मानवता की जीत: एक पिता का संघर्ष और अर्चना का सहारा

जयपुर की गर्मियां अपनी तपिश के लिए जानी जाती हैं, लेकिन उन रातों में भी एक अजीब सी खामोशी और भारीपन होता है। ऐसी ही एक रात थी, जब जयपुर के मुख्य बस स्टैंड के पास एक पिता अपनी छह साल की मासूम बच्ची को गोद में उठाए खड़ा था। उस व्यक्ति के कपड़े फटे-पुराने और मैले थे, कंधे पर एक पुराना सा बैग लटका था। उसकी आँखों में वह बेबसी थी जो केवल एक लाचार पिता की आँखों में देखी जा सकती है।

उसी बस स्टैंड के पास से अर्चना अपनी गाड़ी में गुजर रही थी। अर्चना, जो जयपुर में ही एक छोटा सा रेस्टोरेंट चलाती थी। उसका रेस्टोरेंट भले ही छोटा था, लेकिन उसकी मेहनत और ईमानदारी ने उसे शहर में एक पहचान दी थी। गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी जब उस बाप-बेटी पर पड़ी, तो अर्चना के कदम ठिठक गए।

भूख और प्यास का वो मंजर

अर्चना ने देखा कि वह छोटी बच्ची बार-बार अपने पिता से कुछ कह रही थी। पिता पास के एक पुराने नल की ओर जाता, पानी निकालता और बच्ची को पिला देता। बच्ची पानी पीती और चुपचाप पिता के कंधे पर सिर रख देती। कुछ मिनटों बाद फिर वही सिलसिला शुरू होता। अर्चना को यह समझते देर नहीं लगी कि बच्ची को पानी नहीं, बल्कि भूख लगी है और मजबूर पिता के पास उसे खिलाने के लिए एक दाना भी नहीं है।

अर्चना से रहा नहीं गया। उसने गाड़ी रोकी और सीधे उस व्यक्ति के पास जाकर पूछा, “क्या तुम्हारी बेटी भूखी है?”

वह व्यक्ति, जिसका नाम राकेश कुमार था, अर्चना के सवाल पर सहम गया। उसकी आँखों में आंसू भर आए और उसने धीमी आवाज में कहा, “हाँ मैम साहब, सुबह से कुछ नहीं खाया इसने। लेकिन मेरे पास एक रुपया भी नहीं है।”

अर्चना ने बिना सोचे कहा, “गाड़ी में बैठो, मैं इसे खाना खिलाऊंगी।”

एक नए सफर की शुरुआत

राकेश को पहले तो संशय हुआ। उसे लगा कि शहर की इस भीड़भाड़ में कोई अजनबी उसकी मदद क्यों करेगा? अर्चना उसकी दुविधा समझ गई और मुस्कुराते हुए बोली, “घबराओ मत। जिस हाल में आज तुम हो, कभी मैं भी उसी हाल में थी। मुझे भी किसी ने सहारा दिया था, आज मैं वही कर्ज उतारना चाहती हूं।”

राकेश को अर्चना की आँखों में सच्चाई दिखी। वह अपनी बेटी पूजा को लेकर गाड़ी में बैठ गया। अर्चना उन्हें अपने छोटे से रेस्टोरेंट ले गई, जिसके पीछे रहने के लिए तीन छोटे कमरे भी बने थे। रेस्टोरेंट पहुँचते ही अर्चना ने रसोई में जाकर गरम-गरम खाना तैयार किया और पूजा के सामने परोस दिया। पूजा खाने पर ऐसे टूट पड़ी जैसे उसने हफ्तों से कुछ न खाया हो।

राकेश की दर्दनाक दास्तां

जब पूजा खाना खाकर सो गई, तब अर्चना ने राकेश से उसके इस हाल का कारण पूछा। राकेश फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने बताया कि वह एक खुशहाल किसान था। उसकी पत्नी नेहा और बेटी पूजा के साथ उसका जीवन स्वर्ग जैसा था। लेकिन अचानक नेहा को कैंसर हो गया।

“मैम साहब, पत्नी को बचाने के चक्कर में मैंने अपनी पुश्तैनी जमीन, घर, खेत सब बेच दिया। मैं उसे लेकर शहर आया कि बड़े अस्पताल में इलाज होगा, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। वह चली गई और मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं बची।”

राकेश ने बताया कि वह गाँव वापस जाने से डरता था क्योंकि गाँव वालों ने उसे पहले ही चेतावनी दी थी कि शहर के चक्कर में वह बर्बाद हो जाएगा। वह अपनी हार लेकर गाँव नहीं जाना चाहता था। पिछले कई दिनों से वह फुटपाथ पर सो रहा था और पूजा को पानी पिलाकर सुला देता था।

