स्कूल की फीस न भरने पर टीचर ने बच्चे को क्लास से निकाल दिया, अगले दिन कलेक्टर ने आकर जो कहा

गरीबी का अभिशाप या उम्मीद की किरण?

भूमिका

क्या गरीबी सच में कोई अभिशाप है? क्या जिन बच्चों के पास अच्छे कपड़े या स्कूल की फीस नहीं होती, उन्हें सपने देखने का हक नहीं? अक्सर हम देखते हैं कि हुनर और काबिलियत गरीबी की चादर में दब जाती है। आज की कहानी एक ऐसे ही बच्चे की है, एक गुरु की है और एक फरिश्ते की है, जो न सिर्फ उस बच्चे की तकदीर बदलता है बल्कि पूरे समाज की सोच को झकझोर देता है।

रामनगर का सरकारी स्कूल

रामनगर कस्बे के किनारे एक पुराना सरकारी स्कूल था। स्कूल की दीवारें जर्जर थीं, रंग उखड़ा हुआ था, लेकिन बच्चों की आवाज़ें उसमें जान डाल देती थीं। इसी स्कूल की पांचवी कक्षा में पढ़ता था राजू, उम्र महज 10 साल। उसके कपड़े पुराने थे, शर्ट के कॉलर घिसे हुए, कई जगह रफू किया हुआ। उसके पास जूतों के नाम पर टूटी-फूटी रबर की चप्पलें थीं, जिन्हें तार से बांध रखा था।

राजू के पिता नहीं थे। जब वह बहुत छोटा था, बीमारी ने उसके सिर से पिता का साया छीन लिया था। घर में सिर्फ उसकी मां सावित्री थी, जो दूसरों के घरों में बर्तन मांजती, कपड़े धोती। सावित्री अनपढ़ थी, लेकिन जानती थी कि गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता सिर्फ शिक्षा है। इसलिए चाहे खुद भूखा सोना पड़े, वह राजू की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देती थी।

राजू भी अपनी मां के संघर्ष को समझता था। स्कूल से आने के बाद मां के काम में हाथ बंटाता, फिर रात को ढिबरी की रोशनी में देर तक पढ़ता। वह कक्षा का सबसे होनहार छात्र था। गणित या विज्ञान का कोई सवाल हो, राजू हमेशा सही जवाब देता था।

बीमारी और तंगी

पिछले दो महीनों से सावित्री बीमार चल रही थी। काम पर जाने में दिक्कत थी, घर में पैसों की तंगी आ गई थी। खाने के लाले पड़े थे, स्कूल की फीस भरना दूर की बात थी। स्कूल के हेड मास्टर शर्मा जी अनुशासनप्रिय थे, लेकिन फीस को लेकर बेहद सख्त थे। उनका मानना था कि अगर बच्चों को ढील दी जाए तो स्कूल का अनुशासन बिगड़ जाएगा।

अपमान का दिन

उस दिन सुबह से ही आसमान में काले बादल छाए थे। राजू स्कूल पहुंचा, आज उसकी फीस जमा करने की आखिरी तारीख थी। मां ने उसे खाली हाथ स्कूल भेजते हुए आंखों में आंसू भरकर कहा था, “बेटा, आज मास्टर जी से और रुकने को कह देना, मैं कल पैसे लाऊंगी।”

राजू भारी कदमों से क्लास में गया। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे डर था कि कहीं मास्टर जी आज सबके सामने डांट न दें। पहली घंटी बजी, शर्मा जी हाथ में रजिस्टर और छड़ी लेकर क्लास में आए। पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया। उन्होंने हाजिरी ली, फिर रजिस्टर का आखिरी पन्ना खोला – फीस बाकी वाले बच्चों के नाम।

एक-एक करके नाम पुकारे गए। दो-तीन बच्चों ने कहा – कल ले आएंगे। शर्मा जी ने उन्हें फटकारा। फिर नाम आया राजू का। “राजू कुमार, खड़े हो जाओ!” राजू कांपते हुए खड़ा हुआ। पूरी क्लास की नजरें उस पर थीं। “फीस लाए हो?” शर्मा जी ने पूछा। राजू ने सिर झुका लिया, “नहीं सर।”

