मरा हुआ दादा भूत बन कर घर में आता था और कर दिया कारनामा/वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/

लालच की परछाई और /दु/ष्कर्म/ का मायाजाल

यह घटना राजस्थान के अलवर जिले के कठूमर गाँव की है, जहाँ गरीबी और मजबूरियों के बीच एक ऐसा घिनौना खेल खेला गया जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। यह कहानी रचना नाम की एक लड़की की है, जिसने अपनों पर भरोसा किया, लेकिन बदले में उसे मिला एक गहरा /शारीरिक/ और /मानसिक/ /आ/घात/।

गरीबी की मार और रिश्तों का सहारा

रचना ने अभी-अभी 12वीं कक्षा पास की थी। वह पढ़ाई में मेधावी थी और उसका सपना शिक्षिका बनने का था, लेकिन घर की माली हालत ने उसके सपनों पर पानी फेर दिया। उसके माता-पिता की मृत्यु 10 साल पहले ही एक दुर्घटना में हो चुकी थी, जिसके बाद उसका पूरा संसार उसकी दादी कांता देवी और दादा रमेश के इर्द-गिर्द सिमट गया था। दादा रमेश उसे बहुत लाड करते थे, लेकिन एक साल पहले उनकी मृत्यु ने रचना को बिल्कुल अकेला कर दिया।

दादी कांता देवी मेहनत-मजदूरी करके घर चलाती थीं। रचना को अपनी दादी की उम्र और उनकी कांपती देह को मेहनत करते देख बहुत ग्लानि होती थी। उसने सिलाई-कढ़ाई से कुछ पैसे कमाने शुरू किए, लेकिन वह काफी नहीं थे। अंततः, उसने खुद जमींदारों के खेतों में मजदूरी करने का फैसला किया ताकि उसकी बूढ़ी दादी आराम कर सकें। उसे क्या पता था कि जिस दादी के आराम के लिए वह दिन-रात पसीना बहा रही है, वही उसके जीवन में अंधेरा घोलने वाली है।

‘भूत’ का साया या कुछ और?

1 फरवरी 2026 की रात को रचना और दादी ने साथ में साधारण भोजन किया। सोने से पहले दादी ने प्यार जताते हुए रचना को एक गिलास गर्म दूध दिया। दूध पीने के कुछ ही देर बाद रचना पर एक भारी बेहोशी छा गई। रात के सन्नाटे में उसे लगा जैसे कोई उसके कमरे में आया है। उसे अपने दादाजी की धुंधली सी आकृति दिखाई दी।

अगले दिन जब वह उठी, तो उसका सिर भारी था और उसे अपने शरीर में अजीब सी /पी/ड़ा/ महसूस हुई। उसने दादी को बताया कि सपने में दादाजी आए थे और उन्होंने उसके साथ /अ/भ/द्र/ हरकतें कीं। दादी ने उसे डराते हुए कहा, “बेटी, तेरे दादा की आत्मा भटक रही है, वह शायद तुझसे कुछ कहना चाहती है।” रचना को लगा कि शायद उसके कमरे में वाकई कोई रूहानी ताकत है। अगले कुछ दिनों तक यह खौफनाक सिलसिला जारी रहा। हर सुबह रचना खुद को /अ/स्त/व्य/स्त/ और /श/र्म/सा/र/ महसूस करती, लेकिन दादी इसे ‘भूत-प्रेत’ का चक्कर बताकर टालती रही।

चचेरे भाई का आगमन और संदेह का घेरा

इसी बीच रचना का चचेरा भाई उज्जवल कुछ दिनों के लिए उनके घर रहने आया। उज्जवल शहर में काम करता था और स्वभाव से शांत था। रचना को लगा कि अब घर में कोई पुरुष सदस्य है, तो शायद वह ‘साया’ आना बंद हो जाएगा। लेकिन स्थिति और भी बदतर हो गई।

आधी रात के करीब जब पूरा गाँव गहरी नींद में था, तब एक साया फिर से कमरे में दाखिल हुआ। उसने रचना की /वि/व/श/ता/ और दूध में मिली नशीली दवा के कारण आई गहरी नींद का फायदा उठाया। उस रात उस साये ने रचना के साथ /अ/मा/न/वीय/ कृत्य किया। सुबह जब रचना की आँख खुली, तो वह अपनी /नि/र्व/स्त्र/ हालत देखकर चीख पड़ी। उसके कपड़े कमरे के कोने में बिखरे हुए थे। जब उसने रोते हुए दादी को बुलाया, तो दादी ने फिर से वही राग अलापा—”यह सब तेरे दादा का भूत कर रहा है।” लेकिन इस बार रचना के मन में शक पैदा हो गया था। क्या कोई भूत किसी के कपड़े उतार सकता है?

