बेटे-बहू ने माँ-बाप को चोर समझकर घर से निकाल दिया… फिर माँ-बाप ने जो किया, पूरी दुनिया रो पड़ी

रिश्तों की राख और पश्चाताप की अग्नि
परिचय
यह कहानी एक ऐसे बेटे की है जिसने आधुनिकता और संदेह के चश्मे से अपने उन माता-पिता को देखा, जिन्होंने उसे पालने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। एक छोटी सी गलतफहमी कैसे जीवन भर का घाव बन जाती है, यह इस कहानी का सार है।
अध्याय 1: वह मनहूस सुबह
सुबह का समय था। आसमान साफ था और सूरज की सुनहरी किरणें जमीन को छूने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित उस भव्य बंगले के भीतर का वातावरण बहुत ठंडा और बोझिल था। बाहर से देखने पर वह घर खुशहाली का प्रतीक था—बड़ा गेट, मखमली घास वाला लॉन और चमकती दीवारें। मगर अंदर एक ऐसा सन्नाटा पसरा था जो किसी तूफान के आने का संकेत दे रहा था।
घर के ड्राइंग रूम में ६५ वर्षीय सावित्री देवी एक कोने में खड़ी थीं। सफेद सूती साड़ी, सिर पर पल्लू और झुकी हुई आंखें। उनके हाथ में एक पुराना सा कपड़े का झोला था, जिसमें शायद उनकी पूरी दुनिया सिमटी हुई थी। उनके बगल में उनके पति रामनाथ जी खड़े थे। सादा कुर्ता-पायजामा, चेहरे पर उम्र की अनगिनत झुर्रियां और आंखों में वह गहरा दर्द जिसे शब्द कभी बयान नहीं कर सकते।
उनके सामने खड़ा था उनका इकलौता बेटा अमित और उसकी पत्नी नेहा। अमित का चेहरा गुस्से से लाल था। नेहा, जो रेशमी साड़ी में सजी हुई थी, उसकी आंखों में अपने सास-ससुर के प्रति कोई सम्मान नहीं, बल्कि एक तिरस्कार था।
“अब बहुत हो गया मम्मी-पापा!” नेहा की आवाज हॉल में गूंजी। “हमारे घर से आए दिन पैसे गायब हो रहे हैं। पिछली बार अलमारी से पांच हजार कम थे, और आज लॉकर से पूरे दस हजार गायब हैं। इस घर में आपके अलावा और कौन आता-जाता है?”
सावित्री देवी का शरीर कांप उठा। उन्होंने भारी आवाज में कहा, “बेटा, हमने कुछ नहीं लिया। हमें पैसों की क्या जरूरत?”
“तो फिर पैसे उड़कर चले गए?” अमित दहाड़ा। “लॉकर की चाभी मेज पर थी। नेहा कह रही है कि उसने आपको वहां टहलते देखा था। पापा, आपसे यह उम्मीद नहीं थी कि इस उम्र में आप यह सब करेंगे।”
रामनाथ जी ने कांपते हाथों से अपनी लाठी पकड़ी और बोले, “बेटा, भगवान की कसम… हमने एक पैसा नहीं छुआ।”
नेहा ने ताना मारा, “कसम! अब कसमों पर कौन भरोसा करता है? आप लोग इस घर के लिए बोझ बन गए थे, अब चोर भी बन गए?”
