रानी बनाकर रखना चाहता था पति खूबसूरत पत्नी को फिर भी वह नौकरानी बनाकर रही|
विश्वासघात का मंडप: जब पति ने खुद करवाई अपनी पत्नी की दूसरी शादी
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के एक छोटे और शांत से गाँव में रहने वाले प्रदीप की कहानी किसी भी आम इंसान की तरह बहुत ही साधारण तरीके से शुरू हुई थी, लेकिन इसका अंत ऐसा हुआ जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। यह कहानी केवल एक विवाह के टूटने की नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस ‘मर्यादा’ की जो रिश्तों को बांधे रखती है और उस ‘धोखे’ की जो सबसे मजबूत नींव को भी पल भर में खोखला कर देता है।
प्रदीप: मिट्टी से महलों तक का संघर्ष
प्रदीप एक बेहद साधारण किसान परिवार का लड़का था। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह बहुत ऊंची पढ़ाई कर सके, लेकिन उसमें कुछ कर दिखाने का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। अपनी बुनियादी पढ़ाई पूरी करने के बाद, उसने राजमिस्त्री का काम सीखना शुरू किया। शुरुआत में वह दूसरों के नीचे काम करता था, लेकिन उसकी समझ और मेहनत ने उसे जल्द ही एक कुशल कारीगर बना दिया।
प्रदीप को घर बनाने के नक्शे और डिजाइन तैयार करने का बड़ा शौक था। धीरे-धीरे उसने अपने गाँव के आसपास छोटे-मोटे मकान बनाने के ठेके लेना शुरू किया। उसकी ईमानदारी और काम की फिनिशिंग इतनी बेहतरीन थी कि लोग दूर-दूर से उसे अपना घर बनाने के लिए बुलाने लगे। थोड़े ही समय में प्रदीप बिजनौर का एक सफल कांट्रेक्टर बन गया और उसे नैनीताल जैसे शहरों में बड़े-बड़े कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स के टेंडर मिलने लगे। प्रदीप अब आर्थिक रूप से काफी समृद्ध हो चुका था और उसने नैनीताल में एक बड़ा घर भी किराये पर ले लिया था ताकि वह अपने काम पर करीब से नजर रख सके।
जब घर में पैसा और शोहरत आई, तो माता-पिता की आँखों में बेटे के सेहरे के सपने सजने लगे। उन्होंने सोचा कि अब बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो गया है, तो उसे एक जीवनसाथी की जरूरत है जो घर की खुशियों को दोगुना कर दे।
संगीता: घर में आई खुशियाँ या आने वाला तूफान?
प्रदीप के लिए संगीता का रिश्ता आया। संगीता न केवल देखने में बेहद खूबसूरत थी, बल्कि वह पढ़े-लिखे परिवार से भी ताल्लुक रखती थी। प्रदीप के माता-पिता उसकी सुंदरता और शालीनता देखकर मोहित हो गए। प्रदीप को भी संगीता पसंद आई और बड़े धूमधाम से दोनों की शादी संपन्न हुई।
शादी के कुछ ही दिनों बाद प्रदीप को अपने अधूरे प्रोजेक्ट्स पूरे करने के लिए वापस नैनीताल जाना पड़ा। शुरुआत में प्रदीप ने सोचा कि संगीता को गाँव में ही रहने दे ताकि वह बुजुर्ग माता-पिता की सेवा कर सके और घर संभाल सके। लेकिन प्रदीप की माँ बहुत प्रगतिशील विचारों की थीं। उन्होंने फोन पर प्रदीप को समझाया, “बेटा, तुम्हारी नई-नई शादी हुई है। संगीता अभी जवान है और उसका मन यहाँ गाँव में अकेले नहीं लगेगा। तू उसे अपने साथ नैनीताल ले जा। वहां वह तेरे लिए खाना भी बना देगी और तुम दोनों साथ समय भी बिता सकोगे। हमारी चिंता मत कर, हम अभी इतने बुजुर्ग नहीं हुए हैं कि अपना ख्याल न रख सकें।”
संगीता ने पहले तो गाँव छोड़ने में हिचकिचाहट दिखाई, लेकिन जब प्रदीप ने बार-बार जोर दिया, तो वह नैनीताल जाने के लिए तैयार हो गई। यहीं से इस कहानी में एक तीसरे और सबसे घातक किरदार की एंट्री होती है— राहुल।
राहुल: अटूट दोस्ती की आड़ में छिपा विश्वासघात
राहुल प्रदीप का बचपन का दोस्त था और दूर के रिश्ते में भी उसका भाई लगता था। प्रदीप राहुल पर अपनी जान से ज्यादा भरोसा करता था। जब प्रदीप के पास काम बढ़ा, तो उसने राहुल को भी अपने साथ काम पर रख लिया और उसे अपनी साइट्स का सुपरवाइजर बना दिया। राहुल अक्सर प्रदीप के घर आता-जाता था और घर के एक सदस्य की तरह ही था।
