“मैं इस रॉकेट को ठीक कर दूंगा… आप मेरी बहन का इलाज कराना ,गरीब बच्चा चीखा वैज्ञानिक हैरान

सपनों की उड़ान — आर्यन की कहानी
अध्याय 1: काउंटडाउन की उलझन
बेंगलुरु के बाहर, देश का सबसे बड़ा स्पेस रिसर्च सेंटर। 100 एकड़ का परिसर, 50 से ज्यादा बिल्डिंग, हर कमरे में सुपर कंप्यूटर, हर कोने में देश के सबसे होनहार वैज्ञानिक। पिछले 10 सालों से एक ही सपना—भारतीय एस्ट्रोनॉट को चांद पर भेजना। आज वही ऐतिहासिक दिन था। सुबह 8 बजे कंट्रोल रूम में लॉन्च की तैयारी। स्क्रीन पर रॉकेट की लाइव फीड, पूरे देश की निगाहें टीवी पर। स्कूलों में कक्षाएं रोक दी गई थीं, दफ्तरों में लोग मोबाइल पर न्यूज़ देख रहे थे, गांवों में चौपाल पर भीड़ थी। सब इंतजार कर रहे थे, भारत के आसमान छूने का।
लेकिन अचानक, रॉकेट के इंजन सेक्शन में गड़बड़ी। प्रेशर रीडिंग गिरती, स्पाइक होती, सिस्टम ने सेफ्टी मोड ट्रिगर किया। काउंटडाउन रोक दिया गया। कंट्रोल रूम में तनाव, चिंता, निराशा। कोई नहीं जानता था कि आखिरी समय पर क्या हो गया।
अध्याय 2: स्टेशन का जूता पॉलिश करने वाला
उसी शहर में, स्टेशन के बाहर एक 14 साल का लड़का—आर्यन। फटी चप्पलें, पुरानी ब्रश, गंदा कपड़ा, सामने बिजनेसमैन के जूते। पिता का साया बचपन में ही छूट गया था। मां अंजलि दूसरों के घरों में काम करती, सुबह 4 बजे उठती, छह घरों में काम, शाम को फैक्ट्री या घर में कपड़े धोना। हाथों में दरारें, पीठ में दर्द, लेकिन शिकायत नहीं।
आर्यन दिनभर स्टेशन पर जूते पॉलिश करता। सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक। ₹10 एक जोड़ी जूते, महीने में मुश्किल से ₹5000-6000। घर पर इंतजार करती थी उसकी छोटी बहन अनन्या, उम्र 10 साल, अग्न्याशय का कैंसर। इलाज के लिए लाखों चाहिए, लेकिन घर में एक पैसा नहीं। मां की कमाई बस किराया, राशन और दवाइयों तक सीमित। डॉक्टर ने साफ कहा—बड़े अस्पताल में इलाज वरना बहुत मुश्किल है।
आर्यन रात को बहन के सिरहाने बैठकर हिसाब लगाता—कितना कमाया, कितना चाहिए, कितने साल लगेंगे। लेकिन गणित कठोर था। अनन्या के पास इतना समय नहीं था।
अध्याय 3: कबाड़ से सीखता इंजीनियर
स्टेशन के पास एक पुरानी बंद वर्कशॉप थी। रात को जब स्टेशन खाली होता, आर्यन चुपके से वर्कशॉप में जाता। दीवार के नीचे ढीली ईंट से सरक कर अंदर घुसता। अंधेरे में छोटी टॉर्च जलाकर पुराने मोटर, जंग खाए पंखे, टूटे रेडियो, सर्किट बोर्ड, बैटरियां खोलता। मशीनों की भाषा समझने की कोशिश करता। कोई किताब, कोई कॉलेज, कोई मेंटर नहीं। स्कूल भी छोड़ चुका था। लेकिन अनुभव और जिज्ञासा थी। धीरे-धीरे मशीनों का दिमाग समझने लगा। सर्किट कैसे सोचते हैं, बिजली का फ्लो कैसे चलता है, कहां फॉल्ट है, कैसे ठीक करें।
अध्याय 4: एक मौका — स्पेस सेंटर का इंटरव्यू
एक दिन सड़क पर फेंका अखबार देखा—स्पेस सेंटर में 50 तकनीकी पद खाली, कम पढ़ाई वाले भी आवेदन कर सकते हैं। आर्यन की आंखों में चमक आ गई। अगले दिन अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर स्पेस सेंटर पहुंच गया। इंटरव्यू हॉल में डिप्लोमा, सर्टिफिकेट वाले लोग थे, आर्यन के पास कुछ नहीं। जब उसकी बारी आई, सीनियर इंजीनियर ने पूछा—“तुम्हें क्या आता है?” आर्यन बोला, “मुझे मशीनें समझ आती हैं। आप कोई भी टूटा सिस्टम देंगे, मैं खोलकर देख सकता हूं, और अक्सर ठीक भी कर सकता हूं।”
