बेटे-बहू ने विधवा माँ को एक-एक रोटी को तरसाया, मगर भगवान का इंसाफ अभी बाकी था

भगवान का इंसाफ – एक विधवा मां की दास्तां
भूमिका
उत्तर भारत के सोनपुर गाँव में सुबह की शुरुआत मंदिर की घंटियों से होती थी और शाम को घर-घर दीप जलते थे। इसी गाँव के एक कोने में मिट्टी और खपैल से बना एक पुराना घर था, जिसमें रहती थीं शारदा देवी। शारदा देवी कभी उस घर की रौनक हुआ करती थीं, लेकिन आज वह अकेली थीं। पति हरिनाथ जी की मृत्यु के बाद उनका एकमात्र सहारा था बेटा रमेश, जिसे उन्होंने भूखे रहकर पाला, पढ़ाया और बड़ा किया। मगर वक्त ने ऐसी करवट ली कि वही बेटा और उसकी बहू सुनीता, शारदा देवी के लिए दुख का कारण बन गए।
शारदा देवी का संघर्ष
शारदा देवी का जीवन संघर्षों से भरा रहा। हरिनाथ जी गाँव के ईमानदार किसान थे, ज्यादा जमीन नहीं थी, मगर मेहनत और सादगी से परिवार को पालते थे। शारदा देवी ने भी खेतों में काम किया, घर संभाला, और रमेश को कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी। खुद भूखी रह जाती, मगर बेटे की थाली हमेशा भरपूर रहती। रमेश जब पढ़ने शहर गया, तो शारदा देवी ने अपने गहने तक गिरवी रख दिए ताकि बेटे की पढ़ाई में कोई रुकावट न आए।
समय बीता, रमेश पढ़-लिखकर शहर में नौकरी करने लगा। उसके विवाह के बाद शारदा देवी गाँव में अकेली रह गईं। पति के अचानक देहांत के बाद उनका जीवन वीरान हो गया। कुछ महीनों बाद रमेश ने मां को शहर बुला लिया। शारदा देवी की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्हें लगा भगवान ने उनकी सुन ली।
शहर का जीवन और रिश्तों की जटिलता
शहर का जीवन शारदा देवी के लिए बिल्कुल नया था। ऊँची इमारतें, तेज़ आवाजें, भीड़ – सब कुछ अजनबी था। मगर बेटे के साथ होने का सुख इन सब पर भारी था। शुरुआत में सुनीता भी ठीक-ठाक व्यवहार करती थी, लेकिन उसके शब्दों में अपनापन कम था। धीरे-धीरे रमेश के ऑफिस जाने और देर रात लौटने की वजह से घर में ज्यादातर समय शारदा देवी और सुनीता ही रहतीं।
सुनीता को शारदा देवी का हर काम खटकने लगा। कभी उनके जल्दी उठने से परेशानी, कभी पूजा-पाठ से, कभी उनके पुराने ढंग से बात करने से। शारदा देवी कोशिश करतीं कि किसी को तकलीफ न हो, चुपचाप अपने कमरे में रहतीं, ज्यादा बोलती नहीं। मगर सुनीता को उनका मौजूद होना ही अखरता था।
अपमान और भूख की पीड़ा
धीरे-धीरे हालात और बिगड़ने लगे। सुनीता रसोई में शारदा देवी को घुसने नहीं देती। कहती – आपसे कुछ टूट-फूट गया तो मैं खुद देख लूंगी। पहले जो मां बेटे की थाली सजाती थी, आज वही मां खाने के लिए दूसरों पर निर्भर थी। एक दिन दोपहर को शारदा देवी को भूख लगी, उन्होंने धीरे से आवाज दी – बहू, थोड़ी रोटी मिल जाती? सुनीता ने अनसुना कर दिया। कुछ देर बाद शारदा देवी खुद रसोई की तरफ बढ़ीं, देखा खाना बना है, लेकिन बर्तन ढके हुए हैं। जैसे ही उन्होंने ढक्कन उठाया, सुनीता तेज़ आवाज में बोली – मैंने मना किया है ना, रसोई में मत आया कीजिए।
