रात के 11 बजे खाना देने गया था,डिलीवरी बॉय ने वो देख लिया, जो किसी को नहीं दिखा”

अन्नपूर्णा और अधिकार: एक डिलीवरी बॉय की कहानी

अध्याय 1: दिल्ली की रात और अनजाना डर

कहते हैं किस्मत जब करवट लेती है, तो आदमी की पूरी जिंदगी एक ही रात में बदल देती है। यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है। दिल्ली की गर्म हवा उस रात कुछ ज्यादा ही भारी लग रही थी। अप्रैल का महीना था और घड़ी रात के ठीक 11:00 बजा रही थी। कनोट सर्कल की ऊंची इमारतों के बीच रोशनी से नहाया एक अपार्टमेंट खामोशी में डूबा हुआ था। बाहर शहर जाग रहा था, लेकिन उस फ्लैट के भीतर एक अजीब बेचैनी पसरी हुई थी।

उस फ्लैट में रहने वाली महिला का नाम आद्या मल्होत्रा था। उम्र करीब 27 साल। पढ़ी-लिखी, सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में अच्छी नौकरी, ऊंचा पैकेज और बाहर से देखने पर एक परफेक्ट लाइफ। लेकिन उस रात उसकी आंखों में नींद नहीं थी। वह बार-बार मोबाइल उठाती, स्क्रीन देखती, फिर रख देती। उसका दिल तेज धड़क रहा था, जैसे कोई अनहोनी सिर पर मंडरा रही हो।

इसी दौरान शहर के दूसरे कोने में एक पतली सी बाइक पर सवार एक युवक तेजी से सड़कें नाप रहा था। उसका नाम अमित शर्मा था। उम्र 28 साल। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से आया हुआ। चार साल पहले सपनों के साथ दिल्ली आया था, लेकिन सपने रास्ते में ही थक गए। कभी ढाबे में काम किया, कभी गोदाम में, तो कभी रिक्शा चलाया। अब पिछले एक साल से वह फूड डिलीवरी का काम कर रहा था।

उस रात अमित के मोबाइल पर एक ऑर्डर चमका था—लोकेशन कनोट सर्कल, रेस्टोरेंट महंगा, और बिल ₹1500। अमित ने हल्की सी सांस ली; ऐसा आर्डर रोज़ नहीं आता था। उसने खाना लिया, बैग कंधे पर टांगा और फ्लैट की ओर बढ़ गया।

अध्याय 2: एक अजीब मुलाकात

उधर आद्या ने कुछ मिनट पहले ही खाना आर्डर किया था, लेकिन अब उसे खुद याद नहीं था कि उसने ऐसा क्यों किया। उसका दिमाग सुन्न था। घर का सन्नाटा उसे काटने दौड़ रहा था। तभी डोरबेल बजी। “टिन-टिन।”

आद्या झुंझलाकर उठी और दरवाजा खोला। सामने एक साधारण सा लड़का खड़ा था। चेहरे पर थकान, आंखों में ईमानदारी और कपड़ों से मेहनत की गंध। “क्या है?” आद्या की आवाज में चिड़चिड़ापन था।

अमित थोड़ा चौंका, फिर संयम से बोला, “मैडम, आपका खाना।” आद्या पल भर को रुकी, फिर गुस्से में बोली, “नहीं चाहिए, ले जाओ इसे!”

अमित को अजीब लगा। “मैडम, आपने आर्डर किया है। मैं टाइम से पहले आया हूँ। आप कह रही हैं नहीं चाहिए?” आद्या की आवाज और तेज हो गई, “मैंने कहा न ले जाओ! वरना फेंक दूंगी इसे!”

अमित का चेहरा सख्त हो गया। “मैडम, आप नाराज हैं तो गुस्सा मुझ पर निकालिए, लेकिन खाने का अपमान मत कीजिए। अन्न की कदर करनी चाहिए।” बस यही बात थी जिसने आग में घी डाल दिया। “ज्यादा मत सिखाओ!” आद्या तमतमा गई। “तुम्हें थप्पड़ भी मार सकती हूँ।”

अमित ने सिर झुका लिया। “मार लीजिए, लेकिन खाना मत फेंकिए। यह किसी की मेहनत की कमाई है।” कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। गलियारे में सन्नाटा था। अचानक आद्या ने एक गहरी सांस ली और धीमी आवाज में बोली, “ठीक है… अंदर आ जाओ।”

