भूख से तड़प रही बच्ची को साथ लेकर डिलीवरी करने पहुंचा डिलीवरी ले रही थी मां और||

धोखा, गरीबी और ममता की पुकार: एक डिलीवरी बॉय की दास्तान

यह कहानी दिल्ली के उन विरोधाभासों के बीच की है, जहाँ एक तरफ गगनचुंबी इमारतें और उनमें बसने वाला ऐशो-आराम है, तो दूसरी तरफ तंग गलियों की उन झोपड़ियों में भूख, लाचारी और सन्नाटा पसरा है। यह दास्तान राजू की है, जो अपनी मासूमियत, ईमानदारी और बेपनाह प्यार की कीमत अपनी आँखों के बहते हुए गर्म आँसुओं से चुका रहा था।

भूख की तड़प और एक मजबूर पिता की उम्मीद

कड़ाके की ठंड वाली एक सर्द रात थी। दिल्ली की एक संकरी और बदबूदार बस्ती के एक छोटे से कमरे में, जहाँ दीवारें सीलन से काली पड़ चुकी थीं, राजू अपनी आठ महीने की बेटी ‘परी’ के साथ बैठा था। घर के अंदर सन्नाटा इतना गहरा था कि नन्हीं परी की साँसों की आवाज़ भी साफ सुनी जा सकती थी। राजू की जेब पूरी तरह खाली थी। रसोई के डिब्बे खड़खड़ा रहे थे—न तो चाय की पत्ती बची थी और न ही बच्ची के लिए एक बूंद दूध।

परी भूख से बिलख रही थी। उसकी कमज़ोर आवाज़ राजू के सीने को छलनी कर रही थी। वह उसे अपनी गोदी में लेकर बहलाने की नाकाम कोशिश कर रहा था, उसे लोरी सुना रहा था, लेकिन भूख के आगे लोरी बेअसर थी। राजू एक फूड डिलीवरी कंपनी में काम करता था। वह बार-बार अपने पुराने मोबाइल की टूटी हुई स्क्रीन को देख रहा था, इस दुआ के साथ कि कहीं से बस एक ऑर्डर आ जाए।

अचानक फोन की घंटी बजी। एक नोटिफिकेशन आया—15 किलोमीटर दूर एक पॉश इलाके से फूड डिलीवरी का ऑर्डर था। राजू के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई। उसने तुरंत अपनी डिलीवरी बॉय की लाल वर्दी पहनी, फटे हुए मफलर से परी को अच्छी तरह लपेटा और उसे अपनी बाइक की टंकी पर बिठा लिया। रास्ते की बर्फीली हवाएँ उसके चेहरे को काट रही थीं, लेकिन उसे बस उस दूध की बोतल की फिक्र थी जो वह इस ऑर्डर के पैसों से खरीदने वाला था।

वह दरवाजा और सालों पुराना गहरा जख्म

आधे घंटे की मशक्कत के बाद राजू दिल्ली के सबसे महंगे और आलीशान फ्लैट्स वाली एक बिल्डिंग के सामने खड़ा था। वह भारी मन और कांपते हाथों से लिफ्ट के जरिए 12वीं मंजिल पर पहुँचा। उसने फ्लैट नंबर 1204 की बेल बजाई। जैसे ही दरवाजा खुला, राजू के हाथ सुन्न पड़ गए और खाने का पैकेट फर्श पर गिरते-गिरते बचा।

सामने रेशमी कपड़ों में सजी एक महिला खड़ी थी। उसे देखते ही राजू के गले से एक चीख जैसी आवाज़ निकली, “भावना! तुम यहाँ… इस हाल में?”