सहेली शिवानी और सूझबूझ का परिचय

25 फरवरी को रचना का जन्मदिन था। दादी ने उसे एक महंगा स्मार्टफोन और नए कपड़े उपहार में दिए। रचना के मन में यह सवाल कौंधा कि जो दादी घर के राशन के लिए संघर्ष करती थीं, उनके पास 15-20 हजार रुपये कहाँ से आए? उसी दिन रचना की सहेली शिवानी उसके घर आई। शिवानी शहर में कॉलेज की छात्रा थी और काफी समझदार थी। रचना ने सिसकते हुए अपनी पूरी आपबीती शिवानी को सुनाई।

शिवानी ने रचना की बातों को गौर से सुना और कहा, “रचना, भूत कभी कपड़े नहीं उतारते और न ही वे भौतिक रूप से /दु/ष्कर्म/ कर सकते हैं। यह किसी इंसान की घिनौनी साजिश है।” शिवानी ने तय किया कि वह उस रात रचना के साथ सोएगी। उस रात भी दादी ने दोनों लड़कियों को दूध पिलाया। अगली सुबह जब शिवानी की आँख खुली, तो वह भी उसी हालत में थी। उसके शरीर पर भी /चोट/ के निशान थे। शिवानी को अब यकीन हो गया था कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

पुलिस का हस्तक्षेप और जाल

शिवानी और रचना ने हिम्मत जुटाई और बिना दादी को बताए पुलिस स्टेशन पहुँचे। वहां दरोगा ईश्वर सिंह ने उनकी बात ध्यान से सुनी। ईश्वर सिंह अनुभवी ऑफिसर थे, उन्हें तुरंत समझ आ गया कि मामला नशीली दवा और विश्वासघात का है। उन्होंने एक गुप्त योजना बनाई। पुलिस ने गाँव में शोर मचाने के बजाय सादे कपड़ों में रचना के घर के आसपास पहरा देने का फैसला किया।

अगली रात, पुलिस की टीम घर के पीछे झाड़ियों में छिपी थी। रात के करीब 11:30 बजे, सन्नाटे को चीरते हुए एक मोटरसाइकिल घर के पास रुकी। पुलिस ने देखा कि कांता देवी ने खुद धीरे से पिछला दरवाजा खोला और उस अनजान व्यक्ति को अंदर बुलाया।

रोंगटे खड़े कर देने वाला सच

जैसे ही वह व्यक्ति रचना के कमरे में दाखिल हुआ, पुलिस ने छापा मारकर उसे रंगे हाथों दबोच लिया। वह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि गाँव की ही दूध डेयरी का मालिक प्रवीण सिंह था। पुलिस ने कांता देवी को भी हिरासत में ले लिया।

थाने ले जाकर जब प्रवीण की /सु/टाई/ हुई, तो उसने सारा सच उगल दिया। उसने बताया कि कांता देवी ने अपनी पोती के नाम पर उससे 2 लाख रुपये लिए थे। कर्ज और लालच में अंधी होकर उस दादी ने अपनी ही पोती की /अ/स्मि/ता/ का सौदा कर दिया था। कांता देवी हर रात दूध में नींद की गोलियां मिलाकर रचना और उज्जवल को पिला देती थी ताकि वे /बे/सु/ध/ हो जाएं और प्रवीण आसानी से अपना /घिनौना/ काम कर सके। दादी ही वह औरत थी जो कमरे का दरवाजा खोलती थी और ‘भूत’ की कहानियां सुनाकर अपनी पोती को गुमराह करती थी।

निष्कर्ष: पुलिस ने कांता देवी और प्रवीण सिंह दोनों के खिलाफ /दु/ष्कर्म/ और /सा/जिश/ की धाराओं में मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया। रचना और शिवानी की सूझबूझ ने एक ऐसे /अप/रा/ध/ का अंत किया जो रिश्तों की आड़ में फल-फूल रहा था। यह घटना सिखाती है कि आँखें बंद करके अपनों पर भरोसा करना कभी-कभी विनाशकारी हो सकता है।