“लोग समझते रहे भिखारी है… लेकिन जब सच खुला तो बड़े घर की नींव हिल गई”

दहलीज के बाहर बैठा सच
भूमिका
उज्जैन की सुबह अक्सर घंटियों से नहीं, बल्कि पहियों की आवाज से शुरू होती थी। सड़कों पर दूध वालों की पुकार, मंदिरों से आती आरती की ध्वनि और ऑटो की ब्रेक चीखती हुई शहर को जगा देती। लेकिन शहर के सबसे पौश इलाके चिंतामणि रोड की उस बड़ी कोठी में सुबह का मतलब बिल्कुल अलग था। वहां सूरज निकलने से पहले पर्दे खुलते थे और रोशनी बाहर से नहीं, बल्कि अंदर की व्यवस्था से आती थी।
इस कोठी में हर चीज़ अपनी जगह पर थी। संगमरमर की ठंडी फर्श, दीवारों पर बड़े-बड़े फ्रेम, विदेश यात्राओं की तस्वीरें, उद्योक्ति सम्मेलनों के फोटो, सम्मान और पुरस्कार। सबसे बीच में एक बड़ा सा फ्रेम था – “मालवीय ग्रुप”। यह घर सिर्फ रहने की जगह नहीं था, यह एक पहचान थी। इस घर का इकलौता बेटा था आनंद मालवीय।
आनंद मालवीय: एक नाम, एक पहचान
आनंद की उम्र 24-25 के आसपास थी। कद लंबा, चेहरा साफ और आंखों में वह आत्मविश्वास जो अक्सर पैसे के साथ मिलता है। उसके कमरे में एसी की हवा हमेशा संतुलित रहती थी। बिस्तर की चादरें इतनी मुलायम थी कि वहां नींद से ज्यादा सुरक्षा महसूस होती थी। सुबह आनंद की आंख खुलती तो सामने घड़ी नहीं, बल्कि एक नौकर खड़ा होता – “गुड मॉर्निंग सर।” चाय आनंद बिना कुछ बोले हल्का सा सिर हिला देता था। वाशरूम में उसके लिए अलग-अलग खुशबू वाले शैंपू, टॉवल और क्रीम रखी रहती थी। कपड़े अलमारी में ऐसे टंगे होते थे जैसे किसी शोरूम की डिस्प्ले हो।
बाहर लॉन में गार्डों की वर्दी चमकती थी। मानो उनका काम सुरक्षा से ज्यादा दिखावा हो। नाश्ते की टेबल पर चांदी के बर्तनों की खनक सुनाई देती थी। टोस्ट की महक और कॉफी की भाप के बीच सामने बैठी थी उसकी मां नैना मालवीय। उनके चेहरे पर हमेशा एक स्थिर मुस्कान रहती थी, लेकिन आंखों में कुछ ऐसा था जो उस मुस्कान से मेल नहीं खाता था। वो मां थी, लेकिन कई बार उनकी नजरों में मातृत्व से ज्यादा डर दिखाई देता था। टेबल के सिर पर बैठे थे विराज मालवीय, शहर के नामी उद्योगपति। वही जिनके दान के बोर्ड मंदिरों के बाहर लगे रहते थे। वही जिनके नाम से लोग रास्ते में सिर झुका लेते थे।
मंदिर का भंडारा और पहली दरार
