बीमार माँ-बाप गाँव में तड़पते रहे, बेटे-बहू शहर में मस्त रहे… मगर भगवान का इंसाफ अभी बाकी था…

“भगवान का इंसाफ: कल का पछतावा”

भूमिका

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की चमचमाती सड़कों और ऊँची इमारतों के बीच एक लक्ज़री फ्लैट की बालकनी में खड़ा राघव अपने मोबाइल पर दोस्तों के साथ जोर-जोर से हँस रहा था। उसकी हँसी में गर्व था, घमंड भी। वहीं, सैकड़ों किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव के कच्चे-पक्के घर में उसकी मां सरस्वती देवी दर्द से कराह रही थी और पिता हरिनाथ जी छत की ओर टकटकी लगाए, बोलना चाहकर भी बोल नहीं पा रहे थे।

शहर की मस्ती, गांव का दर्द

राघव का जीवन अब पूरी तरह शहर के रंग में रंग चुका था। ऑफिस, पार्टियां, महंगी गाड़ियां और दोस्तों के साथ गोवा की प्लानिंग। मां का फोन बार-बार आता, लेकिन वह हर बार टाल देता—”कल बात कर लूंगा।” उसे याद ही नहीं था कि पिछली बार कब वह ‘कल’ आया था, और कितने ‘कल’ बीत चुके थे।

गांव में मां-बाप की तबीयत बिगड़ती जा रही थी। दवाइयां खत्म, डॉक्टर ने कह दिया—अब इलाज शहर के बड़े अस्पताल में ही होगा। लेकिन बेटे के पास वक्त नहीं था। मां ने कांपते हाथों से फिर कॉल लगाया, लेकिन वही मशीन जैसी आवाज—”नंबर व्यस्त है।” आंखों से आंसू बह निकले, पर गले से आवाज नहीं निकली।

अकेलापन और उम्मीद

हरिनाथ जी की छाती में दर्द उठा। सरस्वती देवी ने उनका हाथ थामा, “सब ठीक हो जाएगा…” लेकिन खुद को भी यकीन नहीं था। बाहर गहरा सन्नाटा था, पड़ोसी भी नहीं आए। एक कमजोर बल्ब बार-बार बुझने की कोशिश कर रहा था, जैसे वह भी थक चुका हो।

सुबह हुई, लेकिन घर में कोई उजाला नहीं आया। सरस्वती देवी पूरी रात जागती रही, हरिनाथ की हालत और बिगड़ गई। उन्होंने गांव के प्रधान के बेटे को बुलाया। उसने हालात देखे, “चाची, इन्हें तुरंत शहर ले जाना पड़ेगा।” मां ने फिर फोन लगाया। इस बार राघव ने उठाया, “हां मां, जल्दी बोलो।” उसकी आवाज में बेचैनी थी। मां कुछ बोल नहीं पाई, “बाबूजी…” “मां, अभी ऑफिस की मीटिंग में हूँ, बाद में बात करेंगे।” और फोन कट गया।

अंदर से टूटना

उस पल सरस्वती देवी के अंदर कुछ स्थायी रूप से टूट गया। अब आंसू नहीं निकले, आंखें खाली हो गईं। शहर में राघव मीटिंग में था, सब उसकी तारीफ कर रहे थे। लेकिन दिल में अजीब बेचैनी थी। उसने मोबाइल देखा, कुछ नहीं था, फिर भी बेचैनी बढ़ती गई।

गांव में हालात और बिगड़ गए। सरस्वती देवी ने दोनों हाथ जोड़ लिए, “भगवान, मेरे बेटे का दिल नहीं पसीजा तो तू ही कुछ कर दे।” शायद ऊपर किसी ने सुन लिया।

भगवान की परीक्षा शुरू

शाम को राघव की नई गाड़ी अचानक बंद हो गई। उसी समय गांव से कॉल आया, “भैया, बाबूजी की हालत बहुत नाजुक है, अब समय कम है।” राघव के हाथ से मोबाइल गिरते-गिरते बचा। उसकी आवाज पहली बार कांपी।

गांव में हरिनाथ जी की सांसें कमजोर हो गईं। सरस्वती देवी ने उनका सिर गोद में रखा, “थोड़ा और सब्र करो, बेटा आता ही होगा।” लेकिन समय किसी का इंतजार नहीं करता।

शहर में राघव डर रहा था, उसे लग रहा था—शायद बहुत देर हो चुकी है। बारिश, तूफान, रास्ता बंद। एक बड़ा पेड़ गिरा था। राघव खुद उतरकर उसे हटाने लगा, मिट्टी में फिसलता, भीगता, हांफता। ड्राइवर बोला, “सर, सुबह तक रुकते हैं।” राघव ने कहा, “मुझे नहीं पता, वह सुबह देखेंगे भी या नहीं।”