अध्याय 3: सन्नाटे की बातचीत

अमित हिचकिचाता हुआ अंदर गया। फ्लैट साफ-सुथरा था, लेकिन माहौल बहुत भारी था। आद्या ने मेज पर प्लेटें रखीं और कहा, “खाना निकालो।” “मैडम, यह मेरा काम नहीं है,” अमित बोला। आद्या ने एक ठंडी हंसी हंसी। “अभी तो तुम अन्न की बात कर रहे थे। अगर मैं अकेले खाऊंगी तो आधा फेंक दूंगी। तुम भी बैठो, साथ खाओ।”

अमित के लिए यह सब बहुत अजीब था, फिर भी उसने खाना निकाला। दो अजनबी एक ही टेबल पर खामोशी से खाना खाने लगे। लेकिन अमित महसूस कर सकता था कि यह सिर्फ भूख नहीं थी; इस घर में कोई बहुत बड़ा दर्द बैठा था।

खाना लगभग खत्म हो चुका था, लेकिन कमरे में पसरी बेचैनी वैसी ही थी। आद्या बार-बार मोबाइल देख रही थी। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। अमित से रहा नहीं गया। “मैडम, अगर बुरा ना लगे तो पूछूं? आप बहुत परेशान लग रही हैं। कुछ हुआ है क्या?”

आद्या कुछ सेकंड तक मौन रही। फिर वह कुर्सी से टिक कर बैठ गई। “तुम्हें लगता है पढ़ी-लिखी लड़की की जिंदगी आसान होती है?” अमित ने सिर हिलाया। “नहीं मैडम, मुश्किलें सबकी होती हैं।”

अध्याय 4: आद्या का कड़वा सच

आद्या ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की। “सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, शादीशुदा हूँ।” अमित चौका। “सॉरी मैडम, मुझे पता नहीं था।”

“कोई बात नहीं। शादीशुदा होना हमेशा सुरक्षा नहीं देता,” आद्या ने कहा। “मेरी शादी निलय कपूर से हुई थी। कॉलेज के आखिरी साल में रिश्ता तय हुआ। मेरे मां-बाप सरकारी टीचर हैं। उन्हें लगा लड़का एमबीए है, सब ठीक रहेगा। लेकिन शादी के कुछ महीनों बाद असलियत सामने आई।”

आद्या की आवाज भारी हो गई। “निलय खुद को फाइनेंशियल एक्सपर्ट बताता था, लेकिन सच्चाई यह थी कि उस पर 40 लाख का कर्ज था। मेरे पिता ने कार के लिए उसे 20 लाख दिए थे, जो उसने जुए और ट्रेडिंग में उड़ा दिए। जब मैंने पूछा, तो पहले झगड़ा हुआ, फिर मारपीट।”

अमित को गुस्सा आने लगा, लेकिन वह चुप रहा। आद्या आगे बोली, “मैंने कर्ज चुकाया। मैंने सोचा अब वह सुधर जाएगा। लेकिन कुछ लोगों को सुकून से डर लगता है। उसने मेरी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के पैसों पर नजर गड़ा दी। कुछ हफ्ते पहले मुझ पर हमला हुआ, गोली चली… मैं बच गई। आज रात पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया है। असली निशाना मैं ही थी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। आद्या की आंखों से आंसू बह निकले। अमित धीरे से बोला, “मैडम, आप अकेली नहीं हैं।” आद्या ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। उस साधारण से लड़के की आंखों में दया नहीं, बल्कि एक सच्चा सहारा था।

अध्याय 5: एक अजनबी का सहारा

आद्या का रोना रुक नहीं रहा था। बरसों की घुटन उस रात बह रही थी। अमित चुपचाप बैठा रहा। कभी-कभी किसी के लिए बस वहां होना ही सबसे बड़ा सहारा होता है। कुछ देर बाद आद्या ने पानी पिया। “मुझे माफ कर देना अमित, मैंने तुम पर गुस्सा निकाला।” “मैडम, इंसान परेशान हो तो गलत बोल ही देता है। आप बिल्कुल ठीक हैं,” अमित ने कहा।

रात गहरा रही थी। आद्या ने हिचकिचाते हुए पूछा, “अमित… क्या तुम आज यहाँ रुक सकते हो? दूसरे कमरे में? मुझे बहुत डर लग रहा है। मम्मी-पापा सुबह ही पहुँच पाएंगे।” अमित कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “अगर आपको सुरक्षित लगे, तो मैं रुक सकता हूँ।”

उस रात दो अलग कमरों में दो ऐसे लोग सोए जिनकी दुनिया अलग थी, पर दर्द ने उन्हें जोड़ दिया था। सुबह सूरज की पहली किरण के साथ आद्या के माता-पिता पहुँचे। उन्होंने अमित का परिचय जाना और उसका धन्यवाद किया।

