महिला ने लड़के को पढ़ाई करने के लिए कमरा किराए पर दे दिया।

अधूरे अरमान और विश्वासघात की कहानी

आंध्र प्रदेश के एक शांत और विकसित शहर के बाहरी इलाके में एक बहुत ही विशाल और आलीशान बंगला खड़ा था। यह बंगला अपनी नक्काशी और सुंदरता के लिए जाना जाता था, लेकिन इसके भीतर की दीवारों में सन्नाटा पसरा रहता था। इस बंगले की मालकिन ५५-६० वर्ष की एक बेहद खूबसूरत विधवा महिला थी, जिसका नाम कविता (कुछ लोग उसे शीतल भी कहते थे) था। कविता के पति का देहांत कई साल पहले एक रेल दुर्घटना में हो गया था। उनके पति रेलवे में एक उच्च पद पर कार्यरत थे, जिसके कारण उनकी मृत्यु के बाद कविता को सरकार से अच्छी पेंशन और एक बड़ी मुश्त राशि मिली थी।

पैसे की कमी तो नहीं थी, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर कविता बिल्कुल अकेली रह गई थी। उसके बंगले में दर्जनों कमरे थे, जो खाली पड़े रहते थे। पति के जाने के बाद कविता की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे डगमगाने लगी थी क्योंकि बड़े घर के रख-रखाव में काफी खर्च होता था। इसी कारण उसने अपने बंगले के कुछ कमरों को किराए पर दे रखा था। कविता दिखने में आज भी अपनी उम्र से काफी छोटी और आकर्षक लगती थी, लेकिन उसके भीतर /अतृप्त इच्छाओं/ का एक समंदर हिलोरें ले रहा था।

विकास का आगमन: एक नया मोड़

एक दिन सुबह के समय, विकास नाम का एक नौजवान लड़का कविता के घर पहुँचा। विकास मूल रूप से झारखंड का रहने वाला था और एक गरीब किसान परिवार से ताल्लुक रखता था। उसके पिता मंडी में सब्जी बेचते थे और माँ एक साधारण गृहणी थी। विकास के माता-पिता ने अपनी दो कट्ठा जमीन बेचकर उसे शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने भेजा था। विकास न केवल पढ़ाई में तेज था, बल्कि वह काफी सुदर्शन, लंबा और स्मार्ट भी था।

जब कविता ने पहली बार दरवाजे पर विकास को देखा, तो उसे देखते ही उसके मन में /खलबली/ मच गई। विकास की सादगी और उसकी शारीरिक बनावट ने कविता को उसकी ओर /आकर्षित/ कर लिया। कविता ने बिना किसी अधिक पूछताछ के उसे अपना सबसे अच्छा कमरा किराए पर दे दिया। विकास वहाँ रहकर अपनी पढ़ाई में जुट गया। उसे नहीं पता था कि जिस छत के नीचे वह रह रहा है, वहाँ मालकिन की नजरें उस पर /गंदी नीयत/ से जमी हुई हैं।

किराए के बदले एक /अनोखा सौदा/

विकास को उस घर में रहते हुए एक महीना बीत चुका था। दोपहर का समय था और पूरा बंगला शांत था। विकास अपने महीने का किराया देने के लिए कविता के कमरे की ओर गया। जब वह वहाँ पहुँचा, तो उसने देखा कि कविता अपने बिस्तर पर बहुत ही /मर्यादाहीन/ और आरामदायक अवस्था में लेटी हुई थी। विकास ने हिचकिचाते हुए उसे आवाज दी।

जब कविता की नींद खुली और उसने सामने विकास को देखा, तो उसके चेहरे पर एक /कामुक/ मुस्कान आ गई। विकास ने जैसे ही किराए के पैसे हाथ में थमाए, कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया और पैसे लेने से साफ मना कर दिया। विकास हैरान रह गया। उसने पूछा, “मैडम, आप पैसे क्यों नहीं ले रही हैं? क्या मैंने कोई गलती की है?”

कविता ने विकास का हाथ सहलाते हुए कहा, “विकास, तुम मुझे पहली नजर में ही बहुत अच्छे लगे थे। मुझे इन पैसों की जरूरत नहीं है। मुझे जरूरत है तो बस एक /साथी/ की। तुम एक जवान और तंदुरुस्त लड़के हो, क्या तुम मेरी एक /ख्वाहिश/ पूरी नहीं करोगे? बदले में तुम्हें यहाँ रहने का एक रुपया भी नहीं देना होगा।”

