बिहार से हरिद्वार गए थे तीन लोग | hindi story |

विश्वासघात का तीर्थ: हरिद्वार की एक कहानी

बिहार के मधुबनी जिले के एक शांत गाँव में राजेश और पार्वती का परिवार रहता था। राजेश, जो करीब ३० साल का था, पेशे से जेसीबी ऑपरेटर था और अच्छी कमाई कर लेता था। उसकी पत्नी, २८ वर्षीया पार्वती, स्वभाव से बेहद सरल और शांत थी। पार्वती के साथ केवल एक ही शारीरिक कमी थी—वह बोल नहीं सकती थी, यानी वह ‘गूँगी’ थी। लेकिन उसकी आँखों की चमक और चेहरे की मासूमियत उसके मन के भाव बयां कर देती थी। उनका ३ साल का एक बेटा था, जिसका नाम शिवम था।

पार्वती की एक छोटी बहन थी, २० वर्षीया रेखा। रेखा अक्सर अपनी दीदी के घर आती-जाती रहती थी। वह पार्वती की तरह भोली नहीं, बल्कि चंचल और आधुनिक खयालात वाली थी। समय के साथ, राजेश और उसकी साली रेखा के बीच /अवैध सं/बंध/ विकसित होने लगे। राजेश रेखा की खूबसूरती और उसकी बातों का दीवाना हो गया। दोनों ने चोरी-छिपे एक-दूसरे के साथ /वक्त बिताना/ शुरू कर दिया और अंततः साथ जीने-मरने की कसमें खा लीं। लेकिन उनके बीच सबसे बड़ी बाधा थी—पार्वती।

हरिद्वार का खौफनाक षड्यंत्र

रेखा और राजेश ने मिलकर एक बेहद /घिनौनी साजिश/ रची। उन्होंने तय किया कि पार्वती को रास्ते से हटाना होगा। मकर संक्रांति २०२३ के अवसर पर राजेश ने घर में प्रस्ताव रखा कि वे सभी गंगा स्नान के लिए हरिद्वार जाएंगे। पार्वती खुश थी कि उसे तीर्थ यात्रा पर जाने का मौका मिल रहा है, वह नहीं जानती थी कि यह उसके जीवन की सबसे /दर्दनाक यात्रा/ होने वाली है।

हरिद्वार की भारी भीड़ और घाटों के शोर के बीच, राजेश और रेखा ने मौका पाकर पार्वती को अकेला छोड़ दिया। पार्वती, जो बोल नहीं सकती थी, अपनों को पुकार भी नहीं सकी। राजेश और रेखा वहां से चुपचाप शिवम को लेकर निकल गए। घर लौटने के बजाय, वे १५ दिनों तक हरिद्वार के ही एक होटल में रुके और /शारीरिक सुख/ भोगते रहे।

जब वे १५ दिन बाद मधुबनी पहुँचे, तो उनके चेहरे पर झूठा दुख था। गाँव वालों और मायके वालों ने जब पार्वती के बारे में पूछा, तो राजेश ने रोने का नाटक करते हुए कहा, “वह भीड़ में कहीं गायब हो गई। हमने उसे बहुत ढूंढा, पुलिस में भी रिपोर्ट दी, पर वह नहीं मिली।” रेखा ने भी अपने जीजा की बात का समर्थन किया। चूंकि रेखा खुद पार्वती की सगी बहन थी, इसलिए किसी ने उन पर शक नहीं किया।

झूठ का जाल और दूसरी शादी

महीने बीतते गए और राजेश समय-समय पर ‘हरिद्वार पुलिस का फोन आया है’ कहकर रेखा को अपने साथ ले जाता और वे दोनों शहर जाकर /मौज-मस्ती/ करते। करीब एक साल बाद, राजेश ने परिवार के सामने प्रस्ताव रखा कि शिवम की परवरिश के लिए उसे एक माँ की जरूरत है, इसलिए उसे रेखा से शादी कर लेनी चाहिए। पार्वती के माता-पिता ने भी सोचा कि बेटी तो खो चुकी है, कम से कम छोटी बेटी उसी घर में राज करेगी। समाज और परिवार की सहमति से राजेश और रेखा की शादी हो गई।

