लड़का रोजाना स्कूल लेट आता था , और रोजाना टीचर्स की डांट पड़ती ,जब टीचर्स को उसकी सच्चाई पता चली

संघर्ष की सुबह – राजू की कहानी

अध्याय 1: जिम्मेदारी के बोझ तले दबा बचपन

दिल्ली की एक बस्ती, ऊँची इमारतों के पीछे छिपी गरीबी। वहीं, एक छोटी सी झुग्गी में रहता था 12 साल का राजू। उसके साथ उसकी बीमार मां पार्वती और 6 साल की छोटी बहन मुन्नी। पिता कब छोड़कर चले गए, राजू को याद भी नहीं था। पार्वती ने लोगों के घरों में काम करके बच्चों को पाला, लेकिन पिछले छह महीने से वो बिस्तर पर थी – दमे की मरीज़।

अब घर का सारा बोझ राजू के कंधों पर था। उसकी आँखों में सपने थे, लेकिन पेट में भूख थी। किताबों से ज्यादा जिम्मेदारी का बोझ था। उसे मां की दवा लानी थी, बहन को रोटी खिलानी थी, और खुद भी पढ़ना था। राजू सर्वोदय बाल विद्यालय में आठवीं कक्षा का छात्र था। गणित उसका पसंदीदा विषय था। उसका सपना था कि वह एक दिन इंजीनियर बनेगा और मां को पक्का घर देगा।

अध्याय 2: संघर्ष की सुबह

राजू की सुबह, सुबह नहीं बल्कि अंधेरी रात में शुरू होती थी। रोज रात के तीन बजे उसकी पुरानी अलार्म घड़ी बजती। राजू कभी स्नूज़ नहीं करता – उसे पता था, अगर एक मिनट भी लेट हुआ तो मां की दवा के पैसे कम हो जाएंगे।

वह चुपचाप उठता, मां के माथे पर हाथ फेरता, ठंडे पानी से मुंह धोता, अपनी फटी स्वेटर पहनता और बाहर निकल जाता। सड़क पर कुत्ते भी सो रहे होते। राजू अपनी खटारा साइकिल – जो उसके पिता की आखिरी निशानी थी – लेकर अखबार के डिपो पहुंचता। डिपो का मैनेजर शुक्ला सख्त और बदजुबान था। “आ गया रे, आज फिर दो मिनट लेट है! पैसे काट लूंगा तेरे। चल जल्दी कर!”

राजू ठंड में कांपते हाथों से अखबारों में पर्चे डालता। फिर उसकी साइकिल पॉश कॉलोनी की ओर दौड़ पड़ती। बड़े-बड़े घर, बड़ी-बड़ी गाड़ियां। कोठी नंबर 12 का मालिक – एक बड़ा बिजनेसमैन – उसे रोज ताने मारता। “अखबार सुबह 5:30 बजे चाहिए, अगर देर हुई तो गालियां मिलतीं।”

राजू अखबार डालता, मन ही मन गणित के सवाल हल करता। उसके सपने उसकी साइकिल के पहियों से बंधे थे। सुबह सात बजे तक आखिरी अखबार डालता। फिर घर की ओर दौड़ता – मां के तकिए के नीचे पैसे रखता, मुन्नी को बासी रोटी और चाय देता, मां को दवा खिलाता।

पार्वती रोती, “मेरी वजह से तेरी जिंदगी खराब हो रही है।” राजू मुस्कुराता, “मां, चिंता मत कर। मैं इंजीनियर बनूंगा, तुझे कोई काम नहीं करने दूंगा।”

अध्याय 3: स्कूल का संघर्ष

राजू अपनी पैबंद लगी यूनिफॉर्म पहनता, टूटी चप्पल में स्कूल भागता। स्कूल बस्ती से दो किलोमीटर दूर था। सर्वोदय बाल विद्यालय में सुबह आठ बजे राष्ट्रगान के लिए सबको मैदान में होना चाहिए। आठ बजकर एक मिनट पर गेट बंद हो जाता।

राजू रोज पूरी जान लगाकर दौड़ता, लेकिन रोज लेट हो जाता। गेट पर चपरासी राम सिंह घूरता, और सीधे प्रिंसिपल ऑफिस के बाहर खड़ा कर देता।

प्रिंसिपल शर्मा जी सख्त थे। “राजू, तुम फिर लेट। स्कूल को मजाक समझ रखा है?” राजू सिर झुकाए खड़ा रहता। शर्मा जी गरजते, “कल मां को लेकर आना।” राजू धीरे से कहता, “पिताजी नहीं हैं।” शर्मा जी नरम होते, फिर कहते, “मां को लेकर आना।”

राजू अपनी क्लास के बाहर खड़ा हो जाता। क्लास टीचर शांति मैडम – नाम के उलट, बहुत कड़क। उन्हें लगता, राजू जानबूझकर लेट आता है। “तुम्हारी वजह से पूरी क्लास डिस्टर्ब होती है।” पूरी क्लास हंसती। “कल मैंने तुम्हें 100 बार लिखने को कहा था – मैं कभी लेट नहीं आऊंगा। कहां है कॉपी?”

