“मैं आपकी बेटी का दोस्त बनूँगा” – एक भूखे बच्चे का वादा जिसने बचा लिया अरबपति का परिवार!

एक निवाला, एक वादा – देवा की कहानी
भूमिका
भूख इंसान को वह सब सिखा देती है जो दुनिया की बड़ी से बड़ी यूनिवर्सिटी भी नहीं सिखा पाती। भूख स्वाभिमान और बेबसी के बीच की उस महीन रेखा को मिटा देती है, जहां एक इंसान अपने पेट की आग बुझाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। लेकिन 12 साल के देवा की आंखों में भूख तो थी, पर लाचारी नहीं थी। मुंबई की सड़कों की धूल उसकी फटी शर्ट पर थी, मगर उसकी रीढ़ सीधी थी। वह होटल ग्रैंड पैलेस के बाहर खड़ा था, जहां शहर के सबसे रईस लोग अपनी चमचमाती गाड़ियों से उतरते और भव्य इमारत में दाखिल होते।
देवा कोई भिखारी नहीं था। वह बस एक मौके की तलाश में था। पिछले दो दिनों से उसने अन्न का एक दाना भी नहीं छुआ था, फिर भी उसने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। तभी वहां एक काली Mercedes आकर रुकी। उसमें से शहर के मशहूर उद्योगपति जगत नारायण उतरे। उनके चेहरे पर हमेशा एक गहरी चिंता की लकीरें खिंची रहती थीं। वे फोन पर किसी से बात कर रहे थे—“मैंने कहा ना, उसे खाना खिलाने की कोशिश करो। अगर वह नहीं खा रही है तो डॉक्टर को बुलाओ। मैं मीटिंग में हूं। हर छोटी बात के लिए मुझे परेशान मत करो।”
उनकी परेशानी की वजह उनकी इकलौती बेटी अनन्या थी, जो गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी थी। 10 साल की अनन्या खिड़की के शीशे से बाहर देख रही थी, लेकिन उसकी आंखों में कोई भाव नहीं था। वह एक जिंदा लाश की तरह थी—गुमसुम, खामोश और अपनी ही दुनिया में कैद।
पहली मुलाकात – एक सौदा
देवा ने जगत बाबू को देखा, फिर कार के अंदर बैठी उदास अनन्या को। उसने एक पल कुछ सोचा और सुरक्षा गार्डों की नजर बचाकर सीधे जगत नारायण की ओर बढ़ गया। गार्ड ने उसे रोकने के लिए डंडा उठाया—“ए लड़के, पीछे हट! कहां घुस रहा है?” लेकिन देवा की आवाज में एक अजीब सी खनक थी, जिसने जगत बाबू के कदमों को रोक दिया।
“साहब, मुझे पैसे नहीं चाहिए। बस मेरी बात सुन लीजिए।”
जगत नारायण ने गार्ड को रुकने का इशारा किया और बेरुखी से पूछा—“क्या चाहिए तुम्हें? मेरे पास वक्त नहीं है।”
देवा ने अपनी पेट पर हाथ रखा और सीधा उनकी आंखों में देखकर कहा,
“साहब, दो दिन से कुछ नहीं खाया है। मुझे भीख नहीं चाहिए। मैं मेहनत का खाता हूं। आप मुझे भरपेट खाना खिला दीजिए। बदले में मैं वह कर दूंगा जो आपके डॉक्टर और नौकर नहीं कर पाए।”
जगत नारायण को उस मैले-कुचैले लड़के की बात पर हंसी आ गई, लेकिन उसके आत्मविश्वास ने उन्हें चौंका भी दिया।
“तुझ जैसा सड़क का आवारा लड़का मेरे लिए क्या कर सकता है? क्या मेरे जूते पॉलिश करेगा या गाड़ी साफ करेगा?”