गांव की चौखट पर पछतावा

रात के दो बजे राघव गांव के किनारे पहुंचा। वही रास्ता, जहां बचपन में साइकिल चलाता था। अब वही रास्ता भारी लग रहा था। घर पहुंचा, दरवाजा खोला। अंदर छोटा सा दीपक जल रहा था, मां जमीन पर बैठी थी, आंखें सूखी, आंसू हार मान चुके थे। हरिनाथ जी लेटे थे, स्थिर और शांत।

राघव ने बस इतना कहा, “मां…” मां ने सिर उठाया, “तेरे बाबूजी तेरा इंतजार करते रहे…” राघव की आंखों से आंसू फूट पड़े। वह बाबूजी के पैर छूने झुका, पर जवाब में बस ठंडी हवा थी। दीपक की लौ कांप रही थी, फिर एक झोंके ने उसे बुझा दिया। और उसी के साथ हरिनाथ जी की सांसें हमेशा के लिए थम गईं।

मां की विरह, बेटे का पछतावा

सरस्वती देवी चीख कर रो पड़ी, “बेटा, भगवान सब देखता है। उसका इंसाफ देर से आता है, लेकिन आता जरूर है।” राघव ने मां की आंखों में देखा, वहां गुस्सा नहीं था, बस गहरा खालीपन था।

अगले दिन अंतिम संस्कार हुआ, पूरा गांव इकट्ठा था। राघव ने सिर झुका रखा, किसी से कुछ नहीं बोला। शाम को अकेला आंगन में बैठा, दीवार पर पुरानी तस्वीरें देखता रहा—मां, बाबूजी, तीनों मुस्कुराते हुए। उसने तस्वीर छूकर कहा, “काश मैं पहले समझ पाता कि वक्त सिर्फ आगे नहीं बढ़ता, कभी-कभी पीछे मुड़कर भी देख लेता है।”

माफी और सीख

रात को मां के कमरे में गया, “मां, आप सोई नहीं?” “नींद अब कहाँ बेटे…” राघव उनके पास बैठ गया, “मां, मैं सब ठीक कर दूंगा, अब कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा।” मां ने हल्की मुस्कान दी, “बेटा, कुछ चीजें ठीक नहीं होती, बस सीखी जाती हैं और सहन की जाती हैं।”

बाहर बारिश फिर से शुरू हो गई थी। राघव को नहीं पता था कि यह रात सिर्फ पछतावे की नहीं, बल्कि सजा की शुरुआत है। क्योंकि अगले कुछ दिनों में जो होने वाला था, वो उसका इंसाफ बनने वाला था।

नई जिम्मेदारी, पुराना दर्द

हरिनाथ जी के जाने के बाद घर में अजीब सी खामोशी बस गई थी। राघव अब मां के साथ गांव में ही रुक गया। शहर की मीटिंग्स, बड़े प्रोजेक्ट्स, दोस्तों की पार्टियां—सब बेईमानी लगने लगी। सुबह उठकर मां के लिए चाय बनाता, दवाइयां देता, सफाई करता। लेकिन हर बार मां की आंखों में देखता, लगता—बहुत देर हो गई।

मां अब बहुत कम बोलती थी, ज्यादातर समय खिड़की से बाहर देखती रहती। राघव बोला, “मां, चलो शहर चलते हैं, अच्छा इलाज होगा।” मां ने सिर हिला दिया, “नहीं बेटा, अब शरीर नहीं, मन थक चुका है।”

राघव ने महसूस किया, मां की तबीयत भी बिगड़ने लगी है। भूख कम, कमजोरी बढ़ती जा रही थी। डॉक्टर ने कहा, “इनका दिल बहुत कमजोर है, इन्हें सबसे ज्यादा आराम, देखभाल और अपनापन चाहिए।” राघव ने सिर छुपा लिया—अपनापन जो उसने सालों तक नजरअंदाज किया था।

भगवान का आईना

रात को नींद नहीं आई। आंगन में अकेला बैठा, बचपन याद आया—जब बीमार होता था, मां पूरी रात उसके पास बैठती थी। अब जब मां को उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, वह तब भी बहुत देर से पहुंचा।

मन ही मन कहा, “भगवान, मेरी सारी खुशियां, कामयाबी ले लो, बस मां को ठीक कर दो।” हवा तेज चलने लगी, जैसे कोई ऊपर से सुन रहा हो।

अगले दिन मां को शहर के अस्पताल ले जाने की तैयारी कर रहा था, मां को तेज चक्कर आया, वह जमीन पर बैठ गई। “मां, क्या हुआ?” मां ने उसकी कलाई पकड़ी, “अगर कभी मैं भी चली गई…” राघव ने बात काट दी, “नहीं मां, आप ठीक हो जाएंगी।” लेकिन अंदर कहीं डर था।

