स्कूल के चपरासी को.. सबके सामने बेइज्ज़त क्यों किया?

कहानी का शीर्षक: “अनपढ़ की पहचान”
भूमिका
सेंट पॉल स्कूल, देहरादून। सुबह के 9:00 बजे थे। कॉरिडोर में सफाई करते हुए चंपकलाल की आवाज गूंज रही थी। फटे चप्पल, झुकी कमर, और चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान। उसके जीवन की कहानी किसी को नहीं पता थी। सब उसे अनपढ़, गंवार समझते थे। लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिखा था।
पहला भाग: चंपकलाल का रहस्य
चंपकलाल स्कूल के अलग-अलग कमरों में सफाई करता था। दोपहर के वक्त वह लाइब्रेरी में झाड़ू लगा रहा था, तभी एक किताब शेल्फ से गिर गई। एडवांस्ड मैथमेटिक्स फॉर क्लास 12। उसने पेज पलटा और कैलकुलस का एक कठिन सवाल देखा। जेब से पुरानी पेंसिल निकाली और मार्जिन पर हल लिखने लगा। उसके हाथ तेजी से चल रहे थे, हर स्टेप बिल्कुल सही।
लेकिन वह नहीं जानता था कि लाइब्रेरी के कोने में छुपकर कोई उसे देख रहा था—अनन्या वर्मा, प्रिंसिपल संजय गुप्ता की बेटी। अनन्या हैरान थी, स्कूल का चपरासी कैलकुलस हल कर रहा था! उसने जवाब चेक किया, सब सही था। वह सोचती रही—क्या चंपकलाल सच में अनपढ़ है?
दूसरा भाग: सवालों की जड़ें
अगले दिन अनन्या ने चंपकलाल से पूछा, “आपने पढ़ाई की है?” चंपकलाल ने मुस्कान छोड़ दी, “नहीं बिटिया, मैं तो अनपढ़ हूँ।” लेकिन अनन्या को यकीन था, चंपकलाल कुछ छुपा रहा है। उसने कई दिनों तक उस पर नजर रखी। एक दिन स्कूल बंद होने के बाद चंपकलाल लाइब्रेरी गया, किताबें पढ़ी, नोट्स बनाए। अनन्या ने सब देख लिया।
उसने चंपकलाल को रोका, “आप इतने पढ़े-लिखे होकर चपरासी का काम क्यों कर रहे हैं?” चंपकलाल ने गहरी सांस ली, “तुम नहीं समझोगी बेटा, लेकिन एक दिन यही राज सबकी आँखें खोल देगा।”
तीसरा भाग: 23 साल पुराना सच
शाम को स्कूल के गार्डन में चंपकलाल ने अपनी कहानी सुनाई। “23 साल पहले मैं और तुम्हारे पापा, दोनों IIT रुड़की में पढ़ते थे। मैं गरीब किसान का बेटा था, वे अमीर घर से। कॉलेज में मैं टॉप करता था, तुम्हारे पापा मेहनती थे। नेशनल इनोवेशन कॉन्टेस्ट में मैंने एक मशीन बनाई—कम पानी में खेती। लेकिन एक रात मेरा प्रोजेक्ट चोरी हो गया। अगले दिन तुम्हारे पापा ने वही प्रोजेक्ट प्रेजेंट किया। सबूत नहीं था, उल्टा मुझ पर चोरी का आरोप लगा। मुझे कॉलेज से निकाल दिया गया।”
चंपकलाल की आँखों में आँसू थे, “मेरी बेटी को कैंसर था, इलाज के लिए पैसे नहीं थे। तुम्हारे दादाजी ने मदद नहीं की। मेरी बेटी सिर्फ 8 साल की थी जब…,” उसकी आवाज रुक गई।
चौथा भाग: बदले की आग
अनन्या ने पूछा, “आपने बदला क्यों नहीं लिया?”
