मां ने रोते हुए जवान बेटी को घर से भगाया और कहा वापस मत लौटना फिर भी||

पवित्र गंगा का उपहार: मीरा और अरविंद की अमर गाथा

हरिद्वार—जहाँ गंगा की लहरें पत्थरों से टकराकर एक दिव्य संगीत पैदा करती हैं। हर शाम यहाँ हज़ारों दीये पानी पर तैरते हैं, जो लोगों की मन्नतों और विश्वास का प्रतीक होते हैं। इसी पावन नगरी के एक प्राचीन मंदिर की सीढ़ियों पर एक युवती बैठी थी। उसकी उम्र शायद चौबीस-पच्चीस साल रही होगी, लेकिन चेहरे पर छाई उदासी ने उसे समय से पहले ही बूढ़ा बना दिया था। उसके कपड़े मैले थे, बाल बिखरे हुए थे और वह देखने में बिल्कुल एक भिखारिन लग रही थी।

उसकी आँखों में कोई आशा नहीं थी, बस एक खालीपन था, जैसे वह गंगा की बहती धार में अपना सब कुछ विसर्जित कर चुकी हो।

अरविंद का आगमन

उसी मंदिर में रोज़ की तरह अरविंद आया। अरविंद एक संभ्रांत ज़मींदार परिवार का इकलौता बेटा था। स्वभाव से सौम्य और दयालु, अरविंद का हरिद्वार में एक आलीशान होटल था। वह हर सुबह गंगा स्नान के बाद मंदिर आता और अपने साथ लाए ताज़ा भोजन को गरीबों और जरूरतमंदों में बाँटता था।

आज जब अरविंद खाना बाँट रहा था, तो उसकी नज़र सीढ़ियों पर बैठी उस युवती पर पड़ी। उसकी खामोशी में एक अजीब सा आकर्षण था। अरविंद ने उसके पास पत्तल पर खाना रखा। जैसे ही उस युवती ने कांपते हाथों से खाने की ओर हाथ बढ़ाया, एक आवारा कुत्ता झपटकर आया और खाने को जूठा कर गया।

लड़की ठिठक गई। उसने न तो गुस्सा किया, न ही कुत्ते को भगाया। उसने बस एक लंबी सांस ली और फिर से उसी शून्य की ओर देखने लगी। अरविंद यह सब देख रहा था। उसे लगा कि वह लड़की उसे दोबारा खाना माँगेगी, क्योंकि उसकी आँखों की गहराई भूख चीख-चीख कर बयां कर रही थी। लेकिन वह मौन रही।

अरविंद उसके पास गया। “क्या तुम्हें भूख लगी है?” उसने धीमे से पूछा।

लड़की ने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, शायद रातों से सोई नहीं थी। उसने धीरे से ‘हाँ’ में सिर हिलाया। अरविंद ने उसे दूसरा पैकेट दिया। जब लड़की ने खाना शुरू किया, तो अरविंद हैरान रह गया। वह हाथ फैलाकर माँग नहीं रही थी, बल्कि बहुत ही सलीके और गरिमा के साथ खा रही थी—जैसे वह किसी ऊँचे खानदान की शिक्षित लड़की हो।

भिक्षा नहीं, स्वाभिमान की तलाश

मंदिर से वापस लौटते समय भी अरविंद ने उसे वहीं पाया। उसने पास जाकर पूछा, “तुम भीख क्यों माँगती हो? तुम जवान हो, काम कर सकती हो।”

लड़की की आँखों में बिजली सी कौंधी। “मैं भिखारिन नहीं हूँ साहब… बस हालातों की मारी हुई हूँ,” उसकी आवाज़ में एक भारीपन था।

अरविंद का दिल पसीज गया। उसने प्रस्ताव दिया, “अगर तुम सच में काम करना चाहती हो, तो मेरे होटल में स्टाफ की ज़रूरत है। वहाँ तुम्हें रहने की जगह और इज़्ज़त की रोटी मिलेगी।”

लड़की ने कुछ पल अरविंद की आँखों में ईमानदारी देखी और फिर साथ चलने को तैयार हो गई। होटल पहुँचते ही स्टाफ के बीच कानाफूसी शुरू हो गई। “साहब इस भिखारिन को कहाँ से उठा लाए?” लेकिन अरविंद ने सबको सख्त लहजे में चुप करा दिया। “आज से यह हमारे स्टाफ का हिस्सा है। इसका नाम मीरा है।”

अरविंद ने एक महिला कर्मचारी को पैसे दिए और कहा, “इसे नहला-धुलाकर अच्छे कपड़े पहनाओ और इसे काम समझाओ।” दो घंटे बाद जब मीरा अरविंद के सामने आई, तो वह पहचानी नहीं जा रही थी। साफ-सुथरे कपड़ों में उसकी सुंदरता निखर आई थी। उसकी चाल-ढाल से साफ़ था कि वह कोई साधारण लड़की नहीं है।

साजिश और मां का आगमन

दिन बीतते गए। मीरा ने होटल का सारा काम बड़ी लगन से संभाल लिया। अरविंद उसे बार-बार प्रोत्साहित करता, ताकि वह अपने अतीत के गमों को भूल सके। लेकिन अरविंद के ही स्टाफ में एक व्यक्ति था, जो उसके पड़ोस का था और अरविंद की माँ का खास खबरी था। उसे मीरा की तरक्की और अरविंद का उस पर ध्यान देना खटकने लगा।