देवा ने कार की खिड़की की तरफ इशारा किया, जहां अनन्या अब भी शून्य में ताक रही थी।
“साहब, मैंने सुना आप फोन पर क्या कह रहे थे। वो गुड़िया खाना नहीं खा रही है और मैं खाने के लिए तड़प रहा हूं। भगवान का खेल भी अजीब है। आप मुझे एक वक्त का खाना खिला दीजिए। मैं वादा करता हूं, मैं आपकी बेटी का दोस्त बन जाऊंगा। मैं उसे हंसाऊंगा, उसे वह बातें बताऊंगा जो इन बड़े होटलों में नहीं मिलती। मैं उसकी वह दुनिया बदल दूंगा, जहां वह अभी कैद है।”
यह प्रस्ताव अजीब और बचकाना था, लेकिन जगत नारायण ने देवा की आंखों में एक ऐसी सच्चाई देखी, जो उन्होंने अरसे से किसी में नहीं देखी थी। एक हताश पिता को उम्मीद की धुंधली किरण दिखाई दी।
नारायण विला – पहली रात
जगत नारायण ने गहरा इशारा किया, ड्राइवर ने गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल दिया। देवा झिझकते हुए उस आलीशान कार में बैठा। पूरी रास्ते अनन्या ने एक बार भी सिर उठाकर नहीं देखा कि उसके बगल में कौन बैठा है। वह अपनी ही खामोशी के कोकून में थी।
घर के अंदर दाखिल होते ही नौकरों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई। घर का पुराना रसोइया काका देवा के मैले कपड़ों को देखकर नाक-भौं सिकोड़ने लगा।
जगत नारायण ने आदेश दिया—“काका, डाइनिंग टेबल पर खाना लगाओ और जो कुछ भी बनाया है, सब ले आओ।”
चांदी की थालियों में तरह-तरह के व्यंजन परोसे गए—शाही पनीर, दाल मखनी, गरमागरम रोटियां, बासमती चावल की खुशबू। देवा के पेट में मचे तूफान को और तेज कर दिया। लेकिन तभी उसने देखा कि अनन्या सीढ़ियों से उतरकर अपने कमरे की ओर जा रही थी। देवा का हाथ रोटी के टुकड़े तक जाकर रुक गया। उसे अपना वादा याद आया—“सौदा तो सौदा होता है।”
देवा ने जगत नारायण की ओर देखा और कहा,
“साहब, अगर बुरा ना माने तो मैं यह थाली लेकर गुड़िया के कमरे में जा सकता हूं। अकेले खाने में वह मजा नहीं है जो बांटने में है।”
जगत बाबू को लगा कि लड़का पागल है, लेकिन उन्होंने सिर हिला दिया। वे दबे पांव उसके पीछे गए, यह देखने के लिए कि वह क्या करता है।
दोस्ती की शुरुआत
अनन्या अपने कमरे में बिस्तर पर बैठी थी। महंगे खिलौनों का ढेर लगा था, लेकिन वे सब बेजान लग रहे थे। देवा कमरे में दाखिल हुआ, लेकिन उसने अनन्या से कोई बात नहीं की। उसने थाली फर्श पर रखी और खुद भी कालीन पर पालथी मारकर बैठ गया। उसने जानबूझकर जोर से एक निवाला तोड़ा—“वाह, क्या खुशबू है! हे भगवान, आज तो तूने मेरी लॉटरी लगा दी। सुना है इस पनीर को बनाने के लिए रसोइए ने जादू का मंत्र पढ़ा है।”
अनन्या ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। देवा ने खाते हुए एक और ड्रामा किया—“अरे भालू मियां, तुम खाओगे? नहीं, चलो मैं ही खा लेता हूं। वैसे भी अमीरों का खाना फीका होता है, लेकिन यह वाला तो कमाल है।”
उसकी बातें बेतुकी थीं, लेकिन कमरे के बाहरी सन्नाटे को तोड़ने के लिए काफी थीं। देवा हर निवाले के साथ एक कहानी बुन रहा था। वह अनन्या को खाने के लिए नहीं कह रहा था, बल्कि उसे ललचा रहा था, उसकी जिज्ञासा को जगा रहा था।
पहली बार अनन्या की पलकें झपकी। उसने कनखियों से उस अजीब लड़के को देखा, जो उसके कमरे में बैठकर रईसों की तरह नहीं बल्कि एक राजा की तरह मजे लेकर खा रहा था। देवा ने देख लिया कि मछली जाल में फंसने लगी है। अनन्या की नजरें बार-बार चांदी की थाली की ओर उठ रही थीं।
देवा ने रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा, उस पर थोड़ी सी दाल लगाई और उसे अनन्या की तरफ बढ़ा दिया। लेकिन उसने खाने के लिए नहीं कहा।
“तुम्हें एक राज की बात बताऊं? रसोई काका ने इसमें नमक कम डाला है। अगर तुम चक्कर नहीं बताओगी तो वह मानेंगे ही नहीं। अमीरों के रसोइए हम जैसों की बात कहां सुनते हैं?”
