मरने जा रही थी लड़की… जूता पॉलिश करने वाले लड़के ने बचाई जान, आगे जो हुआ दिल हिला देगा…

इंसानियत की जीत: पटरी से सुनहरे भविष्य तक

देहरादून रेलवे स्टेशन पर शाम के धुंधलके में प्लेटफार्म नंबर तीन पर एक अजीब सी बेचैनी पसरी हुई थी। ट्रेनों के आने-जाने की घोषणाएं, कुली का शोर और मुसाफिरों की जल्दबाजी के बीच 22 साल की कुसुम मूर्ति की तरह स्थिर खड़ी थी। उसके चेहरे पर जो दर्द था, वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को पिघला सकता था। महंगे रेशमी सूट और कलाई पर बंधी सोने की घड़ी उसकी अमीरी की गवाही दे रहे थे, लेकिन उसकी आँखों में मौजूद खालीपन बता रहा था कि वह भीतर से पूरी तरह टूट चुकी है।

सौतेली माँ के कड़वे बोल उसके कानों में अब भी हथौड़े की तरह बज रहे थे— “तुम इस घर की इज्जत नहीं, एक बोझ हो। जितनी जल्दी तुम्हारी शादी उस अधेड़ उम्र के व्यापारी से हो जाए, उतना ही अच्छा है।” पिता की खामोशी ने उसे सबसे ज्यादा चोट पहुँचाई थी। उसे लगा कि अब इस दुनिया में उसके लिए कोई जगह नहीं बची। उसने एक लंबी सांस ली, आँखें बंद कीं और प्लेटफार्म के बिल्कुल किनारे तक पहुँच गई। जैसे ही उसने पटरी की ओर झुकने की कोशिश की, उसे लगा कि उसका अंत बस एक पल दूर है।

लेकिन तभी, एक झटके ने उसे पीछे खींच लिया। वह ज़मीन पर गिर पड़ी। घबराहट में उसने पीछे मुड़कर देखा तो एक साधारण सा युवक खड़ा था, जिसके कपड़े मैले थे और हाथ में पॉलिश का एक ब्रश था।

सादगी में छुपा सुकून

वह युवक राजू था। राजू पिछले दस सालों से इसी स्टेशन पर जूते पॉलिश करके अपनी बीमार माँ का पेट पाल रहा था। उसने कुसुम को पानी की बोतल देते हुए बड़े शांत स्वर में कहा, “साहब कहते थे कि मरने से दर्द खत्म नहीं होता, बस पीछे रहने वालों के हिस्से में आ जाता है। पानी पी लो, थोड़ा हल्का लगेगा।”

कुसुम की सिसकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। राजू उसे अपने साथ अपने छोटे से मोहल्ले की तंग गली में ले गया। जब वे उसके घर पहुँचे, तो कुसुम ने देखा कि वहाँ वैभव नहीं, पर एक अजीब सा अपनापन था। राजू की माँ, जो चारपाई पर लेटी हुई थीं, ने बिना कोई सवाल किए कुसुम को अपने पास बिठाया और उसके सिर पर हाथ फेरा। सालों बाद कुसुम को लगा कि वह अपनी सगी माँ की गोद में है।

राजू ने चूल्हे पर चाय चढ़ाई और धीमी आवाज़ में बोला, “मेरे बाबूजी हमेशा कहते थे— ‘बेटा, मेहनत कभी छोटी या बड़ी नहीं होती, बस इंसान की नीयत साफ़ होनी चाहिए।’ आप भले ही बहुत बड़े घर की हों, लेकिन आज इस छोटे से घर की चाय पीकर देखिए, शायद आपकी घुटन थोड़ी कम हो जाए।”

जब सच और ज़मीर का सामना हुआ

अगली सुबह जब देहरादून की पुलिस और कुसुम के पिता, श्री खन्ना, उस तंग गली में राजू के घर पहुँचे, तो उनके साथ सौतेली माँ भी थी। घर की हालत देखकर सौतेली माँ ने नाक सिकोड़ी और चिल्लाते हुए बोली, “इस नीच लड़के ने ज़रूर मेरी बेटी को लालच देकर यहाँ रखा होगा! देखो इसकी हिम्मत, एक अमीर घर की लड़की को इस गंदगी में ले आया!”