पहले हल्के में लिया गया, फिर एक पुराना खराब फैन मोटर और सर्किट बोर्ड दिया गया। आधे घंटे बाद मोटर घूम रही थी। फिर एक डमी सेंसर वाला बोर्ड दिया गया, आउटपुट नहीं आ रहा था। आर्यन ने दो मिनट देखा, जला हुआ ट्रैक पहचाना, जंपर वायर लगाई, LED जल उठी। इंटरव्यू लेने वालों की मुस्कान बदल गई। उसे नौकरी मिल गई—टेक्निकल असिस्टेंट की।
अध्याय 5: मिशन का संकट
लॉन्च डे तक के कुछ महीनों में आर्यन ने खुद को साबित किया। सीनियर इंजीनियरों के पीछे-पीछे, सबकुछ ध्यान से देखता। डॉ विजय राज, मिशन के सीनियर साइंटिस्ट, उसकी आंखों की चमक पहचान गए थे। लॉन्च डे सुबह 8 बजे, लेकिन 2 घंटे पहले ही कंट्रोल रूम में हंगामा। इंजन सिस्टम में विद्युत समस्या, मेन कंट्रोल स्क्रीन पर लाल चेतावनियां। सबकुछ चेक किया गया, हर जगह हरी बत्ती, लेकिन क्रिटिकल फॉल्ट फ्लैग बार-बार ट्रिगर हो रहा था। मौसम विभाग ने साफ कर दिया—अगर आज लॉन्च नहीं हुआ तो कई हफ्तों का इंतजार, करोड़ों का नुकसान, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजाक।
अध्याय 6: आर्यन का चमत्कार
अफरातफरी में आर्यन दौड़ता हुआ कंट्रोल रूम में घुसा। सिक्योरिटी गार्ड्स रोकने में चूक गए। “रुको सर, मुझे बस एक मौका चाहिए।” डॉ विजय ने गार्ड्स को रोक दिया। आर्यन ने मेन स्क्रीन पर रॉकेट के सिस्टम की लाइव टेलीमेट्री देखी। कुछ सेकंड तक देखता रहा, फिर बोला—“फॉल्ट सेंसर में नहीं है, फॉल्ट डाटा इंटरप्रिटेशन में है। कंप्यूटर सही संदेश दे रहा है, लेकिन बैक एंड सिस्टम उसे गलत तरीके से पढ़ रहा है। यह लूप यहां डाटा रिसेट कर रहा है, जबकि होल्ड होना चाहिए।”
डॉ विजय ने स्क्रीन पर नजर दौड़ाई, कभी इस एंगल से देखा नहीं था। “इसे ठीक करने में कितना समय लगेगा?”
“सर, मुझे एक हफ्ता दीजिए। मैं कोड और हार्डवेयर इंटरफेस दोनों चेक करूंगा। अगर फेल हुआ, तो चुपचाप चला जाऊंगा। लेकिन अगर मौका नहीं मिला तो हम कभी नहीं जान पाएंगे कि असली गलती कहां थी।”
एक पल के लिए सब चुप। इतने क्रिटिकल मिशन को एक 14-15 साल के लड़के के हाथ में देना… लेकिन टॉप लेवल टीम भी फंसी थी। डॉ विजय ने कहा—ठीक है, एक हफ्ता। मिशन होल्ड पर रहेगा।
अध्याय 7: सात दिन की जंग
अगले सात दिन आर्यन लैब में ही सोता, वहीं उठता। हार्डवेयर लॉक पढ़ता, बैक एंड कोड के स्नैपशॉट्स देखता। किस दिन कौन सा अपडेट, किस वर्जन से गलती, कहां से लूप इंट्रोड्यूस हुआ। तीसरे दिन एक माइक्रो लूप पकड़ा, जो डाटा हर कुछ सेकंड बाद रिसेट कर देता था। छठे दिन एक बैकअप सिस्टम मिला जो मेन सर्किट से कॉन्फ्लिक्ट कर रहा था। दोनों एरर्स को अलग-अलग कभी क्रिटिकल नहीं माना गया, लेकिन कंबाइन करने पर मिशन स्टॉपिंग समस्या बन गई।
सातवें दिन सुबह, थके हुए चेहरे, लेकिन आत्मविश्वास के साथ आर्यन ने डॉ विजय से कहा—“सर, अब ठीक है।”
अध्याय 8: ऐतिहासिक उड़ान
