मौ*त से लड़ रही थी हॉस्पिटल मे पत्नी डॉक्टर निकला उसका तलाकशुदा पति फिर जो हुआ

शीर्षक: इंसानियत की जीत – एक डॉक्टर, एक टूटा रिश्ता और मौत से लड़ती उम्मीद

प्रस्तावना

कान्हापुर शहर के आस्था केयर सेंटर में एक रात ऐसी आई, जिसने न केवल एक डॉक्टर की पेशेवर मजबूती बल्कि उसकी इंसानियत, उसके टूटे दिल और उसके बीते रिश्ते की गहराई को भी परख लिया। यह कहानी डॉक्टर आरव मेहरा और उनकी तलाकशुदा पत्नी नेहा शर्मा की है – एक ऐसी मुलाकात, जो मौत की दहलीज पर इंसानियत की सबसे बड़ी परीक्षा बन गई।

अस्पताल का वह रात

आस्था केयर सेंटर की इमरजेंसी में हलचल थी। एक मरीज स्ट्रेचर पर लहूलुहान पड़ी थी। सिर से खून बह रहा था, सांसें कमजोर थीं। स्टाफ भागदौड़ कर रहा था, लेकिन सबकी नजर डॉक्टर आरव की ओर थी। तभी दो आदमी दौड़ते हुए उनके केबिन में आए – “डॉक्टर साहब, जल्दी देख लीजिए, मरीज मर जाएगी।”

आरव ने फाइल बंद की, बिना एक शब्द बोले उठे और इमरजेंसी की ओर चले। स्ट्रेचर पर पड़ी मरीज का चेहरा देखते ही उनके कदम ठिठक गए। वह कोई और नहीं, उनकी तलाकशुदा पत्नी नेहा शर्मा थी – वही नेहा, जिसने कभी उन्हें तड़पाया था, गालियां दी थीं, उनके गर्भ में पल रहे बच्चे को छीन लिया था। आज वही मौत से जूझ रही थी।

पेशेवर धर्म और दिल की जंग

आरव की आंखें नम थीं, कंधे कांप रहे थे। लेकिन अगले ही पल उन्होंने खुद को संभाला – “ऑक्सीजन लगाओ, खून का ग्रुप मैच करो, एक कतरा खून और नहीं बहना चाहिए। इस मरीज को बचाना है।” पूरे स्टाफ ने समझ लिया कि मामला सिर्फ पेशेवर नहीं, कुछ और भी है।

आईसीयू तैयार हुआ, इंजेक्शन, दवाइयां, मशीनें – सब कुछ एक पल में जुट गया। आरव बस एकटक नेहा को देख रहे थे – वही चेहरा, जिसने कभी उनकी जिंदगी बदल दी थी। लेकिन आज वह सिर्फ डॉक्टर थे, जिन्हें जान बचानी थी।

बीते रिश्ते की परछाई

नेहा दो दिन तक बेहोश रही। आईसीयू की ठंडी दीवारों के बीच आरव हर घंटे आते, रिपोर्ट्स देखते, लेकिन चुप रहते। उनकी आंखों में दर्द था, मगर शब्द नहीं। तीसरी सुबह नेहा की आंखें खुलीं। धुंधली रोशनी में सबसे पहले उसकी नजर आरव पर पड़ी – “आरव, तुम?”

आरव शांत थे – “तुम्हें होश आ गया, यही काफी है।”
“मैं… मैं यहां कैसे?”
“सड़क हादसा हुआ था। दो लोग तुम्हें लेकर आए थे। सिर से खून बह रहा था, हाथ टूटा था। वक्त पर लाए गए, इसलिए बच गई।”

नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे – “मुझे माफ कर दो आरव। मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। उस वक्त मैं अंधी थी, टूट चुकी थी। लेकिन जो जहर मैंने तुम्हारे साथ किया, वह किसी इंसान के साथ नहीं होना चाहिए था।”

दर्द की स्वीकारोक्ति

आरव पास आए, कुर्सी खींचकर बैठे – “जानती हो नेहा, जब कोई आदमी किसी रिश्ते से बाहर आता है, लोग पूछते हैं – क्या हुआ, किसने छोड़ा? लेकिन कोई नहीं पूछता – कितना टूटा। मैंने तुम्हारे साथ रिश्ता नहीं तोड़ा था, बस उस दर्द से खुद को अलग किया था। तुम्हारी शराब, चीखें, और फिर वो रात जब तुमने मेरे पेट पर लात मारी थी… मेरा बच्चा, जिसे मैंने सपने में झूला झुलाया था, उसे तुमने मुझसे छीन लिया।”