डॉक्टर ने कहा, “इन्हें तुरंत भर्ती करना होगा, स्थिति गंभीर है।” राघव ने मां को अस्पताल में भर्ती करवाया। अब वह हर समय उनके पास रहता, ऑफिस के कॉल्स बंद, मोबाइल साइलेंट।

सजा और इंसाफ

तीसरे दिन राघव मां के पास बैठा था, अचानक उसे तेज सीने में दर्द हुआ। पहले ध्यान नहीं दिया, फिर दर्द बढ़ता गया। नर्स को आवाज दी, अगले ही पल वह जमीन पर गिर पड़ा। जब आंख खुली, खुद अस्पताल के बिस्तर पर था। डॉक्टर बोले, “आपको हार्ट अटैक आया था। समय रहते बचा लिया गया, अब बहुत सावधानी बरतनी होगी।”

राघव को मां की बात याद आई—”भगवान सब देखता है।” अब वह पूरी तरह समझ रहा था। मां को व्हीलचेयर पर उसके पास लाया गया, मां ने उसका हाथ थामा, राघव की आवाज भर आई, “मां, आज मुझे वही दर्द समझ आ गया, जो आपने और बाबूजी ने अकेले सहा।” मां ने बस माथे पर हाथ फेरा—उस स्पर्श में माफी भी थी, दुआ भी, और बहुत सारा प्यार।

अंतिम परीक्षा

अब राघव रोज अपने बिस्तर पर लेटे यही सोचता, “अगर मैं एक बेटा होकर मां-बाप के दर्द से मुंह मोड़ सकता हूं, तो भगवान क्यों मुंह मोड़ेगा?” अब वह समझ गया, यह बीमारी सिर्फ सजा नहीं, एक बड़ा आईना है। डॉक्टर ने कहा, “अब जिंदगी पूरी तरह बदलनी होगी, तनाव से दूर रहना होगा।”

राघव ने मन ही मन कहा, “अगर जिंदगी बची है तो सिर्फ मां के लिए।” लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। अस्पताल से छुट्टी मिली, उसी रात एक और परीक्षा उसका इंतजार कर रही थी।

शहर की चमक का अंत

राघव और मां कुछ दिनों के लिए शहर के फ्लैट में आ गए। वही फ्लैट, जहां कभी हंसी, शोर, पार्टियों की आवाजें थीं। अब वहां सन्नाटा था। राघव अब पहले जैसा नहीं रहा था। जल्दी थक जाता, सीढ़ियां चढ़ते हुए रुकता, दिल कमजोर हो चुका था।

मां अक्सर खिड़की के पास चुपचाप बैठी रहती, नीचे भागती जिंदगी को देखती, कुछ नहीं कहती। राघव कई बार उनसे बात करना चाहता, पर शब्द कम पड़ जाते।

एक शाम ऑफिस से कॉल आया, “राघव, कंपनी को अब तुम्हारी जरूरत नहीं है।” बीमारी और परफॉर्मेंस के कारण कंपनी ने उसे निकाल दिया। राघव चुप रहा, कोई बड़ा झटका नहीं लगा, जैसे अंदर से पहले ही तैयार था।

अब असली डर शुरू हुआ—महंगी दवाइयां, अस्पताल के बिल, फ्लैट का किराया। बैंक अकाउंट में पैसे थे, लेकिन ज्यादा दिन चलने वाले नहीं। उसे पहली बार समझ आया, मां-बाप ने कैसे हर दिन गिन-गिन कर खर्च किया होगा।

अंतिम बिछड़न

एक रात मां की तबीयत फिर बिगड़ गई। राघव उन्हें अस्पताल लेकर गया। डॉक्टर बोले, “बहुत ज्यादा केयर और खर्चा चाहिए।” राघव ने अपना फ्लैट बेचने का फैसला किया। वही फ्लैट, जो उसकी पहचान था, अब मां की जिंदगी बचाने का साधन बन गया।

कुछ हफ्तों बाद मां को लेकर गांव लौट आया। वही पुराना घर, वही पीपल का पेड़। अब शहर हमेशा के लिए पीछे छूट चुका था। गांव वालों ने देखा, राघव खुद मां को सहारा देकर चला रहा था। उनके लिए खाना बनाता, दवाइयां देता, रात को उनके पास सोता।

लोग कहते, “देर से सही, बेटा जाग तो गया।”

एक रात मां ने उसका हाथ पकड़ा, “अगर भगवान ने तुझे यह सब दिखाया, तो शायद इसलिए कि तू किसी और का दर्द नजरअंदाज ना करे।” राघव की आंखों से आंसू बह निकले। उसने मां का हाथ माथे से लगा लिया, “मां, अब मेरी हर सांस आप दोनों की सीख के नाम है।”