शर्मा जी का पारा चढ़ गया, “पिछले महीने भी यही कहा था। अब तो दो महीने हो गए। क्या यह स्कूल धर्मशाला है? अगर पैसे नहीं हैं तो यहां क्या करने आते हो? जाकर मजदूरी करो, अपनी मां के साथ बर्तन मांझो। पढ़ाई तुम्हारे बस की बात नहीं है।” यह शब्द राजू के दिल पर कोड़े की तरह बरसे।

राजू की आंखों में आंसू आ गए, “सर, मां बीमार थी, बस दो दिन और दे दीजिए। मैं पक्का फीस ले आऊंगा। सर, मुझे पढ़ने दीजिए।” लेकिन शर्मा जी का दिल नहीं पसीजा। “बहाने मत बनाओ। जब तक फीस नहीं लाते, क्लास में बैठने की जरूरत नहीं है। निकलो मेरी क्लास से। और कल तभी आना जब पैसे हों। वरना स्कूल की तरफ देखना भी मत।”

राजू एक पल के लिए बुत बना खड़ा रहा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस स्कूल को वह मंदिर मानता था, वहां से उसे धक्के मारकर निकाला जा रहा है। उसने अपनी किताबें समेटी, फटा हुआ बस्ता उठाया और सिर झुकाकर क्लास से बाहर निकल गया।

आंसुओं के साथ पढ़ाई

राजू क्लास से बाहर आया, लेकिन घर नहीं गया। वह जानता था कि अगर घर गया और मां को बताया कि स्कूल से निकाल दिया गया है, तो मां का दिल टूट जाएगा। वह अपनी बीमारी भूलकर पैसे मांगने निकल पड़ेंगी। राजू स्कूल के पीछे वाले मैदान में गया, एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी। उसने बस्ता खोला, गणित की किताब निकाली, रोते-रोते भी पढ़ने की कोशिश करता रहा। उसके आंसू किताब के पन्नों पर गिरते रहे।

वह सोच रहा था – क्या गरीब होना इतना बड़ा गुनाह है भगवान? मैं तो बस पढ़ना चाहता हूं। पूरा दिन वहीं भूखा-प्यासा बैठा रहा। जब छुट्टी की घंटी बजी, बच्चे बाहर निकले, तो वह भी उनके बीच छिपकर घर चला गया ताकि मां को शक न हो।

उस रात राजू सो नहीं पाया। शर्मा जी के कड़वे शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे।

कलेक्टर का आगमन

अगली सुबह स्कूल में हलचल थी। खबर आई थी कि जिले के नए कलेक्टर आदित्य वर्मा शहर के दौरे पर हैं और अचानक किसी भी स्कूल का निरीक्षण कर सकते हैं। यह सुनते ही शर्मा जी और स्टाफ के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में सफाई शुरू हो गई, बच्चों को साफ ड्रेस पहनने की हिदायत दी गई।

करीब 11 बजे स्कूल के गेट पर एक सरकारी गाड़ी रुकी। गाड़ी से एक नौजवान शख्स उतरा – चेहरे पर सौम्य मुस्कान, आंखों में तेज, साधारण पहनावा लेकिन प्रभावशाली। यह थे डीएम आदित्य वर्मा। प्रिंसिपल और शर्मा जी दौड़कर स्वागत के लिए गए।

आदित्य जी ने हाथ जोड़कर सबका अभिवादन किया और सीधे निरीक्षण के लिए चल पड़े। उन्होंने लाइब्रेरी देखी, पानी देखा, फिर कक्षाओं की तरफ बढ़े। हर क्लास में बच्चों से बात करते, सवाल पूछते, शाबाशी देते। अंत में वे पांचवी कक्षा में पहुंचे – शर्मा जी की क्लास।