नेहा फूट-फूट कर रो पड़ी – “मुझे कुछ समझ नहीं आया था। नशे ने मुझे अंधा कर दिया था। लेकिन जब जिंदगी मेरी सांसों से फिसल रही थी, एक ही चेहरा था जो मौत से लड़ रहा था – और वह तुम थे।”

आरव की आंखें नम थीं – “मैं डॉक्टर हूं नेहा, तुम्हारा इलाज मेरी जिम्मेदारी थी। लेकिन तुम्हारे दिए जख्मों का इलाज आज भी अधूरा है।”

माफी और बदलाव की शुरुआत

नेहा ने कांपते हाथों से आरव की मांग की ओर देखा – “तुमने फिर से शादी की?”
आरव मुस्कुराए – “नहीं। जब एक ने साथ नहीं दिया, दूसरा क्यों देगा? सिंदूर अब भी वही है, जो तुमने कभी मिटाया था। लेकिन उसका रंग अब मेरी पहचान नहीं, मेरी चेतावनी बन चुका है।”

नेहा बोली – “मैं बदल चुकी हूं। अगर मौका मिले तो खुद को साबित करना चाहती हूं। तुम्हारा विश्वास जीतना चाहती हूं। चाहती हूं कि तुम फिर से मेरी जिंदगी में वापस आओ। अगर नहीं भी आओ, तो बस एक बार माफ कर दो ताकि मैं सुकून से मर सकूं।”

आरव ने गहरी सांस ली – “तुम अभी नहीं मर रही नेहा, और मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा। लेकिन माफ करना, यह शब्द इतना छोटा है कि मेरे दर्द को छू भी नहीं सकता। अब 15 दिन इस अस्पताल में रहो, ठीक हो जाओ, फिर सोचो कैसे जीना है। मरना तो बहुत आसान है नेहा, लेकिन जिंदा होकर सुधरना – यही असली माफी है।”

अस्पताल में उम्मीद की लौ

अब नेहा की आंखों में उम्मीद की हल्की लौ थी। आरव रोज उसके कमरे में आते, रिपोर्ट्स देखते, दवाइयां चेक करते। लेकिन अब वह सिर्फ डॉक्टर की तरह नहीं, बल्कि एक पुरानी पहचान को निभाने की कोशिश कर रहे थे।

नेहा, जो कभी घमंडी और नशे में डूबी थी, अब हर सुबह भगवान को देखती, दोनों हाथ जोड़कर नर्सों को धन्यवाद कहती – “धन्यवाद दीदी, आपने रात में दवा दी। माफ कीजिएगा, आपको बार-बार उठाना पड़ा।” स्टाफ हैरान था – वही नेहा, जो कभी अपने पति को जलील करती थी, आज सबको शुक्रिया कहना सीख गई थी।

आरव के लिए यह देखना आसान नहीं था। कभी-कभी वह आईसीयू के बाहर से चुपचाप उसे देखता – कैसे वह किताबें पढ़ती, गरीब वार्ड बॉय की मदद करती, दीवार की ओर मुंह करके चुपचाप रोती।

दिल और दिमाग की जंग

आरव के अंदर एक जंग चल रही थी – क्या सच में कोई आदमी या औरत बदल सकता है? यही सवाल हर रात उसकी नींद में दस्तक देता। एक शाम, जब अस्पताल की लाइट्स धीमी थीं, नेहा ने आरव को अकेले देखा। वह लंगड़ाते हुए उसके पास पहुंची – “आरव, एक बात पूछूं?”

“अगर वक्त पीछे ले जा सकते, तो क्या तुम मुझे फिर से चुनते?”
आरव चुप हो गए, कुछ देर सोचा – “अगर वक्त पीछे जाता तो शायद मैं तुम्हें बदलने की कोशिश ही नहीं करता। बस खुद को बचा लेता।”

नेहा मुस्कुरा दी, लेकिन मुस्कान अंदर से टूटी थी – “तुम सही कहते हो। बदलना तुम्हारा काम नहीं था, मेरा था। पर अब अगर मैं खुद बदलना चाहूं, तो क्या कोई उम्मीद है?”