खन्ना साहब ने राजू की ओर घृणा से देखा, लेकिन कुसुम बीच में आ खड़ी हुई। उसने चीखकर कहा, “बस कीजिए! जिसे आप गंदगी कह रही हैं, उसी घर की सादगी ने कल मेरी जान बचाई है। जब आपके ताने मुझे मौत के पास ले गए थे, तब इस ‘नीच’ कहलाने वाले लड़के ने अपनी जान की परवाह किए बिना मुझे पटरी से खींचा था। आपके पास पैसा तो बहुत है पापा, पर राजू जैसा बड़ा दिल कहाँ से लाओगे?”

पूरे मोहल्ले के सामने खन्ना साहब का सिर शर्म से झुक गया। उन्होंने राजू की आँखों में देखा, जहाँ कोई डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी गरिमा थी। उन्होंने राजू को बड़ी रकम का चेक देना चाहा, लेकिन राजू ने हाथ जोड़ लिए। उसने कहा, “साहब, अगर जान की कीमत पैसों से चुकाई जाती, तो आज दुनिया में कोई गरीब ज़िंदा नहीं बचता। मुझे पैसे नहीं चाहिए। बस मेरी माँ का इलाज करवा दीजिए और मुझे इतना काबिल बना दीजिए कि मैं भी समाज के काम आ सकूँ।”

तीन साल बाद: कर्मों का प्रतिफल

समय का पहिया घूमा और देहरादून की हवाओं ने एक नई कहानी लिखी। तीन साल बीत चुके थे। राजू अब स्टेशन पर नहीं बैठता था। खन्ना साहब ने उसकी माँ का बेहतरीन इलाज करवाया और राजू की शिक्षा का पूरा खर्च उठाया। अपनी कड़ी मेहनत और ईमानदारी के दम पर राजू ने अस्पताल प्रबंधन में डिप्लोमा किया और अब उसी बड़े अस्पताल में एक सम्मानजनक पद पर था जहाँ उसकी माँ का इलाज हुआ था।

वहीं कुसुम ने खुद को पूरी तरह बदल लिया था। उसने अपनी सौतेली माँ के प्रभाव से खुद को मुक्त किया और एक एनजीओ (NGO) की नींव रखी, जिसका नाम था ‘नई राह’। यह संस्था उन लड़कियों और युवाओं को मानसिक संबल और रोज़गार देती थी जो घरेलू हिंसा या अवसाद के कारण अपनी ज़िंदगी खत्म करने का विचार करते थे।

एक दिन, राजू और कुसुम फिर से उसी प्लेटफार्म नंबर तीन पर मिले। सूरज ढल रहा था और वही पुरानी घोषणाएं गूँज रही थीं।

राजू: “कुसुम जी, आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि उस दिन भगवान ने हम दोनों को ही बचाया था। आपने मुझे पढ़ाई का मौका दिया और मैंने आपको जीने की वजह।”

कुसुम: (मुस्कुराते हुए) “नहीं राजू, तुमने मुझे सिर्फ ज़िंदगी नहीं दी, तुमने मुझे इंसानियत का असली पैमाना सिखाया। रईसी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उन हाथों में होती है जो किसी गिरते हुए को थाम लें।”

निष्कर्ष

यह कहानी हमें इस महान सत्य से रूबरू कराती है कि बाहरी चमक-धमक अक्सर अंदर के खोखलेपन को छुपाती है, जबकि असली नूर और ताकत सादगी और निस्वार्थ सेवा में होती है। एक जूता पॉलिश करने वाले लड़के ने समाज के उस बड़े वर्ग को आईना दिखा दिया जो इंसान को उसके काम से तौलता है। प्यार, सम्मान और इंसानियत जब एक साथ मिलते हैं, तो वे न केवल जान बचाते हैं, बल्कि एक नए युग का निर्माण करते हैं।

पाठकों के लिए संदेश: अगर आपके आस-पास कोई खामोश है या टूट रहा है, तो उसका हाथ थामें। आपका एक छोटा सा सकारात्मक कदम किसी के लिए पूरी दुनिया बन सकता है।

जय हिंद, जय भारत।