हर लॉग, हर लाइन, हर पैच चेक हुआ। “ठीक है, काउंटडाउन फिर से शुरू करो।” कंट्रोल रूम में सन्नाटा। T सेकंड्स, हर स्क्रीन पर डाटा रन, कहीं लाल फ्लैग नहीं।
T 10…9…8…7…6…5…4…3…2…1…0
एक पल के लिए समय रुक गया। फिर स्क्रीन पर हरा संकेत—इंजन इग्निशन स्टेबल, मेन प्रेशर नॉर्मल, ऑल सिस्टम्स ग्रीन। रॉकेट ने जमीन को पीछे छोड़ दिया, धुएं और आग की लपटों के बीच आसमान की तरफ निकल गया। तालियों की गूंज, वैज्ञानिक गले लगा रहे थे, कुछ की आंखों में आंसू। डॉ विजय ने आर्यन को गले लगा लिया—“तुमने कर दिखाया। तुमने एक देश का सपना बचा लिया।”
आर्यन की आंखें भर आईं, लेकिन उसकी जुबान से सिर्फ एक बात निकली—“सर, मेरी बहन…”
डॉ विजय ने कहा—“कल सुबह तुम्हारी बहन दिल्ली के सबसे अच्छे अस्पताल में होगी।”
अध्याय 9: बहन के लिए उड़ान
अगले दिन अनन्या को टॉप कैंसर हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। टेस्ट, स्टेज कंफर्म, तुरंत ट्रीटमेंट प्लान। खर्च मिशन के सरकारी बजट से नहीं, बल्कि डॉक्टर्स, कॉरपोरेट्स और साइंटिस्टों की निजी मदद से अरेंज हुआ। सब जानते थे—अगर उस दिन आर्यन ने लूप और कॉन्फ्लिक्ट नहीं पकड़ा होता, तो मिशन सालों पीछे चला जाता।
महीनों तक कीमोथेरेपी, दवाइयां, रूटीन चेकअप, बालों का झड़ना, उल्टियां—अनन्या ने सब झेला, लेकिन इस बार अकेली नहीं थी। उसके पास इलाज था, टाइम था, और एक भाई था जो अब रॉकेटों पर भी अपनी छाप छोड़ चुका था।
आखिरकार, डॉक्टर ने रिपोर्ट हाथ में लेकर मुस्कुराते हुए कहा—“कैंसर फिलहाल कंट्रोल में है। अगर फॉलो अप करते रहे तो बच्ची नॉर्मल लाइफ जी सकती है।” उस दिन आर्यन ने पहली बार महसूस किया कि उसने क्या हासिल किया है। रॉकेट की उड़ान तो देश ने देखी, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी जीत थी—उसकी बहन फिर से हंस रही थी।
अध्याय 10: सपनों की उड़ान
कुछ समय बाद स्पेस सेंटर ने घोषणा की—आर्यन को इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए फुल स्कॉलरशिप दी जाएगी। टॉप कॉलेज में इलेक्ट्रॉनिक्स और एयरस्पेस की पढ़ाई, पूरी फीस, हॉस्टल, दूसरी जरूरतें कवर। डॉ विजय खुद मेंटर बने। जिस स्पेसक्राफ्ट को सबने ऑलमोस्ट हार मान ली थी, उसी ने चांद की तरफ सफल मिशन पूरा किया। हर सक्सेस स्टोरी में एक नाम जरूर आता—एक गरीब लड़का जिसने सिर्फ एक मौका मिलने पर दिखा दिया कि काबिलियत कैसे बोलती है।
कहानी का सबक
कभी-कभी प्रतिभा डिग्री नहीं देखती। कभी-कभी ज्ञान किताबों में नहीं होता। वह अनुभव और जिज्ञासा में छुपा होता है। कभी-कभी एक बच्चा, जिसे हम बस क्लीनर या हेल्पर समझते हैं, वही किसी देश का सपना बचा लेता है। और किसी छोटी बच्ची की जिंदगी भी।
आर्यन के पास पैसा नहीं था, डिग्री नहीं थी। लेकिन जिम्मेदारी थी, सवाल थे, सपने थे। और कभी-कभी बस इतना ही काफी होता है सब कुछ बदल देने के लिए।
(कहानी समाप्त)
अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो अपनी राय जरूर साझा करें। क्या आपको आर्यन की मेहनत, उसकी बहन के लिए प्यार या देश के सपनों के लिए उसकी जिम्मेदारी ने छू लिया?
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