आरव की आंखें भर आईं – “उम्मीद हमेशा होती है नेहा। लेकिन भरोसा एक बार टूट जाए तो उसकी मरम्मत आसान नहीं होती। तुम्हारे किए गए गुनाहों की माफी सिर्फ शब्दों से नहीं मिलेगी। तुम्हें हर रोज बदल कर दिखाना होगा, खुद से लड़ना होगा, और मुझे भी अपनी उस आरव को वापस लाना होगा जो तुमने कभी तोड़ दिया था।”

नई शुरुआत का संकल्प

नेहा ने सिर झुकाया – “मैं तैयार हूं। अगर तुम कहो तो तुम्हारे अस्पताल के पास किराए पर कमरा ले लूंगी, नौकरी कर लूंगी, और हर रोज खुद को तुम्हारे सामने साबित करूंगी।”

आरव बोले – “ठीक है नेहा, 15 दिन और रहो यहां, फिर बात करेंगे। लेकिन याद रखना, मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर नहीं जाऊंगा। अगर साथ रहना चाहती हो तो मेरी दुनिया में आओ, क्योंकि मैंने इसे खून और आंसुओं से सींचा है और अब मैं इसे फिर किसी के भरोसे नहीं छोड़ सकता।”

स्वास्थ्य, आत्मा और आत्मसम्मान की यात्रा

15 दिन बीत चुके थे। नेहा अब लगभग ठीक थी। शरीर के घाव भर गए थे, लेकिन आत्मा की टूटन को भरने में वक्त लगने वाला था। अस्पताल की आखिरी सुबह, नेहा डिस्चार्ज पेपर्स हाथ में लिए गैलरी में खड़ी थी। कंधे पर छोटा सा बैग, आंखें उसी दरवाजे की ओर – जहां से हर सुबह डॉक्टर आरव आते थे।

आरव आए, नेहा ने हाथ जोड़कर कहा – “आपने मेरी जान बचाई, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि आपने मुझे मेरी गलती से पहचान करवाया। अब मैं हर दिन एक बेहतर इंसान बनने की कोशिश करूंगी। बस एक गुजारिश है – कभी-कभी देखने आ जाया करूं?”

आरव बोले – “यह शहर सिर्फ तुम्हारी यादों से नहीं, मेरी मेहनत और पहचान से भी जुड़ा है। तुम यहां रह सकती हो, लेकिन शर्तों पर। पहली – शराब को हाथ नहीं लगाओगी। दूसरी – अपनी जिंदगी खुद संभालोगी। तीसरी – जो रिश्ता तुमने तोड़ा था, अगर फिर से जोड़ना चाहती हो तो हर दिन खुद को साबित करना होगा।”

नेहा भावुक होकर बोली – “मैं तुम्हारे घर नहीं लौटूंगी, लेकिन अगर तुम चाहो तो एक किराए के छोटे से कमरे में तुम्हारे अस्पताल के पास रहूंगी, रोज उस दरवाजे से झांका करूंगी, जहां एक दिन तुम मुझे फिर से बुला सको।”

आरव की आंखें भर आईं, लेकिन खुद को संभाला – “ठीक है, आज से तुम्हारा इम्तिहान शुरू। लेकिन याद रखना, मैं अब वो आरव नहीं हूं जो दिल से हार जाता था। अब मैं सिर ऊंचा करके जिंदगी से लड़ता हूं।”

नेहा का नया जीवन

कुछ हफ्ते बीते। नेहा अब अस्पताल के पास ही एक दवा दुकान में काम करने लगी थी। रोज सुबह जल्दी उठती, योग करती, मंदिर जाती, पूरी ईमानदारी से ड्यूटी निभाती। दिन में कई बार अस्पताल के बाहर से गुजरती, लेकिन कभी अंदर नहीं जाती – बस एक उम्मीद लिए।

एक शाम, बारिश हो रही थी। आरव अपने केबिन में अकेला बैठा था, हाथ में वही पुरानी तस्वीर – शादी के दिन की। कुछ देर बाद उसने नेहा को कॉल किया – “कल सुबह 9 बजे अस्पताल आ जाना। बात करनी है।”

दूसरा मौका

नेहा अस्पताल पहुंची। आरव ने ऑफिस में बुलाया। कमरे में सन्नाटा था, एक अलग भावुकता। आरव बोले – “बहुत सोचा नेहा, क्या कोई रिश्ता दोबारा जिया जा सकता है? क्या किसी को एक और मौका देना कमजोरी है या हिम्मत? और फिर मैंने सोचा, क्या मैं अब भी उस इंसान को जानता हूं जो मेरे सामने खड़ी है? और जवाब मिला – नहीं। वो नेहा जो मुझे छोड़ गई थी, वह मर चुकी है। और जो अब है, वह शायद वही है जो मुझे मिलना चाहिए था।”

