रहस्यमयी वीराना: शाप और प्रेम की परीक्षा

अध्याय 1: वीराने की दस्तक

रेगिस्तान की तपती रेत अब ठंडी पड़ने लगी थी। सूरज क्षितिज के पार जा चुका था और दूर-दूर तक केवल धूल और सन्नाटा था। इस वीराने के बीचों-बीच एक छोटा सा, पुराना पत्थर का घर बना हुआ था। उस घर के बाहर एक बूढ़ा आदमी बैठा हुआ था, जिसकी आँखें गहरी और चेहरे पर झुर्रियों का जाल था। वह सालों से यहाँ अकेला रह रहा था।

अचानक, सन्नाटे को चीरती हुई कदमों की आहट सुनाई दी। बूढ़ा चौंका। उसने मन ही मन सोचा, “इस वक्त मेरे घर पर कौन हो सकता है? यहाँ इस वीराने में तो आज तक कोई नहीं आया।”

धूल के गुबार से एक साया उभरकर सामने आया। वह एक अत्यंत सुंदर युवती थी, जिसके चेहरे पर थकान और घबराहट साफ दिख रही थी।

बूढ़े ने अपनी कर्कश आवाज में पूछा, “तुम कौन हो? और इस वक्त इस वीराने में क्या कर रही हो?”

युवती ने अपनी ओढ़नी संभालते हुए जवाब दिया, “मैं अजमेर जा रही थी मगर रास्ता भूल गई। अंधेरा होने वाला है और मुझे डर लग रहा है। क्या मुझे आपके घर में एक रात रहने की अनुमति मिलेगी? सुबह होते ही मैं यहाँ से चली जाऊंगी।”

बूढ़े की आँखों में एक अजीब सी चमक आई। उसने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर धीमे स्वर में कहा, “अंदर आ जाओ।”

अध्याय 2: पहली रात और वासना का जाल

अंदर एक पुरानी चारपाई बिछी थी। बूढ़े ने इशारा करते हुए कहा, “यहीं सो जाओ।”

युवती थककर चूर थी, वह चुपचाप लेट गई। लेकिन बूढ़े की नींद उड़ चुकी थी। वह अंधेरे कोने में बैठकर उसे निहार रहा था। उसने अपने मन में कहा, “मैंने आज तक इतनी खूबसूरत महिला नहीं देखी। जब तक इसे देखा, तब तक मैं बूढ़ा हो चुका था। खैर, अब पास जाकर असली आनंद लेता हूँ।”

वह दबे पाँव युवती की ओर बढ़ा। उसकी खूबसूरती उसे मदहोश कर रही थी। “इतनी हसीन और खूबसूरत… वाह, मज़ा आ जाएगा,” उसने फुसफुसाते हुए कहा।

जैसे ही उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, युवती अचानक जाग गई। वह हड़बड़ाकर पीछे हटी और चिल्लाई, “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

बूढ़ा घबरा गया, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला और झूठ बोला, “कुछ नहीं, मुझे लगा तुम्हें ठंड लग रही होगी। मैं तो बस चादर देने आया था।”

युवती ने शक भरी निगाहों से उसे देखा और कड़े शब्दों में कहा, “अब जाओ यहाँ से।”

वह पूरी रात सो नहीं सकी। वह बस यही दुआ मांग रही थी कि आज की रात जल्दी से कट जाए और सुबह होते ही वह यहाँ से निकल जाए। दूसरी ओर, बूढ़ा हार मानने को तैयार नहीं था। वह सोच रहा था, “आज की रात ऐसे ही चली जाएगी… सुबह मुझे कुछ न कुछ तो करना ही होगा।”

अध्याय 3: काफिले का बहाना

सुबह की पहली किरण के साथ युवती तैयार हो गई। उसने बूढ़े से कहा, “आपके घर में रात रुकने देने के लिए आपका धन्यवाद। अब मैं चलती हूँ।”

लेकिन बूढ़े ने उसे रोकने का नया पैंतरा चला। उसने कहा, “कहाँ जाओगी? तुम जवान लड़की हो। अजमेर तो यहाँ से बहुत दूर है। आज की रात रुक जाओ। बस एक रात की बात है।”

युवती चौंक गई। “क्या मतलब है तुम्हारा? मैं क्यों नहीं जा सकती आज?”