पुलिस स्टेशन में कार्यवाही के दौरान अमित साये की तरह आद्या के साथ रहा। वह कुछ कहता नहीं था, बस पास खड़ा रहता था। शाम को जब वह जाने लगा, तो उसने एक कागज पर अपना नंबर लिख कर दिया। “मैडम, कभी बात करने का मन हो तो कॉल कर लेना। अकेले मत रहना।”

अध्याय 6: नई शुरुआत की ओर

निलय की गिरफ्तारी के बाद आद्या की जिंदगी जैसे ठहर गई थी। ऑफिस जाना और वापस आना—एक मशीन जैसी जिंदगी। लेकिन एक नाम उसे बार-बार याद आता—अमित। एक शाम उसने कॉल किया। “हेलो अमित।” “हाँ मैडम, बोलिए। आप ठीक हैं?” वही शांत आवाज।

धीरे-धीरे यह कॉल रोज की आदत बन गई। आद्या को अमित की सादगी अच्छी लगने लगी। वह कोई कॉर्पोरेट बातें नहीं करता था, बस अपने गाँव के किस्से और मेहनत की बातें सुनाता था। एक रविवार को दोनों एक साधारण ढाबे पर मिले। आद्या पहली बार खुलकर हंसी। “तुम्हें कभी शिकायत नहीं होती अमित? अपनी इस जिंदगी से?” आद्या ने पूछा। अमित ने चाय का घूंट लिया और मुस्कुराकर कहा, “मैडम, अगर शिकायत करता रहूँगा तो जियूँगा कब?”

अध्याय 7: दिल की कशमकश

महीने बीतने लगे। अदालत में केस चल रहा था। अमित अब आद्या की जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चुका था। एक शाम इंडिया गेट के पास बैठे हुए आद्या ने अचानक कहा, “अमित… मैं तुम्हारे बारे में सोचने लगी हूँ। शायद… मैं तुमसे प्यार करने लगी हूँ।”

अमित का दिल तेज धड़कने लगा। उसने गंभीर होकर कहा, “आद्या, मैं एक मामूली आदमी हूँ। महीने के 17,000 कमाता हूँ। ना घर है, ना बड़ा नाम। तुम जिस दुनिया से आती हो, मैं वहां फिट नहीं बैठता।” आद्या मुस्कुराई। “समाज ने मुझे क्या दिया अमित? धोखा और मारपीट? तुम मुझे सुरक्षित महसूस कराते हो, और मेरे लिए यही काफी है।”

अमित को डर था कि वह आद्या पर बोझ बन जाएगा, लेकिन आद्या का इरादा पक्का था।

अध्याय 8: समाज की दीवार और जीत

जब आद्या ने अपने माता-पिता को अमित के बारे में बताया, तो वे दंग रह गए। “एक डिलीवरी बॉय?” उसकी माँ ने पूछा। “समाज क्या कहेगा?” आद्या ने शांत होकर जवाब दिया, “समाज ने मेरे पहले पति के समय कुछ नहीं किया था। मुझे बराबरी नहीं, भरोसा चाहिए।”

अमित ने खुद को साबित करने के लिए कड़ी मेहनत शुरू कर दी। उसने अपनी नौकरी के साथ-साथ आगे की पढ़ाई के लिए फॉर्म भरा। एक रात आद्या के पिता ने अमित को बुलाया। अमित ने बिना किसी दिखावे के अपनी स्थिति साफ कर दी। पिता ने उसकी आंखों में ईमानदारी देखी और आखिरकार रिश्ता स्वीकार कर लिया।

शादी का दिन बहुत सादा था। कोई शोर-शराबा नहीं, बस कुछ अपने लोग। आद्या ने महसूस किया कि उसने सिर्फ शादी नहीं की है, बल्कि डर का एक अध्याय हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

उपसंहार

समय बीतता गया। अमित ने एक अच्छी कंपनी में स्थिर नौकरी प्राप्त की। आद्या और अमित की जिंदगी में अब छोटे-छोटे सुख थे—साथ चाय पीना, बालकनी में बातें करना। आद्या ने महसूस किया कि ऊपर वाला जब कुछ छीनता है, तो वह उससे बेहतर देने के लिए ऐसा करता है। उसे प्यार नहीं मिला था, उसे ‘भरोसा’ मिला था।

यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान की पहचान उसके काम या पैसों से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और ईमानदारी से होती है।

समाप्त