लोग जिस पागल को पत्थर मार रहे थे 😢… आर्मी चीफ ने गाड़ी रोककर उसे सैल्यूट क्यों किया?

गूंजता सन्नाटा: पागल फौजी और वतन का कर्ज
अध्याय 1: घंटाघर की जलती दोपहर
मई का महीना था और उत्तर भारत के इस छोटे से शहर का मुख्य चौराहा—घंटाघर चौक—किसी तपते हुए तवे जैसा प्रतीत हो रहा था। दोपहर के ठीक दो बजे थे। डामर की सड़कें इतनी गर्म थीं कि लगता था अभी पिघल जाएंगी। लू के थपेड़े चेहरे पर किसी चाबुक की तरह लग रहे थे। हर कोई अपनी जल्दी में था, इस आग उगलते सूरज से बचकर कहीं छांव में छुप जाने की जल्दी में।
इसी भीड़भाड़ और शोर के बीच, चौराहे के एक कोने में कूड़े के ढेर के पास एक साया बैठा था। वह एक आदमी था, या शायद कभी रहा होगा। अब वह सिर्फ धूल, मिट्टी और फटे हुए चीथड़ों का एक ढेर था। उसके बाल जटाओं की तरह उलझ गए थे, मानो सालों से उनमें पानी न लगा हो। उसकी दाढ़ी इतनी लंबी और गंदी थी कि उसमें चेहरा कहीं खो गया था। उसके बदन पर कपड़ों के नाम पर केवल कुछ लत्ता बचा था, जो शायद उसने किसी कूड़ेदान से अपनी इज्जत ढकने के लिए उठाया होगा।
वह आदमी अपनी ही धुन में कुछ बड़बड़ा रहा था। कभी वह अचानक सीधा खड़ा हो जाता, कभी रेंगने लगता। आने-जाने वाले उसे हिकारत भरी नजरों से देखते। कुछ उसे ‘पागल’ कहकर आगे बढ़ जाते, तो कुछ उसे ‘गंदा भिखारी’ कहकर कोसते।
चौराहे पर सोहन लाल की फलों की दुकान थी। सोहन लाल को अपने फलों से ज्यादा अपनी दुकान की ‘शान’ की फिक्र रहती थी। वह पागल आदमी, भूख से तड़पता हुआ, सोहन लाल की दुकान के पास पड़े एक सड़े हुए केले को उठाने के लिए आगे बढ़ा। भूख इंसान को जानवर बना देती है, और वह तो मानसिक रूप से विक्षिप्त था।
“ए पागल! चल हट यहाँ से!” सोहन लाल दहाड़ा। उसने पास पड़ा एक डंडा उठाया और उस आदमी की ओर लहराया। “ग्राहक खराब कर रहा है मेरा। भाग यहाँ से वरना हाथ-पैर तोड़ दूँगा!”
वह आदमी डरा नहीं। उसने एक अजीब सी, मासूम मुस्कान के साथ सोहन लाल की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक पल के लिए ऐसी चमक आई जैसे उसने कोई बहुत बड़ा दुश्मन देख लिया हो। वह एकदम ‘सावधान’ की मुद्रा में खड़ा हो गया। उसने अपना दाहिना हाथ अपने माथे पर रखा और सोहन लाल को एक ज़ोरदार ‘सैल्यूट’ मारा।
उसकी फटी हुई आवाज़ में एक अजीब सी कड़क थी— “जय हिंद सर! दुश्मन सीमा पर है। हम पीछे नहीं हटेंगे। मिशन पूरा करेंगे सर!”
