लाचार बुढ़ापा- माँ को निकाला घर से l भावुक कहानी जो हर औलाद को सुननी चाहिए

अंतिम आंसू – एक मां-बाप की पुकार
भूमिका
कहते हैं, माता-पिता को चोट शरीर पर नहीं आत्मा पर लगती है। और ऐसी चोट का कोई इलाज नहीं होता, सिवाय उस क्षण के जब ईश्वर किसी टूटे हुए दिल को फिर से अपने आंचल में भर ले। यह कहानी सिर्फ दो बुजुर्ग माता-पिता की नहीं, बल्कि उन अनगिनत मां-बाप की है जो उम्र ढलने पर अपने ही घर में पराए हो जाते हैं। जो चुपचाप अपमान सहते हैं, बिना शिकायत किए भूखे सो जाते हैं और फिर भी अपने बच्चों के लिए दुआ ही देते हैं। यह सिर्फ कथा नहीं, एक आईना है जिसमें हर वह इंसान अपना चेहरा देख सकता है जो कभी मां-बाप के दिए हुए प्यार को हल्का समझ बैठता है।
पहला भाग: घर की दीवारों के बीच
श्यामलाल जी और सावित्री जी का जीवन कभी खुशियों से भरा था। उनके बेटे आकाश की शादी सरिता से हुई थी। घर में रौनक थी, हर शनिवार आकाश अपने माता-पिता से मिलने आता था। लेकिन समय के साथ सब बदल गया। बहू सरिता के आते ही घर में सन्नाटा पसर गया। श्यामलाल जी की तबीयत बिगड़ने लगी, सावित्री जी की आंखों में चिंता और तिरस्कार का मिश्रण था। बहू ने धीरे-धीरे घर के काम अपने हिसाब से करने शुरू कर दिए, माता-पिता को एक कोने में समेट दिया।
एक दिन श्यामलाल जी की खांसी बढ़ गई। सावित्री जी ने बहू से दवाई मांगी, पर सरिता ने ताने मारते हुए कहा, “इतने काम होते हैं घर में, हर चीज मेरे भरोसे छोड़ दिया है क्या?” सावित्री जी का दिल टूट गया। वे चुपचाप रसोई में जाकर अपने पति के लिए अदरक वाली चाय बनाई। दोपहर तक दोनों भूखे रहे, रात को बांसी खाना मिला। दोनों ने अपमान को प्रभु का प्रसाद मानकर ग्रहण किया।
दूसरा भाग: बेटे की आंखों पर पट्टी
अगले दिन सावित्री जी ने बेटे आकाश को फोन किया, लेकिन सरिता ने फोन छीन लिया। “आकाश बहुत व्यस्त है, हर बात पर फोन मत किया करो,” कहकर उसने बात टाल दी। आकाश जब घर आता तो सरिता बनावटी मुस्कान के साथ कहती, “मैं मां जी और बाबूजी का पूरा ध्यान रखती हूं।” आकाश को लगता घर में सब ठीक है, लेकिन हकीकत कुछ और थी।
शनिवार को आकाश फिर घर आया, लेकिन मां-बाबूजी मंदिर गए थे। सरिता ने झूठ बोल दिया, “वे सुबह से ही जिद कर रहे थे जाने की।” आकाश ने इंतजार किया, रात हो गई लेकिन माता-पिता नहीं लौटे। उसका मन बेचैन हो गया, पुलिस स्टेशन गया, रिपोर्ट दर्ज करवाई। दिन बीतते गए, माता-पिता का कोई सुराग नहीं मिला।
तीसरा भाग: अपनों की तलाश
आकाश ने रिश्तेदारों के घर, मंदिर, धर्मशालाओं में माता-पिता को ढूंढा। पांच दिन बीत गए, कोई खबर नहीं मिली। ऑफिस से फोन आया, “अगर दो दिन में नहीं लौटे तो तुम्हारी जगह किसी और को दे दी जाएगी।” आकाश ने निर्णय लिया कि वह मुंबई जाएगा, नौकरी बचाएगा ताकि माता-पिता के लौटने पर उनकी सेवा कर सके। सरिता ने भी साथ चलने की जिद की, लेकिन आकाश ने उसे घर पर ही रहने को कहा।
चौथा भाग: अकेलापन और पछतावा
सरिता अब घर में अकेली थी। उसकी सहेली पूजा ने मजाक किया, “अब खुद ही अकेली पड़ गई है ना?” सरिता के पास कोई उत्तर नहीं था। उधर आकाश मुंबई में भी खुश नहीं था। हर शनिवार उसकी आंखों में माता-पिता की यादें उमड़ आती थीं। एक दिन उसका मित्र महेश उसे अपने घर ले गया। महेश की मां ने आकाश को अपनापन दिया, जिससे आकाश की आंखें भर आईं। परिवार के प्रेमपूर्ण माहौल में वह अपना दुख कुछ पल के लिए भूल गया।
पांचवां भाग: एक तस्वीर, एक आशा