बूढ़े ने गंभीर होकर कहा, “तुम जवान लड़की हो, तुम्हारा अकेले जाना ठीक नहीं। मुझे खबर मिली है कि कल एक काफिला यहाँ से गुजरेगा और अजमेर की तरफ जाएगा। उसके साथ चली जाना, तुम सुरक्षित रहोगी।”

युवती को उसकी बात में तर्क लगा। उसने सोचा कि अकेले भटकने से बेहतर है कि वह सुरक्षा के साथ जाए। “ठीक है, कल काफिले के साथ चली जाऊंगी। आज की रात यहीं रह लेती हूँ,” उसने मान लिया।

बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा, “आओ, खाना खा लेते हैं।”

अध्याय 4: बढ़ती नजदीकियां और विरोध

दिन भर बूढ़ा युवती के करीब आने के बहाने ढूंढता रहा। शाम को जब वे बैठे थे, तो बूढ़ा बोला, “तुम इतनी दूर क्यों बैठी हो? मेरे बिल्कुल पास बैठो। मुझे भी अच्छा लगेगा।” वह जोर से हँसा।

फिर उसने अपनी सीमा लांघते हुए कहा, “यार, तुम कितनी खूबसूरत हो! काश तुम मेरी पत्नी होती तो…”

युवती ने उसे झिड़कते हुए कहा, “मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूँ, समझे? अपनी उम्र का लिहाज करो।”

बूढ़ा नहीं माना। “पत्नी नहीं हो तो क्या हुआ? कम से कम पास तो बैठ सकती हो। मैं भी इस रेगिस्तान में अकेला रहकर थक गया हूँ। आओ, पास बैठो।” उसने उसे छूने की कोशिश की।

युवती ने उसका हाथ झटक दिया। “मुझे इतना मत छुओ! मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूँ। छोड़ो मुझे!”

बूढ़े ने हाथ पीछे खींच लिया और बोला, “लो, ये छोड़ दिया।” लेकिन उसके दिमाग में शैतानी विचार चल रहे थे। उसने कहा, “रात हो गई है, चलो सोने चलते हैं। तुम मेरे साथ सो जाना।”

युवती का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। “तुम्हें शर्म नहीं आती साथ सोने का कहते हुए? मैं तुम्हारे साथ नहीं सोऊंगी, अलग सोऊंगी।”

अध्याय 5: तीसरी रात की कशमकश

युवती को अब डर लगने लगा था। वह सोच रही थी, “बस आज की रात कट जाए, सुबह होते ही काफिले के साथ निकल जाऊंगी।”

रात के सन्नाटे में बूढ़ा फिर उसकी तरफ बढ़ा। वह सोच रहा था, “आज की रात इसे ऐसे ही नहीं जाने दूँगा। कुछ न कुछ तो करना ही होगा।”

जैसे ही वह उसके बिस्तर के पास पहुँचा, युवती फिर से जाग गई। “तुम फिर वही कर रहे हो?” वह चिल्लाई।

बूढ़ा बड़बड़ाया, “साली जाग गई! सारा काम बिगड़ गया।” वह समझ गया कि अब जबरदस्ती करना ठीक नहीं। उसने सोचा कि सुबह उसे किसी और तरीके से मनाना होगा।

सुबह होते ही युवती ने सामान उठाया और पूछा, “काफिला आया है क्या? अब मुझे जाने की इजाजत दो।”

बूढ़े ने फिर झूठ बोला, “काफिला तो अभी तक नहीं आया। शायद शाम तक आए।”

युवती अब जिद पर अड़ गई। “मैं अब और नहीं रुक सकती! तुम्हारी निगाहें मुझे ठीक नहीं लगतीं। मैं एक जवान लड़की हूँ और तुम…”

बूढ़े ने उसे डराते हुए कहा, “बाहर जानवर घूमते हैं, लुटेरे होते हैं। अगर कुछ हो गया तो?” डर के मारे युवती एक रात और रुकने को तैयार हो गई, लेकिन उसने साफ कह दिया कि यह उसकी आखिरी रात है।

अध्याय 6: रहस्य का खुलासा

अगली सुबह जब फिर से वही बहाना बनाया गया, तो युवती का सब्र टूट गया। “मुझे सब समझ आ चुका है! तुम मुझे किसी और मकसद के लिए रोक रहे हो। अब मैं एक पल यहाँ नहीं रुकूँगी!”

जब वह जाने लगी, तो बूढ़े ने उसका रास्ता रोका। युवती चिल्लाई, “हट जाओ, वरना मैं चीखूँगी!”