विकास पहले तो डर गया। उसने अपनी पढ़ाई और माता-पिता की उम्मीदों का हवाला दिया, लेकिन कविता ने उसे अपने /मोहपाश/ में बांधना शुरू कर दिया। उसने विकास को समझाया कि यह उम्र /मौज-मस्ती/ की है और इसमें कोई बुराई नहीं है। विकास, जो शहर में नया था और कहीं न कहीं पैसों की तंगी महसूस कर रहा था, कविता के इस /अनैतिक प्रस्ताव/ के आगे झुक गया।

/वासना/ की आग में जलते रिश्ते

उस दिन के बाद से विकास और कविता के बीच एक /अवैध संबंध/ शुरू हो गया। विकास रोज रात को अपना खाना खाने के बाद पढ़ाई का बहाना बनाकर कविता के कमरे में चला जाता था। वहाँ दोनों घंटों तक /मर्यादाएं/ तोड़ते और अपनी /शारीरिक भूख/ मिटाते थे। कविता अपनी उम्र का अकेलापन विकास के साथ /गलत काम/ करके दूर कर रही थी।

विकास को भी धीरे-धीरे इस /गंदी लत/ का स्वाद लगने लगा था। वह भूल गया था कि उसके माता-पिता ने अपनी जमीन बेचकर उसे यहाँ पढ़ने भेजा है। वह कविता के साथ अपनी रातें /रंगीन/ करने में इतना व्यस्त हो गया कि उसकी पढ़ाई और सेहत पर इसका बुरा असर पड़ने लगा। कविता ने उसे बार-बार चेतावनी दी थी कि यह बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए, वरना समाज में उसकी बहुत बदनामी होगी और विकास का करियर बर्बाद हो जाएगा।

अचानक आई विपदा और सच का सामना

यह /अनैतिक खेल/ करीब तीन-चार महीनों तक चलता रहा। एक रात, जब विकास कविता के कमरे में अपनी /हसरतें/ पूरी कर रहा था, अचानक उसका सिर घूमने लगा और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। लगातार /अत्यधिक शारीरिक संबंध/ और नींद की कमी के कारण उसका शरीर अंदर से खोखला हो चुका था। कविता बुरी तरह घबरा गई। बदनामी के डर से उसने पहले तो उसे घर पर ही ठीक करने की कोशिश की, लेकिन जब विकास की हालत बिगड़ने लगी, तो उसे मजबूरी में अस्पताल ले जाना पड़ा।

अस्पताल में विकास का इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों ने बताया कि वह बहुत अधिक कमजोरी और तनाव का शिकार है। कविता ने डरते-डरते विकास के माता-पिता को फोन किया। विकास के माता-पिता अपना सब कुछ छोड़कर तुरंत शहर पहुँचे। जब उन्होंने अपने जवान बेटे को अस्पताल के बिस्तर पर इस हालत में देखा, तो वे फूट-फूट कर रोने लगे।

दो हफ्ते के इलाज के बाद जब विकास को होश आया, तो उसके पिता ने कड़ाई से पूछा, “बेटा, हम तुम्हें यहाँ पढ़ने के लिए पैसे भेजते थे, फिर तुम्हारी यह हालत कैसे हुई? क्या तुम खाना नहीं खाते थे?” विकास अपनी माँ की आँखों में आंसू और पिता का उतरा हुआ चेहरा देख कर टूट गया। उसने फूट-फूट कर रोते हुए कविता के साथ अपने /गंदे और अवैध संबंधों/ की पूरी सच्चाई बयान कर दी।

अंत और पश्चाताप

विकास के माता-पिता के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वे उस महिला को देवी जैसा मानते थे, लेकिन उसने उनके बेटे को /वासना/ की वेदी पर चढ़ा दिया था। विकास के पिता ने तुरंत उसका सामान उस बंगले से निकाला। उन्होंने कविता को पुलिस में देने की धमकी दी, लेकिन समाज में अपनी और अपने बेटे की बदनामी के डर से उन्होंने चुपचाप वहाँ से जाना ही बेहतर समझा।

विकास अपने माता-पिता के साथ दूसरे इलाके में एक छोटे से कमरे में शिफ्ट हो गया। अब वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके मन पर लगे विश्वासघात के घाव गहरे थे। उधर कविता उस बड़े बंगले में फिर से अकेली रह गई, लेकिन अब उसके पास न तो विकास था और न ही चैन की नींद। वह विकास की यादों और अपने किए के पश्चाताप में घुटने लगी।

यह कहानी हमें यह सीख देती है कि उम्र के किसी भी पड़ाव पर अगर /संयम/ खो दिया जाए और /वासना/ को रिश्तों से ऊपर रख दिया जाए, तो उसका अंत हमेशा विनाशकारी ही होता है। विकास ने अपनी पढ़ाई और भविष्य दांव पर लगा दिया था, जबकि कविता ने अपनी गरिमा।