अनन्या ने पहली बार उसे सीधे देखा। उसकी आंखों में अब भी उदासी थी, लेकिन कोतूहल भी था। एक अजनबी, जो उसके आलीशान कमरे में फटी शर्ट पहन कर बैठा था और रसोइए की शिकायत कर रहा था। यह उसके लिए बिल्कुल नया अनुभव था।
अनन्या धीरे से बिस्तर से नीचे उतरी और कालीन पर देवा के सामने बैठ गई। जगत नारायण दरवाजे की ओट से यह सब देख रहे थे, अपनी सांसे रोके खड़े थे। देवा ने वह निवाला अनन्या के होठों के पास ले जाकर रोक दिया।
“रुको।” देवा ने अपनी जेब टटोली और एक कंचा मार्बल निकाला। उसने वह कंचा अनन्या की हथेली पर रख दिया—
“मेरी दुनिया में मुफ्त का खाना नहीं मिलता। यह कंचा मेरी सबसे कीमती दौलत है। इसे रखो, तब यह निवाला तुम्हारा।”
यह कोई भीख नहीं थी, यह एक सौदा था—बराबरी का सौदा। अनन्या ने अपनी नन्ही मुट्ठी में वह कंचा भी लिया। उसे पहली बार लगा कि वह किसी पर एहसान नहीं कर रही, बल्कि अपना हक ले रही है। उसने अपना मुंह खोला और देवा ने वह निवाला उसे खिला दिया।
जैसे ही खाने का स्वाद उसकी जुबान पर लगा, अनन्या की आंखों से आंसू छलक पड़े। महीनों बाद उसने अन्न का स्वाद महसूस किया था। एक निवाला, फिर दूसरा—देखते ही देखते वे दोनों एक ही थाली में खाना खाने लगे। देवा बीच-बीच में उसे हंसाने के लिए अजीबोगरीब शक्लें बनाता, कभी खाने की तारीफ करता, कभी अपनी झूठी बहादुरी के किस्से सुनाता।
“पता है, एक बार मैंने एक चूहे से कुश्ती लड़ी थी। वह चूहा इतना बड़ा था कि बिल्लियां उसे देखकर सलाम ठोकती थीं।”
अनन्या के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। वह मुस्कान जिसे देखने के लिए जगत नारायण ने करोड़ों रुपए खर्च कर दिए थे, आज एक मुफ्त के किस्से और साझा किए गए खाने से लौट आई थी।
दरवाजे के बाहर खड़े जगत नारायण की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने महसूस किया कि उनका पैसा, उनका रुतबा, उनकी ताकत सब इस सड़क के लड़के के सामने बौने थे। वह लड़का केवल खाना नहीं खिला रहा था, वह अनन्या को वापस जिंदगी की तरफ खींच रहा था।
देवा – परिवार का हिस्सा
खाना खत्म होने पर देवा ने पानी का गिलास पिया और डकार ली।
“पेट तो भर गया, लेकिन दोस्त का पेट भरा या नहीं, यह कैसे पता चलेगा?”