चौराहे पर खड़े कुछ लड़के ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। “अरे देखो, यह फिर से फौजी बन गया!” एक लड़के ने मज़ाक उड़ाते हुए ज़मीन से एक पत्थर उठाया और उस पागल की तरफ फेंक दिया। पत्थर सीधा उस आदमी के माथे पर लगा। खून की एक पतली धार उसकी आँखों के पास से बह निकली। लेकिन उस आदमी ने सैल्यूट नहीं तोड़ा। वह वैसे ही तना खड़ा रहा, जैसे कोई फौलादी खंभा हो। उसके माथे से गिरता खून उसकी गंदी कमीज़ को लाल कर रहा था, पर उसकी आँखों की वह ‘फौजी चमक’ फीकी नहीं पड़ी थी।
अध्याय 2: वह प्लास्टिक का तिरंगा
वह आदमी वहां से हटा और चौराहे के बीच में लगे एक पुराने बिजली के खंभे के पास चला गया। उस खंभे पर किसी ने पिछली 15 अगस्त को एक छोटा सा प्लास्टिक का तिरंगा लगाया होगा, जो अब फट चुका था और तेज़ हवा में नीचे गिरने ही वाला था।
जैसे ही वह झंडा खंभे से छूटकर नीचे गिरा, वह पागल आदमी अपनी पूरी ताकत से दौड़ा। उसने उस झंडे को ज़मीन पर गिरने से पहले ही अपने हाथों में लपक लिया, जैसे कोई पिता अपने गिरते हुए बच्चे को बचाता है। उसके गंदे हाथों ने उस तिरंगे को बड़ी कोमलता से पकड़ा। उसने अपनी फटी कमीज़ के साफ हिस्से (जो शायद ही कहीं बचा था) से उस प्लास्टिक के टुकड़े को पोंछा, उसे चूमा और अपनी फटी जेब के सबसे करीब रख लिया।
लोग यह सब देख रहे थे और हँस रहे थे। “देखो इसकी नौटंकी! अब झंडा लेकर नाचेगा यह पागल।”
तभी दूर से सायरन की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। यह पुलिस की जीप का सायरन नहीं था। यह सेना की गाड़ियों का भारी-भरकम, गूंजता हुआ सायरन था। शहर के लोग जानते थे कि आज सेना के नए लेफ्टिनेंट जनरल विक्रम सिंह कैंट इलाके का दौरा करने आ रहे हैं। पुलिस वालों ने तुरंत मुस्तैदी दिखाई।
इंस्पेक्टर राठी अपनी जीप से उतरे। उनका डंडा हवा में लहरा रहा था। “ए रोड खाली करो! सब पीछे हो जाओ! साहब का काफिला आ रहा है!” उनकी नज़र उस पागल आदमी पर पड़ी जो अभी भी सड़क के किनारे खड़ा होकर उस झंडे को सीधा करने की कोशिश कर रहा था।
“ए पागल! सुनाई नहीं देता? साहब लोग आ रहे हैं। उधर जा, गटर के पास बैठ जा। तेरी बदबू से साहब का मूड खराब हो जाएगा। चल भाग!” राठी ने उसे ज़ोर से धक्का दिया। वह आदमी लड़खड़ाकर गिरा, लेकिन फिर उठ खड़ा हुआ। उसने राठी को भी सैल्यूट मारा— “सर, पोस्ट सिक्योर है। कोई घुसपैठिया नहीं आएगा सर!”