राजू कांपते हाथों से कॉपी निकालता, शांति मैडम फेंक देती। “यह क्या लिखा है? कीड़े-मकोड़े! तुम जैसे लड़के अपने मां-बाप का नाम डुबोते हो। पढ़ाई तुम्हारे बस की बात नहीं। जाओ बाहर मुर्गा बनो।”

राजू बाहर घुटनों के बल बैठकर मुर्गा बन जाता। अंदर शांति मैडम उसका पसंदीदा गणित पढ़ाती। राजू बाहर धूल में उंगली से एक्स और वाई के सवाल हल करता। उसके आंसू धूल में मिलकर कीचड़ बन जाते।

अध्याय 4: रोज की जद्दोजहद

यह रोज का सिलसिला था। रोज की डांट, रोज की सजा, रोज की बेइज्जती। राजू ने बोलना बंद कर दिया था। वह स्कूल आता, सजा पाता, क्लास के आखिरी बेंच पर बैठता, छुट्टी की घंटी बजते ही घर भाग जाता।

घर जाकर मां की देखभाल, मुन्नी को पढ़ाना, रात का जुगाड़। रात को दो घंटे अपनी पढ़ाई करता – शांति मैडम के सारे सवाल खुद से हल करता।

अध्याय 5: एक कड़वी सुबह

सर्दी अपने जोबन पर थी। दिल्ली का कोहरा और ठिठुरन। उस रात राजू तीन बजे उठा, मां की खांसी बहुत बढ़ गई थी। “बेटा, दवाई खत्म हो गई है।” राजू घबरा गया। उसने दवा की दुकान की तरफ साइकिल दौड़ाई। डिपो पहुंचा तो 15 मिनट लेट था। शुक्ला आगबबूला – “तेरी नौकरी गई!”

राजू की आंखों से आंसू टपक पड़े। नौकरी गई तो मां की दवा कहां से आएगी? मुन्नी की रोटी कहां से आएगी? वह रोता हुआ डिपो की तरफ गया, मालिक से गिड़गिड़ाया, लेकिन किस्मत उसका इम्तिहान ले रही थी।

अध्याय 6: सच्चाई का उजागर होना

शांति मैडम उसी कॉलोनी में रहती थी, कोठी नंबर 14 में। वह बालकनी में चाय पी रही थीं। उनकी नजर गली में हो रहे तमाशे पर पड़ी – पड़ोसी कोठी नंबर 12 का मालिक राजू पर चिल्ला रहा था, अखबार उसके मुंह पर फेंक रहा था।

शांति मैडम को बहुत बुरा लगा। उन्होंने सिर्फ एक फटी लाल स्वेटर देखी। वह अंदर चली गईं, सोचती रहीं – दुनिया कितनी जालिम है।

स्कूल पहुंचीं तो नौ बजे थे। प्रिंसिपल ऑफिस के बाहर राजू सिर झुकाए खड़ा था। शांति मैडम गुस्से में उसकी तरफ लपकी। “राजू, तुम्हें शर्म नहीं आती? आज फिर लेट!”

फिर उनकी नजर राजू की स्वेटर पर पड़ी – वही लाल रंग की फटी स्वेटर। उन्हें सुबह का मंजर याद आया। उन्होंने कांपती आवाज में पूछा, “राजू, क्या तुम ग्रीन पार्क कॉलोनी में अखबार बांटते हो?”

राजू का चेहरा सफेद पड़ गया। वह डर के मारे रोने लगा, शांति मैडम के पैरों पर गिर पड़ा। “मैडम, मुझे स्कूल से मत निकालो। मेरी नौकरी चली गई, मां की दवा कैसे लाऊंगा? मेरी मां मर जाएगी।”

शांति मैडम पत्थर की मूरत बन गईं। उनके कानों में राजू के शब्द हथौड़े की तरह बज रहे थे। नौकरी चली गई, मां की दवा…

अध्याय 7: स्कूल का बदलता चेहरा

शांति मैडम ने राजू का हाथ पकड़ा, उसे स्टाफ रूम में ले गईं। सारे टीचर्स, प्रिंसिपल शर्मा जी वहीं थे। शांति मैडम की आवाज गूंजी, “हम सब कातिल हैं। हम गुरु नहीं हैं। हम सब ने मिलकर इस बच्चे का संघर्ष कत्ल किया है।”

फिर उन्होंने सुबह का मंजर बताया, राजू की लाल स्वेटर, सूजे हुए हाथ, रोती आंखें। राजू ने सब बता दिया – तीन बजे का अलार्म, शुक्ला की गालियां, ठंडी साइकिल, कोठी नंबर 12 का मालिक, मां का दमा, छोटी बहन की भूख, स्कूल के गेट तक की दौड़। उसने बताया कि कैसे वह मुर्गा बने हुए भी बाहर से गणित के सवाल हल करता था।

