मंदिर के पुजारी ने महिला को नशा देकर कर दिया गलत काम/पुजारी बोला ये सब करके मज़ा आता था/

आस्था की आड़ में अधर्म: कांता देवी और ढोंगी पुजारी का काला सच
प्रस्तावना: कुशालिया गाँव का शांत परिवेश
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले की सीमा पर बसा ‘कुशालिया’ गाँव अपनी हरियाली और शांति के लिए जाना जाता था। यहाँ के लोग सीधे-सादे और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। इसी गाँव के बीचों-बीच रहने वाला श्रवण सिंह अपनी छोटी सी किराने की दुकान के जरिए पूरे गाँव का चहेता बना हुआ था। श्रवण का व्यवहार इतना मृदु था कि लोग शहर जाने के बजाय उसकी दुकान से सामान लेना पसंद करते थे।
श्रवण के छोटे से परिवार में उसकी धर्मपत्नी कांता देवी थी, जो अपनी सादगी और सुंदरता के लिए पूरे मोहल्ले में मशहूर थी। कांता केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि एक आदर्श बहू और पत्नी भी थी। घर की बुजुर्ग सदस्य और श्रवण की माँ आराधना देवी का दिन मंदिर और पूजा-पाठ में बीतता था। घर में सुख-शांति थी, लेकिन वक्त का पहिया कब घूम जाए, यह कोई नहीं जानता था।
अध्याय १: पुजारी आनंद का आगमन और गंदी नजर
गाँव के प्राचीन शिव मंदिर में करीब एक साल पहले एक नया पुजारी आया था, जिसका नाम आनंद कुमार था। सरपंच हुकुम सिंह ने उसे मंदिर की देखरेख के लिए नियुक्त किया था। आनंद देखने में तो तिलकधारी और ज्ञानी लगता था, लेकिन उसके मन में पा/प/ का वास था।
एक दिन आनंद पुजारी किसी धार्मिक अनुष्ठान के सिलसिले में श्रवण के घर पहुँचा। उस समय कांता देवी घर के आंगन में घरेलू काम कर रही थी। आनंद की नजरें कांता पर टिक गईं और वह उसे ब/द/च/ल/न/ तरीके से ऊपर से नीचे तक निहारने लगा। श्रवण ने अपनी आँखों से पुजारी की इस नीच हरकत को देख लिया।
श्रवण ने तुरंत हस्तक्षेप किया और कहा, “पुजारी जी, आप मंदिर की मर्यादा का ख्याल रखिए। आपकी नजरें वह नहीं कह रही हैं जो आपका चोला कह रहा है।” कांता ने भी पुजारी को फटकार लगाई। अपमानित होकर आनंद वहां से चला गया, लेकिन उसके दिमाग में एक भ/या/न/क/ साजिश ने जन्म ले लिया।
अध्याय २: श्रवण की बीमारी और परिवार पर संकट
सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक एक सुबह श्रवण के सीने में तेज दर्द हुआ। उसे लगा कि यह मामूली गैस का दर्द है, लेकिन धीरे-धीरे उसका आधा शरीर सुन्न पड़ने लगा। डॉक्टरों ने बताया कि हाई ब्लड प्रेशर की वजह से श्रवण को लकवा (Paralysis) मार गया है।
घर की पूरी जिम्मेदारी अब कांता के कंधों पर आ गई। वह सुबह दुकान संभालती, दोपहर में घर का काम करती और रात भर पति की सेवा करती। वह शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुकी थी। इसी कमजोरी का फायदा उठाने के लिए आनंद पुजारी ने अपनी चाल चली।
अध्याय ३: रूबी देवी और षड्यंत्र का जाल
कांता की एक पड़ोसन थी रूबी देवी। रूबी एक विधवा महिला थी, लेकिन उसका चाल-चलन संदिग्ध था। वह अक्सर रात के अंधेरे में मंदिर जाती थी। असल में, रूबी और पुजारी आनंद के बीच अ/वै/ध/ संबंध थे। पुजारी उसे पैसे देता था और रूबी उसके गंदे कामों में उसकी मदद करती थी।
पुजारी ने रूबी को ५००० रुपये का लालच दिया और कहा, “कांता को किसी भी तरह मंदिर लेकर आओ। मुझे उससे अपनी बेइज्जती का बदला लेना है।” रूबी लालच में आ गई। उसने कांता के पास जाकर सहानुभूति का नाटक किया। “कांता, तू कितनी परेशान है। देख, हमारे पुजारी जी के पास सिद्ध शक्तियां हैं। अगर तू २१ दिन तक मंदिर में ३-३ घंटे पूजा करेगी, तो श्रवण फिर से चलने लगेगा।”
पति के प्रति अगाध प्रेम ने कांता की बुद्धि पर पर्दा डाल दिया। उसने रूबी की बात मान ली।
अध्याय ४: मंदिर का अंधकार और कांता की बेबसी
२१ फरवरी २०२६ की वह काली शाम थी। कांता अपनी पूजा की थाली लेकर रूबी के साथ मंदिर पहुँची। मंदिर में सन्नाटा था। पुजारी आनंद ने बड़े ही प्रेम से कांता का स्वागत किया और कहा, “बेटी, भगवान तुम्हारी परीक्षा ले रहे हैं। यह चरणामृत और प्र/सा/द/ लो, फिर पूजा शुरू करो।”
