मरा हुआ पति भूत बन कर हर रोज रात के समय घर में आता था/

अदृश्य साया: सरोज देवी और दूधवाले की घिनौनी साजिश
अध्याय १: बसनी चरण गाँव और सरोज का संघर्ष
राजस्थान की रेतीली धरती पर बसा जोधपुर जिला अपनी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इसी जिले में एक छोटा सा गाँव है—बसनी चरण। इस गाँव की गलियों में सन्नाटा पसरा रहता था, लेकिन यहाँ रहने वाली सरोज देवी के जीवन में सन्नाटा और गहरा था।
दो साल पहले एक भीषण कार दुर्घटना ने सरोज के पति विक्रम को उससे छीन लिया था। एक विधवा का जीवन वैसे ही संघर्षपूर्ण होता है, ऊपर से घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। सरोज ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने दो कमरों के छोटे से घर में गाँव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। शाम ४ से ६ बजे तक उसके पास १०-१५ बच्चे पढ़ने आते थे। यही ट्यूशन उसकी कमाई का इकलौता जरिया था।
सरोज के परिवार में उसकी बुजुर्ग सास दयावती और १५ साल का देवर टिंकू थे। टिंकू १०वीं कक्षा में था, लेकिन वह काफी शरारती और झगड़ालू किस्म का लड़का था। उसकी हरकतों से सरोज और दयावती अक्सर परेशान रहती थीं।
अध्याय २: एक अजीब शादी का प्रस्ताव
दयावती को हमेशा डर सताता था कि सरोज कहीं घर छोड़कर न चली जाए। उसने एक योजना बनाई कि जब टिंकू १८ साल का हो जाएगा, तो वह सरोज की शादी अपने छोटे बेटे टिंकू से करा देगी।
जब दयावती ने सरोज के सामने यह बात रखी, तो सरोज अवाक रह गई। उसने कहा, “माँ जी, वह मेरा देवर है, बच्चा है।” लेकिन दयावती ने अपनी ममता और मजबूरी का वास्ता देकर उसे मना लिया। जब यही बात टिंकू को पता चली, तो उसने भी पहले विरोध किया, लेकिन बाद में वह भी राजी हो गया। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।
अध्याय ३: डरावनी रातें और ‘भूत’ का साया
४ दिसंबर २०२५ की वह रात सरोज के जीवन में तूफान लेकर आई। रात के ११ बजे पूरा परिवार खाना खाकर सो चुका था। अचानक सरोज के कमरे से चीखने-चिल्लाने की आवाज आई। दयावती भागकर वहां पहुँची। सरोज पसीने से तर-बतर थी और कांप रही थी।
“माँ जी! विक्रम आए थे। वह भूत बनकर मेरे सपने में आते हैं और मुझे डराते हैं,” सरोज ने रोते हुए कहा। दयावती ने इसे बुरा सपना समझकर टाल दिया और उस रात सरोज के पास ही लेट गई। लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी।
अध्याय ४: दूधवाला सुरेश और नई व्यवस्था
अगले दिन शाम को गाँव का दूधवाला सुरेश उनके घर आया। सुरेश रोज डेढ़ लीटर दूध देने आता था। उसने सरोज से कहा, “भाभी जी, अब से मैं घर-घर दूध देने नहीं आ पाऊँगा। आपको मेरी दुकान पर ही दूध लेने आना होगा।”
मजबूरी में सरोज तैयार हो गई। अगले दिन जब वह सुरेश की दुकान पर पहुँची, तो वहां सुरेश के साथ उसका दोस्त पवन भी बैठा था। दोनों सरोज को बड़ी ही अ/प/मा/न/ज/न/क/ नजरों से देख रहे थे। सरोज ने दूध लिया और चुपचाप घर लौट आई। उसे क्या पता था कि वह दूध नहीं, बल्कि अपने लिए बर्बादी लेकर जा रही है।
अध्याय ५: मदहोशी और आधी रात का अ/प/रा/ध/
रात को सरोज ने खाना बनाया और सबको दूध पीने के लिए दिया। दूध पीने के एक घंटे बाद ही सरोज, दयावती और टिंकू को ऐसी गहरी नींद आई जैसे वे बेहोश हो गए हों। रात के साढ़े ग्यारह बजे एक ‘अदृश्य साये’ ने घर में प्रवेश किया।