बूढ़ा हँसा, “यहाँ तुम्हारी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है।”

युवती ने रोते हुए कहा, “तुम क्या चाहते हो? तुम मेरे बाप की उम्र के हो, कुछ तो शर्म करो!”

तब बूढ़े ने एक ऐसी बात कही जिसने युवती के कदम रोक दिए। उसने कहा, “तुम जिस शख्स की तलाश में अजमेर जा रही हो, क्या पता वह यहीं कहीं हो।”

युवती ठिठक गई। “तुम्हें कैसे पता कि मैं किसी को ढूंढ रही हूँ?”

बूढ़े ने गंभीरता से कहा, “तुम अपने शौहर (पति) को तलाशने निकली हो, है ना? वह काफी समय से लापता है। अगर तुम आज की रात रुक जाओ, तो कल सुबह तुम्हें तुम्हारे सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे। शायद तुम्हें अजमेर जाने की ज़रूरत भी न पड़े।”

युवती दुविधा में पड़ गई। क्या यह बूढ़ा सच कह रहा है या यह फिर से कोई नई चाल है? लेकिन अपने पति की चाहत में उसने एक आखिरी रात रुकने का फैसला किया।

अध्याय 7: शाप का अंत और सत्य

रात बीती और सुबह हुई। युवती अपनी पोटली लेकर बाहर निकली। जैसे ही वह आंगन में पहुँची, उसकी आँखों के सामने एक चमत्कार हुआ। जहाँ वह बूढ़ा खड़ा था, वहाँ अब एक जवान और सुंदर पुरुष खड़ा था।

युवती की आँखों से आँसू बहने लगे। “मेरे शौहर! तुम यहाँ कैसे? क्या मैं कोई ख्वाब देख रही हूँ?”

उस पुरुष ने उसे गले लगा लिया और कहा, “नहीं, यह हकीकत है। मैं वापस आ गया हूँ।”

युवती ने चकित होकर पूछा, “लेकिन तुम कहाँ थे? और वह बूढ़ा आदमी कहाँ गया? वह तो मुझे बिल्कुल ठीक नहीं लग रहा था।”

उसके पति ने एक लंबी सांस ली और पूरी कहानी सुनाई:

“एक दिन मैं बाज़ार की तरफ निकला था। रास्ते में मुझे एक जादूगर बूढ़ा और एक हसीन लड़की मिली। मैंने अनजाने में उनका मज़ाक उड़ा दिया कि उस जवान लड़की ने उस बूढ़े से शादी क्यों की? उस जादूगर को बुरा लगा। उसने मुझ पर एक मंत्र पढ़कर फूँक मारी और पल भर में मैं उसी बूढ़े की शक्ल का हो गया। उसने मेरी पहचान छीन ली और मुझे इस वीराने में रहने की सजा दी।”

पति ने आगे कहा, “उसने एक शर्त रखी थी। अगर मेरा अपना कोई, जिससे मैं मोहब्बत करता हूँ, मुझे इस वीराने में ढूंढ ले और मेरे साथ कुछ दिन बिताए बिना मेरी असलियत जाने, तो मैं वापस अपनी शक्ल पा सकूँगा। लेकिन शर्त यह थी कि मैं खुद अपनी पहचान नहीं बता सकता था।”

युवती की आँखों में पश्चाताप के आँसू थे। “तो वह बूढ़ा तुम ही थे? मैं तुम्हें पहचान नहीं सकी, मुझे माफ़ कर दो।”

उसके पति ने मुस्कुराते हुए कहा, “इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं। तुम्हारी सच्चाई और प्यार ने ही इस शाप को तोड़ा है। तुमने उन मुश्किल रातों में भी खुद को संभाला और यहाँ रुकी रही, इसीलिए मैं आज फिर से इंसान बन पाया।”

दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और उस पुराने पत्थर के घर को हमेशा के लिए छोड़कर अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत करने निकल पड़े। वह वीराना अब उनके पीछे छूट चुका था, और आगे एक खुशहाल जीवन उनका इंतज़ार कर रहा था।

सीख: सच्चा प्रेम और धैर्य सबसे कठिन परीक्षाओं को भी पार कर सकता है, और कभी-कभी जो हमें बुरा दिखता है, उसके पीछे कोई गहरा राज या मजबूरी छिपी हो सकती है।