कांता ने जैसे ही वह प्र/सा/द/ खाया, उसे चक्कर आने लगे। पुजारी ने उस मिठाई में तेज न/शी/ला/ पदा/र्थ/ मिलाया था। देखते ही देखते कांता बेहोश होकर गिर पड़ी। पुजारी और रूबी ने मिलकर उसे मंदिर के गुप्त तहखाने वाले कमरे में पहुँचाया। पुजारी ने उसके हाथ-पैर रस्सियों से बाँध दिए और उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया ताकि वह चीख न सके।
जब कांता को होश आया, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने खुद को अ/प/मा/नि/त/ अवस्था में पाया। पुजारी आनंद ने उसके साथ ज/ब/र/द/स्ती/ की और उसके स/ती/त्व/ को तार-तार कर दिया। पुजारी ने अपनी ह/व/स/ मिटाने के बाद सरपंच हुकुम सिंह को फोन किया। “सरपंच जी, शिकार जाल में है। आ जाइये।”
अध्याय ५: सरपंच की दरिंदगी और ह/त्या/
सरपंच हुकुम सिंह, जो खुद को गाँव का रक्षक कहता था, वह भी इस घिनौने खेल में शामिल हो गया। रात के करीब १० बजे सरपंच मंदिर पहुँचा। उन दोनों ने मिलकर उस बेबस और निर्दोष महिला के साथ बारी-बारी से घि/नौ/ना/ काम किया।
कांता की आँखों में अंगारे थे। जब सरपंच ने उसके हाथ-पैर खोले, तो कांता ने चीखते हुए कहा, “तुम दोनों नरक में जाओगे! मैं अभी पुलिस के पास जाऊंगी और तुम दोनों को फां/सी/ के फंदे तक पहुँचाउंगी।” अपनी पोल खुलने के डर से सरपंच आपा खो बैठा। उसने कांता को एक जोरदार धक्का दिया। कांता का सिर दीवार के नुकीले कोने से जा टकराया। उसके सिर से खून की धार बह निकली और कुछ ही मिनटों में उसने दम तोड़ दिया।
अध्याय ६: ला/श/ को ठिकाने लगाने की नाकाम कोशिश
कांता की मौत के बाद दोनों अपराधी बुरी तरह डर गए। सरपंच ने कहा, “इसे यहीं मंदिर के प्रांगण में दफन कर देते हैं, किसी को पता नहीं चलेगा।” वे दोनों फावड़ा लेकर गड्ढा खोदने लगे।
इधर, कांता की सास आराधना देवी बेचैन थी। रात के ११ बज चुके थे और कांता घर नहीं लौटी थी। वह पड़ोसियों को लेकर मंदिर की तरफ दौड़ी। रास्ते में उन्हें पुलिस की एक पेट्रोलिंग गाड़ी मिली। आराधना देवी ने रोते हुए पुलिस को पूरी बात बताई। पुलिस तुरंत मंदिर पहुँची।
जैसे ही पुलिस की गाड़ियां मंदिर के गेट पर रुकीं, पुजारी और सरपंच के हाथ-पाँव फूल गए। पुलिस ने उन्हें रंगे हाथों गड्ढा खोदते और कांता की ला/श/ को ठिकाने लगाने की कोशिश करते हुए पकड़ लिया।
अध्याय ७: न्याय की गूँज और कड़वा सच
पुलिस स्टेशन में जब आनंद पुजारी की डंडे से खातिरदारी हुई, तो उसने सारा सच उगल दिया। उसने बताया कि वह कोई पुजारी नहीं बल्कि अंतर्राज्यीय लुटेरा और ब/ला/त्का/री है। उसने सरपंच के साथ मिलकर अब तक गाँव की १४ महिलाओं को अपना शिकार बनाया था। वे महिलाओं को डरा-धमका कर चुप करा देते थे, लेकिन कांता ने विरोध किया, इसलिए उसे जान गंवानी पड़ी।
पुलिस ने कांता देवी का शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा और उन दोनों पर ह/त्या/, ब/ला/त्का/र/ और षड्यंत्र की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया। पूरे गाजियाबाद में इस घटना ने तहलका मचा दिया।
उपसंहार: समाज के लिए एक चेतावनी
कांता देवी तो चली गई, लेकिन उसने जाते-जाते समाज के इन दो भेड़ियों का मुखौटा उतार दिया। यह घटना हमें याद दिलाती है कि अंधविश्वास और किसी पर भी आँख मूंदकर भरोसा करना कितना घातक हो सकता है। आज कुशालिया गाँव की हर आँख नम है, लेकिन उन्हें संतोष है कि कांता के कातिल अब जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहे हैं।
सीख: १. सतर्कता ही सुरक्षा है: किसी भी अनजान व्यक्ति, चाहे वह धार्मिक चोला ही क्यों न पहने हो, उस पर पूरी तरह भरोसा न करें। २. अंधविश्वास से बचें: बीमारी का इलाज डॉक्टरों के पास होता है, झाड़-फूंक या तथाकथित चमत्कारी पूजा में नहीं। ३. विरोध की शक्ति: कांता ने अपनी जान गंवाई, लेकिन अपराधियों के सामने घुटने नहीं टेके। उसके इसी साहस ने उन्हें सलाखों के पीछे पहुँचाया।
यह घटना हमें जागरूक रहने और अपने आस-पास की महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सजग रहने का संदेश देती है।
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