एक दिन विराज ने अखबार मोड़ते हुए आनंद से पूछा कि क्या वो आज मंदिर चलेगा? भंडारे का उद्घाटन था। आनंद ने कॉफी उठाते हुए कहा कि वह चलेगा और मीडिया भी आ रही है। विराज की मुस्कान में संतोष और गर्व साफ था। नैना ने धीरे से कहा कि भंडारे में बहुत लोग होंगे, धक्कामुक्की से बचना। आनंद ने हंसकर जवाब दिया कि वह अकेला थोड़े ही जा रहा है, सुरक्षा होगी। नैना कुछ नहीं बोली, बस चम्मच चलाते हुए उनकी उंगलियां हल्की सी कांप गई।
काफिला निकल पड़ा। चमचमाती गाड़ी, आगे पीछे सुरक्षा और पीछे मीडिया की गाड़ी। शहर की गलियों से गुजरते हुए उज्जैन दो हिस्सों में बंटा हुआ दिखाई देता था। एक तरफ चमकती सड़कें, दूसरी तरफ धूल में सनी छोटी दुकानों की कतारें। वे महाकाल मंदिर के बाहर पहुंचे। वहां का दृश्य हमेशा जैसा ही था – भीड़, फूलों की खुशबू, पंडितों की आवाज और मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे कुछ लोग जो हमेशा वहीं बैठे रहते थे।
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा आदमी
आनंद गाड़ी से उतरा। कैमरे चमक उठे। लोग दूर से हाथ जोड़ने लगे। पंडित आगे आए। माला पहनाई गई। विराज ने चुपचाप कुछ नोट ट्रस्ट के आदमी को दिए और एक तस्वीर खींच गई। भंडारे के लिए बड़ा टेंट लगा था। बैनरों पर लिखा था – “मालवीय परिवार की ओर से जनसेवा”। लोग लाइन में लग चुके थे। आनंद मंच के पास खड़ा था। तभी उसकी नजर मंदिर की सीढ़ियों पर गई। वहां एक आदमी बैठा था। उसके कपड़े पुराने थे। चेहरा धूप से झुलसा हुआ था। लेकिन उसकी आंखें अजीब थी। जैसे उन्होंने बहुत कुछ देख लिया हो और अब किसी चीज की उम्मीद ही ना बची हो। उसकी उंगलियां बार-बार पेट की ओर जाती थी।
आनंद के कदम अपने आप उस ओर बढ़ गए। सिक्योरिटी भी साथ खिसक गई और कैमरे वालों को लगा कि शायद दान वाला दृश्य मिलेगा। आनंद सीढ़ियों के पास पहुंचा और धीमी आवाज में पूछा – “क्या आपने खाना खाया?” आदमी ने ऊपर देखा। उसकी आंखें सीधे आनंद की आंखों में उतरी। वहां ना भीख थी, ना कातरता, सिर्फ एक थकी हुई सच्चाई थी। उसने हल्की सी हंसी के साथ कहा – “आज तीसरा दिन है।” आनंद के चेहरे पर कुछ हिला। उसने जेब से नोट निकाले और कहा – “लाइन में लग जाइए, भंडारा चल रहा है।” आदमी ने नोट देखे, फिर आनंद को देखा और कहा – “भंडारे का खाना पेट भर देगा। लेकिन मैं एक सवाल पूछना चाहता हूँ। क्या आप बड़े घर के बेटे हैं? क्या आपने कभी खाली पेट सोया है?”