अनन्या ने सिर हिलाया। फिर उसने अपनी मुट्ठी खोली और वह कंचा वापस देवा की तरफ बढ़ाया।
देवा ने उसका हाथ बंद कर दिया—
“उधारी में रखता नहीं और दोस्ती में हिसाब होता नहीं। यह अब तुम्हारा है। जब भी अकेला लगे, इसे देखना। इसमें मेरी दुनिया दिखाई देगी।”
उस रात अनन्या ने पहली बार बिना दवाइयों के सुकून की नींद ली, अपनी मुट्ठी में उस सस्ते से कांच के कंचे को जकड़े हुए।
अगले कुछ हफ्तों में नारायण विला का नक्शा ही बदल गया। वह घर, जो कभी मातम का घर लगता था, अब बच्चों की किलकारियों से गूंजने लगा था। देवा ने अनन्या को वह सब सिखाया जो किताबों में नहीं होता—नंगे पैर घास पर चलना, बारिश के पानी में कागज की कश्तियां चलाना, और सबसे बड़ी बात खुलकर हंसना।
जगत नारायण जब शाम को ऑफिस से लौटते, अपनी बेटी को कीचड़ में सना हुआ देखकर डांटने के बजाय उनकी आंखों में सुकून के आंसू आ जाते। देवा अब उस परिवार का एक हिस्सा बन चुका था—एक बिन कहा बेटा। उसे रसोइए के बगल वाले कमरे में रहने की जगह मिल गई थी और अब वह अच्छे कपड़े पहनता था। लेकिन उसकी आंखों की वह सड़क वाली चमक और होशियारी अब भी वैसी ही थी।
साजिश – महेंद्र प्रताप की चालें
जहां दिया जलता है, वहां अंधेरा अपनी जगह बनाने की कोशिश जरूर करता है। इस खुशहाल तस्वीर को कोई था जो बहुत नफरत भरी नजरों से देख रहा था—जगत नारायण के सौतेले भाई महेंद्र प्रताप। महेंद्र पिछले कई सालों से कंपनी और घर पर अपना कब्जा जमाए बैठा था, क्योंकि जगत अपनी बेटी की बीमारी में व्यस्त थे। महेंद्र का प्लान साफ था—अनन्या मानसिक रूप से बीमार रहे, जगत तनाव में रहे, और एक दिन सारी जायदाद उसके नाम हो जाए।
लेकिन देवा के आने से उसकी पूरी बाजी पलट गई थी। अनन्या ठीक हो रही थी और जगत नारायण का ध्यान वापस बिजनेस पर जाने लगा था।
महेंद्र अपनी बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था, जब उसका वफादार मुनीम बृजेश उसके पास आया—
“मालिक, अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह सड़क छाप लड़का मालकिन को पूरा ठीक कर देगा। और अगर अनन्या ठीक हो गई तो वसीयत के मुताबिक सारी दौलत उसकी हो जाएगी। हमें कुछ करना होगा।”
महेंद्र ने सिगरेट का धुआं छोड़ा और जहरीली मुस्कान के साथ कहा—
“उस कीड़े को मसलने का वक्त आ गया है। लेकिन ऐसे नहीं, उसे ऐसे घर से निकालेंगे कि जगत खुद उसे धक्के मारकर बाहर करेगा। और उसके बाद जगत का भी इंतजाम कर देंगे।”
देवा की सतर्कता
देवा को अमीरों के तौर-तरीके नहीं आते थे, लेकिन उसे इंसानों की फितरत पहचानने की गजब की समझ थी। उसने कई बार महेंद्र को अनन्या को घूरते हुए देखा था। वह नजर प्यार की नहीं, शिकार की थी।
