मरने जा रही थी अमीर लड़की…चने बेचने वाले गरीब लड़के ने बचाई जान…फिर जो हुआ

सफर से सीख: अवनी और माधव की महागाथा

रत्नागरी शहर का समुद्री तट अपनी सुंदरता के लिए विख्यात था। शाम का समय था, सूरज धीरे-धीरे अपनी लालिमा समेटकर समुद्र की गोद में समा रहा था। लहरें शोर मचा रही थीं और तट पर पर्यटकों का तांता लगा था। लेकिन इस रौनक के बीच एक पत्थर की चट्टान पर बैठी अवनी के मन में गहरा अंधेरा छाया हुआ था।

अंधकार और अंतिम निर्णय

23 वर्षीय अवनी, शहर के सबसे प्रतिष्ठित व्यवसायी विक्रम प्रताप सिंह की इकलौती पुत्री थी। उसके कानों में हीरे के कुंडल चमक रहे थे और उसने बेशकीमती रेशमी वस्त्र पहने थे, लेकिन उसकी आँखों की लाली और कांपते हाथ कुछ और ही बयां कर रहे थे।

उसके पिता ने जब से दूसरी शादी की थी, अवनी के लिए उसका अपना घर पराया हो गया था। उसकी सौतेली चाची उसे हर पल नीचा दिखाती थीं। उसके पिता, जो कभी उसे पलकों पर बिठाते थे, अब अपनी नई पत्नी के प्रभाव में आकर मूकदर्शक बन गए थे। अवनी को लगा कि वह अपनी ही संपत्ति पर एक बोझ है। अंतिम प्रहार तब हुआ जब उसके पिता ने उसकी मर्जी के बिना उसका विवाह ‘मिस्टर खन्ना’ से तय कर दिया—एक ऐसा व्यक्ति जो केवल व्यापारिक लाभ के लिए अवनी को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करना चाहता था।

अवनी चट्टान के बिल्कुल किनारे पर खड़ी हो गई। नीचे उफनता समुद्र उसे पुकार रहा था। उसने आँखें मूंद लीं और जैसे ही अपना शरीर आगे झुकाया…

एक रक्षक का आगमन

“रुको!” एक दमदार आवाज गूंजी और साथ ही एक मजबूत हाथ ने अवनी की कलाई पकड़ ली। वह माधव था। 25 वर्षीय माधव, जो उसी तट पर चने और मूंगफली बेचकर अपनी छोटी बहन मीरा की शिक्षा का खर्च उठाता था।

माधव ने अवनी को पीछे खींचते हुए सुरक्षित स्थान पर बैठाया। अवनी सुबक रही थी, “तुमने मुझे क्यों बचाया? मुझे मर जाने देते।”

माधव ने शांत स्वर में कहा, “मरना बहुत सरल है बहन, जीना कठिन है। मरने से समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं, बल्कि उन लोगों के लिए बढ़ जाती हैं जो आपसे प्रेम करते हैं।”

अवनी ने कड़वाहट से कहा, “मुझसे कोई प्रेम नहीं करता।”

माधव ने उसे पानी पिलाया और उसे अपनी छोटी सी कुटिया में ले जाने का प्रस्ताव रखा। अवनी ने माधव की आँखों में सच्चाई देखी और पहली बार किसी अजनबी पर भरोसा कर उसके साथ चल पड़ी।

छोटी कुटिया, बड़ा दिल

माधव अवनी को शहर के संकरे और पुराने हिस्से में ले गया। वहाँ की दीवारें भले ही जर्जर थीं, पर लोगों के दिलों में एक-दूसरे के लिए जगह थी। माधव के घर में उसकी छोटी बहन मीरा और उसकी अंधी काकी रहती थीं।

जैसे ही काकी का ममता भरा हाथ अवनी के सिर पर पड़ा, अवनी फूट-फूटकर रो पड़ी। उसे वह सुकून मिला जो उसे अपने बड़े बंगले में कभी नहीं मिला था। उस रात उसने मिट्टी के चूल्हे पर बनी सादी रोटियां और दाल खाई, जिसका स्वाद उसे दुनिया के सबसे बेहतरीन पकवानों से भी ज्यादा लगा।

संघर्ष और नई पहचान

अगले कुछ दिन अवनी के लिए एक नई पाठशाला की तरह थे। उसने माधव की काकी और मीरा के साथ घर के काम सीखे। जब उसने देखा कि घर चलाने के लिए माधव कितनी कड़ी मेहनत करता है, तो उसने भी काम करने का निर्णय लिया।