अगली सुबह जब सरोज की आँख खुली, तो उसकी रूह कांप गई। उसके शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। उसके वस्त्र नीचे फ/टे/ हुए पड़े थे। सरोज को अहसास हो गया कि रात में उसके साथ कुछ बहुत ही ग/ल/त/ हुआ है।
उसने अपनी सास को जगाया और टिंकू पर शक जताया। “माँ जी, टिंकू रात में मेरे कमरे में आया होगा।” दयावती ने टिंकू को जगाकर पूछा, लेकिन टिंकू ने साफ इनकार कर दिया। दयावती, जो अंधविश्वासी थी, कहने लगी, “यह टिंकू नहीं, यह तेरे पति विक्रम की आत्मा है जो भूत बनकर आती है।”
अध्याय ६: तांत्रिक विद्यासागर का ढोंग
घटनाएँ बार-बार होने लगीं। हर दूसरी-तीसरी रात सरोज के साथ वही घिनौना काम होता और उसे पता तक नहीं चलता। दयावती उसे तांत्रिक विद्यासागर के पास ले गई। तांत्रिक ने भी वही राग अलापा, “तेरा पति भूत बनकर आता है। एक बड़ी पूजा करानी होगी।”
तांत्रिक ने पूजा के नाम पर १००० रुपये लिए, लेकिन उस रात भी सरोज के साथ वही हुआ। सरोज अब पूरी तरह टूट चुकी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कोई भूत कैसे उसके शरीर के साथ ऐसा कर सकता है।
अध्याय ७: चौंकाने वाला खुलासा
२१ जनवरी २०२६ को सरोज को अचानक चक्कर आया और वह गिर पड़ी। दयावती उसे अस्पताल ले गई। महिला डॉक्टर ने जब चेकअप किया, तो जो सच सामने आया उसने सबके होश उड़ा दिए। डॉक्टर ने कहा, “सरोज एक महीने की प्रेग्नेंट (गर्भवती) है।”
सरोज चीख पड़ी, “यह कैसे मुमकिन है? मेरे साथ तो भूत ग/ल/त/ काम करता है।” डॉक्टर ने उसे डांटा और तुरंत पुलिस के पास जाने की सलाह दी।
अध्याय ८: पुलिस दरोगा अमर सिंह की सूझबूझ
सरोज अपनी सास के साथ पुलिस स्टेशन पहुँची और दरोगा अमर सिंह को पूरी आपबीती सुनाई। अमर सिंह एक अनुभवी अफसर थे। उन्होंने तुरंत कहा, “यह किसी भूत का काम नहीं है। कोई इंसान ही है जो इस घिनौनी साजिश को अंजाम दे रहा है।”
दरोगा ने एक योजना बनाई। उन्होंने शादी वर्दी में चार पुलिसवालों को सरोज के घर के सामने तैनात कर दिया। उस रात भी परिवार ने दूध पिया और सो गए। रात के ठीक १२ बजे दो लड़के दीवार फांदकर घर में घुसे। जैसे ही वे सरोज के कमरे में दाखिल हुए, पुलिस ने उन्हें दबोच लिया।
अध्याय ९: हकीकत का कड़वा सच
पकड़े गए लड़के कोई और नहीं, बल्कि दूधवाला सुरेश और पवन थे। पुलिस ने जब थाने ले जाकर उनकी स/ख्ती/ से पूछताछ की, तो उन्होंने सारा राज उगल दिया।
सुरेश ने बताया, “हम दूध में नींद की गोलियां मिला देते थे। जब पूरा परिवार बेहोश हो जाता, तो हम दीवार फांदकर अंदर जाते और सरोज देवी के साथ ग/ल/त/ काम करते थे। हमने जानबूझकर भूत की बात फैलाई ताकि किसी को शक न हो।”
उपसंहार: जागरूकता ही बचाव है
पुलिस ने सुरेश और पवन के खिलाफ क/ठो/र/ धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। यह घटना समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
इस घटना से हमें क्या सीखना चाहिए? १. अंधविश्वास का त्याग: भूत-प्रेत के नाम पर होने वाले शोषण के खिलाफ आवाज उठाएं। विज्ञान और कानून पर भरोसा रखें। २. सावधानी: अपनी खाने-पीने की चीजों के प्रति सतर्क रहें, खासकर तब जब कोई अजनबी या बाहरी व्यक्ति उन्हें पहुँचा रहा हो। ३. पुलिस की मदद: किसी भी अ/प/रा/ध/ को दबाने के बजाय तुरंत पुलिस से संपर्क करें। चुप्पी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है।
आज सरोज देवी न्याय की लड़ाई लड़ रही है। गाँव में अब कोई भी भूत की बातों पर यकीन नहीं करता, बल्कि लोग बाहरी लोगों से सतर्क रहने लगे हैं।
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