आनंद का गला सूख गया। पहली बार उसे समझ आया कि खाली पेट सिर्फ भूख नहीं होती, बल्कि एक ऐसी सच्चाई होती है जिसे बड़े घरों में घुसने नहीं दिया जाता।
सवाल जो नींद उड़ा दें
आनंद मंच की ओर बढ़ गया। लेकिन उसके कदमों में अब पहले जैसी चाल नहीं थी। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे उस खाली पेट आदमी ने सिर्फ भूख नहीं बताई थी, उसने आनंद के भीतर छुपे एक सच को छेड़ दिया था। भंडारे का उद्घाटन हो चुका था। तालियां बज चुकी थी। फूल बरस चुके थे और कैमरों की फ्लैश लाइटें अपना काम कर चुकी थी। आनंद का मन बार-बार उसी ओर खींच रहा था। उसने फिर से देखा कि वह आदमी अब भी वहीं बैठा था। मंदिर की सीढ़ियों पर बिल्कुल उसी जगह। ऐसा लग रहा था मानो वह आदमी सीढ़ियों का ही हिस्सा हो गया हो।
आनंद ने अपने साथ खड़े सिक्योरिटी कर्मियों से कहा कि वे वहीं रुके। वह सीढ़ियों की ओर बढ़ा। इस बार कैमरे पीछे रह गए। भीड़ के बीच उसका चेहरा भीड़ जैसा ही हो गया था। वह आदमी सिर झुकाए बैठा था। आनंद ने उसके पास बैठते हुए पूछा – “आप लाइन में क्यों नहीं लगे?” आदमी ने ऊपर देखे बिना जवाब दिया – “जहां जिंदगी ने खड़ा नहीं किया वहां लाइन में कैसे लगा जाए।” आनंद चुप हो गया। कुछ देर की चुप्पी के बाद आनंद ने उसका नाम पूछा। आदमी ने हल्की सी सांस ली, आसमान की ओर देखते हुए कहा – “नाम तो शायद कहीं छूट गया है।” फिर उसने कहा – “मेरा नाम शिवदत्त है।”
आनंद ने पूछा – “क्या आप रोज यही रहते हैं?” शिवदत्त ने सिर हिलाकर कहा – “मैं यहां रहता नहीं, बस टिकता हूँ। जब तक लोग आते-जाते रहते हैं, तब तक मैं भी रहता हूँ।”
पैसे नहीं, पहचान चाहिए
कुछ लोग पत्तल लेकर उनके पास से गुजरे। किसी ने शिवदत्त की ओर देखा और फिर नजर फेर ली। आनंद ने कहा – “खाना ठंडा हो जाएगा।” शिवदत्त मुस्कान के साथ बोला – “ठंडा खाना नहीं, इंसान ठंडा हो जाता है।” आनंद ने जेब से वही नोट निकाले और शिवदत्त के हाथ में रखने की कोशिश की। शिवदत्त ने हाथ पीछे कर लिया और शांत स्वर में मना कर दिया। आनंद ने कारण पूछा तो शिवदत्त ने कहा – “अगर मैंने पैसे ले लिए तो मैं भीख मांगने वाला बन जाऊंगा और अगर मैं भीख मांगने वाला बन गया तो सच बोलने का अधिकार खो दूंगा।”
आनंद ने पूछा – “आपको क्या चाहिए?” शिवदत्त ने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा और कहा – “मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप असल में कौन हैं?” आनंद ने कहा – “मैं आनंद मालवीय हूँ।” शिवदत्त की आंखें एक पल के लिए थम गई। उसने बस इतना कहा – “मालवीय अच्छा नाम है।”
दूर खड़ी नैना मालवीय यह सब देख रही थी। उनकी उंगलियां साड़ी के पल्लू को मरोड़ रही थी और उनके चेहरे पर ऐसा डर था जो मंदिर की घंटियों से भी ज्यादा शोर कर रहा था।
मंदिर की सीढ़ियों का सच
शिवदत्त ने आनंद से पूछा – “क्या आपने कभी सोचा है कि मंदिर की सीढ़ियां क्यों होती हैं?” आनंद ने जवाब दिया – “चढ़ने के लिए।” शिवदत्त थके हुए अंदाज में हंसा और बोला – “नहीं, वे उतरने के लिए होती हैं। ऊपर भगवान बैठता है और नीचे इंसान। सीढ़ियां इसलिए होती हैं ताकि इंसान नीचे ही रहे।” आनंद की सांस अटक गई।