शारदा देवी घबरा गईं, उनके हाथ कांपने लगे। बिटिया, बस एक रोटी। सुनीता ने ताना मारते हुए कहा – आपको हर वक्त खाने की ही पड़ी रहती है क्या? डॉक्टर ने कहा है ना कम खाया कीजिए। उस दिन शारदा देवी बिना खाए ही लौट गईं। यह कोई एक दिन की बात नहीं थी। धीरे-धीरे यह रोज़ का सिलसिला बन गया। कभी खाना देर से मिलता, कभी बचा खुचा, कई बार तो एक ही रोटी देकर कहा जाता – इतना ही बचा है।
शारदा देवी की हालत दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही थी। उनका शरीर सूखने लगा, आंखों की चमक बुझने लगी। मगर सबसे बड़ा दर्द शारीरिक नहीं, मानसिक था। जिस बेटे को उन्होंने अपनी गोद में पाल-पोसकर बड़ा किया, वही बेटा अब सब कुछ देखकर भी चुप था।
माँ का धैर्य और भगवान से प्रार्थना
रात को जब रमेश घर आता, सुनीता पहले ही अपनी कहानी सुना चुकी होती – आपकी मां दिन भर शिकायत करती रहती है, कभी खाना पसंद नहीं, कभी घर अच्छा नहीं। रमेश थका हुआ होता, वो बिना कुछ सोचे समझे मां से कह देता – अम्मा, आप थोड़ा एडजस्ट क्यों नहीं कर लेतीं? यह शब्द शारदा देवी के दिल में तीर की तरह चुबते।
एक रात शारदा देवी अपने कमरे में अकेली बैठी थीं। पेट में जलन, कमजोरी से शरीर कांप रहा था। उन्होंने अपने पति की तस्वीर की ओर देखा और बुदबुदाईं – देखो जी, तुम्हारी शारदा आज एक-एक रोटी को तरस रही है। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उन्हें याद आया, कैसे उन्होंने रमेश के लिए अपने हिस्से की रोटी भी उसे खिला दी थी। कैसे सर्दियों में खुद ठंड में कांपती रहीं मगर बेटे को कंबल ओढ़ाया। और आज वही बेटा।
मगर शारदा देवी ने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। उन्होंने बस इतना कहा – हे प्रभु, अगर मैंने कुछ गलत किया हो तो सजा मुझे दो, मगर मेरे बेटे को सद्बुद्धि देना।
भगवान का संकेत
उसी रात एक अजीब सा सपना आया। सपने में वे एक बड़े से दरबार में खड़ी थीं। सामने उजाला था और उस उजाले से आवाज आई – शारदा, धैर्य रखो। अन्याय का हिसाब जरूर होगा। शारदा देवी की नींद खुल गई, दिल तेज़-तेज़ धड़क रहा था। उन्हें नहीं पता था कि यह सपना है या कोई संकेत।
अगले दिन भी हालात वैसे ही रहे। सुनीता ने जानबूझकर खाना कम बनाया। शारदा देवी को सिर्फ एक सूखी रोटी मिली। उन्होंने चुपचाप रोटी खाई और पानी पीकर पेट भरने की कोशिश की। शाम को जब रमेश घर आया, शारदा देवी ने हिम्मत करके कहा – बेटा, आजकल तबीयत ठीक नहीं रहती, डॉक्टर को दिखा दे तो… रमेश ने सुनीता की ओर देखा, सुनीता तुरंत बोली – इन्हें बस बहाना चाहिए, दिन भर आराम करती हैं फिर भी बीमार।
रमेश ने बात टाल दी। उस रात शारदा देवी ने फैसला कर लिया – वे अब किसी से कुछ नहीं मांगेंगी, चाहे जो हो जाए। लेकिन शायद भगवान ने भी देख लिया था कि अब सहने की सीमा पार हो चुकी है।
कहानी का मोड़ – गोविंद जी का आगमन
रात गहरी हो चली थी, मगर शारदा देवी के मन में शोर था – दर्द, अपमान और टूटती उम्मीदों का। सुबह होने से पहले ही उनकी आंख खुल गई। आदत थी, सालों से सूरज उगने से पहले उठ जाना। मगर आज उठते ही सिर चकराने लगा। गला सूखा था, पेट में जलन थी। उन्हें समझ आ रहा था कि शरीर जवाब देने लगा है। उन्होंने मन ही मन कहा – हे नारायण, आज का दिन भी काट ही लेंगे।