एक रात जब पूरा घर सो रहा था, देवा को प्यास लगी और वह रसोई की तरफ गया। तभी उसने देखा कि महेंद्र के कमरे की बत्ती जल रही है और दरवाजा हल्का सा खुला है। अंदर से फुसफुसाने की आवाजें आ रही थीं। देवा दीवार से सट कर खड़ा हो गया। उसने जो सुना, उसने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी।
“कल रात की पार्टी में हंगामा होगा। जगत के खाने में वह दवा मिला दी जाएगी जिससे दिल का दौरा पड़ता है। डॉक्टर अपनी मुट्ठी में है। इल्जाम उस अनाथ लड़के पर लगेगा कि उसने चोरी की और पकड़े जाने पर मालिक को जहर दे दिया। एक तीर से दो शिकार।”
देवा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। जिस आदमी ने उसे पनाह दी और जिस बच्ची ने उसे भाई माना, उनकी जान खतरे में थी। उसके पास कोई सबूत नहीं था और वह जानता था कि एक सड़क के लड़के की बात पर कोई यकीन नहीं करेगा—खासकर अपने सगे भाई के खिलाफ। लेकिन भागना देवा के खून में नहीं था।
पार्टी – साजिश का पर्दाफाश
शाम को नारायण विला रोशनी से नहाया हुआ था। शहर के तमाम बड़े लोग जमा थे। संगीत, हंसी, महंगे तोहफों का दौर चल रहा था। लेकिन देवा की नजरें सिर्फ एक शख्स पर टिकी थीं—महेंद्र प्रताप।
देवा ने पार्टी के लिए नए कपड़े पहने थे, लेकिन उसे वेटर की वर्दी पहननी पड़ी ताकि वह भीड़ में घुल-मिल सके और हर हरकत पर नजर रख सके। तभी उसने देखा कि महेंद्र एक विशेष वेटर से चांदी का गिलास ले रहा है। महेंद्र के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। वह धीरे-धीरे जगत नारायण की ओर बढ़ा, जो मेहमानों से घिरे हुए थे।
“भाई साहब, आप बहुत थके हुए लग रहे हैं। यह लीजिए, आपकी पसंद का खास जूस। इसे पी लीजिए, ताजगी आ जाएगी।”
जगत नारायण ने अपने भाई पर भरोसा करते हुए हाथ बढ़ाया। देवा दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसे कल रात की वह बात याद आ गई—दवा जिससे दिल का दौरा पड़ता है। समय नहीं था। अगर वह समझाने जाता तो देर हो जाती। अब सिर्फ कर्म का वक्त था।
क्षण भर में देवा ने निर्णय लिया। वह चीते की रफ्तार से दौड़ा। जैसे ही गिलास जगत नारायण के होठों तक पहुंचने वाला था, देवा ने पूरी ताकत से जगत बाबू के हाथ पर धक्का मारा। गिलास हवा में उछला और दूर जा गिरा। लाल रंग का जूस सफेद संगमरमर के फर्श पर खून की तरह फैल गया।
छन छन करके कांच टूटने की आवाज ने पूरी पार्टी में सन्नाटा फैला दिया। संगीत रुक गया। मेहमान हैरान होकर देखने लगे। महेंद्र का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने जोरदार तमाचा देवा के गाल पर जड़ दिया—
“हरामजादे, तेरी इतनी हिम्मत मेरे भाई पर हमला करता है?”
जगत नारायण भी स्तब्ध थे।
“देवा, यह क्या पागलपन है? तुमने ऐसा क्यों किया?”