स्टाफ रूम में सन्नाटा था। हर टीचर की आंखों में आंसू थे। प्रिंसिपल शर्मा जी अपना चेहरा हाथों में छिपाकर रो रहे थे। शांति मैडम ने राजू के आंसू पोछे, उसके हाथों को अपनी आंखों से लगाया। “राजू बेटा, अगर हो सके तो अपनी इस नालायक मैडम को माफ कर दे।”

राजू ने शांति मैडम को गले लगा लिया, “मैडम, बस मुझे स्कूल से मत निकालना। मुझे पढ़ना है।”

अध्याय 8: बदलाव की शुरुआत

उस दिन सर्वोदय बाल विद्यालय का इतिहास बदल गया। प्रिंसिपल शर्मा जी ने अपनी गाड़ी निकाली – पहले कोठी नंबर 12 गए, मालिक ने शर्मिंदगी में राजू से लिखित माफी मांगी और छह महीने की एडवांस दिहाड़ी दी। शुक्ला के डिपो पर गए, शुक्ला ने कान पकड़ लिए कि वह कभी किसी बच्चे से बदतमीजी नहीं करेगा।

शांति मैडम राजू को उसकी झुग्गी में ले गईं, पार्वती की हालत देखी। उन्होंने स्कूल की तरफ से अच्छे अस्पताल में भर्ती करवाया। पूरे स्कूल के स्टाफ ने मिलकर ‘राजू फंड’ बनाया। मुन्नी का दाखिला अच्छे प्ले स्कूल में करवाया, जिसकी फीस टीचर्स भरते थे।

अध्याय 9: नई सुबह, नई उम्मीद

अगले दिन राजू सोकर उठा – सुबह सात बजे। मां अस्पताल में थी, लेकिन सुरक्षित थी। उसने मुन्नी को तैयार किया। आज शांति मैडम खुद अपनी कार लेकर राजू की झुग्गी पर उसे लेने आईं। राजू पहली बार स्कूल ऑन टाइम पहुँचा।

स्कूल के गेट से अंदर आया तो पूरा स्कूल, सारे बच्चे, सारे टीचर्स मैदान में खड़े उसके लिए तालियां बजा रहे थे। प्रिंसिपल शर्मा ने माइक पर कहा, “आज मैं आप सबका परिचय इस स्कूल के सबसे बहादुर, सबसे मेहनती और सबसे अनुशासित छात्र से कराना चाहता हूं – राजू।”

राजू जो कल तक नालायक था, आज स्कूल का हीरो बन गया था।

अध्याय 10: जीत की कहानी

शांति मैडम ने उसका हाथ थामा, उसे पहली बेंच पर बिठाया। बोर्ड पर लिखा – अलजेब्रा। “चलो राजू, आज तुम पूरी क्लास को पढ़ाओगे कि जिंदगी के सबसे मुश्किल सवाल हल कैसे किए जाते हैं।”

स्कूल के बच्चों ने राजू को अपना आदर्श मान लिया। उसकी कहानी पूरे स्कूल में फैल गई। बच्चे अब किसी को देखकर ताने नहीं मारते थे, बल्कि उसकी मदद करते थे। टीचर्स ने भी अपनी सोच बदल ली। अब वे हर बच्चे के संघर्ष को समझने की कोशिश करते थे।

राजू ने अपनी मेहनत और संघर्ष से सबको जीत लिया। उसकी मां अस्पताल से ठीक होकर घर लौटी। मुन्नी प्ले स्कूल में पढ़ने लगी। राजू ने पढ़ाई में और मेहनत की, गणित में अव्वल आया। उसकी मेहनत रंग लाई – उसे स्कॉलरशिप मिली।

अध्याय 11: संघर्ष से सफलता तक

राजू ने दसवीं में टॉप किया, फिर बारहवीं में भी अव्वल रहा। उसकी कहानी दिल्ली के अखबारों में छपी। उसे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला। राजू ने मां के लिए एक पक्का घर बनवाया। उसकी मेहनत ने पूरे समाज को बदल दिया।

राजू अब बच्चों को पढ़ाता था, गरीब बच्चों की मदद करता था। उसकी कहानी हर बच्चे के लिए प्रेरणा बन गई।

अध्याय 12: कहानी का संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। हम अक्सर वही देखते हैं जो हमें दिखाया जाता है या जो हम देखना चाहते हैं। राजू की लेट आने की आदत उसके टीचर्स के लिए अनुशासनहीनता थी, लेकिन उसके पीछे का सच एक ऐसा संघर्ष था जिसे जानकर उनकी रूह कांप गई।

किसी भी इंसान, खासकर एक बच्चे के बारे में राय बनाने से पहले उसके जूतों में चलकर देखना जरूरी है। अगर इस मासूम बच्चे के संघर्ष और उन टीचर्स की दरियादिली ने आपके दिल को छुआ है तो इस कहानी को जरूर शेयर करें।