सुबह रमेश ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था, सुनीता मोबाइल में व्यस्त थी। शारदा देवी बाहर आईं तो रमेश ने औपचारिक सा पूछा – अम्मा, सब ठीक है ना? शारदा देवी ने मुस्कुराने की कोशिश की – हां बेटा, सब ठीक है। यह वही मां थी जो कभी बेटे के चेहरे की एक झलक से उसका हाल समझ जाती थी, और आज बेटा मां के कांपते हाथ तक नहीं देख पाया।
दोपहर होते-होते शारदा देवी की हालत और बिगड़ने लगी। उन्होंने सुनीता को आवाज दी – बहू, जरा पानी… सुनीता ने दूर से जवाब दिया – खुद ले लीजिए, मैं काम में हूं। शारदा देवी धीरे-धीरे रसोई तक पहुंचीं, गिलास उठाते वक्त हाथ कांप गया और गिलास नीचे गिर गया। आवाज सुनकर सुनीता दौड़ती हुई आई – हे भगवान, अब क्या तोड़ दिया? शारदा देवी डर गईं – बिटिया, हाथ कांप गया। सुनीता चिल्लाई – हर वक्त यही ड्रामा रहता है, आपको समझ नहीं आता कि आप यहाँ बोझ हैं।
शारदा देवी ने कुछ नहीं कहा, वे झुककर कांच के टुकड़े उठाने लगीं। तभी चक्कर आया और वे वहीं फर्श पर बैठ गईं। कुछ पल के लिए सुनीता घबरा गई – अगर कुछ हो गया तो जवाब कौन देगा? उसने झुझलाते हुए कहा – उठिए मांजी, यहाँ बैठकर तमाशा मत कीजिए। शारदा देवी उठ तो गईं मगर अंदर कुछ टूट चुका था।
पुराने मित्र का सहारा
दोपहर बाद दरवाजे की घंटी बजी। सुनीता ने दरवाजा खोला तो सामने एक साधारण कपड़ों में शांत चेहरे वाला व्यक्ति खड़ा था – उम्र लगभग 50 के आसपास, माथे पर हल्का तिलक, आंखों में अजीब सी गहराई। मांजी है? उसने पूछा। सुनीता ने ऊपर-नीचे देखा – कौन? मैं उनका पुराना परिचित हूं, गाँव से आया हूं।
शारदा देवी बाहर आईं तो उस व्यक्ति को देखकर ठिठक गईं – अरे, पंडित गोविंद जी! उनकी आंखों में आश्चर्य और खुशी दोनों थे। गोविंद जी वही थे जो कभी गाँव में कथा वाचक हुआ करते थे, हरिनाथ जी के घनिष्ठ मित्र। वर्षों बाद उनका यहाँ आना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
गोविंद जी ने नम्रता से कहा – आपको देखे बिना चैन नहीं मिला, शहर आया था, सोचा हालचाल ले लूं। शारदा देवी की आंखें भर आईं – आइए, अंदर आइए। सुनीता ने मन मारकर उन्हें बैठने दिया। चाय बनाने का मन नहीं था, मगर औपचारिकता निभानी पड़ी।
गोविंद जी ने शारदा देवी की हालत देखी – सूखा चेहरा, धंसती आंखें, कांपती आवाज। उनका अनुभवी मन सब समझ गया। उन्होंने धीरे से पूछा – स्वास्थ्य ठीक नहीं लगता। शारदा देवी मुस्कुरा दीं – अब उम्र हो गई है। गोविंद जी ने कुछ नहीं कहा, मगर मन में बहुत कुछ समझ लिया।
थोड़ी देर बाद रमेश भी ऑफिस से लौट आया। गोविंद जी को देखकर उसने आदर से पैर छुए – आप यहाँ? गोविंद जी ने शांति से कहा – हां बेटा, मां से मिलने आया था। बातों-बातों में गोविंद जी ने जीवन, धर्म और कर्म की बातें शुरू कर दीं। वे बोले – देखो रमेश, संसार में सबसे बड़ा धर्म माता-पिता की सेवा है। जो उन्हें दुख देता है उसका हिसाब ऊपर जरूर होता है।