जिस दिन संगीता को गाँव से नैनीताल आना था, प्रदीप किसी जरूरी मीटिंग में फंसा हुआ था। उसने राहुल से कहा, “भाई, तू मेरा सबसे भरोसेमंद है। तू गाँव चला जा और अपनी भाभी को पूरी हिफाजत के साथ नैनीताल ले आ।” राहुल खुशी-खुशी तैयार हो गया।
बिजनौर से नैनीताल तक के उस ट्रेन सफर के दौरान ही धोखे के बीज बो दिए गए थे। ट्रेन में एक अजनबी महिला ने जब उन्हें साथ बैठे देखा, तो अनजाने में कह दिया, “तुम दोनों की जोड़ी बहुत प्यारी है, बिल्कुल राम-सीता जैसी।” राहुल ने तो मजाक में टाल दिया, लेकिन संगीता ने भी इसका कोई कड़ा विरोध नहीं किया, बल्कि वह धीरे से मुस्कुरा दी। रास्ते में राहुल ने संगीता को कई महंगी साड़ियां और उपहार दिलाए। संगीता को राहुल का यह बेबाक अंदाज और देखभाल करने का तरीका पसंद आने लगा। नैनीताल पहुँचने तक, उनके बीच एक अनकहा आकर्षण पैदा हो चुका था।
एक्सीडेंट और धोखे की पराकाष्ठा
किस्मत का खेल देखिए, कुछ महीनों बाद जब सब कुछ ठीक चल रहा था, प्रदीप का एक भीषण बाइक एक्सीडेंट हो गया। इस हादसे में उसकी एक टांग बुरी तरह फ्रैक्चर हो गई। डॉक्टरों ने उसे सख्त हिदायत दी कि वह कम से कम दो से तीन महीने तक बिस्तर से न हिले। अब प्रदीप असहाय होकर घर के अंदर बिस्तर पर पड़ा रहता था।
प्रदीप का बिस्तर पर होना राहुल और संगीता के लिए एक बड़ी रुकावट बन गया। वे अब पहले की तरह बेखौफ नहीं मिल सकते थे। यहाँ राहुल ने अपनी दोस्ती को पूरी तरह ताक पर रखकर एक घिनौनी साजिश रची। वह प्रदीप के लिए कुछ ऐसी खास दवाइयां और सिरप लेकर आने लगा जिनसे बहुत गहरी नींद आती थी। वह प्रदीप से कहता, “भैया, यह दवा पियो, इससे दर्द कम होगा और आप जल्दी ठीक हो जाओगे।”
जैसे ही प्रदीप को दवा के असर से गहरी नींद आती, संगीता और राहुल घर के दूसरे कमरे में अपनी मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ देते। प्रदीप का अपना घर, जिसे उसने बड़ी मेहनत से बनाया था, अब उसकी पीठ पीछे उसके ही दोस्त और पत्नी के विश्वासघात का गवाह बन रहा था।
वो खौफनाक रात और कैमरे में कैद सच
कहते हैं कि पाप का घड़ा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक न एक दिन उसे भरना ही पड़ता है। एक रात संगीता काम की व्यस्तता या घबराहट में प्रदीप को वो ‘नींद वाली गोली’ देना भूल गई। रात के करीब 12:30 बजे थे। प्रदीप की नींद अचानक दर्द के कारण खुल गई।
उसने महसूस किया कि कमरे में संगीता नहीं है। तभी उसे पड़ोस के कमरे से कुछ फुसफुसाहट और हंसने की आवाजें सुनाई दीं। प्रदीप का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने अपनी बैसाखी उठाई और दीवार का सहारा लेते हुए रेंगते हुए उस कमरे के दरवाजे तक पहुँचा। दरवाजे के छेद से उसने जो देखा, उसने उसकी रूह कंपा दी। उसकी अपनी पत्नी, जिसे वह देवी मानता था, उसके सबसे पक्के दोस्त की बाहों में थी।
प्रदीप का खून खौल उठा, वह चाहता तो अंदर जाकर दोनों की जान ले सकता था या शोर मचा सकता था। लेकिन उसने ठंडे दिमाग से सोचा। उसने अपना स्मार्टफोन निकाला और चुपके से उस पूरे कृत्य का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया। वह जानता था कि बिना सबूत के समाज उसकी बात नहीं मानेगा। वह चुपचाप वापस आया और अपनी आँखों से आंसू पोंछते हुए सोने का नाटक करने लगा।
मंदिर का वो अजीब और ऐतिहासिक नजारा
कुछ हफ़्तों बाद जब प्रदीप बैसाखी के बिना चलने लायक हो गया, तो उसने एक बहुत ही अजीब योजना बनाई। उसने शहर के एक प्रतिष्ठित मंदिर में फूलों का मंडप सजवाया और वहां पंडित जी को भी बुलाया। उसने राहुल से कहा कि आज साइट पर काम बंद रखो और मंदिर पहुँचो, वहां एक बहुत बड़ा शुभ कार्य करना है।
जब संगीता वहां पहुँची, तो उसने भव्य सजावट देखी। उसने हैरानी से पूछा, “प्रदीप, यहाँ किसकी शादी हो रही है? क्या हम अपनी सालगिरह दोबारा मना रहे हैं?”
