मैनपुरी की इस महिला ने जो अपने सगे भाई के साथ की है उसे समाज कभी भूल नहीं पाएगा ||

मैनपुरी का /खूनी/ विश्वासघात: पूजा दुबे और मोहित की /दर्दनाक/ कहानी

प्रस्तावना: एक अटूट रिश्ते का /अंत/

दुनिया में भाई-बहन का रिश्ता सबसे पवित्र माना जाता है। बहन भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के कुसमरा गांव में ७ अप्रैल २०२६ को एक ऐसी घटना घटी, जिसने इस पवित्र रिश्ते को /कलंकित/ कर दिया। एक बहन ने अपने /अवैध/ प्रेम संबंधों को छुपाने के लिए अपने ही भाई को /मौत/ के घाट उतरवा दिया।

अध्याय १: खुशहाल परिवार के पीछे का /कड़वा/ सच

मैनपुरी के किसनी थाना क्षेत्र के कुसमरा गांव में ३६ वर्षीय दिलीप दुबे का परिवार रहता था। दिलीप महाराष्ट्र के पुणे में एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में नौकरी करता था। घर में उसकी ३३ वर्षीय पत्नी पूजा दुबे और उनके तीन बच्चे रहते थे। दिलीप कड़ी मेहनत कर पैसे कमाता और घर भेजता था ताकि उसके बच्चे – रितिक (१० वर्ष) और अन्य दो छोटे बच्चे – एक अच्छा जीवन जी सकें।

लेकिन दिलीप को यह खबर नहीं थी कि उसकी अनुपस्थिति में पूजा ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। पिछले ५ सालों से पूजा का अपने पड़ोस में रहने वाले जितेंद्र ठाकुर (३८ वर्ष) के साथ /अनैतिक/ संबंध चल रहा था। जितेंद्र खुद शादीशुदा था और उसके भी तीन बच्चे थे, लेकिन वह और पूजा एक-दूसरे के /मोह/ में अंधे हो चुके थे। जब भी दिलीप पुणे होता, जितेंद्र रात के अंधेरे में पूजा के घर आता था।

अध्याय २: वह काली रात – ७ अप्रैल २०२६

७ अप्रैल को पूजा अपने बच्चों के साथ अपने मायके (फर्रूखाबाद का करथिया गांव) से वापस अपने ससुराल कुसमरा आई थी। पूजा का छोटा भाई मोहित मिश्रा, जो अपनी बहन से बहुत प्यार करता था, उसे और बच्चों को छोड़ने के लिए खुद साथ आया था। शाम के ५ बज चुके थे, इसलिए मोहित ने तय किया कि वह उस रात अपनी बहन के घर ही रुकेगा और अगली सुबह घर लौट जाएगा।

लेकिन पूजा, जो कई दिनों से अपने प्रेमी जितेंद्र से नहीं मिली थी, /बेचैन/ थी। उसने सोचा कि मोहित बगल के कमरे में सो रहा है और उसे कुछ पता नहीं चलेगा। आधी रात को करीब १२ बजे, उसने जितेंद्र को इशारा किया। जितेंद्र हमेशा की तरह छत के रास्ते पूजा के कमरे में दाखिल हुआ।

अध्याय ३: जब भाई ने देख ली /शर्मनाक/ हकीकत

देर रात करीब १ बजे, बगल के कमरे में सो रहे मोहित की आंख अचानक खुल गई। उसे अपनी बहन के कमरे से कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी। उसे लगा कि शायद कोई चोर घुस आया है। सच्चाई जानने के लिए मोहित दबे पांव पूजा के कमरे की ओर गया।

जैसे ही उसने दरवाजा खोला, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी सगी बहन पूजा अपने पड़ोसी जितेंद्र के साथ /आपत्तिजनक/ और /अश्लील/ स्थिति में थी। मोहित का खून खौल उठा। उसने आव देखा न ताव और जितेंद्र पर हमला कर दिया। दोनों के बीच जमकर /हाथापाई/ शुरू हो गई।

शोर सुनकर पूजा का १० साल का बेटा रितिक भी जाग गया और वह दरवाजे की ओट से यह सब /खौफनाक/ मंजर देखने लगा।

