रिश्तों का कत्ल: मुजफ्फरनगर की एक खौफनाक दास्तान
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का बुढ़ाना क्षेत्र अपनी उपजाऊ भूमि और शांत देहाती जीवन के लिए जाना जाता है। लेकिन साल 2022 में यहाँ एक ऐसी घटना घटी जिसने न केवल इस शांति को भंग कर दिया, बल्कि ममता और रिश्तों के पवित्र बंधन पर भी एक गहरा दाग लगा दिया। यह कहानी है स्वार्थ, वासना और विश्वासघात की, जहाँ एक माँ ने अपने ही जिगर के टुकड़े का सौदा अपने सुख के लिए कर दिया।
खुशियों का आशियाना और वक्त की मार
बुढ़ाना थाने के अंतर्गत आने वाले एक गाँव में मामचंद अपने परिवार के साथ रहते थे। मामचंद एक मेहनती किसान थे और उनके पास अपनी जमीन, ट्रैक्टर और ट्यूबवेल था। उनके जीवन का केंद्र उनका इकलौता बेटा, आशीष था। आशीष 14-15 साल का एक होनहार किशोर था, जो पढ़ाई के साथ-साथ खेती में अपने पिता का हाथ भी बंटाता था। मामचंद की पत्नी मुनेश एक कुशल गृहिणी थी। गाँव वाले अक्सर इस परिवार की मिसाल दिया करते थे—छोटा परिवार, सुखी परिवार।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। साल 2020 में एक सड़क दुर्घटना में मामचंद की असामयिक मृत्यु हो गई। इस एक हादसे ने पूरे परिवार की नींव हिला दी। मुनेश के सिर से सुहाग का साया उठ गया और आशीष अनाथ जैसा महसूस करने लगा। उस समय गाँव के लोग और रिश्तेदार ढांढस बंधाने आए। सबने यही कहा, “मुनेश, अब आशीष ही तुम्हारा सहारा है, इसके लिए तुम्हें जीना होगा।”
अकेलापन और सत्येंद्र का प्रवेश
वक्त बीतता गया और धीरे-धीरे सांत्वना देने वाले हाथ पीछे हटने लगे। मुनेश को अब खुद खेती-किसानी संभालनी पड़ रही थी। हालांकि मामचंद ने सब कुछ व्यवस्थित छोड़ा था, लेकिन मुनेश को ट्रैक्टर चलाना या बाजार के काम करना नहीं आता था। इसी बीच उनके पड़ोस में रहने वाला सत्येंद्र उनकी मदद के लिए आगे आया।
सत्येंद्र भी विधुर था; उसकी पत्नी की मृत्यु 2019 में हो गई थी। वह मुनेश का हमदर्द बनकर उभरा। कभी ट्रैक्टर से खेत जोत देना, कभी आशीष के लिए शहर से किताबें ला देना, तो कभी मुनेश को जरूरी कामों के लिए बाहर ले जाना। मुनेश को लगा कि खुदा ने उसे एक सहारा भेज दिया है। लेकिन उसे क्या पता था कि यह सहारा ही एक दिन उसके सर्वनाश का कारण बनेगा।
सत्येंद्र और मुनेश के बीच की यह हमदर्दी धीरे-धीरे ‘अवैध संबंधों’ में बदल गई। दोनों का अकेलापन उन्हें एक-दूसरे के करीब ले आया। मुनेश को अब आशीष से ज्यादा सत्येंद्र की बातों में सुकून मिलने लगा था।
जब मासूम आँखों ने सच देख लिया
आशीष अब बच्चा नहीं रहा था। 14-15 साल की उम्र में बच्चे सब समझने लगते हैं। उसे अपनी माँ और सत्येंद्र के बीच की बढ़ती नजदीकियां खटकने लगी थीं। एक दिन आशीष ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस माँ को वह साक्षात देवी मानता था, उसका यह रूप देखकर वह टूट गया।
आशीष ने अपनी माँ को टोकना शुरू किया। उसने कहा, “माँ, यह गलत है। पिताजी की आत्मा को क्या जवाब दोगी? गाँव वाले बातें बनाएंगे, तो मैं किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहूँगा।”
मुनेश ने पहले तो इसे नजरअंदाज किया, फिर उसे डांटा। उसने कहा, “तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, मुझे मत सिखा कि मुझे क्या करना है। मैं अकेली कैसे रहूँ, तुझे अंदाजा भी है?” लेकिन आशीष पीछे हटने को तैयार नहीं था। वह सत्येंद्र का घर आना बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। वह माँ और सत्येंद्र के बीच की दीवार बन गया था।
खौफनाक साजिश की रात
सत्येंद्र के मन में लालच भी घर कर गया था। उसे पता था कि आशीष के नाम पर अच्छी-खासी जमीन और जायदाद है। अगर आशीष रास्ते से हट जाए, तो वह मुनेश से शादी करके उस सारी संपत्ति का मालिक बन सकता था। दूसरी तरफ मुनेश को भी लगने लगा था कि आशीष बड़ा होकर उसे चैन से नहीं जीने देगा।
7 अगस्त 2022 की वह काली रात थी। आशीष रोज की तरह ट्यूबवेल की रखवाली करने के लिए खेत पर गया था। वह बेखबर गहरी नींद में सो रहा था। उसे क्या पता था कि जिन हाथों ने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया, वही उसकी जान लेने आ रहे हैं।
