यूपी | बुलंदशहर की इस घटना ने पुलिस को भी हैरान कर रख दिया | viral news

बुलंदशहर हत्याकांड: धोखे और प्रतिशोध की खौफनाक दास्तान
दोस्त/ों, एक बात हमेशा याद रखिएगा कि अपराधी चाहे कितने भी शातिर तरीके से अपने काम को अंजाम क्यों न दे दे, लेकिन अगर पुलिस ठान ले, तो गड़े मुर्दे भी खोद निकालती है। आज की यह घटना उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की है, जहाँ पुलिस के सामने एक ऐसा पेचीदा मामला आया जिसे देखकर पहली नजर में यही लगा कि यह शायद कभी नहीं सुलझेगा। लेकिन मात्र 10 दिनों की कड़ी मशक्कत ने अपराधियों के नकाब उतार फेंके।
एक बिना सर वाली ला/श
तारीख थी 15 मार्च, 2026। सुबह का वक्त था। बुलंदशहर के नरसेना थाना क्षेत्र के अंतर्गत घुंघराली फरीद रोड पर गेहूं के खेत में एक महिला की दे/ह बरामद हुई। पुलिस जब मौके पर पहुँची, तो दृश्य देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए। उस महिला का सर धड़ से अलग था और वहां मौजूद नहीं था।
जांच में पता चला कि ह/त्या लगभग 10-12 घंटे पहले की गई थी। महिला की उम्र करीब 35 से 40 साल के बीच लग रही थी। सर न होने के कारण शिनाख्त करना नामुमकिन सा था। पुलिस ने जब शरीर की बारीकी से जांच की, तो उनके हाथ एक सुराग लगा। महिला के हाथ पर दो टैटू बने थे—एक पर ‘बबली’ और दूसरे पर ‘जॉनी सिंह’ लिखा हुआ था।
पुलिस ने सोशल मीडिया का सहारा लिया, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। शाम को पुलिस फिर घटनास्थल पर पहुँची और सर की तलाश शुरू की। करीब 500 मीटर दूर झाड़ियों में महिला का कटा हुआ सर मिल गया। हालांकि, चेहरा काफी बिगड़ चुका था, जिससे पहचान फिर भी नहीं हो पा रही थी। तीन दिनों तक इंतजार करने के बाद, जब कोई वारिस नहीं आया, तो पुलिस ने सम्मानपूर्वक अंतिम संस्का/र कर दिया।
सीसीटीवी और सफलता
पुलिस ने हार नहीं मानी। उन्होंने इलाके के सैकड़ों सीसीटीवी कैमरों को खंगालना शुरू किया। 10वें दिन पुलिस को एक फुटेज मिली जिसमें वह महिला एक बाइक पर तीन युवकों के साथ जाती हुई दिखी। यानी एक ही बाइक पर चार लोग सवार थे। उन युवकों के चेहरे साफ दिख रहे थे।
यहीं से पुलिस को पहला बड़ा सुराग मिला। जांच में पता चला कि उन लड़कों में से एक का नाम विकास वाल्मीकि (26 वर्ष) है, जो सुलैला गांव का रहने वाला था। पुलिस ने उसे हिरासत में लिया, तो उसने अपने छोटे भाई सचिन (23 वर्ष) और अपने साले अमन का नाम उगल दिया। 22 मार्च को इन तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया।
ढाई साल पुराना रिश्ता और धोखे का जाल
पूछताछ में विकास ने जो बताया, उसने पुलिस को भी हैरान कर दिया। यह कहानी ढाई साल पहले दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल से शुरू हुई थी। विकास वहां सफाई कर्मी था और वहीं बबली का पति जॉनी सिंह भी काम करता था। दोनों में दोस्ती थी। अचानक बीमारी से जॉनी की मृ/त्यु हो गई।