सुनीता पास ही खड़ी हो गई। रमेश ने बात टालने की कोशिश की। शाम होते-होते गोविंद जी जाने लगे। जाते-जाते उन्होंने शारदा देवी के हाथ में एक छोटा सा कपड़ा बांध दिया – इसमें कुछ पैसे हैं, अगर कभी जरूरत पड़े तो डॉक्टर को दिखा लेना। और हां, धैर्य रखना। शारदा देवी कुछ कह नहीं पाईं। उस रात पहली बार शारदा देवी ने पेट भरकर खाना खाया। सुनीता ने मेहमान के कारण ढंग से खाना बनाया था। मगर यह राहत अस्थाई थी।
बीमारी और आत्मग्लानि का आरंभ
अगले दिन से हालात फिर वही हो गए, बल्कि और खराब। सुनीता अब खुलकर ताने देने लगी – गाँव के लोग आकर हमें ज्ञान देंगे, यह भी सहना पड़ेगा। रमेश भी चुप रहता। एक दिन शारदा देवी की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई। तेज बुखार, बदन में दर्द, वे बिस्तर से उठ नहीं पा रही थीं। सुनीता ने झुझलाकर कहा – आज ऑफिस पार्टी है, मुझे देर हो जाएगी। रमेश ने असमंजस में कहा – अम्मा को दवा दे देना। सुनीता बिना जवाब दिए चली गई।
शारदा देवी पूरे दिन बिना दवा, बिना खाना, बिस्तर पर पड़ी रहीं। शाम होते-होते उनकी सांसें तेज चलने लगीं। उसी समय पड़ोस में रहने वाली कमला नाम की महिला आई। उसने शारदा देवी की हालत देखी तो घबरा गई – अरे मांजी, यह क्या हाल कर दिया? कमला ने तुरंत डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने जांच कर कहा – इन्हें कमजोरी और कुपोषण है, समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो हालत गंभीर हो सकती है।
रात को जब रमेश और सुनीता लौटे, डॉक्टर की बात सुनकर रमेश को पहली बार झटका लगा। डॉक्टर ने साफ कहा – मां को ठीक से खाना, दवा और देखभाल चाहिए। डॉक्टर के जाने के बाद सुनीता बोली – हर चीज़ का दोष मुझ पर ही डाल दीजिए। रमेश चुप था, मगर उसके मन में पहली बार अपराधबोध जागा।
रात को वह सो नहीं पाया। उसे मां का बचपन में सिर पर हाथ फेरना याद आया। पहली बार उसे लगा कि शायद वह बहुत बड़ी गलती कर रहा है। इधर शारदा देवी बिस्तर पर लेटी हुई छत को देख रही थीं, उनके मन में वही सपना गूंज रहा था – अन्याय का हिसाब होगा। और सचमुच अब भगवान का इंसाफ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
पश्चाताप और बदलाव की शुरुआत
सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से भीतर आ रही थी, मगर रमेश की आंखों में पूरी रात की थकान साफ दिख रही थी। वह बिस्तर पर बैठा था, हाथों में सिर थामे हुए। मां की कमजोर सांसें, डॉक्टर के शब्द और बीते वर्षों की यादें सब एक साथ उसके मन में घूम रही थीं। उसे याद आया, जब वह बचपन में जरा सा बीमार पड़ता था, तो शारदा देवी पूरी रात जागकर उसके सिरहाने बैठी रहती थीं। खुद भूखी रह जातीं, मगर बेटे को समय पर दवा और दूध जरूर देतीं। और आज वही मां बिस्तर पर पड़ी है, कमजोरी से बोल भी नहीं पा रही।