“अगर तुम अभी यही चाहती हो तो एक शर्त पर – तुम मेरे साथ रह सकती हो, लेकिन मेरे घर में मेरी शर्तों पर। मैं तुम्हारे साथ चलूंगा, तुम्हारे पीछे नहीं, तुम्हारे बराबर बनकर – तुम्हारी परछाई बनकर नहीं।”

नेहा ने बिना देर किए हाथ जोड़े, आंखों से आंसू बहते हुए बोली – “मैं सिर्फ तुम्हारा साथ चाहती हूं, तुम्हारी बराबरी बनकर – ना बोझ, ना मालकिन।”

दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा। उस खामोशी में हजारों शब्दों से ज्यादा ताकत थी। अगले ही पल दोनों के हाथ जुड़ गए – एक टूटा रिश्ता फिर जुड़ गया, लेकिन अब प्यार से नहीं, समझ से; दर्द से नहीं, इज्जत से।

समाज के सामने स्वीकारोक्ति

अब नेहा के पास सुकून था, गर्व था कि वह बदल चुकी है। एक दिन आरव बोले – “नेहा, अब अपने रिश्ते को सबके सामने स्वीकार करें। बहुत छुपा लिया। अब समाज को भी दिखा दें कि अगर इंसान सुधर जाए तो उसे फिर से सम्मान मिल सकता है।”

नेहा झिझकी – “क्या लोग मानेंगे? क्या समाज हमें समझेगा?”
आरव मुस्कुराए – “अगर दुनिया गलतियों को सजा दे सकती है, तो पश्चाताप को माफ भी कर सकती है। बस शर्त यह है कि तुम खुद को सच्चे दिल से बदल चुकी हो।”

नया अध्याय

अस्पताल के ऑडिटोरियम में एक निशुल्क स्वास्थ्य शिविर रखा गया। स्टेज पर आरव थे, सैकड़ों मरीज, डॉक्टर्स, शहर के लोग जमा थे। आरव ने माइक थामा – “आज मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं। जिस इंसान ने कभी मेरी जिंदगी को तोड़ा था, आज वही मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा सहारा बन चुका है। क्योंकि उसने मुझसे नहीं, खुद से भी माफी मांगी है और हर दिन खुद को बेहतर साबित किया है। मैंने उसे नहीं अपनाया, मैंने एक नए इंसान को चुना है जो उसकी ही परछाई से बना है।”

भीड़ में सन्नाटा था। नेहा को स्टेज पर बुलाया गया। नेहा चुपचाप सिर झुकाकर आई। आरव ने उसके गले में फूलों की माला पहनाई – “यह रिश्ता अब सिर्फ पति-पत्नी का नहीं, इंसानियत और विश्वास का है।”

तालियों की गूंज उठी। आंसुओं के बीच कई चेहरों पर मुस्कान थी, कई जख्मों पर मलहम लग चुका था।

अंत – माफी और हिम्मत की सीख

कहानी खत्म नहीं हुई, बस नया अध्याय शुरू हुआ। आरव अब अस्पताल का प्रमुख डॉक्टर था, नेहा एक मेडिकल सोशल वर्कर – हर मरीज की सेवा को अपना धर्म मान चुकी थी। उनके पास सब कुछ नहीं था, लेकिन जो था वह सच था, संपूर्ण था और सच्चे बदलाव की कहानी था।

रिश्ते कभी पूरी तरह नहीं टूटते। अगर दिल में सच्चा पछतावा हो, इंसान सच में बदलने को तैयार हो, तो वक्त भी एक और मौका देता है। लेकिन माफी मांगना जितना आसान है, माफ करना उससे कहीं ज्यादा बड़ा साहस है।

आपसे सवाल

अगर आपके सामने वह इंसान फिर से आ जाए जिसने आपको सबसे गहरा दर्द दिया था, लेकिन अब सच में बदल चुका हो – क्या आप उसे माफ कर पाएंगे? क्या आप फिर से एक टूटा रिश्ता जोड़ने की हिम्मत दिखा पाएंगे?

कमेंट में जरूर बताइए, क्योंकि हो सकता है आपका जवाब किसी की जिंदगी को बर्बाद होने से बचा दे और एक सबक बन जाए।