राठी ने अपना माथा पीट लिया। “इसे पकड़कर भीड़ के पीछे धकेलो!” दो सिपाहियों ने उसे बांहों से पकड़ा और घसीटते हुए पीछे ले गए।
अध्याय 3: जनरल का काफिला और वह गूँज
सामने से सेना का काफिला नज़र आया। सबसे आगे मिलिट्री पुलिस की बुलेट मोटरसाइकिलें थीं, जिनके पीछे काली चमचमाती जिप्सियाँ थीं। और बीच में थी एक शानदार टाटा सफारी, जिस पर तीन चमकते हुए सितारे लगे थे। यह गाड़ी थी लेफ्टिनेंट जनरल विक्रम सिंह की—एक ऐसे अधिकारी जिनका नाम दुश्मन की सीमाओं पर खौफ का दूसरा नाम था।
काफिला धीरे-धीरे चौराहे से गुज़र रहा था। जनरल विक्रम सिंह पिछली सीट पर बैठे बाहर का नज़ारा देख रहे थे। जैसे ही उनकी गाड़ी उस जगह से गुज़री जहाँ सिपाहियों ने उस पागल को पकड़ रखा था, कुछ अजीब हुआ।
वह पागल आदमी, जो अब तक सिपाहियों से जूझ रहा था, अचानक शांत हो गया। उसने जैसे ही सेना की गाड़ियों पर लगा तिरंगा देखा, उसके शरीर में बिजली सी दौड़ गई। उसने पूरी ताकत से सिपाहियों के हाथ झटक दिए। वह भीड़ को चीरता हुआ सड़क के किनारे आया और ‘अटेंशन’ की मुद्रा में खड़ा हो गया।
उसने अपनी ठोड़ी ऊपर उठाई, सीना चौड़ा किया और अपनी दाहिनी हथेली को माथे के पास ले जाकर एक ऐसा ‘परफेक्ट सैल्यूट’ मारा, जिसे देखकर किसी भी फौजी का सीना गर्व से भर जाए।
उसके कपड़े फटे थे, चेहरा लहूलुहान था, बदन से बदबू आ रही थी—लेकिन उसका खड़े होने का तरीका! वह तरीका किसी आम इंसान का नहीं हो सकता था। वह ‘एलीट कमांडो’ का पोस्चर था।
जनरल विक्रम सिंह की नज़र खिड़की से उस आदमी पर पड़ी। गाड़ी कुछ मीटर आगे निकल चुकी थी, लेकिन जनरल साहब ने कुछ ऐसा देखा जिसने उनके दिल की धड़कन रोक दी। उन्होंने ड्राइवर को आदेश दिया— “स्टॉप द कार! रुकिए!”
ड्राइवर ने इमरजेंसी ब्रेक मारा। टायरों की चीख के साथ पूरा काफिला रुक गया। पूरे चौराहे पर सन्नाटा छा गया। पुलिस वाले घबरा गए कि शायद सुरक्षा में कोई बड़ी चूक हो गई है।
अध्याय 4: पहचान की वह घड़ी
जनरल विक्रम सिंह गाड़ी से नीचे उतरे। उनकी वर्दी पर सजे मेडल धूप में चमक रहे थे। उनके बूटों की आवाज़ ‘खट-खट’ करते हुए सड़क पर गूँजी। वह पीछे की ओर मुड़े, जहाँ वह ‘पागल’ अभी भी सैल्यूट की मुद्रा में अडिग खड़ा था।
इंस्पेक्टर राठी दौड़ते हुए आए, “सर, आई एम सॉरी! यह यहाँ का पागल है, हम अभी इसे हटा देते हैं…”
जनरल ने अपना हाथ उठाकर राठी को चुप करा दिया। उनकी आँखें उस पागल आदमी के चेहरे पर टिकी थीं। वह धीरे-धीरे उसके करीब गए। उन्होंने उस आदमी के फटे हुए कपड़ों के नीचे उसके सीने और बाहों पर लगे पुराने ज़ख्मों के निशान देखे—वे ज़ख्म गोलियों के थे, वे निशान बिजली के झटकों के थे।
जनरल विक्रम सिंह की आवाज़ कांप उठी। उन्होंने बहुत धीमे, लेकिन भारी स्वर में कहा— “मेजर… मेजर रणवीर?”
यह नाम सुनते ही उस पागल आदमी के शरीर में एक कंपन हुआ। उसका हाथ धीरे-धीरे नीचे आया। उसकी धुंधली पड़ चुकी आँखों में पहचान की एक हलचल हुई। यादों के बंद दरवाज़े जैसे अचानक खुल गए हों।
उसने अपनी टूटी-फूटी आवाज़ में बुदबुदाया— “कोड नेम: तूफान… मिशन: लाहौर… रिपोर्टिंग सर!”
