रागिनी और महक भी थीं। सारिका दिखने में जितनी खूबसूरत थी, स्वभाव से उतनी ही सरल।
अध्याय 2: एक छोटी सी मदद, एक बड़ी शुरुआत
भीड़ इतनी थी कि चारों लड़कियों का बुरा हाल था। अचानक सारिका का चेहरा पीला पड़ने लगा। उसे चक्कर आने लगे और वह लगभग गिरने ही वाली थी कि प्रेम ने उसे सहारा दिया। प्रेम ने तुरंत अपनी सीट छोड़ दी और कहा, “बहन जी, आप यहाँ बैठ जाइए, आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही।”
सारिका बिना कुछ कहे बैठ गई। प्रेम ने देखा कि उसे अभी भी राहत नहीं मिल रही है, तो उसने अपने बैग से एक छोटा सा बैटरी वाला हैंड-फैन (हवा देने वाला पंखा) निकाला और ऑन करके सारिका की ओर कर दिया। ठंडी हवा के झोंकों ने सारिका को होश में ला दिया। उसकी सहेलियां हैरान थीं कि इस साधारण से दिखने वाले लड़के के पास इतना उपयोगी गैजेट है।
जब कश्मीरी गेट आया और लड़कियां उतरने लगीं, तो सारिका ने पंखा वापस करते हुए धीरे से कहा, “थैंक यू।” प्रेम बस मुस्कुरा दिया। उसे क्या पता था कि यह ‘थैंक यू’ उसकी जिंदगी बदलने वाला है।
अध्याय 3: मुलाकातों का सिलसिला और चॉकलेट का जादू
अगले कुछ दिनों तक यह सिलसिला बन गया। प्रेम उसी समय बस पकड़ता और सारिका अपनी सहेलियों के साथ उसी बस में मिलती। प्रेम हमेशा अपनी सीट सारिका के लिए छोड़ देता। धीरे-धीरे उनमें बातचीत शुरू हुई। सहेलियों ने प्रेम से उसका परिचय पूछा। उसने बताया कि वह चांदनी चौक की एक कपड़े की दुकान पर काम करता है।
एक दिन प्रेम ने अपने बैग में कुछ महंगी ‘कैडबरी’ चॉकलेट्स रखी थीं। जब सारिका ने पंखा निकालने के लिए बैग खोला, तो उसकी नजर उन चॉकलेट्स पर पड़ी। “ये किसके लिए हैं?” सारिका ने शरारत से पूछा। “बस आप लोगों के लिए ही लाया था,” प्रेम ने सादगी से जवाब दिया।
सहेलियों ने खूब मजे लिए। दिल्ली की कॉलेज जाने वाली मॉडर्न लड़कियों और एक बिहारी मजदूर के बीच की यह दोस्ती बस के बाकी यात्रियों के लिए चर्चा का विषय बन गई थी। लोग आपस में कानाफूसी करते, लेकिन सारिका को प्रेम की सादगी और उसकी ईमानदारी भाने लगी थी।
अध्याय 4: दिल्ली दर्शन और दिल का आकर्षण
दो महीने बीत चुके थे। एक दिन लड़कियों ने दिल्ली घूमने का प्लान बनाया। सारिका की सहेलियों के साथ उनके बॉयफ्रेंड भी थे, लेकिन सारिका अकेली थी। उसने रात को पहली बार प्रेम को फोन किया और पूछा, “क्या कल तुम हमारे साथ घूमने चलोगे?” प्रेम पहले तो हिचकिचाया— “मैं कहाँ आप लोगों के साथ मैच करूँगा?” पर सारिका के जोर देने पर वह मान गया।
अगले दिन प्रेम अच्छे कपड़े पहनकर आया। जब गाड़ी (टैक्सी) करने की बात आई, तो सबने बस या ऑटो का सुझाव दिया क्योंकि वे सब मध्यमवर्गीय छात्र थे। पर प्रेम ने कहा, “आज का दिन स्पेशल है, हम टैक्सी से चलेंगे और सारा खर्च मैं करूँगा।”
उस दिन प्रेम ने लाल किला, अक्षरधाम और इंडिया गेट की सैर के दौरान करीब 15,000 से 20,000 रुपये खर्च किए। उसने सबको महंगे रेस्टोरेंट में खाना खिलाया। सारिका उसे बार-बार टोकती रही, “तुम पागल हो क्या? अपनी दो महीने की सैलरी एक दिन में उड़ा रहे हो?” पर प्रेम के चेहरे पर सिर्फ एक सुकून भरी मुस्कान थी। उस दिन सारिका ने प्रेम के साथ बहुत क्लोज होकर तस्वीरें खिंचवाईं।