प्रदीप ने एक ठंडी और गहरी सांस ली और बड़े शांत स्वर में कहा, “नहीं संगीता, आज तुम्हारी और राहुल की शादी हो रही है।”
संगीता और राहुल दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया। संगीता चिल्लाई, “पागल हो गए हो क्या? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ!” तभी प्रदीप ने अपना फोन निकाला और वो वीडियो प्ले कर दिया। राहुल और संगीता के पैरों तले जमीन खिसक गई। पूरा मंदिर परिसर सन्नाटे में डूब गया।
प्रदीप ने राहुल की तरफ मुड़कर कहा, “तूने मेरी दोस्ती का ये सिला दिया? और संगीता, तुझे अगर राहुल ही पसंद था तो मुझसे कह देती। मैं अपनी ही पत्नी का कन्यादान करने की हिम्मत रखता हूँ, लेकिन धोखे की दवा पीना मुझे मंजूर नहीं। अब तुम दोनों एक-दूसरे के साथ खुश रहो।” और प्रदीप ने वहां मौजूद चंद गवाहों के सामने उन दोनों की शादी की रस्म पूरी करवाई।
अंजाम: कर्मों का अंतहीन चक्र
शादी संपन्न होते ही प्रदीप ने अपनी पुरानी जिंदगी के सारे पन्ने फाड़ दिए। उसने वह शहर छोड़ दिया और हमेशा के लिए कहीं दूर चला गया। उसने वह वीडियो संगीता के माता-पिता और राहुल के परिवार को भेज दिया।
संगीता के माता-पिता समाज में हुई इस भारी बदनामी को बर्दाश्त नहीं कर सके। उन्होंने संगीता से सारे रिश्ते तोड़ लिए और उसे जीते जी अपने लिए मरा हुआ घोषित कर दिया।
राहुल के परिवार ने उसे धोखेबाज और कलंक मानकर अपनी पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिया। गाँव में राहुल का चेहरा देखना भी लोगों ने बंद कर दिया।
सालों बाद की कड़वी सच्चाई: आज कई साल बीत चुके हैं। प्रदीप ने अपनी मेहनत से दोबारा एक नया मुकाम हासिल किया है, उसने एक अच्छी लड़की से दूसरी शादी की है और अब वह एक सुखी परिवार का मुखिया है।
लेकिन राहुल और संगीता का जीवन एक अंतहीन नर्क बन चुका है। राहुल, जिसने अपने दोस्त को धोखा दिया था, अब उसे कहीं सम्मानजनक काम नहीं मिलता। वह अपनी नाकामी और जिल्लत को भुलाने के लिए दिन-भर शराब के नशे में डूबा रहता है। नशे की हालत में वह संगीता पर बेरहमी से हाथ उठाता है और उसे कोसता है कि उसकी वजह से उसकी जिंदगी बर्बाद हो गई। संगीता, जो कभी रेशमी साड़ियां पहनती थी और लग्जरी लाइफ जीती थी, आज फटे-पुराने कपड़ों में दूसरों के घरों में जूठे बर्तन साफ करने और झाड़ू-पोछा करने पर मजबूर है।
कहानी की सीख
यह मार्मिक कहानी हमें यह बड़ा सबक सिखाती है कि ‘विश्वास’ कांच के उस बर्तन की तरह है, जो एक बार चटक जाए तो उसमें दिखने वाली तस्वीर हमेशा के लिए धुंधली हो जाती है। स्वार्थ और वासना के लिए किया गया विश्वासघात अंततः इंसान को उसी दलदल में धकेल देता है, जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। कर्मों का हिसाब इसी जन्म में होता है।
नोट: यह कहानी समाज में नैतिक मूल्यों के पतन के प्रति सचेत करने और रिश्तों की गरिमा बनाए रखने के उद्देश्य से लिखी गई है।
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