महिला ने 40 साल तक किसी को छूने नहीं दिया मगर एक दिन |
सफलता का अकेलापन और मासूमियत की जीत
अध्याय १: सफलता का चमकता शिखर और सूना आंगन
मुंबई के कोलाबा और कफ परेड जैसे पॉश इलाकों की गगनचुंबी इमारतों में रहने वाले लोगों की दुनिया बाहर से जितनी सुनहरी दिखती है, अंदर से अक्सर उतनी ही तन्हा होती है। अपूर्वा इसी दुनिया का एक चमकता सितारा थी। ४० साल की अपूर्वा एक जानी-मानी मल्टीनेशनल कंपनी की हेड थी। उसकी उपलब्धि की कहानी किसी मिसाल से कम नहीं थी—आईआईटी बॉम्बे से एमटेक और फिर अमेरिका से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी।
अपूर्वा का रुतबा ऐसा था कि उसके केबिन में कदम रखने से पहले बड़े-बड़े मैनेजर अपने पसीने पोंछते थे। वह अनुशासन की पक्की थी, लेकिन उसके अनुशासन में कठोरता अधिक और इंसानियत कम थी। कंपनी के लक्ष्यों को पूरा करने की होड़ में वह अक्सर अपने कर्मचारियों पर /ची/ख/ती/ और /चिल्ला/ती/ थी। लोग उसे ‘आयरन लेडी’ कहते थे, लेकिन पीठ पीछे उसे एक ‘खड़ूस और /नि/र्द/यी/’ बॉस माना जाता था।
अपूर्वा के इस व्यवहार की जड़ उसके अकेलेपन में थी। जवानी के दिनों में उसने अपनी तीन सहेलियों के साथ कसम खाई थी कि वे कभी शादी नहीं करेंगी और केवल करियर पर ध्यान देंगी। लेकिन समय के साथ उसकी तीनों सहेलियां अपनी कसम भूल गईं और उन्होंने घर बसा लिया। अपूर्वा अपनी बात की पक्की रही, लेकिन ४० की उम्र तक आते-आते वह भीतर से चिड़चिड़ी हो गई थी। उसके हार्मोनल बदलाव और अकेलेपन की /कुं/ठा/ अक्सर कर्मचारियों पर /गा/ली/-गलौज और /अ/प/मा/न/ बनकर फूटती थी।
अध्याय २: लग्जरी फ्लैट का सन्नाटा
अपूर्वा मालाबार हिल के एक आलीशान फ्लैट में अकेली रहती थी। उसके पास ८-१० लाख रुपये महीने की सैलरी थी, महंगी गाड़ियां थीं, लेकिन घर आने पर उसका स्वागत करने वाला कोई नहीं था। शाम को जब वह घर लौटती, तो सन्नाटा उसे /ड/स/ने/ दौड़ता। वह खुद चाय बनाती और वही बासी सन्नाटा ओढ़कर सो जाती।
उसकी मां कभी-कभी फोन करती, तो अपूर्वा उन पर भी भड़क जाती। भाई-बहन अपनी गृहस्थी में व्यस्त थे। अपूर्वा ने अपनी उन सहेलियों से भी नाता तोड़ लिया था जो उसे ‘पार्टनर’ ढूंढने की सलाह देती थीं। उसे लगता था कि प्यार और शादी सिर्फ समय की बर्बादी है। लेकिन रात के अंधेरे में जब वह पुराने फोटो देखती, तो उसकी आँखों से आंसू छलक आते थे।
अध्याय ३: १२ मार्च २०२२ – वह ऐतिहासिक दिन
१२ मार्च २०२२ की सुबह अपूर्वा का मूड बहुत खराब था। कंपनी अपने त्रैमासिक लक्ष्यों (Targets) से पीछे चल रही थी। ऑफिस पहुँचते ही उसने मीटिंग बुलाई और फाइलों का ढेर फर्श पर फेंक दिया। वह चिल्लाई, “तुम सब निकम्मे हो! अगर काम नहीं करना तो कल से ऑफिस मत आना, मैं सबको /नौकरी/ से निकाल दूँगी!”