राजू की प्रतिभा

बच्चे सावधान मुद्रा में खड़े हो गए। आदित्य जी ने बैठने का इशारा किया। ब्लैकबोर्ड पर गणित का सवाल लिखा था। “क्या कोई इस सवाल को हल कर सकता है?” पूरी क्लास शांत थी। सवाल थोड़ा मुश्किल था। शर्मा जी बोले, “सर, अभी-अभी पढ़ाया है। शायद बच्चों को थोड़ा वक्त लगेगा।”

आदित्य जी ने पूरी क्लास पर नजर दौड़ाई। तभी उनकी नजर खिड़की के बाहर गई – बरगद के पेड़ के नीचे एक बच्चा बैठा था, जमीन पर लकड़ी से कुछ लिख रहा था। आदित्य जी ने पूछा, “वो बच्चा बाहर क्यों बैठा है? क्या वो इस स्कूल का छात्र नहीं है?”

शर्मा जी का गला सूख गया, “वो… सर, छात्र तो है, लेकिन फीस नहीं लाया था। बहुत दिनों से फीस बाकी थी। अनुशासन के लिए मैंने उसे क्लास से बाहर…”

आदित्य जी ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया। उनकी आंखों में गहरा दर्द दिखा। वे बिना कुछ बोले क्लास से बाहर निकले, सीधे उस पेड़ की तरफ चले। शर्मा जी और स्टाफ पीछे-पीछे।

राजू मग्न होकर गणित के सूत्र हल कर रहा था। उसे पता नहीं चला कि जिले के सबसे बड़े अधिकारी उसके पीछे खड़े हैं। आदित्य जी ने प्यार से राजू के कंधे पर हाथ रखा। राजू चौंक गया, डरकर अपनी टूटी चप्पलें पहनने लगा। आदित्य जी ने उसे रोका, वहीं धूल में उसके पास बैठ गए।

उन्होंने जमीन पर लिखे सवाल देखे – राजू ने ना सिर्फ सवाल हल किए थे, बल्कि तरीका किताब से ज्यादा बेहतर और छोटा था। “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?” राजू बोला, “राजू।” “तुम क्लास के अंदर क्यों नहीं हो?” राजू ने शर्मा जी की तरफ देखा, फिर सच बोला – “मेरे पास फीस के पैसे नहीं थे साहब। मास्टर जी ने कहा है जब पैसे हो तभी आना, लेकिन मुझे पढ़ना था इसलिए यहां बैठकर सुन रहा था।”

आदित्य जी की आंखें भर आईं। उन्होंने राजू का हाथ पकड़ा, उसे क्लास में ले गए। राजू को उसकी सीट पर बैठाया। फिर टीचर की कुर्सी के पास खड़े हुए, शर्मा जी को बुलाया। अपनी जेब से पर्स निकाला, नोट निकालकर शर्मा जी के हाथ में रख दिए।

“मास्टर जी, यह लीजिए इस बच्चे की फीस, और पूरे साल की फीस। अगर और कुछ कम पड़े तो मुझे बता दीजिएगा।” शर्मा जी शर्म से पानी-पानी हो रहे थे। “सर, आप क्यों तकलीफ कर रहे हैं? माफी चाहता हूं सर।”

वक्त का पहिया

तब आदित्य जी ने जो कहा, उसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए। “शर्मा जी, आप जानते हैं यह बच्चा कौन है? नहीं जानते। बस इतना जानते हैं कि यह गरीब औरत का बेटा है जिसकी फीस जमा नहीं हुई। लेकिन मैं बताता हूं कि यह कौन है।”

“आज से 20 साल पहले इसी शहर में एक और लड़का था। वह भी गरीब था, उसके पिता भी नहीं थे। उसकी मां भी दूसरों के घरों में काम करती थी। उसके पास भी अच्छे कपड़े नहीं थे, फीस के पैसे नहीं थे। वह भी कई बार क्लास के बाहर निकाला गया, रोया। लेकिन उसका एक दोस्त था – अमीर नहीं, दिल का बादशाह। वह दोस्त अपनी पॉकेट मनी बचाकर उसकी फीस भरता था, किताबें देता था, टिफिन बांटता था। उस दोस्त ने कभी एहसास नहीं होने दिया कि वह छोटा है। हमेशा कहा – तू बस पढ़ाई कर, बाकी मैं देख लूंगा।”