आधी रात के करीब, मुनेश और सत्येंद्र चुपके से ट्यूबवेल पर पहुँचे। आशीष नींद में था। उन दोनों ने मिलकर आशीष का गला घोंट दिया। वह मासूम कुछ पल के लिए छटपटाया, अपनी माँ की तरफ मदद के लिए देखा होगा, लेकिन वहाँ ममता नहीं, पत्थर दिल हत्यारा खड़ा था। दम टूटने के बाद, उन्होंने उसकी लाश को ट्यूबवेल के पास ही बने एक गहरे गड्ढे में फेंक दिया, जिसमें गंदा पानी भरा हुआ था। उन्हें लगा कि सब कुछ एक हादसे जैसा लगेगा।
सुबह का नाटक और पुलिस की जांच
अगले दिन, 8 अगस्त की सुबह, मुनेश ने अपना नाटक शुरू किया। वह सुबह-सुबह खेत की तरफ भागी और रास्ते में मिली महिलाओं से पूछने लगी, “बहन, मेरा आशीष घर नहीं आया, क्या तुमने उसे देखा है?” गाँव वाले भी फिक्रमंद हो गए। सबने मिलकर तलाश शुरू की। मुनेश रोने और बेहोश होने का ऐसा ढोंग कर रही थी कि किसी को उस पर शक ही न हो।
शाम तक जब कुछ पता नहीं चला, तो पुलिस को सूचना दी गई। अगले दिन आशीष की फूली हुई लाश उस गड्ढे से बरामद हुई। माँ का विलाप देखकर पूरा गाँव रो पड़ा। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा।
जांच अधिकारी (IO) को कुछ बातें अजीब लगीं। पहला यह कि आशीष एक अच्छा तैराक था, वह इतने छोटे गड्ढे में डूबकर कैसे मर सकता था? दूसरा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया—मौत डूबने से नहीं, बल्कि गला घोंटने (asphyxiation) से हुई थी। यानी यह साफ तौर पर कत्ल था।
मोबाइल की कॉल डिटेल्स और गिरफ्तारी
पुलिस ने शक के आधार पर परिवार और करीबियों के मोबाइल नंबरों की जांच की। मुनेश के कॉल रिकॉर्ड्स से पता चला कि घटना वाली रात वह सत्येंद्र के साथ घंटों बात कर रही थी। गाँव में गुप्त पूछताछ करने पर पुलिस को उनके संबंधों के बारे में भी सुराग मिले।
14 अगस्त 2022 को, जब घर में आशीष की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना चल रही थी और मुनेश रोते-रोते बेहोश हो रही थी, तभी पुलिस वहाँ पहुँची। पुलिस ने अचानक मुनेश और सत्येंद्र को हिरासत में ले लिया। पूरा गाँव दंग रह गया। लोग चिल्लाने लगे, “पुलिस पागल हो गई है! एक दुखी माँ को क्यों ले जा रही है?”
लेकिन थाने में जब पुलिस ने सख्ती दिखाई और अलग-अलग पूछताछ की, तो मुनेश टूट गई। उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया। उसने बताया कि कैसे उसने अपने ‘प्यार’ और संपत्ति के लिए अपने ही बेटे को मौत के घाट उतार दिया। सत्येंद्र ने भी कबूल किया कि उसका मकसद संपत्ति हड़पना था।
न्याय का दिन
यह मामला कोर्ट में चला। एक माँ द्वारा अपने ही बेटे की हत्या के इस जघन्य अपराध ने समाज को झकझोर दिया था। मुजफ्फरनगर की अदालत में गवाहों और सबूतों के आधार पर कार्यवाही आगे बढ़ी।
16 जनवरी 2026 को अदालत ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जज ने टिप्पणी की कि “यह कृत्य ममता के नाम पर कलंक है।” कोर्ट ने मुनेश और सत्येंद्र दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उन पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
निष्कर्ष और सीख
आज मुनेश और सत्येंद्र जेल की सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी काट रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह संपत्ति या वह संबंध जिसके लिए उन्होंने यह पाप किया, उन्हें मिल सका? आशीष तो चला गया, लेकिन वह पीछे छोड़ गया एक ऐसा समाज जो आज भी यह सोचकर कांप जाता है कि क्या एक माँ भी ऐसी हो सकती है?
यह कहानी हमें सिखाती है कि क्षणिक सुख और लालच इंसान को अंधा बना देते हैं। रिश्तों की मर्यादा टूटने पर अंजाम केवल विनाश ही होता है। समाज में अकेलेपन का सहारा लेना बुरा नहीं है, लेकिन उस सहारे के लिए अपनों का लहू बहाना अक्षम्य अपराध है।
नोट: यह कहानी समाज में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से लिखी गई है। अपराध कभी छुपता नहीं है और कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। सुरक्षित रहें और रिश्तों की गरिमा बनाए रखें।
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