सामने खड़ी महिला कोई और नहीं, राजू की पूर्व पत्नी और परी की सगी माँ थी। भावना भी राजू को एक फटे-हाल डिलीवरी बॉय के रूप में देखकर पत्थर की मूरत बन गई। उसे उम्मीद नहीं थी कि जिस अतीत को वह पीछे छोड़ आई है, वह इस तरह उसके दरवाजे पर दस्तक देगा।

तभी अंदर से एक हट्टा-कट्टा और शालीन व्यक्ति बाहर आया। वह भावना का वर्तमान पति, राजवीर था। उसने देखा कि एक डिलीवरी बॉय अपनी गोद में एक छोटी सी बच्ची को लिए, ठंड से कांप रहा है। राजवीर ने हैरानी और हमदर्दी के साथ पूछा, “क्यों भाई साहब, आप इस नन्हीं सी जान को लेकर इतनी रात को काम कर रहे हैं? इसकी माँ कहाँ है? इतनी कड़ाके की ठंड में यह बीमार पड़ सकती है, इसे इसकी माँ के पास छोड़ देना चाहिए था।”

राजू की आँखों के बांध टूट गए। उसने रुंधे गले और सिसकियों के साथ कहा, “साहब, क्या बताऊं… इसकी माँ तो हमें और इस मासूम को धोखा देकर अपनी अलग दुनिया बसाने चली गई। घर पर देखभाल करने वाला कोई नहीं था, और इसके दूध के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं बची थी, इसलिए इसे साथ लाना मेरी मजबूरी बन गई।”

एक दर्दनाक अतीत का लंबा और काला साया

राजवीर एक दयालु इंसान था। उसने राजू और बच्ची को घर के अंदर सोफे पर बैठने का आग्रह किया। भावना का चेहरा पीला पड़ चुका था, वह अनकंफर्टेबल महसूस कर रही थी और कमरे के कोने में गुमसुम खड़ी थी। राजवीर ने तुरंत अपनी नौकरानी से बच्ची के लिए दूध गर्म करने को कहा और राजू से उसकी पूरी कहानी पूछी।

राजू ने अपनी आपबीती सुनानी शुरू की। उसने बताया कि सात साल पहले गोरखपुर के एक कॉलेज में उसे भावना से सच्चा प्यार हुआ था। दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं। घरवाले इस रिश्ते के खिलाफ थे, इसलिए वे भागकर दिल्ली आ गए। राजू ने भावना के सपनों को पूरा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और दिन-रात मेहनत की। उसने डबल शिफ्ट में काम किया ताकि भावना अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर सके।

भावना की पढ़ाई पूरी हुई और उसकी मेहनत (और राजू के त्याग) के दम पर उसे एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई। राजू को लगा कि अब उनके संघर्ष के दिन खत्म हो गए हैं। लेकिन जैसे ही भावना के पास पैसा और रूतबा आया, उसे राजू की सादगी और उसकी कम कमाई से चिढ़ होने लगी।

एक दिन अचानक भावना ने राजू के सामने तलाक के कागजात रख दिए। राजू ने उसके हाथ जोड़े, पैरों में गिरकर मिन्नतें कीं, “भावना, हमारे प्यार का वास्ता, हमारी आठ महीने की बेटी का तो ख्याल करो।” लेकिन भावना के सिर पर अमीरी का भूत सवार था। उसने बेरुखी से कहा, “राजू, मुझे मेरे बॉस से प्यार हो गया है। उसके पास वह ऐश-ओ-आराम है जो तुम अगले सात जन्मों में भी नहीं दे पाओगे। मुझे अब इस गरीबी और तुम्हारी छोटी सोच के साथ नहीं रहना।” उसने अपनी दूधमुंही बच्ची को भी ठुकरा दिया और उसी रात घर छोड़कर चली गई।

भावना के झूठ का पर्दाफाश

राजवीर यह सब बड़े ध्यान से सुन रहा था। उसे राजू के संघर्ष पर फख्र हो रहा था और उस ‘बेरहम माँ’ पर घृणा, जिसने ममता का गला घोंट दिया था। राजवीर ने अपनी पत्नी की ओर देखा, जो अब भी सिर झुकाए खड़ी थी। राजवीर ने राजू से पूछा, “भाई, क्या तुम मुझे उस पत्थर-दिल औरत का नाम बता सकते हो?”

