बीमार बूढ़ी माँ को डॉक्टर बेटे ने अस्पताल से धक्के मार कर निकाला, फिर जो हुआ…

ममता का मंदिर और पत्थर का देवता: एक डॉक्टर के प्रायश्चित की पूर्ण गाथा

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की सड़कों पर सुबह की हलचल शुरू हो चुकी थी। राजवाड़ा की भीड़ और सराफा की खुशबू के बीच, शहर के एक कोने में ‘स्वस्तिक सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल’ अपनी आधुनिकता और भव्यता का प्रदर्शन कर रहा था। आज यहाँ का माहौल कुछ अलग था। फूलों की सजावट, सुरक्षा गार्डों की तैनाती और मीडिया के कैमरों की फ्लैश—सब कुछ डॉक्टर आरव वर्मा के स्वागत के लिए था।

आरव वर्मा, जिन्हें शहर ‘द हार्ट हीरो’ कहता था। लेकिन उसी अस्पताल के बरामदे में एक बूढ़ी औरत, शारदा देवी, अपनी ममता की झोली फैलाए बैठी थी, जिसे यह नहीं पता था कि उसका अपना ‘देवता’ आज उसे पहचानने से इनकार करने वाला है।

अध्याय 1: बचपन की वो रोटियाँ और माँ का त्याग

कहानी की जड़ें इंदौर से दूर एक छोटे से गाँव में थीं। जहाँ मिट्टी के घर में शारदा देवी ने अपने पति को खोने के बाद आरव को पालने के लिए दिन-रात एक कर दिया था। गाँव के लोग याद करते हैं कि कैसे शारदा देवी दूसरों के खेतों में काम करती थी ताकि आरव की पढ़ाई की फीस भरी जा सके।

आरव बचपन में बहुत सीधा था। जब भी माँ थककर आती, वह उनके पैर दबाता और कहता, “माँ, मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूँगा और तुम्हारा सारा दर्द दूर कर दूँगा।” शारदा देवी मुस्कुराकर उसे गले लगा लेतीं। उन्होंने खुद आधे पेट खाकर आरव को दूध और रोटी खिलाई। आज वही आरव शहर का सबसे बड़ा डॉक्टर था, लेकिन सफलता की चकाचौंध ने उसके बचपन के वादों को धुंधला कर दिया था।

अध्याय 2: अहंकार का सिंहासन

अस्पताल के भीतर, आरव अपने चैंबर में बैठा था। उसके कोट पर लगा ‘गोल्ड मेडल’ उसकी सफलता की गवाही दे रहा था। उसके पास अब समय नहीं था—न खुद के लिए, न यादों के लिए। जब शारदा देवी व्हीलचेयर पर अंदर आईं, तो आरव को उनके चेहरे में माँ नहीं, बल्कि एक ‘रुकावट’ नजर आई।

“बेटा, तूने मुझे पहचाना? मैं तेरी माँ…” शारदा देवी ने कांपते हाथों से उसे छूना चाहा। आरव ने पीछे हटते हुए कहा, “माँ, यहाँ तमाशा मत करो। मेरा स्टेटस देखो। तुम इस साधारण हाल में यहाँ आओगी तो लोग क्या कहेंगे?”

जब माँ ने अपनी बीमारी और दर्द का जिक्र किया, तो आरव का कलेजा नहीं पसीजा। उसने कठोरता से कहा, “यह अस्पताल वीआईपी मरीजों के लिए है। तुम्हारे इलाज का खर्च लाखों में है। गार्ड! इन्हें बाहर ले जाओ और सरकारी अस्पताल का रास्ता दिखा दो।”

अध्याय 3: बाहर की ठंड और भीतर का सन्नाटा

गार्ड ने शारदा देवी को बाहर निकाल दिया। बाहर जनवरी की कड़कड़ाती ठंड थी। शारदा देवी उसी बेंच पर बैठ गईं, जहाँ से अस्पताल का मुख्य द्वार साफ दिखता था। उनके पास न कंबल था, न पैसे। बस आँखों में आँसू थे जो ठंड के कारण सूखने लगे थे।

अस्पताल के भीतर सेमिनार चल रहा था। आरव भाषण दे रहा था, “एक डॉक्टर का धर्म है सेवा…” लोग तालियां बजा रहे थे। उसी समय बाहर एक चाय वाला, छोटू, माँ के पास आया। उसने अपनी दुकान की पुरानी चादर उन्हें ओढ़ाई और गर्म चाय का एक कप दिया। “माँ, आप रो मत। भगवान सब देख रहा है,” छोटू ने कहा। शारदा देवी ने सिसकते हुए कहा, “बेटा, मेरा भगवान तो अंदर बैठा है, जिसने आज मंदिर (अस्पताल) के कपाट मेरे लिए बंद कर दिए।”

अध्याय 4: डॉक्टर अजय शर्मा—अनुभव की आवाज

पास ही एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे थे, जिनका नाम डॉक्टर अजय शर्मा था। वे कभी इस शहर के सबसे बड़े सर्जन हुआ करते थे, लेकिन अब वे गुमनामी की जिंदगी जी रहे थे। उन्होंने शारदा देवी की हालत देखी और आरव के अहंकार को भी।

