बेटी इस हालात में होगी ये पिता ने सपने में भी नहीं सोचा था |

नियति का न्याय: मेला, खिलौने और बिछड़े रिश्तों की दास्तां

प्रस्तावना: नियति का अनकहा खेल

जिंदगी के रंग बड़े ही निराले होते हैं। कभी-कभी इंसान जिस मोड़ पर सब कुछ खत्म मान लेता है, वहीं से एक नई शुरुआत की आहट सुनाई देती है। यह कहानी महाराष्ट्र के सांस्कृतिक केंद्र पुणे की है, जहाँ एक स्थानीय मेले के शोर-गुल, चकाचौंध और खुशियों के बीच एक ऐसी घटना घटी, जिसने वर्षों पहले बिखर चुके एक परिवार को फिर से एक सूत्र में पिरो दिया। यह कहानी है ‘रिश्ता’ नाम की उस 12 साल की बच्ची की, जो मेले में अपनी गरीबी बेचकर खिलौने खरीद रही थी, और उस 9 साल के ‘राहुल’ की, जो अपने पिता के साथ अपनी खुशियों की तलाश में वहां आया था।

अध्याय 1: मेले का दृश्य और दो अलग दुनिया

पुणे के एक विशाल मैदान में वार्षिक दीपावली मेला लगा था। चारों तरफ रंग-बिरंगी रोशनी, ऊंचे-ऊंचे झूले और बच्चों का कोलाहल था। इसी मेले के एक धूल भरे कोने में, जहाँ रोशनी थोड़ी कम थी, ज़मीन पर फटा हुआ टाट बिछाकर एक छोटी सी बच्ची बैठी थी, जिसका नाम ‘रिश्ता’ था। उसकी उम्र मुश्किल से 11-12 साल रही होगी, लेकिन उसकी आँखों में उम्र से पहले आई परिपक्वता और चेहरे पर गरीबी की गहरी लकीरें साफ दिख रही थीं। उसके पास कुल जमा 700-800 रुपये के साधारण प्लास्टिक के खिलौने थे, जिन्हें वह बड़ी उम्मीद से हर गुजरने वाले को दिखाती थी।

उसी समय वहां ‘सुरेश’ नाम का एक व्यक्ति अपने बेटे ‘राहुल’ के साथ पहुँचता है। राहुल किसी छोटे राजकुमार की तरह दिख रहा था—महंगे ब्रांडेड कपड़े, चमकते जूते और चेहरे पर एक बेफिक्र, समृद्ध मुस्कान। सुरेश एक प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर इंजीनियर था और समाज के उच्च वर्ग में उसका बड़ा नाम था। राहुल की नज़र अचानक एक नीले रंग की प्लास्टिक की कार पर पड़ी और वह रुक गया।

अध्याय 2: एक मासूम भेंट और पिता का अहंकार

राहुल खिलौने के लिए मचल उठा। सुरेश ने उसकी कलाई पकड़ते हुए डांटा, “चलो राहुल, यहाँ से! घर में पहले ही खिलौनों का ढेर लगा है और तुम सड़क किनारे से ये कचरा खरीदना चाहते हो?” राहुल ने रोना शुरू कर दिया। उसकी सिसकियाँ सुनकर रिश्ता का कोमल मन पसीज गया। उसने बड़े ही विनम्र और शांत भाव से कहा, “अंकल, ले लीजिए न छोटे बाबू के लिए, देखिए कितना रो रहे हैं। बच्चों का मन नहीं तोड़ना चाहिए।”

सुरेश ने झिड़कते हुए कहा, “तू अपनी सलाह अपने पास रख! जैसे तू ये खिलौना फ्री में देने वाली है।” रिश्ता ने अपनी मासूम मुस्कान के साथ जवाब दिया, “अंकल, अगर मेरा बस चलता तो मैं सच में फ्री में दे देती, पर हमें भी ये खरीद कर लाने पड़ते हैं। आप इसके 60 रुपये मत दीजिए, बस 30 रुपये दे दीजिए। मेरे लिए बाबू की खुशी ज्यादा बड़ी है।”

सुरेश का अहंकार फिर भी नहीं पिघला और वह राहुल को लगभग घसीटते हुए ले जाने लगा। राहुल पीछे मुड़-मुड़कर उस खिलौने को देख रहा था। रिश्ता से यह देखा नहीं गया। वह अपनी जगह से उठी, वही नीली कार उठाई और दौड़कर पीछे से राहुल के हाथ में थमा दी। उसने सुरेश से पैसे नहीं मांगे, बस एक इशारा किया और वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।