जनरल विक्रम सिंह की आँखों से आँसू छलक पड़े। पूरे शहर ने देखा कि भारतीय सेना का एक सर्वोच्च अधिकारी, जो कभी युद्ध के मैदान में नहीं डगमगाया, आज सड़क के बीचोंबीच एक ‘भिखारी’ के सामने रो रहा था।
जनरल ने आगे बढ़कर उस गंदे, बदबूदार आदमी को अपने सीने से लगा लिया। “रणवीर! तुम ज़िंदा हो? मेरे शेर, तुम ज़िंदा हो!” उन्होंने उसे इतनी ज़ोर से भींचा जैसे वह कोई खोया हुआ भाई हो। जनरल की बेदाग वर्दी उस पागल के खून और गंदगी से सन गई, लेकिन उन्हें कोई परवाह नहीं थी।
“रणवीर, हमने तो मान लिया था कि तुम 15 साल पहले शहीद हो गए। कहाँ थे तुम?” जनरल रोते हुए पूछ रहे थे।
मेजर रणवीर—वह ‘पागल’—बच्चों की तरह सुबकने लगा। उसने जनरल के कान में फुसफुसाते हुए कहा, “सर, वे लोग बहुत मारते थे… नाखूनों में सुई डालते थे… बिजली देते थे… लेकिन सर, मैंने अपना नाम नहीं बताया। मैंने देश का राज नहीं दिया। मैं पास हो गया ना सर?”
यह सुनकर वहाँ खड़े हर शख्स का कलेजा मुँह को आ गया। सोहन लाल दुकानदार, पत्थर मारने वाले लड़के, पुलिस वाले—सब के सब जैसे पत्थर के बन गए थे।
अध्याय 5: वतन का असली कर्ज
जनरल विक्रम सिंह का चेहरा अब गुस्से से लाल था। उन्होंने पलटकर भीड़ की तरफ देखा। उनकी आवाज़ पूरे चौराहे पर बिजली की तरह कड़की— “शर्म करो! ओ शहर वालों, शर्म करो!”
उन्होंने मेजर रणवीर की बांह पकड़ी और उसे सबके सामने लाकर खड़ा किया। “जिस आदमी को तुम लोग ‘पागल’ कहकर पत्थर मार रहे थे, जानते हो यह कौन है? यह भारतीय सेना की पैरा स्पेशल फोर्सेज का मेजर रणवीर सिंह राठौर है। कारगिल युद्ध का वह नायक, जिसने अकेले दुश्मन के 10 सैनिकों को मारा था। उसके बाद यह एक गुप्त मिशन पर सीमा पार गया था।”
जनरल की आवाज़ भारी हो गई, “दुश्मन ने इसे पकड़ लिया। 15 साल… 15 साल तक इसने उनकी कालकोठरियों में यातनाएं सहीं। उन्होंने इसके शरीर का एक-एक इंच तोड़ दिया, इसका मानसिक संतुलन बिगाड़ दिया, लेकिन यह नहीं टूटा! और जब यह किसी तरह उनकी कैद से भागकर अपने वतन वापस लौटा, तो मेरे ही देश के लोगों ने मेरे हीरो को ‘पागल’ बना दिया?”