शिवदत्त ने आगे कहा – “लोग ऊपर जाकर हाथ जोड़ते हैं, लेकिन नीचे बैठे इंसान से आंख नहीं मिलाते। मैं यहां भगवान के लिए नहीं बैठा हूँ, बल्कि इसलिए बैठा हूँ क्योंकि लोग यहां आकर भी मुझे नहीं देखते।” आनंद को पहली बार लगा कि यह आदमी भिखारी नहीं, बल्कि एक गवाह है।
आनंद ने उससे पूछा – “आप पहले क्या करते थे?” शिवदत्त कुछ देर चुप रहा और फिर बोला – “पहले मैं भी किसी घर की दहलीज के भीतर बैठता था।” आनंद का दिल जोर से धड़का और उसने पूछा – “किस घर की?” शिवदत्त ने सीधा जवाब नहीं दिया। उसने बस इतना कहा – “बड़े घर की दहलीज बहुत फिसलन भरी होती है और एक बार पैर फिसला तो आदमी सीधे मंदिर की सीढ़ियों तक आ गिरता है।”
रात की बेचैनी और सच की तलाश
उस रात आनंद को नींद नहीं आई। कोठी की दीवारें हमेशा की तरह शांत थी। लेकिन आनंद के भीतर समय जैसे ठहर गया था। वह बिस्तर पर लेटा रहा। आंखें बंद करने की कोशिश करता रहा। लेकिन बार-बार उसकी आंखों के सामने वही चेहरा उभर आता था। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा शिवदत्त, उसकी आवाज और वो सवाल – “क्या आपने कभी खाली पेट सोया है?” बार-बार उसके भीतर गूंज रहा था।
कुछ देर बाद आनंद उठकर बैठ गया। उसने कमरे की लाइट जलाई और सामने लगे आईने में खुद को देखा। वही चेहरा, वही महंगे कपड़े, वही आराम और सुविधाएं। लेकिन आज पहली बार उसे यह सब अपना नहीं लगा। उसे लगा जैसे यह सब उसने उधार लिया हो। एक ऐसी जिंदगी जो उसकी होते हुए भी उसकी नहीं थी।
वो कमरे से बाहर निकल आया। कोठी के पिछले हिस्से में छोटा सा निजी मंदिर था। सफेद संगमरमर का। आनंद ने अगरबत्ती उठाई लेकिन जलाने से पहले रुक गया। उसे शिवदत्त की बात याद आ गई – “ऊपर भगवान बैठा है और नीचे इंसान।” उसने अगरबत्ती वापस रख दी और चुपचाप वहां से हट गया।
मां की चुप्पी और दबी हुई बातें
अगली सुबह नाश्ते की टेबल पर असामान्य चुप्पी थी। विराज अखबार पढ़ रहे थे और नैना चाय की प्याली पकड़े सामने बैठी थी। आनंद आया तो दोनों ने ऊपर देखा। विराज ने पूछा – “कल मंदिर में देर हो गई थी? सब ठीक तो था?” आनंद ने जवाब नहीं दिया। उसने सीधे अपनी मां की ओर देखा और पूछा – “क्या आपको मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे उस आदमी के बारे में कुछ पता है?”
यह सुनते ही नैना का हाथ कांप गया। चाय की प्याली थरथराई और थोड़ी सी चाय तश्तरी में छलक गई। उन्होंने जल्दी से प्याली रख दी। जब आनंद ने शिवदत्त का नाम लिया तो कमरे की हवा जैसे भारी हो गई। विराज ने अखबार नीचे रख दिया और सख्त स्वर में पूछा – “कौन शिवदत्त?” आनंद ने बताया – “वही आदमी जो मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा था और जिसने खाली पेट सोने का सवाल पूछा था।” नैना की आंखें झुक गई और विराज का चेहरा कठोर हो गया।