रमेश की आंखें नम हो गईं। दूसरे कमरे में सुनीता गहरी नींद में सो रही थी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। रमेश चुपचाप उठा और मां के कमरे में गया। शारदा देवी की आंखें खुली हुई थीं। उन्होंने बेटे को देखा तो हल्की सी मुस्कान आई – बेटा, ऑफिस नहीं जाना? उनकी आवाज बहुत धीमी थी।
रमेश का गला भर आया – आज छुट्टी ले ली है अम्मा। यह सुनकर शारदा देवी को तसल्ली हुई। उन्होंने धीरे से कहा – मेरे कारण तुम्हारा काम… नहीं अम्मा, रमेश ने जल्दी से कहा – आप ठीक हो जाएं, यही सबसे जरूरी है।
पहली बार रमेश ने मां के माथे पर हाथ रखा। शारदा देवी की आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें लगा जैसे बरसों बाद बेटे का स्पर्श मिला हो। रमेश ने डॉक्टर के लिखी दवाइयां दीं और खुद अपने हाथों से मां को दलिया खिलाया। मां की आंखों में आश्चर्य भी था और भावुकता भी।
कुछ देर बाद सुनीता उठी। उसने यह दृश्य देखा तो उसके चेहरे पर असहजता आ गई। आज आप ऑफिस नहीं गए? उसने पूछा। नहीं, रमेश ने शांत लेकिन सख्त स्वर में कहा – मां की हालत ठीक नहीं है। सुनीता ने कंधे उचका दिए – एक-द दिन में ठीक हो जाएंगी।
रमेश ने उसकी ओर देखा, पहली बार उसकी आंखों में सवाल था – सुनीता, क्या तुम्हें सच में लगता है कि मां ठीक से रह रही है? सुनीता चौंक गई – आप यह क्या कह रहे हैं? रमेश ने धीमी आवाज में मगर साफ शब्दों में कहा – डॉक्टर ने साफ कहा है, कुपोषण यह अचानक नहीं होता।
सुनीता के चेहरे पर झुझलाहट आ गई – तो अब मुझ पर इल्जाम लगाया जाएगा। रमेश ने कुछ नहीं कहा, मगर उसका चुप रहना ही बहुत कुछ कह गया।
कर्मों का पहिया घूमता है
उसी दिन दोपहर में रमेश ऑफिस के काम से बाहर गया। लौटते समय उसे फोन आया कंपनी से – रमेश, आपको तुरंत ऑफिस आना होगा। वह घबरा गया। जब ऑफिस पहुंचा तो मैनेजर ने बताया कि कंपनी को भारी नुकसान हुआ है और कई कर्मचारियों की छंटनी होने वाली है। रमेश का नाम भी सूची में था। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह जैसे-तैसे घर पहुंचा, मन भारी था। सुनीता ने पूछा – क्या हुआ? रमेश ने धीमे स्वर में कहा – मेरी नौकरी जा रही है। सुनीता के चेहरे का रंग उड़ गया – क्या अब घर कैसे चलेगा? पहली बार सुनीता को डर लगा। वह बोली – आप कुछ कीजिए ना। रमेश ने थकी हुई हंसी हंसी – मैं कोशिश करूंगा।
उसी शाम शारदा देवी ने बेटे की बातें सुन ली थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की – हे प्रभु, मेरे बेटे को संभाल लेना।
अगले कुछ हफ्तों में हालात तेजी से बदले। रमेश को नई नौकरी नहीं मिल रही थी, बचत कम होती जा रही थी। सुनीता का स्वभाव और चिड़चिड़ा हो गया। अब वही सुनीता, जो मां को बोझ समझती थी, खुद परेशान रहने लगी।
मां का सहारा
एक दिन शारदा देवी ने अपनी पुरानी संदूकची खोली। उसमें कुछ गहने थे, वही जो उन्होंने शादी के बाद कभी इस्तेमाल नहीं किए थे। उन्होंने रमेश को बुलाया – बेटा, यह रख लो, जरूरत पड़े तो काम आ जाएंगे। रमेश सन्न रह गया – अम्मा, यह आपके हैं। शारदा देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा – मां के लिए बेटा ही सब कुछ होता है।