भीड़ में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। सोहन लाल का सिर शर्म से झुक गया। वे लड़के, जिन्होंने पत्थर मारा था, अब भीड़ में छिपने की कोशिश कर रहे थे।
मेजर रणवीर ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वह गंदा प्लास्टिक का तिरंगा निकाला और जनरल को देते हुए कहा, “सर, झंडा… झंडा ज़मीन पर गिर गया था। मैंने बचा लिया सर।”
जनरल ने वह तिरंगा लिया, उसे चूमकर अपने माथे से लगाया और मेजर रणवीर को फिर से सैल्यूट किया। इस बार यह सैल्यूट एक जनरल का मेजर को नहीं, बल्कि एक कृतज्ञ राष्ट्र का अपने गुमनाम नायक को था।
जनरल ने तुरंत अपने मेडिकल ऑफिसर को बुलाया। “डॉक्टर! मेजर रणवीर को तुरंत मिलिट्री हॉस्पिटल ले जाइए। यह वीआईपी ट्रीटमेंट है। इनके इलाज में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”
जब मेजर रणवीर को जनरल की अपनी गाड़ी में बैठाया गया, तो पूरे घंटाघर चौक पर तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। लोग ‘भारत माता की जय’ और ‘मेजर रणवीर अमर रहें’ के नारे लगाने लगे।
उपसंहार
बाद में पता चला कि मेजर रणवीर को दुश्मन देश ने मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़कर सीमा पर छोड़ दिया था। वे अपनी याददाश्त खो चुके थे और भटकते-भटकते इस शहर तक आ गए थे। अस्पताल में इलाज और अपने साथियों के प्यार के बीच उनकी याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी। सरकार ने उन्हें सर्वोच्च वीरता पदक से सम्मानित किया और उनके पिछले 15 सालों का बकाया वेतन और सम्मान सप्रेम लौटाया।
लेकिन यह कहानी हमें एक बड़ा सबक दे गई। हम जिस आज़ादी की हवा में साँस लेते हैं, उसकी कीमत मेजर रणवीर जैसे हज़ारों गुमनाम नायक चुकाते हैं। फटे हुए कपड़ों के नीचे अक्सर एक महान आत्मा छिपी होती है।
आज भी घंटाघर चौक पर मेजर रणवीर की एक छोटी सी प्रतिमा लगी है, जो शहर वालों को याद दिलाती है कि— “हर पागल दिखने वाला आदमी पागल नहीं होता, कभी-कभी वह वह नायक होता है जिसने आपके कल के लिए अपना आज खो दिया होता है।”
लेखक का संदेश: अगली बार जब आप सड़क पर किसी लाचार या मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को देखें, तो उस पर पत्थर न उठाएं। क्या पता, उसने भी कभी इस तिरंगे की शान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो।
जय हिंद! जय भारत!
News
डॉक्टरों ने कहा ये कभी नहीं बोलेगी… एक पागल भिखारी ने चमत्कार कर दिखाया जो करोड़ों नहीं कर पाए 😱💔
डॉक्टरों ने कहा ये कभी नहीं बोलेगी… एक पागल भिखारी ने चमत्कार कर दिखाया जो करोड़ों नहीं कर पाए 😱💔…
सबने समझा कूड़ा बीनने वाला… लेकिन उसने करोड़पति की जान वापस ला दी! 😲
सबने समझा कूड़ा बीनने वाला… लेकिन उसने करोड़पति की जान वापस ला दी! 😲 धड़कनों का मसीहा: कूड़े के ढेर…
जिसे गरीब समझकर बैंक से घसीटते हुए बाहर निकाल दिया। उसने पूरे सिस्टम को हिला दिया…
जिसे गरीब समझकर बैंक से घसीटते हुए बाहर निकाल दिया। उसने पूरे सिस्टम को हिला दिया… अभिमान का पतन: बैंक,…
पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर दिया कारनामा/पत्नी के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/
पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर दिया कारनामा/पत्नी के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/ धोखे की…
तलाक के 5 साल बाद पति IPS बन गया और तलाकशुदा पत्नी सब्जियां बेचती मिली फिर जो हुआ…
तलाक के 5 साल बाद पति IPS बन गया और तलाकशुदा पत्नी सब्जियां बेचती मिली फिर जो हुआ… पछतावे की…
सबने समझा कूड़ा बिनने वाला… लेकिन उसने 10 करोड़ का गाना गा दिया! 😲
सबने समझा कूड़ा बिनने वाला… लेकिन उसने 10 करोड़ का गाना गा दिया! 😲 सुरों का संघर्ष: फटे कपड़ों से…
End of content
No more pages to load