अध्याय 3: सच की पहली कड़वी परत

जब सुरेश ने राहुल के हाथ में खिलौना देखा, तो उसे लगा कि उसकी इज़्ज़त पर चोट पहुँची है। उसे लगा कि राहुल ने इसे चुराया है या माँग कर लिया है। वह गुस्से में तमतमाता हुआ वापस रिश्ता की दुकान पर आया। “ए लड़की! तूने इसे यह खिलौना क्यों दिया? क्या तुझे लगा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं?” सुरेश ने कड़क कर पूछा।

रिश्ता ने हाथ जोड़कर सहमते हुए कहा, “नहीं अंकल, ऐसी बात नहीं है। वह छोटा बच्चा है, रो रहा था। मुझे अच्छा नहीं लगा, इसलिए मैंने उसे छोटा सा उपहार समझकर दे दिया।” सुरेश का दिल पहली बार थोड़ा नरम पड़ा। उसे अहसास हुआ कि यह बच्ची कितनी स्वाभिमानी और नेक है। उसने बटुआ निकाला और पूछा, “ठीक है, इसका सही दाम बताओ। मैं उधार नहीं रखता।” रिश्ता ने फिर वही 30 रुपये कहे, जबकि उस पर साफ़ तौर पर 60 रुपये लिखे थे। सुरेश उसकी ईमानदारी से दंग रह गया। उसने पूछा, “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है और तुम इतनी छोटी उम्र में यह काम क्यों करती हो?”

“मेरा नाम ‘रिश्ता’ है,” बच्ची ने जवाब दिया। सुरेश के कान खड़े हो गए। “रिश्ता? बड़ा अजीब नाम है। तुम्हारी माँ का क्या नाम है?” बच्ची ने धीरे से कहा, “मेरी माँ का नाम ‘सुमित्रा’ है।”

अध्याय 4: अतीत के काले पन्ने और /विच्छेद/ का दर्द

‘रिश्ता’ और ‘सुमित्रा’—ये दो नाम सुरेश के सीने में किसी खंजर की तरह उतरे। उसके दिमाग में वर्षों पुरानी यादों का सैलाब उमड़ पड़ा।

सुरेश की फ्लैशबैक कहानी: सुरेश मूल रूप से अहमदनगर का रहने वाला था। जब वह मुंबई में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, तब उसकी मुलाकात सुमित्रा से हुई। सुमित्रा उस हॉस्टल के पास वाले अस्पताल में साफ-सफाई और सहायक का काम करती थी। वह बहुत सुंदर नहीं थी, लेकिन उसके विचार और उसकी सादगी ने सुरेश का दिल जीत लिया था। सुरेश ने समाज और अपने ऊँचे खानदान की परवाह किए बिना सुमित्रा से /प्रेम विवाह/ कर लिया।

विवाह के बाद वह उसे अपने पुश्तैनी घर ले आया। लेकिन वहां सुमित्रा के लिए स्थितियाँ किसी /यातना/ से कम नहीं थीं। सुरेश के माता-पिता और उसकी बहनों ने एक ‘जमादारिन’ की बेटी को कभी बहू के रूप में स्वीकार नहीं किया। उसे हर बात पर /अपमानित/ किया जाता था। सुरेश पहले तो उसका पक्ष लेता था, लेकिन धीरे-धीरे अपने करियर की भागदौड़ और परिवार के दबाव में वह सुमित्रा के प्रति /उदासीन/ और /निष्ठुर/ होता चला गया।

जब पहली बेटी हुई, तो घर में शोक जैसा माहौल छा गया। सुरेश के पिता ने कहा कि इस ‘कुलक्षणी’ ने वारिस नहीं दिया। उस बेटी का नाम सुमित्रा ने बड़े अरमानों से ‘रिश्ता’ रखा था, यह सोचकर कि शायद यह बच्ची परिवार के टूटे रिश्तों को जोड़ दे। दो साल बाद राहुल का जन्म हुआ, लेकिन तब तक सुरेश और सुमित्रा के बीच की खाई बहुत गहरी हो चुकी थी। रोज़-रोज़ के झगड़ों और /मानसिक प्रताड़ना/ से तंग आकर सुरेश ने सुमित्रा को /तलाक/ देने का फैसला कर लिया।

अध्याय 5: ममता का वह महान और /विनाशकारी/ बलिदान

तलाक के समय सबसे बड़ा सवाल बच्चों की कस्टडी का था। सुरेश चाहता था कि बेटा उसके पास रहे, जबकि सुमित्रा दोनों बच्चों को अपने पास रखना चाहती थी। लेकिन सुमित्रा ने एक रात अपनी फटी हुई आँखों से राहुल के भविष्य की ओर देखा। उसने सोचा, “अगर राहुल मेरे पास रहा, तो वह भी मेरी तरह गरीबी और अभावों में पलेगा। वह कभी इंजीनियर नहीं बन पाएगा।”