यह सुनकर रमेश टूट गया। उसे अपनी गलती साफ दिखाई देने लगी। उधर सुनीता यह सब देख रही थी। उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस बुजुर्ग मां को वह बेकार समझती थी, वही आज घर को संभालने के लिए आगे आ रही है।
भगवान का इंसाफ
लेकिन भगवान का इंसाफ अभी पूरा नहीं हुआ था। एक दिन सुनीता के मायके से फोन आया – उसके पिता गंभीर बीमार थे। सुनीता घबरा गई। रमेश ने कहा – तुम वहाँ चली जाओ। सुनीता मायके पहुंची तो वहाँ का दृश्य देखकर वह हिल गई। उसके पिता बिस्तर पर थे, कमजोर। उनकी सेवा में उसकी मां लगी हुई थी।
उसकी मां ने कहा – बुजुर्गों का सहारा बनना ही सबसे बड़ा धर्म है। यह शब्द सुनीता के दिल में उतर गए। उसे अपनी सास की हालत याद आ गई – एक-एक रोटी को तरसती हुई। रात को सुनीता सो नहीं पाई। उसे अपनी गलती का एहसास पहली बार सच में हुआ।
सच्चा पश्चाताप
उधर घर में शारदा देवी की तबीयत थोड़ी सुधर रही थी। रमेश अब मां का पूरा ध्यान रखता था। मगर उसे पता था, जो हुआ है उसका प्रायश्चित अभी बाकी है। कर्मों का पहिया घूम चुका था और अब कहानी उस मोड़ पर आ चुकी थी जहां सच्चा पश्चाताप जन्म लेने वाला था।
समय ने धीरे-धीरे अपना रंग दिखाया। सुनीता मायके से लौटी तो वह बदली-बदली थी। घर में कदम रखते ही वह सीधे शारदा देवी के कमरे में गई। बूढ़ी मां बिस्तर पर बैठी थी, हाथ में माला थी। सुनीता उनके सामने बैठ गई और पहली बार उसका घमंड टूटकर आंसुओं में बह निकला – मां जी, मुझे माफ कर दीजिए। वह रोते हुए बोली – मैंने आपको बहुत दुख दिया।
शारदा देवी ने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा – बेटी, जब समझ आ जाए वही माफी होती है।
रमेश यह दृश्य देखकर अंदर से टूट गया। वह मां के पैरों में बैठ गया – अम्मा, मैं सबसे बड़ा गुनहगार हूं। शारदा देवी की आंखों से आंसू निकले, मगर चेहरे पर शांति थी। वर्षों का दर्द जैसे हल्का हो गया हो।
नया जीवन, नया सम्मान
कुछ ही दिनों बाद रमेश को एक छोटी सी नौकरी मिल गई। आमदनी कम थी, मगर घर में अब सम्मान और अपनापन लौट आया था। सुनीता खुद मां के लिए खाना बनाती, दवा समय पर देती और हर निवाले में पश्चाताप घुला होता।
एक दिन शारदा देवी ने आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा – हे प्रभु, आपने देर की, मगर इंसाफ जरूर किया। अब वो मां, जो एक-एक रोटी को तरसती थी, उसी घर में सम्मान के साथ जी रही थी।
कहानी की सीख
यह कहानी यही सिखा जाती है – जो माता-पिता का अपमान करता है, कर्म उसे झुका कर ही सिखाते हैं। और जो धैर्य रखता है, भगवान उसका हाथ कभी नहीं छोड़ते। आज अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, अगर एक मां का दर्द, उसका धैर्य और भगवान का इंसाफ आपकी आंखों को नम कर गया हो, तो इसे सिर्फ एक कहानी मत समझिए। यह हर उस मां की सच्चाई है, जो अपने बच्चों के लिए खुद को भूल जाती है।
माता-पिता का सम्मान ही सबसे बड़ा धर्म है।
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