आदित्य जी की आंखों से आंसू छलक पड़े। “शर्मा जी, वह दोस्त कोई और नहीं बल्कि इस राजू के पिता मोहन थे, और वह गरीब लड़का मैं हूं – आदित्य वर्मा। आज मैं जिस कुर्सी पर हूं, जिस रुतबे के साथ आपके सामने खड़ा हूं, उसकी नींव राजू के पिता ने रखी थी। अगर मोहन ने मेरा हाथ ना थामा होता, मेरी फीस ना भरी होती, मेरा हौसला ना बढ़ाया होता, तो आज मैं कहीं मजदूरी कर रहा होता।”

पूरे कमरे में सन्नाटा था। शर्मा जी की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। राजू हैरानी से उस बड़े साहब को देख रहा था। उसे अपनी मां से सुनी कहानियां याद आ रही थीं कि उसके पिता कितने मददगार थे, लेकिन उसे नहीं पता था कि उन्होंने एक कलेक्टर बनाया है।

समाज को सीख

“वक्त का पहिया घूमता है, मास्टर जी। मोहन चला गया, लेकिन उसकी अच्छाई आज भी जिंदा है। मैं अपने दोस्त का कर्ज तो कभी नहीं चुका सकता, लेकिन मैं यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरे दोस्त का बेटा सिर्फ चंद रुपयों की खातिर शिक्षा से वंचित रह जाए।”

“आप शिक्षक हैं, आपका काम बच्चों का भविष्य बनाना है। फीस वसूलना आपका काम नहीं है। अगर कोई बच्चा फीस नहीं ला पाया, उसकी मजबूरी को समझिए, उसका अपमान मत कीजिए। हो सकता है जिस बच्चे को आज आप क्लास से बाहर निकाल रहे हैं, कल वही बच्चा इस देश का भविष्य बनकर वापस आए। सरस्वती के मंदिर में लक्ष्मी को द्वारपाल मत बनाइए।”

शर्मा जी आदित्य जी के पैरों में गिर पड़े – “मुझे माफ कर दीजिए सर, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैंने अपने अहंकार में एक मासूम का दिल दुखाया। आज आपने मेरी आंखें खोल दीं।” आदित्य जी ने उन्हें उठाया – “माफी मुझसे नहीं, इस बच्चे से मांगिए। और वादा कीजिए कि आज के बाद इस स्कूल से कोई भी बच्चा सिर्फ गरीबी की वजह से नहीं निकाला जाएगा।”

शर्मा जी ने राजू के पास जाकर उसके सिर पर हाथ रखा, माफी मांगी। राजू बस मुस्कुरा दिया।

नई शुरुआत

उस दिन के बाद रामनगर के स्कूल की तस्वीर बदल गई। आदित्य जी ने न सिर्फ राजू की पढ़ाई का जिम्मा उठाया, बल्कि स्कूल की मरम्मत के लिए सरकारी फंड भी जारी किया। उन्होंने राजू की मां सावित्री को बुलवाया, उनके पैर छूकर कहा, “काकी, मैं आपके मोहन का दोस्त हूं। अब आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। राजू सिर्फ आपका बेटा नहीं, अब मेरा भी बेटा है।”

सावित्री का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसकी तपस्या और उसके पति के संस्कारों का फल आज उसे मिल गया था। राजू ने भी मन ही मन कसम खाई कि वह खूब मन लगाकर पढ़ेगा और एक दिन अपने कलेक्टर अंकल जैसा बनेगा।

कहानी की सीख

इस कहानी का अंत हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम किस समाज में जी रहे हैं। क्या हम मदद करने वाले हाथ हैं या उंगली उठाने वाले लोग? शिक्षा हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है – चाहे उसकी जेब में पैसे हों या ना हों। किसी की गरीबी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, क्योंकि वक्त कब किसका बदल जाए कोई नहीं जानता।