उसने अपने कलेजे पर पत्थर रखकर राहुल को सुरेश के पास छोड़ दिया और केवल अपनी बेटी रिश्ता को लेकर वहां से निकल गई। सुरेश ने उसे /तलाक/ के समझौते के रूप में 1.5 लाख रुपये दिए थे। सुमित्रा मुंबई अपने मायके लौटी, लेकिन वहां उसके माता-पिता खुद /दयनीय/ हालत में थे। भाई ने उसे बोझ समझा। सुमित्रा ने उन पैसों को अपने बीमार पिता के इलाज और माँ की दवाइयों में खर्च कर दिया। जब पैसे खत्म हुए, तो वह फिर से घरों में काम करने और खिलौने बेचने पर मजबूर हो गई।

अध्याय 6: पहचान का वह हृदयविदारक क्षण

मेले में सुरेश को जब पूरी सच्चाई का अहसास हुआ, तो वह पागलों की तरह रोने लगा। उसे अपनी उस बेटी पर गर्व हुआ जिसे उसने वर्षों पहले छोड़ दिया था। उसने रिश्ता का हाथ पकड़ा और कहा, “बेटा, मैं तुम्हारा अंकल नहीं, मैं ही तुम्हारा अभागा पापा हूँ।”

रिश्ता पहले तो चौंक गई, फिर उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसे अपनी माँ की बातें याद आईं, जो अक्सर कहती थी कि उसके पापा एक बड़े आदमी हैं। सुरेश उसे अपनी महंगी कार में बिठाकर उसके झोपड़ेनुमा घर ले गया। वहां एक कोने में सुमित्रा फटे हुए कपड़ों में बैठी खिलौने तैयार कर रही थी।

जैसे ही सुरेश और सुमित्रा की नज़रें मिलीं, जैसे वक्त थम गया। सुरेश उसके पैरों में गिर गया। “सुमित्रा, मुझे माफ कर दो! मैं अपनी इज़्ज़त और रुतबे के पीछे अंधा हो गया था।” सुमित्रा की नज़र जब राहुल पर पड़ी, जिसे उसने 7 साल पहले छोड़ा था, तो वह पागलों की तरह चिल्लाई और उसे अपने सीने से लगा लिया। राहुल भी अपनी माँ को पहचान गया और “माँ-माँ” कहकर बिलखने लगा। यह मिलन इतना भावुक था कि आसपास के पड़ोसी भी अपनी आँखें पोंछने लगे।

अध्याय 7: पश्चाताप और एक नया सवेरा

सुरेश ने देखा कि सुमित्रा ने उसके जाने के बाद कभी दूसरी शादी के बारे में नहीं सोचा, जबकि उसके पास कई मौके थे। उसने केवल अपने माता-पिता की सेवा की और अपनी बेटी को स्वाभिमानी बनाया। सुरेश ने भी दोबारा विवाह नहीं किया था क्योंकि वह अपने अंदर के खालीपन को समझ चुका था।

सुरेश ने उसी वक्त फैसला किया। वह सुमित्रा, रिश्ता और सुमित्रा के बीमार माता-पिता को लेकर अपने शानदार बंगले पर आ गया। उसने समाज और अपने पुराने ख्यालात वाले रिश्तेदारों की परवाह करना छोड़ दिया।

निष्कर्ष: एक नई शुरुआत

सुरेश ने रिश्ता का दाखिला पुणे के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल में कराया। आज रिश्ता और राहुल एक साथ एक ही बेंच पर बैठकर पढ़ते हैं। सुमित्रा अब उस घर की मालकिन है, जहाँ उसे कभी /दासी/ समझा जाता था।

यह कहानी हमें तीन बड़े सबक सिखाती है:

    रिश्तों की कद्र: शिक्षा और धन आपको सफल बना सकते हैं, लेकिन संस्कार और संवेदनाएं ही आपको इंसान बनाती हैं।
    त्याग की पराकाष्ठा: एक माँ अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए खुद से दूर होने का दर्द भी सह सकती है।
    नियति का चक्र: हम चाहे अपनों से कितना भी दूर भाग लें, यदि प्रेम सच्चा है, तो तक़दीर के धागे हमें वापस एक ही जगह ले आते हैं।

सीख: कभी भी किसी के काम या उसकी गरीबी का /उपहास/ न उड़ाएं। समय का पहिया कब घूम जाए और आपको किसके सामने झुकना पड़ जाए, यह कोई नहीं जानता। अहंकार रिश्तों को /भस्म/ कर देता है, जबकि क्षमा और विश्वास उन्हें पुनर्जीवित करते हैं।