पूरे ऑफिस में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। तभी एक छोटा सा बच्चा, जिसकी उम्र मुश्किल से ५-६ साल होगी, धीरे से अपूर्वा के केबिन में दाखिल हुआ। उसका नाम सार्थक था, जिसे सब प्यार से चिंटू कहते थे। चिंटू ने बिना डरे जमीन पर बिखरे कागजों को समेटना शुरू किया।
अपूर्वा उसे हैरानी से देखती रही। चिंटू ने कागज मेज पर रखे, पानी की बोतल उठाई और अपूर्वा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “आंटी, इसे खोल दीजिए।” अपूर्वा ने यंत्रवत बोतल खोल दी। चिंटू बोला, “अब आप पानी पी लीजिए। गुस्सा करने से इंसान का खून जल जाता है और वह मर जाता है। मेरी मम्मी भी बहुत गुस्सा करती थीं, उनका खून जल गया और वह मर गईं।”
अध्याय ४: एक मासूम का जादू
चिंटू की इन बातों ने अपूर्वा के भीतर के पत्थर को हिला दिया। उसे पता चला कि चिंटू कंपनी के एक कर्मचारी अखिलेश का बेटा है। आज चिंटू का जन्मदिन था और अखिलेश उसे ऑफिस लेकर आया था। अपूर्वा ने पहली बार किसी बच्चे को इतने करीब से देखा था। उसने चिंटू को गले लगाया और उसे ढेर सारे तोहफे दिलाए।
अखिलेश एक साधारण लेकिन मेहनती कर्मचारी था। वह अपनी पत्नी के छोड़कर चले जाने के बाद अकेले ही चिंटू को पाल रहा था। चिंटू की मासूमियत ने अपूर्वा और अखिलेश के बीच एक अनकहा रिश्ता बना दिया। अपूर्वा अक्सर चिंटू को अपने घर ले जाने लगी। वह चिंटू के साथ वीडियो गेम खेलती, अपनी मां से उसे मिलवाती और बरसों बाद वह खिलखिलाकर हंसने लगी थी।
अध्याय ५: अखिलेश का संघर्ष और अपूर्वा का हृदय परिवर्तन
अपूर्वा को जब पता चला कि अखिलेश की पत्नी उसे तब छोड़कर भाग गई थी जब चिंटू सिर्फ एक महीने का था, तो उसे गहरा दुख हुआ। अखिलेश ने बताया कि उसकी पत्नी के सपने बहुत बड़े थे और उसे एक करोड़पति पति चाहिए था। अपूर्वा को महसूस हुआ कि वह भी तो अब तक केवल बड़े सपनों और पैसों के पीछे ही भाग रही थी, जबकि असली खुशी तो चिंटू जैसी मासूमियत में है।
धीरे-धीरे अपूर्वा का स्वभाव बदलने लगा। अब वह कर्मचारियों पर चिल्लाती नहीं थी, बल्कि उनकी समस्याओं को समझने लगी थी। ऑफिस का माहौल अब तनावपूर्ण नहीं, बल्कि खुशनुमा रहने लगा था।
अध्याय ६: मैट्रीमोनी प्रोफाइल और दिल की बात
एक दिन मजाक-मजाक में अपूर्वा ने अखिलेश का मैट्रीमोनी प्रोफाइल बनवा दिया। अखिलेश ने कहा, “मैडम, ४० की उम्र में मुझे कौन पूछेगा?” अपूर्वा ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोहिनूर की कोई उम्र नहीं होती।”
कुछ दिनों बाद अखिलेश ने देखा कि उसकी प्रोफाइल पर एक रिक्वेस्ट ‘एक्सेप्ट’ हुई है। जब उसने देखा कि वह रिक्वेस्ट खुद अपूर्वा मैडम ने भेजी है, तो उसके होश उड़ गए। वह कांपते हुए अपूर्वा के पास गया और बोला, “मैडम, शायद सिस्टम में कोई गलती हो गई है।”
अपूर्वा ने कुर्सी से उठकर अखिलेश की आँखों में देखा और कहा, “अखिलेश, क्या तुम्हें लगता है कि मैं कोई गलती कर सकती हूँ? क्या मैं तुम्हारे और चिंटू के लायक नहीं हूँ?” अखिलेश सन्न रह गया। अपूर्वा ने उसके हाथ थाम लिए। पद और प्रतिष्ठा की दीवारें गिर चुकी थीं।
अध्याय ७: एक नई शुरुआत
२०२३ में अपूर्वा और अखिलेश ने सादगी से शादी कर ली। आज अपूर्वा केवल एक कंपनी की हेड ही नहीं, बल्कि एक खुशहाल पत्नी और एक प्यारी मां भी है। उसके चेहरे पर अब वह गुस्सा नहीं, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान रहती है। उसने समझ लिया है कि कामयाबी का शिखर तब तक अधूरा है जब तक उसे साझा करने वाला कोई अपना न हो।
निष्कर्ष: यह कहानी हमें सिखाती है कि पैसा और पद इंसान को सुविधाएँ तो दे सकते हैं, लेकिन शांति और खुशी केवल प्रेम और रिश्तों से ही मिलती है। सफलता के शोर में कभी-कभी अपनी इंसानियत को नहीं भूलना चाहिए।
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