जॉनी की मौत के बाद बबली (40 वर्ष) अकेली पड़ गई। उसकी तीन बेटियां थीं (14, 8 और 5 साल)। अपनी बेटियों को उसने अपनी सास के पास भेज दिया और खुद उसी अस्पताल में सफाई का काम करने लगी। यहीं विकास और बबली के बीच अ/वैध संबं/ध शुरू हुए। बबली विकास से 15 साल बड़ी थी, फिर भी दोनों लि/व-इ/न में रहने लगे।
बबली ने विकास पर अपना सब कुछ लुटा दिया। अपनी मेहनत की कमाई और यहां तक कि अपने नाम पर लोन लेकर भी विकास की आर्थिक मदद की। लेकिन समय बदला और विकास के घर वालों ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी।
प्रतिशोध और मुकदमेबाजी
जब बबली को पता चला कि विकास उसे छोड़कर दूसरी लड़की से शादी कर रहा है, तो उसने विरोध किया। विकास ने दलील दी कि उसके घर वाले एक तीन बच्चों की मां और उम्र में बड़ी महिला को कभी नहीं अपनाएंगे। बबली ने हार नहीं मानी और कल्याणपुरी थाने में विकास के खिलाफ मामला दर्ज करा दिया।
पुलिस के दबाव में विकास ने समझौता किया कि वह बबली को साथ रखेगा। लेकिन अंदर ही अंदर वह उससे पी/छा छुड़ाना चाहता था। 12 दिसंबर, 2025 को विकास ने दूसरी शादी कर ली। शादी के बाद वह मुरादनगर शिफ्ट हो गया। बबली भी उसके पीछे-पीछे मुरादनगर पहुँच गई और फिर से साथ रहने का दबाव बनाने लगी।
खौफनाक साजिश
विकास ने अपनी यह परेशानी अपने बड़े भाई अजीत को बताई। अजीत ने उसे सही रास्ता दिखाने के बजाय ह/त्या का मशविरा दिया। उसने कहा— “न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।”
अजीत ने ही ह/त्या के लिए एक धारदार चापड़ (गं/डासा) लाकर दिया। योजना के तहत विकास ने बबली को झांसा दिया कि उसके भाई की शादी की सालगिरह है और वह उसे अपने परिवार से मिलवाने घर ले जाएगा। 14 मार्च की शाम, विकास बबली को लेकर निकला। रास्ते में सचिन और अमन बाइक लेकर तैयार थे।
वे उसे एक सुनसान इलाके में ले गए। वहां उन्होंने साथ बैठकर शरा/ब पी। बबली को अंदेशा हो गया था कि कुछ गलत होने वाला है। उसने अपनी जा/न की भीख मांगी, गिड़गिड़ाई, उनके पैर पकड़े, लेकिन उन दरिंदों के दिल नहीं पसीजे।
विकास ने बबली के हाथ पकड़े, सचिन ने पैर दबाए और अमन ने चापड़ से एक ही वार में बबली की गर्द/न धड़ से अलग कर दी। पहचान छिपाने के लिए सर को दूर फेंक दिया और अगले दिन घर जाकर बड़ी बेशर्मी से सालगिरह का जश्न मनाया।
कानून का शिकंजा
विकास इतना शातिर था कि उसने 17 मार्च को खुद मुरादनगर थाने में बबली की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई ताकि किसी को उस पर शक न हो। लेकिन सीसीटीवी फुटेज ने उसके झूठ का महल ढहा दिया।
पुलिस ने मुख्य साजिशकर्ता अजीत को भी 24 मार्च को गिरफ्तार कर लिया। आज ये चारों आरोपी जे/ल की सलाखों के पीछे हैं। विकास की एक गलती और अजीत के गलत मशविरे ने न सिर्फ विकास का परिवार बर्बाद कर दिया, बल्कि बबली की तीन मासूम बच्चियों को अनाथ बना दिया।
निष्कर्ष: यह घटना हमें सिखाती है कि अपरा/ध का रास्ता हमेशा तबाही की ओर ले जाता है। कानून की नजरों से कोई बच नहीं सकता। उन मासूम बच्चियों का क्या कसूर था, जिनकी मां को उनके ही ‘भरोसे’ ने मौ/त के घाट उतार दिया?
जय हिंद।
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