अमित ने गुस्से में मुख्य द्वार खोल दिया। “आप दोनों अभी इसी वक्त यहाँ से चले जाइए। जब तक आप अपनी गलती नहीं मानते, इस घर में आपके लिए कोई जगह नहीं है।”
माता-पिता ने एक-दूसरे की ओर देखा। सावित्री देवी की आंखों से आंसू गिरकर उनकी साड़ी पर जज्ब हो गए। जिस घर की एक-एक ईंट उन्होंने अपनी खुशियों को बेचकर जोड़ी थी, आज उसी घर की दहलीज उन्हें पराया कर रही थी।
अध्याय 2: बेघर और बेसहारा
दोनों बूढ़े लोग धीरे-धीरे घर से बाहर निकले। भारी गेट के बंद होने की आवाज सावित्री देवी के दिल पर चोट की तरह लगी। सड़क पर आकर रामनाथ जी एक पल के लिए ठिठक गए। उन्होंने आसमान की ओर देखा और बुदबुदाए, “हे ईश्वर, अगर हमसे कोई पाप हुआ है तो हमें सजा दे, पर हमारे बेटे को खुश रखना।”
उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। शहर की भीड़ में वे दो साये गुम हो गए। रिश्तेदार तब तक अपने थे जब तक रामनाथ जी के पास सरकारी नौकरी और रसूख था। अब तो वे खुद ही अपने घर से ‘चोर’ करार दिए गए थे।
उस रात उन्होंने रेलवे स्टेशन की एक ठंडी बेंच पर शरण ली। सावित्री देवी ने अपने झोले से एक फटी हुई चादर निकाली और उसे बेंच पर बिछा दिया। रामनाथ जी पूरी रात जागते रहे। उनके दिमाग में अमित का बचपन घूम रहा था। वह अमित जिसे निमोनिया होने पर रामनाथ जी उसे कंधे पर उठाकर तीन मील पैदल अस्पताल ले गए थे। वह अमित जिसकी पढ़ाई के लिए सावित्री ने अपने सोने के कंगन तक बेच दिए थे। आज वही अमित उन्हें पहचान नहीं सका।
अध्याय 3: सत्य का प्रकाश और अहंकार का पर्दा
उधर बंगले में, अमित परेशान था। उसने सोचा था कि माता-पिता के जाने के बाद घर में शांति होगी, लेकिन उसे घुटन महसूस हो रही थी। तीन दिन बीत गए। नेहा अपने कमरे की सफाई कर रही थी कि अचानक उसके पुराने हैंडबैग की चैन खुली और उसमें से नोटों की एक गड्डी नीचे गिरी।
अमित वहीं खड़ा था। उसने झुककर पैसे उठाए। “नेहा, ये क्या है?”
नेहा का चेहरा सफेद पड़ गया। “अरे… ये तो वही पैसे हैं जो मुझे लगा था चोरी हो गए। शायद मैंने ही इन्हें सुरक्षित रखने के लिए इस बैग में डाल दिया था और भूल गई।”
अमित के हाथ कांपने लगे। उसने अपनी पत्नी की ओर देखा। “सिर्फ तुम्हारी एक भूल की वजह से मैंने अपने मां-बाप को घर से निकाल दिया? उन्हें चोर कहा?”
नेहा ने बात संभालने की कोशिश की, “तो क्या हुआ? वे अब तक कहीं किसी रिश्तेदार के यहाँ होंगे। फोन कर लो, वापस आ जाएंगे।”
अमित ने तुरंत फोन मिलाया, लेकिन दोनों के नंबर बंद थे। उसने शहर के हर कोने में उन्हें ढूंढा, हर रिश्तेदार के यहाँ फोन किया, लेकिन उनका कहीं पता नहीं चला। उसका अहंकार अब पश्चाताप की आग में जलने लगा था।
अध्याय 4: मंदिर और आश्रम का आसरा
भटकते-भटकते सावित्री और रामनाथ एक पुराने मंदिर पहुंचे। वहां के पुजारी ने उनकी हालत देखकर उन्हें पास के एक छोटे से वृद्धाश्रम का पता बताया। आश्रम का नाम था ‘शांति निकेतन’। वहां पहुंचकर रामनाथ जी ने मैनेजर से कहा, “हम बेघर हैं। क्या हमें यहाँ जगह मिल सकती है?”