अवनी को बचपन से सिलाई और कढ़ाई का शौक था। माधव ने अपनी जमा-पूंजी से एक पुरानी सिलाई मशीन खरीदी। अवनी ने मोहल्ले की महिलाओं के फटे-पुराने कपड़ों को नया रूप देना शुरू किया। जल्द ही वह ‘हुनरमंद दीदी’ के नाम से मशहूर हो गई।

लेकिन यह शांति ज्यादा दिन नहीं टिकने वाली थी। शहर में अवनी के लापता होने के पोस्टर लग चुके थे। खन्ना और विक्रम प्रताप सिंह की निजी सुरक्षा टीमें गलियों-गलियों में उसे ढूंढ रही थीं।

खन्ना की धूर्तता और पिता का हृदय परिवर्तन

एक दिन खन्ना और विक्रम प्रताप सिंह उसी बस्ती में पहुँच गए। खन्ना ने माधव को धक्का दिया और अवनी को जबरदस्ती ले जाने की कोशिश की। खन्ना का अहंकार इतना बढ़ गया था कि उसने माधव पर पिस्तौल तान दी।

“बस खन्ना!” विक्रम प्रताप सिंह की दहाड़ गूंजी। उन्होंने खन्ना का हाथ हवा में झटक दिया और गोली हवा में चल गई। अपने पिता को इस तरह अपनी रक्षा में खड़े देख अवनी की आँखों में चमक आ गई।

विक्रम प्रताप सिंह को अहसास हुआ कि जिस व्यक्ति के साथ वह अपनी बेटी का भविष्य जोड़ना चाहते थे, वह कितना नीच है। उन्होंने अवनी से माफी मांगी और उसे घर चलने को कहा। अवनी ने एक शर्त रखी—वह अब पुरानी अवनी बनकर नहीं रहेगी। वह अपनी मेहनत से अपनी पहचान बनाएगी और माधव का परिवार भी उसके साथ रहेगा।

षड्यंत्र का अंत और न्याय

खन्ना ने बदला लेने के लिए विक्रम प्रताप सिंह पर करोड़ों के गबन का झूठा आरोप लगवाया। विक्रम को जेल हो गई। लेकिन इस बार अवनी अकेली नहीं थी। माधव ने अपने बस्ती के मित्रों के साथ मिलकर खन्ना के जाली दस्तावेजों का पर्दाफाश किया।

माधव ने खन्ना के उस लेखाकार (Accountant) को दबोच लिया जो शहर छोड़कर भाग रहा था। पुलिस के सामने सच आ गया और विक्रम प्रताप सिंह ससम्मान रिहा हुए, जबकि खन्ना सलाखों के पीछे पहुँच गया।

‘सफर से सीख’ का उदय

विक्रम प्रताप सिंह ने माधव की ईमानदारी देख उसे अपने व्यापार में शामिल होने का प्रस्ताव दिया, लेकिन माधव ने विनम्रता से अपनी बस्ती के लोगों के लिए काम करने का विकल्प चुना। अवनी ने एक संस्था शुरू की जिसका नाम रखा—“सफर से सीख”

इस केंद्र में निर्धन कन्याओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न कलाएं सिखाई जाने लगीं। माधव इस संस्था का प्रबंधक बना। अवनी ने माधव की काकी की आँखों का ऑपरेशन करवाया, जिससे उन्हें उनकी रोशनी वापस मिल गई।

महामिलन: प्रेम और समानता की जीत

कहानी का सुखद अंत तब हुआ जब उसी समुद्री तट पर अवनी ने माधव से पूछा, “क्या तुम जीवन भर मेरा सारथी बनकर मेरे साथ चलोगे?”

विवाह हुआ, पर किसी बड़े होटल में नहीं, बल्कि उसी बस्ती के खुले मैदान में जहाँ माधव रहता था। अवनी ने अपनी शादी में वही सूती सूट पहना था जो उसने पहली बार माधव के घर पहना था। यह शादी ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी की दीवारों को ढहाने वाली एक मिसाल बन गई।

आज अवनी और माधव मिलकर समाज में रोशनी फैला रहे हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि इंसान की असली पहचान उसके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और दूसरों की मदद करने के उसके जज्बे से होती है।

सीख: “जीवन का हर संघर्ष हमें कुछ सिखाने आता है, बस हमें हार मानने के बजाय लड़ने का साहस जुटाना चाहिए।”

सफर से सीख – एक नई शुरुआत