उन्होंने आनंद से कहा – “ऐसे लोगों की बातों में ना उलझो। ऐसे लोग सिर्फ उलझाने के लिए होते हैं।” आनंद ने पहली बार अपने पिता की बात काटते हुए पूछा – “यह ऐसे लोग कौन होते हैं?” विराज ने कहा – “वे लोग जिन्हें जिंदगी ने पीछे छोड़ दिया हो।” आनंद ने जवाब दिया – “शायद वे लोग हैं जिन्हें जिंदगी से पीछे धकेल दिया गया हो।”
सच का सामना
दोपहर होते-होते नैना का सब्र टूट गया। वह आनंद को अपने कमरे में ले गई। दरवाजा बंद किया और खिड़की के पर्दे गिरा दिए। कमरा अंधेरे में डूब गया। उन्होंने कहा – “कुछ बातें जान लेने से जिंदगी आसान नहीं होती।” आनंद ने जवाब दिया – “झूठ में जीने से जिंदगी और मुश्किल हो जाती है।”
नैना ने बताया कि जिस शिवदत्त की वह बात कर रहा है, वह कोई भिखारी नहीं था। बहुत साल पहले वह इसी शहर में साधारण नौकरी करता था। एक साधारण आदमी था और एक रात एक गलती हो गई। उस समय नैना बहुत छोटी थी। और घरवालों ने उनकी शादी विराज से तय कर दी थी। बड़ा घर, बड़ा नाम सब खुश थे। लेकिन वह खुद खुश नहीं थी। शिवदत्त उस वक्त उनका सहारा था। उसने कभी कुछ मांगा नहीं। बस साथ दिया। फिर समाज जाग गया। उनकी शादी कर दी गई और सच को मंदिर की सीढ़ियों पर छोड़ दिया गया।
जब आनंद ने पूछा – “मैं कौन हूँ?” तो नैना ने पहली बार मां नहीं बल्कि एक टूटी हुई औरत की तरह उसे देखा और कहा – “तुम उसी दबाए हुए सच की निशानी हो।”
पिता का सच
शाम ढलते ही आनंद घर से निकल गया। ना गाड़ी ली, ना सुरक्षा। वो पैदल मंदिर की ओर चल पड़ा। जब वह पहुंचा तो शिवदत्त वहीं बैठा था। आनंद उसके सामने खड़ा हुआ और कांपती आवाज में पूछा – “क्या आप मेरे पिता हैं?” शिवदत्त ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आंखों में ना खुशी थी, ना गुस्सा, बस गहरी थकान थी। उसने कहा – “पिता होना नाम से नहीं, जिम्मेदारी से होता है।”
आनंद मंदिर की सीढ़ियों पर घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और उसने कहा – “मैं देर से आया हूँ।” शिवदत्त ने पहली बार उसके सिर पर हाथ रखा और कहा – “सच के पास कोई समय नहीं होता। वह जब आता है, पूरा आता है।”
घर का सच और समाज का डर
आनंद घर लौटा। कोठी के भीतर अजीब सी बेचैनी फैली हुई थी। ड्राइंग रूम में विराज मालवीय टहल रहे थे और नैना सोफे पर बैठी थी। आनंद को देखते ही विराज ने पूछा – “कहां था?” आनंद ने जूते उतारते हुए जवाब दिया – “वहां था जहां सच बैठा रहता है।” विराज का चेहरा सख्त हो गया। उन्होंने पूछा – “क्या फिर उसी आदमी के पास गया था?” आनंद ने सिर उठाकर कहा – “वह किसी आदमी के पास नहीं, अपने पिता के पास गया था।”
कमरे में जैसे बिजली गिर पड़ी। नैना उठ खड़ी हुई और आनंद से रुक जाने को कहा। लेकिन आनंद अब रुकने वाला नहीं था। उसने कहा – “मैं सब जानता हूँ। यह भी कि मैं किसका बेटा हूँ और यह भी कि मुझे क्यों अपनाया गया।”
विराज की आवाज ऊंची हो गई। उन्होंने कहा – “समाज क्या कहता, उनका नाम, उनकी पत्नी और उनका कारोबार सब कुछ दांव पर था।” आनंद ने पूछा – “फिर एक आदमी की जिंदगी का क्या?” विराज चुप रहे। नैना की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने स्वीकार किया कि वह दोषी है। लेकिन अब क्या किया जाए?