जब आरव शाम को अपनी महंगी कार की ओर बढ़ा, तो डॉक्टर अजय ने उसे रोका। “आरव वर्मा,” अजय की आवाज में भारीपन था। “तुमने आज जिस दिल का ऑपरेशन किया, वह तो धड़कने लगा, लेकिन तुम्हारे अपने सीने में जो मांस का लोथड़ा है, वह मर चुका है।”

आरव ने चिढ़कर कहा, “आप कौन होते हैं मुझे सिखाने वाले?” अजय मुस्कुराए, “मैं वह भविष्य हूँ जो तुम्हारा इंतजार कर रहा है। मैंने भी अपनी माँ को सफलता की सीढ़ी समझा था, और जब मैं शीर्ष पर पहुँचा, तो माँ का साया सिर पर नहीं था। आज मेरे पास पैसा है, पर दुआ देने वाला कोई नहीं।”

अध्याय 5: जब समय ने करवट ली

रात के दो बज रहे थे। अचानक अस्पताल के अलार्म बजने लगे। बाहर बेंच पर बैठी शारदा देवी को दिल का दौरा पड़ा था। उनकी सांसें उखड़ रही थीं। गार्ड घबरा गया। उसने आरव को फोन किया।

आरव जब भागता हुआ पहुँचा, तो उसने देखा कि उसकी माँ जमीन पर गिरी हुई थी और वही चाय वाला छोटू उनके हाथ मल रहा था। आरव का हृदय पहली बार जोर से धड़का। उसने अपनी माँ को गोद में उठाया। वह शरीर, जिसने उसे नौ महीने कोख में रखा था, आज इतना हल्का लग रहा था जैसे कोई सूखी पत्ती।

उसी दरवाजे से, जिससे उसने माँ को धक्के देकर निकाला था, आज वह नंगे पैर दौड़ रहा था। “मम्मी! आँखें खोलो! डॉक्टर! कोई है यहाँ?” वह पागलों की तरह चिल्ला रहा था।

अध्याय 6: आईसीयू की वो रात और पश्चाताप

आरव ने खुद सर्जरी की कमान संभाली। घंटों तक ऑपरेशन चला। उसके हाथ कांप रहे थे। वह जो हजारों ऑपरेशन कर चुका था, आज एक इंजेक्शन लगाने में भी उसके पसीने छूट रहे थे। वह बार-बार कह रहा था, “हे ईश्वर, मेरी माँ को मत छीनना। मुझे एक मौका दे दो।”

ऑपरेशन के बाद, जब सुबह की पहली किरण खिड़की से आई, शारदा देवी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। आरव उनके पैरों के पास जमीन पर बैठा सो गया था। जैसे ही माँ का हाथ उसके सिर पर पड़ा, वह हड़बड़ाकर उठा।

“माँ! मुझे माफ कर दो। मैं डॉक्टर तो बन गया, पर बेटा नहीं बन पाया।” आरव फूट-फूटकर रोने लगा। शारदा देवी ने कमजोर आवाज में कहा, “पगले, माँ कभी बच्चों से नाराज नहीं होती। तू बस खुश रह।”

अध्याय 7: एक नई शुरुआत

उस घटना के बाद डॉक्टर आरव वर्मा बदल गया। उसने अस्पताल के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगवाया— ‘शारदा देवी निःशुल्क सेवा केंद्र’। अब उस अस्पताल में किसी भी गरीब माँ या पिता को बाहर नहीं निकाला जाता था। आरव अब केवल पैसे वालों का डॉक्टर नहीं, बल्कि गरीबों का मसीहा बन चुका था।

उसने अपने गाँव के घर को भी एक बड़े अस्पताल में बदल दिया। अब वह हर हफ्ते गाँव जाता और अपनी माँ के साथ समय बिताता। डॉक्टर अजय शर्मा उसके मार्गदर्शक बन गए।

निष्कर्ष और जीवन की सीख

यह कहानी केवल इंदौर के एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है जो सफलता की अंधी दौड़ में अपनों को पीछे छोड़ देता है।

कहानी की मुख्य सीख:

    जड़ों का सम्मान: पेड़ कितना भी ऊँचा हो जाए, अगर जड़ों से कट जाए तो गिर जाता है।
    असली सफलता: वह नहीं है जो बैंक बैलेंस में दिखे, बल्कि वह है जो किसी की दुआओं में मिले।
    ममता का कर्ज: माँ का कर्ज कोई बेटा सात जन्मों में भी नहीं उतार सकता।

दोस्तों, याद रखें कि आपके पास जो कुछ भी है, वह आपकी मेहनत के साथ-साथ आपके माता-पिता के त्याग का फल है। उन्हें कभी बोझ न समझें, क्योंकि जब वे चले जाते हैं, तो पूरी दुनिया का वैभव भी उनकी कमी को पूरा नहीं कर सकता।

लेखक की कलम से: यह कहानी हमें हमारे मानवीय मूल्यों की याद दिलाती है। यदि आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ साझा करें ताकि किसी और माँ को अस्पताल की बेंच पर न सोना पड़े।