देवा का गाल तमाचे से जल रहा था। आंखों में आंसू थे, लेकिन उसने नजरें नहीं झुकाई।
“मालिक, इस जूस में जहर था। यह आपको मारना चाहते हैं।”
पार्टी में एक विस्फोट सा हुआ। मेहमानों में फुसफुसाहट शुरू हो गई। महेंद्र ने जोर से हंसना शुरू कर दिया, लेकिन उसकी आंखों में डर तैर रहा था।
“अगर यकीन नहीं आता तो छोटे मालिक से कहिए कि वह जग में बचा हुआ जूस पीकर दिखाएं। बस एक घूंट।”
देवा की इस सीधी चुनौती ने सबको चौंका दिया। माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। हर किसी की नजर अब महेंद्र पर थी। जगत नारायण ने भी प्रश्नवाचक नजरों से अपने भाई की ओर देखा।
महेंद्र के माथे पर पसीने की महीन बूंदें चमकने लगी थीं। लेकिन उसने अपनी घबराहट को गुस्से के पीछे छिपा लिया।
“इसे धक्के मारकर बाहर निकालो और पुलिस को बुलाओ। मैं इस पर हत्या की कोशिश का केस करूंगा।”
दो भारी-भरकम गार्ड्स ने देवा को पकड़ लिया और घसीटने लगे। अनन्या जो अब तक सहमी हुई सीढ़ियों पर खड़ी थी, दौड़कर अपने पिता के पास आई—
“पापा, देवा झूठ नहीं बोलता।”
लेकिन सबूत के बिना जगत नारायण भी विवश थे। उनका सगा भाई एक तरफ था और एक अनाथ लड़का दूसरी तरफ। तर्क कहता था कि महेंद्र सही है, लेकिन दिल कह रहा था कि कुछ बहुत गलत हो रहा है।
ब्रूनो – सच्चाई का गवाह
महेंद्र ने वेटर को इशारा किया कि वह जल्दी से फर्श साफ कर दे ताकि सबूत मिट जाए। वेटर कपड़ा लेकर झुका ही था कि तभी घर का पालतू लेब्राडोर कुत्ता ब्रूनो भीड़ के बीच से निकलकर गिरे हुए जूस के पास पहुंच गया और उसे चाटने लगा।
महेंद्र चिल्लाया—“हटाओ उस कुत्ते को वहां से!” लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। ब्रूनो ने अपनी लंबी जीभ से फर्श पर बिखरे उस लाल रस को चाट लिया था।
अगले ही पल जो हुआ, उसने पार्टी में मौजूद हर शख्स की रूह कंपा दी। हट्टाकट्टा ब्रूनो अचानक लड़खड़ाया। उसके मुंह से सफेद झाग निकलने लगा और वह जमीन पर गिरकर तड़पने लगा। मात्र 20 सेकंड के भीतर वह वफादार जानवर हमेशा के लिए शांत हो गया।
हॉल में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। अनन्या की चीख ने उस सन्नाटे को तोड़ा। वह दौड़कर ब्रूनो के पास गई और रोने लगी। जगत नारायण पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े थे। उनकी नजरें पहले अपने मृत कुत्ते पर गई, फिर जहरीले जूस के धब्बे पर और अंत में अपने सगे भाई महेंद्र पर—सच्चाई नंगी होकर सामने खड़ी थी।
सच्चाई का उजागर होना
महेंद्र के चेहरे से खून गायब हो चुका था। वह पसीने से तर-बतर था और पीछे हटने की कोशिश कर रहा था।
“भैया, ये महज एक इत्तेफाक है। कुत्ते को कोई बीमारी होगी।”
लेकिन इस बार जगत नारायण ने कोई तर्क नहीं सुना। उनका हाथ हवा में लहराया और एक जोरदार तमाचा महेंद्र के गाल पर पड़ा।
“बस एक शब्द और नहीं। मैं सांप को अपनी आस्तीन में पालता रहा और उसने मुझे डसने की कोशिश की। और वो सड़क का बच्चा, जिसे तुम कीड़ा समझते हो, उसने अपनी जान पर खेलकर मुझे बचाया।”
तभी वह वेटर, जिसने जूस दिया था, ब्रूनो की हालत देखकर डर के मारे कांपने लगा। वह दौड़कर जगत नारायण के पैरों में गिर पड़ा—
“मालिक, मुझे माफ कर दीजिए। छोटे मालिक ने धमकी दी थी कि अगर मैंने जूस में वह पुड़िया नहीं मिलाई तो वह मेरे परिवार को मार देंगे।”
वेटर के इस कबूलनामे ने रही सही कसर भी पूरी कर दी। वहां मौजूद सुरक्षा गार्ड्स, जिन्होंने देवा को पकड़े हुए थे, उन्होंने तुरंत उसे छोड़ दिया और महेंद्र को घेर लिया।