आनंद ने कहा – “अब सच किया जाए।”
सच का ऐलान
अगली सुबह उज्जैन फिर जागा। मंदिरों की घंटियां बजी। अखबार बंटे और शहर के सबसे बड़े उद्योगपति के घर में एक बड़ा फैसला लिया गया। विराज मालवीय ने प्रेस बुलाया। ड्राइंग रूम को प्रेस हॉल में बदल दिया गया। कैमरे, माइक और सवाल सब तैयार थे। नैना एक कोने में खड़ी थी और उनके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि गहरी थकान थी। आनंद सामने बैठा था और उसने तय कर लिया था कि अब वह पीछे नहीं हटेगा।
विराज माइक के पास आए और बोले – “मैं आज एक सच्चाई बताने जा रहा हूँ जिसे मैंने बरसों दबाकर रखा।” कैमरे चमक उठे। उन्होंने कहा – “मेरे बेटे आनंद का जन्म किसी गलती का नतीजा नहीं था, बल्कि एक इंसान की जिम्मेदारी थी।” उसी क्षण आनंद ने माइक पकड़ लिया और कहा – “यह वही जिम्मेदारी है जिसे एक इंसान से छीन लिया गया।”
आनंद ने कहा – “मेरा असली पिता शिवदत्त पांडे आज भी महाकाल मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा है। खाली पेट, लेकिन सच के साथ।”
मंदिर की सीढ़ियों पर सच
मंदिर के बाहर भीड़ जमा होने लगी। शिवदत्त हमेशा की तरह वहीं बैठा था। लेकिन आज लोग उसे देख रहे थे। आनंद भीड़ को चीरता हुआ वहां पहुंचा। वो उसी सीढ़ी पर बैठ गया। उसने कहा – “यह मेरे पिता हैं। और यह जगह उनका अपराध नहीं, बल्कि समाज की चुप्पी है।”
मंदिर की घंटियां बजती रही। उसी पल मंदिर की सीढ़ियां दहलीज बन गई और दहलीज के बाहर खड़ा समाज पहली बार अपने ही चेहरे से डर गया।
बदलाव की शुरुआत
शिवदत्त अब मंदिर की सीढ़ियों पर नहीं बैठता था। वहां बैठना मजबूरी नहीं, विकल्प बन गया था। मालवीय कोठी अब बंद नहीं रहती थी। उसकी दहलीज खुली रहती थी। जो अंदर आता उससे नाम नहीं पूछा जाता था, पेट पूछा जाता था।
आनंद अब उसी कोठी में नहीं रहता था। वह मंदिर के पास बने छोटे से घर में रहने लगा था। जहां सुबह की पहली आवाज घंटी की नहीं, इंसानों की होती थी।
अंतिम स्वीकार
एक दिन शिवदत्त ने आनंद से कहा – “अब मैं मंदिर की सीढ़ियों पर नहीं बैठूंगा।” आनंद ने कारण पूछा। शिवदत्त ने जवाब दिया – “अब वह जगह सजा नहीं रही। अब वहां बैठना मजबूरी नहीं, विकल्प बन गया है।”
कुछ महीने बाद उज्जैन में एक और खबर फैल गई। मालवीय कोठी अब बंद नहीं रहती थी। उसकी दहलीज खुली रहती थी। जो अंदर आता उससे नाम नहीं पूछा जाता था, पेट पूछा जाता था।
आनंद अब उसी कोठी में नहीं रहता था। वह मंदिर के पास बने छोटे से घर में रहने लगा था। जहां सुबह की पहली आवाज घंटी की नहीं, इंसानों की होती थी।
निष्कर्ष
इस कहानी का कोई हीरो नहीं था। क्योंकि हीरो वही होता है जो डर के बावजूद सच के साथ खड़ा हो। जिस दिन बड़े घर की दहलीज के बाहर मंदिर की सीढ़ियों पर खाली पेट सच सामने आया था, उस दिन जमीन नहीं बदली थी। इंसान बदला था।
अगर इस कहानी ने आपके दिल के किसी कोने को छुआ हो, आपकी आंखों को नम किया हो तो इसे अपने सभी साथी और दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें। ताकि प्यार और इंसानियत की यह लौ जलती रहे।
जय हिंद।
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