अध्याय ४: बहन का /क्रूर/ फैसला और /हत्या/

मोहित चिल्लाकर कह रहा था कि वह यह सब जीजाजी (दिलीप) और पूरे परिवार को बता देगा। पूजा को लगा कि अगर यह बात बाहर निकली, तो उसकी बदनामी होगी और उसका घर उजड़ जाएगा। अपने /पाप/ को छुपाने के लिए वह इतनी /पत्थरदिल/ हो गई कि उसने जितेंद्र को इशारा किया— “इसे खत्म कर दो, ना रहेगा बांस, ना बाजेगी बांसुरी।”

जितेंद्र के पास हमेशा एक अवैध तमंचा रहता था। पूजा का इशारा पाते ही उसने तमंचा निकाला और मोहित के सिर में गोली मार दी। गोली मोहित के सिर को चीरती हुई दीवार में जा धंसी। मोहित एक झटके में फर्श पर गिर पड़ा और मौके पर ही उसकी /मौत/ हो गई।

अध्याय ५: मासूम चश्मदीद और लाश को /ठिकाने/ लगाना

१० साल का रितिक यह सब देखकर थर-थर कांप रहा था। पूजा ने अपने ही बेटे की आंखों में आंखें डालकर उसे /धमकाया/— “अगर किसी को कुछ बताया, तो तुझे भी मार डालूंगी।” डर के मारे मासूम बच्चा चुप हो गया।

अब चुनौती थी लाश को गायब करने की। जितेंद्र ने अपने भाई जूली को बुलाया। उन दोनों ने मोहित की लाश को उसी की मोटरसाइकिल पर लादा और गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर एक नहर किनारे झाड़ियों में फेंक दिया। अपनी तसल्ली के लिए जितेंद्र ने वहां भी मोहित पर एक और गोली चलाई। वापस आकर उन्होंने घर के फर्श और दीवार पर लगे खून के धब्बों को पानी से धोकर साफ कर दिया।

अध्याय ६: /झूठे/ आंसू और पुलिस का खेल

अगली सुबह पूजा ने नाटक शुरू कर दिया। जब मायके वालों ने फोन किया, तो उसने कहा— “मोहित तो सुबह ५ बजे ही निकल गया था।” जब मोहित घर नहीं पहुँचा, तो परिवार परेशान हो गया। पूजा खुद को बेगुनाह दिखाने के लिए अपने प्रेमी जितेंद्र के साथ ही थाने पहुँच गई और भाई की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने लगी।

लेकिन कुदरत का न्याय कुछ और ही था। मोहित के माता-पिता जब पूजा के घर पहुँचे और रितिक से अकेले में पूछा, तो बच्चे का बांध टूट गया। उसने रोते हुए नाना-नानी को बताया— “मम्मी और जितेंद्र अंकल ने रात में मामा को गोली मार दी।”

अध्याय ७: गिरफ्तारी और /पश्चाताप/

मोहित के पिता ने तुरंत थाने फोन किया। पुलिस ने पूजा और जितेंद्र को वहीं दबोच लिया। जब पुलिस ने घर की तलाशी ली, तो फर्श की दरारों में अभी भी खून के अवशेष मौजूद थे। कड़ाई से पूछताछ करने पर पूजा टूट गई और उसने अपना /गुनाह/ कबूल कर लिया।

पुलिस ने झाड़ियों से मोहित का शव बरामद किया। वह भाई, जो कुछ दिन पहले ही यूपी पुलिस की परीक्षा देकर आया था और पुलिस अफसर बनने का सपना देख रहा था, आज अपनी ही बहन की /हवस/ की भेंट चढ़ गया था।

निष्कर्ष: समाज के लिए एक /कलंक/

जब दिलीप पुणे से वापस आया, तो उसे अपनी पत्नी के /चरित्र/ पर यकीन नहीं हुआ। उसने पूजा से मिलने तक से मना कर दिया। आज पूजा और जितेंद्र जेल की सलाखों के पीछे हैं, लेकिन पीछे छूट गए हैं तीन अनाथ जैसे बच्चे और एक बूढ़ा बाप, जो अपनी ही बेटी के लिए /मौत/ की सजा मांग रहा है।

यह कहानी हमें चेतावनी देती है कि /अनैतिक/ इच्छाएं और /पाप/ को छुपाने की कोशिश इंसान को /हैवान/ बना देती है।

समाप्त