राजू नहीं चाहता था कि उसकी वजह से भावना की नई बसी-बसाई गृहस्थी उजड़ जाए। उसने अपनी गरिमा बनाए रखते हुए झूठ बोला, “साहब, उसका नाम सुनीता था।”

लेकिन राजवीर बहुत पारखी इंसान था। उसने वह पल नहीं भुलाया था जब राजू ने दरवाजा खुलते ही इसे “भावना” पुकारा था। राजवीर मुस्कुराया, लेकिन उस मुस्कुराहट में कड़वाहट थी। उसने कहा, “राजू, तुम वाकई में एक महान इंसान और एक सच्चे पिता हो, जो आज भी उस औरत का मान रख रहे हो जिसने तुम्हें सड़क पर ला दिया। लेकिन मेरा यकीन पक्का हो गया है। भावना ही वह औरत है।”

राजवीर तुरंत भावना के पास गया और उसका हाथ पकड़कर उसे दरवाजे की तरफ खींचते हुए कहा, “भावना, अब तुम इस घर में एक पल भी रहने की हकदार नहीं हो। जो औरत अपनी सगी कोख से जन्मी औलाद की नहीं हो सकी, जिसने उस मर्द को धोखा दिया जिसने उसे पाला-पोसा और पढ़ाया, वह मेरी क्या होगी? मुझे तुम्हारे जैसे लालची और घटिया चरित्र वाले इंसान की छाया भी इस घर में नहीं चाहिए।” राजवीर ने उसे धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया और कहा, “तुम्हें जो कोर्ट केस करना है कर लेना, मैं तुम्हें अपनी जिंदगी से बेदखल करता हूँ।”

गहरा पछतावा और रिश्तों का अंतिम पड़ाव

भावना अब सड़क पर थी। उसका अहंकार और उसका नया रिश्ता, दोनों ही ताश के पत्तों की तरह ढह गए थे। वह रोती-बिलखती हुई राजू के पीछे-पीछे उसकी उसी तंग बस्ती में पहुँची और गिड़गिड़ाने लगी, “राजू, मुझे माफ कर दो! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं वापस आना चाहती हूँ।”

लेकिन राजू का दिल, जो कभी उसके लिए धड़कता था, अब पत्थर बन चुका था। उसने कहा, “भावना, तुमने उस दिन सिर्फ मुझे नहीं छोड़ा था, तुमने इस बच्ची की ममता का कत्ल किया था। अब हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं बचा।”

तभी राजू की माँ, जो गाँव में अपने बीमार पति को देखने गई थी, अचानक वापस लौट आईं। उन्होंने जब घर के दरवाजे पर भावना को रोते हुए देखा, तो वे सब समझ गईं। माँ ने पहले तो उसे बहुत धिक्कारा, लेकिन जब उन्होंने देखा कि भावना के पास अब सिर छुपाने की भी जगह नहीं है और वह अपनी गलती पर ज़ार-ज़ार रो रही है, तो एक माँ का दिल पसीज गया।

माँ ने राजू को समझाया, “बेटा, इसने जो किया वह माफी के काबिल नहीं है। लेकिन यह इस बच्ची की माँ है। अगर यह यहाँ रहेगी, तो कम से कम परी को उसकी माँ का साया तो मिलेगा। इसे एक नौकरानी की तरह रहने दे, लेकिन इसे घर से मत निकाल।”

राजू ने भारी मन से माँ की बात मान ली। आज भावना उसी छोटे से कमरे में रहती है, जहाँ वह कभी इस घर की जान थी, लेकिन आज वह सिर्फ एक नौकरानी की तरह काम करती है। राजू उससे बात नहीं करता, वह उसे पत्नी का दर्जा कभी नहीं दे पाया। वह अपनी बेटी परी और अपने काम में मग्न रहता है, जबकि भावना हर पल अपने किए हुए गुनाह की सजा भुगत रही है।

सीख: यह कहानी एक कड़वा सबक देती है कि पैसा और शोहरत अस्थायी हैं, लेकिन वफादारी और रिश्ते ही जीवन की असली पूंजी हैं। जो लोग लालच की आग में अपनों का बलिदान देते हैं, वे अंत में उसी आग में खुद को जलता हुआ पाते हैं।

समाप्त