पुलिस को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि शहर के पुलिस कमिश्नर खुद उस पार्टी में मेहमान थे। उन्होंने तुरंत महेंद्र और वेटर को हिरासत में लेने का आदेश दिया।
महेंद्र ने अपनी नफरत भरी नजरें देवा पर डाली, लेकिन देवा अब डरा हुआ नहीं था। वह गर्व से खड़ा था, हालांकि उसका गाल अभी भी सूजा हुआ था।
परिवार का पुनर्जन्म
जब पुलिस महेंद्र को ले गई, जगत नारायण धीरे-धीरे देवा की ओर बढ़े। उनकी आंखों में शर्मिंदगी थी। एक अरबपति, जो दुनिया भर के सौदे समझता था, वह इंसान पहचानने में धोखा खा गया था। वह देवा के सामने घुटनों के बल बैठ गए, जो कद में उनसे बहुत छोटा था।
“मुझे माफ कर दो बेटे। मैंने अपने खून पर भरोसा किया और उसने मुझे झड़ दिया। मैंने तुम पर शक किया और तुमने मुझे जीवन दिया। आज से तुम अनाथ नहीं हो। यह घर, यह परिवार सब तुम्हारा है।”
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और नारायण विला की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। उस काली रात के बाद जगत नारायण ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने समाज की रूढ़िवादी सोच को तोड़ दिया। उन्होंने किसी अनाथालय से बच्चा गोद नहीं लिया, बल्कि उसी देवा को कानूनी तौर पर अपना बेटा और वारिस घोषित किया, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना उनके परिवार को बचाया था।
दस साल बाद – मिलन और सम्मान
10 साल बाद, होटल ग्रैंड पैलेस जहां कहानी की शुरुआत हुई थी, आज वहां एक भव्य समारोह हो रहा था। जगत नारायण अब बूढ़े हो चुके थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। वे मंच पर आए और उन्होंने माइक संभाला।
“दोस्तों, हम बिजनेस वाले हर चीज में नफा-नुकसान देखते हैं। हम शहरों में निवेश करते हैं, जमीन खरीदते हैं, सोना जमा करते हैं। लेकिन मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे सफल निवेश ना तो यह होटल है और ना ही मेरी कंपनी।”
उन्होंने अपनी जेब से एक पुरानी धुंधली सी तस्वीर निकाली। यह उस दिन की सीसीटीवी फुटेज का प्रिंट था, जब देवा पहली बार उनकी गाड़ी के पास आया था।
“मेरा सबसे बड़ा निवेश था एक थाली खाना। उस दिन एक भूखे बच्चे ने मुझसे सौदा किया था। उसने कहा था—मुझे खाना खिलाओ, मैं आपकी बेटी का दोस्त बन जाऊंगा। मुझे लगा था कि मैं उस पर एहसान कर रहा हूं। लेकिन आज मैं समझ पाया हूं कि असल में उस दिन उसने मुझ पर एहसान किया था। उसने सिर्फ खाना नहीं मांगा था, उसने मेरे परिवार की खुशियां, मेरी बेटी की हंसी और मेरी जान बचाने का वादा किया था। और उसने वह वादा अपनी हर सांस के साथ निभाया।”
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। देवा मंच पर गया और अपने पिता के पैर छुए। जगत नारायण ने उसे गले लगा लिया। अनन्या भी दौड़ कर आई और तीनों एक अटूट आलिंगन में बंध गए।
यह मिलन सिर्फ एक परिवार का नहीं था, बल्कि मानवता, वफादारी और प्रेम की जीत का प्रतीक था।
कंचा – रिश्तों की असली दौलत
उस रात जब वे घर लौटे, अनन्या ने अपनी अलमारी से एक छोटा सा मखमली बॉक्स निकाला। उसमें वही सस्ता सा कांच का कंचा मार्बल रखा था, जो देवा ने उसे पहली मुलाकात में दिया था। वह कंचा आज भी करोड़ों की हीरे की अंगूठियों से ज्यादा चमक रहा था। क्योंकि उस कंचे में सिर्फ कांच नहीं था, उसमें एक भूखे बच्चे का स्वाभिमान और एक भाई का अटूट प्यार कैद था।
समापन
सच ही कहा है, कभी-कभी किसी की खाली झोली भरने से आपकी अपनी झोली दुआओं से भर जाती है। एक निवाला, एक वादा और एक नेक दिल—बस इतना ही काफी होता है दुनिया बदलने के लिए।
समाप्त
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