महेश के छोटे भाई कपिल ने सगाई की तस्वीरें दिखाई। एक तस्वीर देखकर आकाश चौंक गया – वह उसकी मां सावित्री जी थी। आकाश फूट-फूट कर रोने लगा। महेश और अनिल उसे अस्पताल ले गए, जहां सावित्री जी भर्ती थीं। डॉक्टर ने बताया, “इन्हें यहां आए दो महीने हो गए हैं। कोई मिलने नहीं आता।” आकाश ने मां को गले लगाया, मां उसे पहचान तो रही थी, पर फिर भी किसी अजनबी की तरह व्यवहार कर रही थी। आकाश ने डॉक्टर से पूछा, “क्या उनके साथ कोई अन्य बुजुर्ग भी थे?” डॉक्टर ने कहा, “नहीं, इन्हें अकेले ही लाया गया था।”
छठा भाग: बाबूजी की खोज
अनिल ने श्यामलाल जी की तस्वीर दूसरे अस्पतालों में भेजी। एक अस्पताल से खबर आई कि उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया गया है। आकाश ने दौड़कर वृद्धाश्रम पहुंचा। वहां श्यामलाल जी ने बेटे को देखकर कहा, “मुझे विश्वास था कि तू एक दिन जरूर आएगा।” आकाश ने बाबूजी को गले लगाया, दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे। आकाश ने कहा, “अब मैं आप दोनों को कभी अकेला नहीं छोडूंगा।”
सातवां भाग: घर वापसी और न्याय
आकाश मां-बाबूजी को लेकर घर लौटा। सरिता दरवाजे पर खड़ी थी, चरणों में गिरकर रोने लगी, “मां बाबू जी मुझे क्षमा कर दीजिए।” आकाश ने उसे घर से निकाल दिया। सावित्री जी ने कहा, “बेटा बहू को क्षमा कर दो, उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है।” आकाश ने कहा, “मां तू माफ कर सकती है, पर मैं नहीं।”
अब आकाश ने अपनी मां और बाबूजी की सेवा को जीवन का धर्म बना लिया।
आठवां भाग: तीन सीखें – जब बेटे बहू घर से निकालने लगे
जब बेटे बहू माता-पिता को घर से निकालने लगते हैं, तो दुनिया की सबसे बड़ी चोट आत्मा पर लगती है। ऐसे समय में माता-पिता को तीन काम अवश्य करने चाहिए:
1. ईश्वर की शरण में जाएं
मंदिर जाएं, प्रार्थना करें, भजन करें, ध्यान करें। जब सारा संसार साथ छोड़ दे, तब भगवान ही हैं जो बिना शर्त प्रेम करते हैं। यह भक्ति भाव उन्हें टूटने नहीं देगा, बल्कि मन को मजबूती देगा।
2. ऐसे स्थान की खोज करें जहां सम्मान मिले
चाहे वह वृद्धाश्रम हो या साधु संतों की संगति। यह भागना नहीं, बल्कि खुद को फिर से जीवन देना है। माता-पिता को यह समझना चाहिए कि वे किसी पर बोझ नहीं हैं।
3. आत्मसम्मान से जीने का संकल्प लें
अपने बच्चों के नाम कोई भी संपत्ति तब तक न करें जब तक उनका मन और कर्म शुद्ध न हो जाए। अपने हाथ में कुछ न कुछ सल रखें ताकि अपमान की स्थिति में उनके पास फिर से उठ खड़े होने का साहस हो।
समापन
मां-बाप के आंसू व्यर्थ नहीं जाते। उस घर की नींव हिल जाती है जहां से बूढ़े मां-बाप के आशीर्वाद छीन लिए जाते हैं। ऐसे में उन्हें स्वयं को अशक्त न समझकर ईश्वर का अंश समझकर उठ खड़ा होना चाहिए। जो माता-पिता सब कुछ सहकर भी अपने बच्चों को माफ कर सकते हैं, वही भगवान का सबसे सुंदर रूप होते हैं।
याद रखिए, जो मां-बाप ईश्वर का नाम लेकर आंसू पी जाते हैं, वे एक दिन पूरी दुनिया को झुका देते हैं। और जो बेटे-बहू उनका अपमान करते हैं, उनकी आने वाली पीढ़ियां भी उस कर्म का फल भोगती हैं। जिन हाथों ने हमें चलना सिखाया, वही हाथ जब कांपने लगे तो उन्हें थामना हमारा धर्म है। बुढ़ापे में बच्चों का प्रेम दवा बन जाता है और उपेक्षा जहर।
माता-पिता को अंतिम चरण में सम्मान देना ही सच्ची संतान का धर्म है।
जय श्री कृष्ण।
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