“मैंने नाम बदल लिया, फेक डॉक्यूमेंट्स से चंपकलाल दुबे बन गया। सोचा एक दिन सच सबके सामने लाऊंगा। अब मेरे पास जज की चिट्ठी है, जिसमें उसने कबूल किया है कि तुम्हारे दादाजी ने पैसे दिए थे।”
अनन्या ने शर्त रखी, “अगर सच सामने आया, तो पापा को माफी मांगनी होगी, लेकिन उनकी इज्जत खराब नहीं होनी चाहिए।” चंपकलाल ने पहली बार उम्मीद की कि शायद न्याय मिल सकता है।
पाँचवाँ भाग: असली सच की खोज
अनन्या ने सारे डॉक्यूमेंट्स पढ़े। सबूत पक्के थे। लेकिन वह अपने पापा से खुद पूछना चाहती थी। एक शाम उसने पापा से उनके प्रोजेक्ट के बारे में पूछा। संजय गुप्ता घबरा गए, टालने लगे। अनन्या समझ गई, वे झूठ बोल रहे हैं।
रात को उसने माँ से भी पूछा। नीलम सिंह ने बताया, “तुम्हारे पापा का प्रोजेक्ट उनका नहीं था, वह राजीव नाम के लड़के का था। मैं डर गई थी, कुछ नहीं कह पाई।”
अनन्या ने माँ से राजीव की फोटो मांगी। वह वही चेहरा था—चंपकलाल!
छठा भाग: न्याय की लड़ाई
रविवार सुबह अनन्या स्कूल गई। “आप राजीव हैं ना?” चंपकलाल मुस्कुराए, “हाँ। अब क्या करोगी?”
“अब मैं सच सबके सामने लाऊंगी। यह सिर्फ आपकी लड़ाई नहीं, न्याय की लड़ाई है।”
अनन्या ने स्कूल मैनेजमेंट को ईमेल भेजा, सारे डॉक्यूमेंट्स अटैच किए। तीन दिन बाद इमरजेंसी मीटिंग हुई। सबके सामने सच आया। संजय गुप्ता ने गलती मानी, माफी मांगी। उन्हें प्रिंसिपल पद से हटा दिया गया। अखबारों में खबर छपी, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।
सातवाँ भाग: नई शुरुआत
चंपकलाल को सम्मान मिला। स्कूल ने उसे मैथ्स टीचर की नौकरी दी। अनन्या उसकी पहली स्टूडेंट बनी। संजय गुप्ता ने अपनी गलती मानी, खुद को सुधारा। चंपकलाल ने माफ कर दिया, क्योंकि बदला लेने से ज्यादा जरूरी था आगे बढ़ना।
छह महीने बाद अनन्या ने बोर्ड एग्जाम दिया, स्टेट टॉपर बनी। अवॉर्ड सेरेमनी में ट्रॉफी चंपकलाल (राजीव) को समर्पित की। पूरा ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठा।
अंतिम भाग: इंसानियत की जीत
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यह शुरुआत थी एक नई जिंदगी की। चंपकलाल आज भी पढ़ाता है। अनन्या इंजीनियर बन चुकी है। संजय गुप्ता गरीब बच्चों के लिए NGO चलाते हैं। उन्होंने अपनी गलती सुधारने का फैसला किया।
यह कहानी सिखाती है कि गलती कोई भी कर सकता है, लेकिन उसे मानना और सुधारना ही सच्ची बहादुरी है। सच के साथ खड़ा होना सबसे बड़ी ताकत है।
एपिलॉग
दोस्तों, कैसी लगी यह कहानी? अगर अच्छी लगी हो तो जरूर शेयर करें। यह कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं, हर उस व्यक्ति की है जिसे समाज ने अनदेखा किया, लेकिन उसकी असली पहचान उसके काम से होती है, कपड़ों से नहीं।
हम फिर मिलेंगे एक नई कहानी के साथ। तब तक अपना ख्याल रखें।
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