मैनेजर ने जब उनकी कहानी सुनी, तो उसकी आंखें भर आईं। उसने उन्हें एक छोटा सा कमरा दे दिया। वहां कई और बुजुर्ग थे जिनकी कहानियां कमोवेश ऐसी ही थीं। सावित्री देवी ने वहां की रसोई में हाथ बंटाना शुरू कर दिया और रामनाथ जी वहां के छोटे से बगीचे की देखभाल करने लगे।
अमित को अंततः एक हफ्ते बाद मंदिर के पुजारी से पता चला कि दो बुजुर्ग वृद्धाश्रम गए हैं। वह भागता हुआ ‘शांति निकेतन’ पहुंचा। आंगन में सावित्री देवी बैठी स्वेटर बुन रही थीं। अमित उनके पैरों में गिर पड़ा।
“मां! मुझे माफ कर दो। पैसे मिल गए… नेहा से गलती हो गई थी। घर चलिए मां!” अमित फूट-फूट कर रोने लगा।
रामनाथ जी पास ही एक बेंच पर बैठे थे। उन्होंने अमित को देखा और बहुत शांत लहजे में बोले, “घर? बेटा, घर तो वह होता है जहां विश्वास की दीवारें मजबूत हों। तुमने तो उन दीवारों को ही गिरा दिया।”
अमित गिड़गिड़ाया, “पापा, मैं सब ठीक कर दूंगा। अब कभी कोई शिकायत नहीं होगी।”
सावित्री देवी ने अमित के सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, हम नाराज नहीं हैं। लेकिन अब हम थक गए हैं। हमें यहाँ वह सम्मान और शांति मिल रही है जो उस बड़े बंगले में नहीं थी।”
अमित उस दिन खाली हाथ लौटा, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह रोज आश्रम आने लगा। कभी फल लाता, कभी दवाइयां। लेकिन माता-पिता का मन नहीं बदला। उन्हें अब अपनों के बीच रहकर मिलने वाले घावों से ज्यादा परायों के बीच मिलने वाली मरहम पसंद आने लगी थी।
अध्याय 5: अंतिम फैसला और दुनिया की खामोशी
समय बीतता गया। एक दिन रामनाथ जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। अमित दिन-रात उनके पास रहा। अपनी नौकरी, अपनी पत्नी, सब छोड़कर वह सिर्फ अपने पिता की सेवा में लग गया। उसने सावित्री देवी से वादा किया कि वह अब एक आदर्श बेटा बनेगा।
रामनाथ जी ने अपने अंतिम समय में अमित को पास बुलाया और एक लिफाफा दिया। उन्होंने कहा, “इसे हमारे जाने के बाद पढ़ना।”
कुछ दिनों बाद रामनाथ जी का देहांत हो गया। सावित्री देवी भी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकीं और पंद्रह दिनों के भीतर उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए। अमित पूरी तरह टूट चुका था। अंतिम संस्कार के बाद जब वह घर लौटा, तो उसने वह लिफाफा खोला।
उसमें रामनाथ जी की वसीयत और एक पत्र था। पत्र में लिखा था: “बेटा अमित, हमें पता था कि पैसे चोरी नहीं हुए थे। नेहा ने वह पैसे जानबूझकर छिपाए थे ताकि हमें घर से निकाल सके। हमने यह जानते हुए भी चुप्पी साधी क्योंकि हम देखना चाहते थे कि हमारा बेटा अपनी पत्नी के प्यार में अंधा होकर कितना गिर सकता है। हमने अपनी सारी जमीन और जमा पूंजी (जो करोड़ों की थी) इस वृद्धाश्रम के नाम कर दी है। तुम्हारे पास यह बंगला रहेगा, लेकिन याद रखना, बिना माता-पिता के यह सिर्फ ईंटों का ढांचा है। हमने तुम्हें माफ कर दिया है क्योंकि माता-पिता कभी अपने बच्चों से नफरत नहीं कर सकते।”
जब यह बात बाहर आई, तो पूरे शहर में अमित की थू-थू हुई। लोग उस बंगले के सामने से गुजरते हुए सिर झुका लेते थे। अमित ने अपनी गलती सुधारने के लिए उस बंगले को भी एक चैरिटी अस्पताल में बदल दिया और खुद उसी वृद्धाश्रम में एक स्वयंसेवक (Volunteer) के रूप में काम करने लगा।
उपसंहार
आज भी उस आश्रम की दीवार पर एक तख्ती लगी है जिस पर लिखा है— “माता-पिता ईश्वर का साक्षात रूप हैं। उनका अपमान ईश्वर का अपमान है।” अमित हर रोज उस तख्ती को साफ करता है और अपने माता-पिता की तस्वीर के सामने माफी मांगता है। पर वक्त निकल चुका था। पश्चाताप चाहे कितना भी गहरा हो, बीता हुआ समय और मरे हुए इंसान कभी वापस नहीं आते।
दुनिया आज भी चुप है, क्योंकि यह कहानी सिर्फ अमित की नहीं, बल्कि हर उस संतान की है जो सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए उन हाथों को भूल जाती है जिन्होंने उन्हें चलना सिखाया था।
समाप्त
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