सपनों में मां-बाबूजी

राघव को एक अजीब सपना आया—वो फिर शहर में है, भाग रहा है, पैर आगे नहीं बढ़ रहे। दूर मां-बाबूजी खड़े हैं, चुप, शांतिपूर्वक देखते हुए। वह चिल्लाता है, “मैं आ रहा हूं,” पर आवाज नहीं निकलती। नींद खुली तो पसीने से भीगा था। मां की तरफ देखा, वह सो रही थी, सांसें बहुत हल्की थी।

राघव का दिल बैठने लगा। उसने मां का हाथ थामा, “मां, आंखें खोलो…” आवाज कांप रही थी। कमरे में सन्नाटा था। उसने मां के सीने पर सिर रख दिया, दिल की धड़कन ना के बराबर। डॉक्टर आया, “हमें अफसोस है।” राघव वहीं जमीन पर बैठ गया, ना रो पाया, ना चिल्ला पाया। गांव में खबर फैल गई—सरस्वती देवी चली गई थी।

अंतिम संस्कार और आत्मबोध

राघव ने मां को मुखाग्नि दी। हाथ कांप रहे थे, आंखें सूखी थीं। जब आग की लपटें ऊंची उठी, राघव को लगा, उसके अंदर भी कुछ जल रहा है—घमंड, लापरवाही, वो ‘कल’ जिसे उसने सालों तक जिया था।

रात को अकेला आंगन में बैठा, वही पीपल का पेड़। अब कोई नहीं था जिसे दवा देनी हो। यही सबसे बड़ी और स्थायी सजा थी।

मां का पत्र

अचानक याद आया, मां अक्सर एक पुरानी संदूक खोलती थी। वह उठा, कमरे में गया, संदूक खोली। अंदर पुराने कागज, एक छोटी डायरी, और एक लिफाफा—लिखा था, “मेरे बेटे के नाम।”

राघव के हाथ कांपने लगे। पत्र खोला—

“बेटा राघव, अगर तू यह पढ़ रहा है तो शायद मैं और तेरे बाबूजी अब तेरे साथ नहीं हैं। हमें तुझसे कोई शिकायत नहीं है। हम जानते हैं शहर की जिंदगी आसान नहीं होती। अगर कभी हमने तुझे याद किया तो सिर्फ दुआ में। हमने जो भी सहा, वो हमारा कर्म था, और तूने जो किया, वो तेरा। भगवान ने तुझे सजा नहीं दी, बस एक बड़ा आईना दिखाया। अगर तू यह समझ गया, तो हमारा जाना बेकार नहीं जाएगा।

तेरी मां, सरस्वती”

राघव फूट-फूट कर रो पड़ा। अब रोने का कोई मतलब नहीं था। पर शायद यही आखिरी राहत और मुक्ति थी।

नई शुरुआत—सेवा का संकल्प

कुछ महीनों बाद गांव में एक छोटा सा क्लीनिक खुला—”सरस्वती सेवा केंद्र”। राघव अब वही रहता था, गांव के बूढ़े-बुजुर्गों की दवाइयों का इंतजाम करता, किसी को अकेला नहीं छोड़ता। जो मां-बाप अपने बच्चों से दूर थे, उनके लिए राघव खुद बेटा बन गया।

एक दिन एक बूढ़े आदमी ने पूछा, “बेटा, तू शहर की चमक क्यों छोड़ आया?” राघव मुस्कुराया, “क्योंकि भगवान का इंसाफ तब पूरा होता है जब इंसान खुद बदल जाता है।”

पीपल के पेड़ के नीचे वो अक्सर दो दिए जलाता—एक मां के नाम, एक बाबूजी के नाम। अब उसे कोई डर नहीं था, ना कल का, ना हिसाब का। क्योंकि जो इंसाफ भगवान ने लिखा था, वह पूरा हो चुका था। और जो सजा थी, वो राघव को एक बेहतर इंसान बना चुकी थी।

सीख और सवाल

इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि हम अक्सर अपनों के लिए कहते हैं—”कल देख लेंगे।” सोचते हैं, समय बहुत है, मां-बाप हमेशा रहेंगे। लेकिन वक्त किसी का इंतजार नहीं करता। जो अपनापन और सेवा जिंदा रहते देनी चाहिए, वह बाद में सिर्फ पछतावा बनकर रह जाती है।

अब खुद से सवाल करो—अगर आज तुम्हारी मां या पिता का फोन आए तो क्या तुम कहोगे, “अभी बिजी हूं” या फिर सब कुछ छोड़कर उनकी आवाज सुनोगे? उनका हाल पूछोगे?

अंतिम संदेश

अगर यह कहानी आपके दिल को जरा सा भी छुआ है, तो अभी इसी वक्त अपने मां-बाप को एक कॉल कर लो। शायद वह छोटी सी कॉल उनके लिए सबसे बड़ी दवा बन जाए।

जय हिंद, जय भारत।