अर्चना का सहारा और मेहनत का रंग

अर्चना ने राकेश की कहानी सुनकर उसे अपने रेस्टोरेंट में काम का प्रस्ताव दिया। उसने कहा, “मैं तुम्हें बड़ी सैलरी तो नहीं दे सकती, लेकिन तुम और तुम्हारी बेटी यहाँ छत के नीचे रहोगे और कभी भूखे नहीं सोओगे।”

राकेश के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं था। वह जी-जान से काम में जुट गया। एक किसान होने के नाते वह मेहनती तो था ही, उसने जल्द ही कुकिंग की बारीकियां भी सीख लीं। उसने अर्चना के रेस्टोरेंट में ‘होम डिलीवरी’ का आईडिया शुरू किया। अर्चना ने उसे एक पुरानी बाइक दिलवाई और देखते ही देखते रेस्टोरेंट का काम दुगना हो गया। अर्चना ने पूजा का एडमिशन पास के एक अच्छे स्कूल में करा दिया, जिससे राकेश का हौसला और बढ़ गया।

जब आई बड़ी मुसीबत

जैसे-जैसे रेस्टोरेंट चलने लगा, आसपास के लोगों और उस जमीन के मालिक की नजर उस पर पड़ने लगी। जमीन का मालिक लालची था। उसने देखा कि अर्चना का काम अच्छा चल रहा है, तो उसने अचानक किराया बढ़ाने की मांग कर दी। अर्चना ने जब एग्रीमेंट का हवाला दिया, तो मालिक भड़क गया।

उसने पुलिस से मिलीभगत की और अर्चना के रेस्टोरेंट का लाइसेंस ‘एक्सपायर’ होने का फर्जी नोटिस भिजवा दिया। पुलिस वाले आए और सात दिन के भीतर रेस्टोरेंट खाली करने की धमकी दे दी। अर्चना टूट गई, लेकिन राकेश उसके साथ चट्टान की तरह खड़ा था।

अच्छाई की एकजुटता

राकेश ने देखा कि अर्चना ने पिछले सालों में न जाने कितने बेसहारा लोगों की मदद की थी। लगभग 30 ऐसे लोग थे जो अर्चना की वजह से आज अपने पैरों पर खड़े थे। राकेश ने उन सबको इकट्ठा किया और पूरी बात बताई।

सातवें दिन जब पुलिस वाले रेस्टोरेंट को सील करने आए, तो वहां का नजारा बदला हुआ था। रेस्टोरेंट के बाहर 30 से ज्यादा लोग अर्चना के समर्थन में खड़े थे। साथ ही, राकेश ने मीडिया कर्मियों को भी बुला लिया था। राकेश ने नगर निगम के मुख्य दफ्तर से असली लाइसेंस की कॉपी निकलवाई थी और उसे कैमरे के सामने पेश किया।

जब पुलिस वालों ने देखा कि मामला तूल पकड़ रहा है और मीडिया सब कुछ रिकॉर्ड कर रही है, तो वे दबे पाँव वहां से निकल गए। लालची मालिक की साजिश नाकाम हो गई।

एक नया जीवन, एक नई शुरुआत

इस घटना के बाद अर्चना और राकेश के बीच का रिश्ता और गहरा हो गया। अर्चना को एहसास हुआ कि राकेश न केवल एक मेहनती कर्मचारी है, बल्कि एक नेक इंसान भी है। वहीं राकेश के मन में भी अर्चना के लिए असीम सम्मान और प्रेम था।

रेस्टोरेंट में आने वाले बुजुर्गों, जिनकी अर्चना ने कभी मदद की थी, उन्होंने इन दोनों की भावनाओं को समझा। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि दोनों को विवाह कर लेना चाहिए ताकि दोनों बच्चों (अर्चना का बेटा और राकेश की बेटी) को एक पूरा परिवार मिल सके।

अर्चना ने हामी भरी और राकेश ने भी मुस्कुराते हुए उसे स्वीकार किया। आज वे दोनों जयपुर में एक सफल रेस्टोरेंट चला रहे हैं, जहाँ केवल खाना ही नहीं मिलता, बल्कि जरूरतमंदों को उम्मीद भी मिलती है।

कहानी की सीख:

यह कहानी हमें सिखाती है कि मुसीबतें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इंसान की नीयत साफ हो और वह दूसरों की भलाई करता हो, तो पूरी कायनात उसकी मदद के लिए खड़ी हो जाती है। अच्छाई कभी बेकार नहीं जाती, वह लौटकर हमारे पास जरूर आती है।