एक दिन कुछ पुराने ग्राहकों ने मीरा को पहचान लिया। “अरे, यह तो वही भिखारिन है जो मंदिर पर बैठती थी!” उन्होंने शोर मचाया। अरविंद ने स्थिति संभाली, लेकिन उस कर्मचारी ने तुरंत अरविंद की माँ के कान भर दिए। “महारानी जी, आपका बेटा एक कलंक को घर की इज़्ज़त बना रहा है। होटल की बदनामी हो रही है।”

अरविंद के पिता के जाने के बाद उसकी माँ ही उसकी मार्गदर्शक थीं। वह गुस्से में होटल पहुँचीं। उस समय अरविंद बाहर गया था। माँ ने मीरा को सबके सामने ज़लील किया। “मेरे बेटे पर क्या जादू किया है तूने? निकल जा यहाँ से! हमें तेरी जैसी गंदगी की ज़रूरत नहीं है।”

मीरा फूट-फूटकर रोई और बिना एक शब्द कहे होटल छोड़कर फिर से उसी घाट की ओर चली गई।

अतीत की काली परछाइयाँ

शाम को जब अरविंद को पता चला, तो वह पागलों की तरह मीरा को ढूँढने निकला। वह फिर से उसी मंदिर की सीढ़ियों पर मिली। इस बार वह हार चुकी थी।

अरविंद ने उसे शांत कराया और एक शांत रेस्टोरेंट में ले गया। “मीरा, आज तुम्हें बताना होगा। तुम कौन हो? तुम यहाँ कैसे पहुँची?”

मीरा ने सिसकते हुए अपना अतीत खोला। वह बिहार के एक छोटे से गाँव की रहने वाली थी। उसके पिता शराब और जुए के आदी थे। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति जुए में हार दी थी और भारी कर्ज़ में डूब गए थे। एक दिन उसके पिता ने 45 साल के एक अधेड़ और बदचलन सेठ के साथ 17 साल की मीरा का सौदा कर दिया।

मीरा ने विरोध किया, तो उसके पिता ने उसे बेरहमी से पीटा। लेकिन उसकी माँ, सावित्री, अपनी बेटी की ज़िंदगी बर्बाद होते नहीं देख सकती थी। एक रात, सावित्री ने चुपके से घर का दरवाज़ा खोला। “भाग जा बेटी! यहाँ रहेगी तो ज़िंदा लाश बन जाएगी। मैं तेरे पिता की मार सह लूँगी, पर तेरा सौदा नहीं होने दूँगी।”

मीरा अपनी माँ के आशीर्वाद और कुछ रुपयों के साथ घर से भागी। वह शहरों में काम तलाशती रही, लेकिन जहाँ भी जाती, लोग उसकी मजबूरी का फायदा उठाना चाहते। मकान मालिक से लेकर फैक्ट्री मालिक तक, सबकी निगाहें उसकी इज़्ज़त पर थीं। अपनी अस्मत बचाने के लिए वह शहर-दर-शहर भटकती रही, यहाँ तक कि उसके पैसे खत्म हो गए और वह हरिद्वार के घाट पर भूख से बेहाल होकर भीख माँगने पर मजबूर हो गई।

मां के बलिदान का फल

अरविंद की आँखों में आंसू थे। उसने मीरा का हाथ थामा। “मीरा, तुम्हारी माँ ने तुम्हें एक नई ज़िंदगी देने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली। मैं उस बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दूँगी।”

अरविंद उसे लेकर अपनी माँ के पास गया। उसने माँ को मीरा की पूरी सच्चाई बताई—कैसे एक लड़की ने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए भूख और गरीबी को चुना। अरविंद की माँ का हृदय परिवर्तन हो गया। उन्होंने मीरा को गले लगाया और उससे माफी माँगी।

अरविंद ने कहा, “माँ, मैं मीरा से शादी करना चाहता हूँ।”

शादी से पहले अरविंद और मीरा बिहार गए। वहाँ जाकर पता चला कि सावित्री आज भी ज़ुल्म सह रही थी। अरविंद ने कानूनी मदद से मीरा के पिता को पुलिस के हवाले किया और सावित्री को सम्मान के साथ हरिद्वार ले आया।

धूमधाम से अरविंद और मीरा की शादी हुई। आज मीरा उस होटल की मालकिन है और सावित्री अपनी बेटी की खुशियों को देख रही है। वह मंदिर की सीढ़ियाँ आज भी वहीं हैं, लेकिन मीरा अब वहाँ उदास नहीं बैठती, बल्कि हर रोज़ गरीबों के लिए लंगर का आयोजन करती है।

सीख: वक्त कितना भी कठिन क्यों न हो, अगर नीयत साफ़ हो और स्वाभिमान ज़िंदा हो, तो ईश्वर स्वयं किसी न किसी रूप में मदद के लिए हाथ बढ़ाता है। एक माँ का बलिदान कभी निष्फल नहीं जाता।