नियति का न्याय: रेखा का असली चेहरा

शादी के कुछ समय बाद ही राजेश का भ्रम टूटने लगा। रेखा वैसी नहीं थी जैसी उसने सोची थी। वह घर के कामों में हाथ नहीं बटाती थी और अक्सर फोन पर व्यस्त रहती थी। जल्द ही राजेश को पता चला कि रेखा का किसी ‘धर्मेंद्र’ नाम के लड़के के साथ /अफेयर/ चल रहा है। वह राजेश को धोखा देकर धर्मेंद्र के साथ /भागने/ की योजना बना रही थी।

जब राजेश ने उसे टोका, तो रेखा ने पलटवार करते हुए कहा, “अगर तुमने मुझे रोका, तो मैं सबको बता दूंगी कि तुमने दीदी के साथ क्या किया था। उस /पाप/ में तुम भी बराबर के हिस्सेदार हो।” राजेश दंग रह गया। जिस रेखा के लिए उसने अपनी सती-सावित्री पत्नी को /अकेला/ छोड़ा था, आज वही उसे /धमका/ रही थी। राजेश को अपनी पत्नी पार्वती की याद सताने लगी। उसे एहसास हुआ कि उसने एक हीरे को छोड़कर पत्थर चुन लिया था।

पश्चाताप की राह

फरवरी २०२६ में, राजेश ने झूठ बोला कि वह काम के सिलसिले में पटना जा रहा है, लेकिन वह सीधा हरिद्वार पहुँचा। उसने उस हर जगह पार्वती को ढूंढा जहाँ उसने उसे छोड़ा था। वह ढाबों, होटलों और भिखारियों के अड्डों पर अपनी पत्नी की तलाश करने लगा। तीन दिनों की भटकन के बाद, वह हिम्मत जुटाकर पुलिस थाने पहुँचा।

पुलिस ने जब कड़ाई से पूछताछ की, तो राजेश टूट गया और उसने सारा सच उगल दिया। पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया। लेकिन कहानी में एक चमत्कार अभी बाकी था।

आश्रम की ‘भारती माता’ और पुनर्मिलन

पुलिस राजेश को एक स्थानीय आश्रम ले गई, जिसकी संचालिका ७० वर्षीया भारती देवी (भारती माता) थीं। भारती माता ने उन महिलाओं को बुलाया जिन्हें उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में आश्रय दिया था। गेरुआ वस्त्रों और माथे पर तिलक लगाए २५ महिलाओं की भीड़ में एक चेहरा राजेश की ओर देख रहा था। वह पार्वती थी।

पार्वती ने जैसे ही राजेश को देखा, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने इशारों में अपने बेटे शिवम के बारे में पूछा। राजेश उसके पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। पुलिस ने पार्वती को बताया कि कैसे राजेश ने उसे /धोखा/ दिया था और जानबूझकर यहाँ छोड़ दिया था। सच जानकर पार्वती सुन्न रह गई और ज़मीन पर गिरकर अपनी छाती पीट-पीटकर रोने लगी। ३ साल तक वह जिस व्यक्ति का इंतज़ार कर रही थी, वही उसका /गुनहगार/ निकला।

अंत और सवाल

पार्वती वापस मधुबनी आई। जब गाँव वालों को सच पता चला, तो हड़कंप मच गया। रेखा चुपचाप अपनी दुनिया बसाने के लिए कहीं और चली गई। पार्वती ने अपने बेटे शिवम को गले लगाया और घंटों तक रोती रही।

राजेश ने पार्वती से माफी मांगी और अपनी गलती स्वीकार की। हालांकि राजेश को कानूनन सख्त सजा मिलनी चाहिए थी, लेकिन पार्वती के बेटे के भविष्य और परिवार के दबाव के कारण वह कानूनी कार्रवाई से बच गया। आज वे एक ही छत के नीचे रह रहे हैं, लेकिन क्या पार्वती कभी उस /विश्वासघात/ को भूल पाएगी? क्या राजेश के मन का /पाप/ कभी धुलेगा?

यह कहानी हमें सिखाती है कि झूठ की बुनियाद पर खड़ा रिश्ता कभी सुख नहीं दे सकता।