अध्याय 5: समाज का ताना और सहेलियों का विश्वासघात
जैसे-जैसे समय बीता, सारिका की सहेलियों के मन में जलन पैदा होने लगी। उनके बॉयफ्रेंड उतने उदार नहीं थे जितना प्रेम था। ईर्ष्या वश, सहेलियों ने सारिका के माता-पिता को भड़का दिया। उन्होंने कहा, “आपकी बेटी एक सड़क-छाप बिहारी मजदूर के साथ घूमती है।”
घर में हंगामा खड़ा हो गया। सारिका के पिता ने उसे खूब डांटा। “क्या इसीलिए तुम्हें कॉलेज भेजा है? एक मजदूर के साथ तुम्हारा नाम जुड़ रहा है!” सारिका ने सफाई दी कि वह एक जिम्मेदार और नेक इंसान है, पर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
सारिका परेशान हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने परिवार और समाज के इस ‘क्लास’ (वर्ग) भेद को कैसे खत्म करे।
अध्याय 6: प्रेम का बड़ा खुलासा
एक शाम सारिका ने प्रेम को मिलने बुलाया। उसकी आँखों में आंसू थे। उसने प्रेम से पूछा, “क्या तुम मुझसे सच में प्यार करते हो? क्योंकि मेरे घर वाले मेरी शादी कहीं और तय करने की सोच रहे हैं।”
प्रेम ने गंभीरता से कहा, “मैं तुम्हें अपनी जान से ज्यादा चाहता हूँ, सारिका।”
सारिका ने रोते हुए कहा, “लेकिन मेरे माता-पिता एक मजदूर से मेरी शादी कभी नहीं करेंगे। क्या तुम अपनी सैलरी बढ़ा सकते हो? क्या तुम थोड़ा और कमा सकते हो ताकि हम एक अच्छा जीवन जी सकें?”
प्रेम खिलखिलाकर हंसने लगा। सारिका को गुस्सा आया, “मैं यहाँ सीरियस बात कर रही हूँ और तुम्हें हंसी आ रही है?”
प्रेम ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “सारिका, अब सच बताने का वक्त आ गया है। मैं कोई मजदूर नहीं हूँ। जिस कपड़े की दुकान की मैं बात करता हूँ, दरअसल चांदनी चौक में वैसी मेरी तीन बड़ी दुकानें हैं। मेरा अपना 100 गज का घर है नांगलोई में और कार भी है। मैं महीने का करीब 3 से 4 लाख रुपये कमाता हूँ।”
सारिका सन्न रह गई। “फिर तुम बस में क्यों आते थे? और वो फटे-पुराने बैग का क्या?”
प्रेम ने जवाब दिया, “उस दिन मेरी कार सर्विसिंग के लिए गई थी, इसलिए मैंने बस ली। और जब तुम मिलीं, तो मुझे लगा कि अमीरों से तो सब प्यार करते हैं, पर क्या कोई मेरे जैसे साधारण दिखने वाले इंसान की रूह से प्यार कर सकता है? मैंने जानबूझकर यह पहचान छिपाई ताकि मैं तुम्हारा असली प्यार देख सकूँ।”
अध्याय 7: सुखी अंत (Happy Ending)
सारिका की आँखों से अब खुशी के आंसू बह रहे थे। जब यह सच्चाई सारिका के परिवार और उसकी सहेलियों के सामने आई, तो सबके मुँह बंद हो गए। जो सहेलियां कल तक ‘बिहारी मजदूर’ कहकर चिढ़ाती थीं, आज वे अपनी किस्मत पर रो रही थीं।
2025 की शुरुआत में प्रेम और सारिका की धूमधाम से शादी हुई। आज वे दिल्ली में एक सुखी जीवन बिता रहे हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान की असली कीमत उसके कपड़ों या उसके पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और उसके दिल की गहराई से होती है।
लेखक का संदेश: प्यार कभी सरहदें या प्रांत नहीं देखता, वह सिर्फ सादगी और सच्चाई देखता है।
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