होली के दिन बेटी ने माता पिता के साथ कर दिया कारनामा/पुलिस के भी होश उड़ गए/

सौदा और प्रतिशोध: एक बेटी की खौफनाक दास्तान
अध्याय 1: लखन सिंह का हँसता-खेलता परिवार और शराब की लत
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में खासपुर नाम का एक शांत गांव पड़ता है। इसी गांव में लखन सिंह अपने परिवार के साथ रहता था। लखन एक मेहनती मजदूर था, जो जमींदारों के खेतों में पसीना बहाकर अपने परिवार का पेट पालता था। उसकी पत्नी सुंदरी देवी गांव की सबसे खूबसूरत महिलाओं में गिनी जाती थी। उनकी एक 14 साल की बेटी थी, अंजलि, जो नौवीं कक्षा में पढ़ती थी और पढ़ाई में बहुत होशियार थी।
लेकिन वक्त बदला और लखन सिंह को शराब की ऐसी लत लगी कि उसने अपनी सारी जमा-पूंजी नशे में उड़ा दी। घर में गरीबी ने पैर पसार लिए और कलह रहने लगी। लखन अब काम पर भी कम जाने लगा था, जिससे परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया।
अध्याय 2: जमींदार नसीब सिंह की गंदी नजर
गांव का एक रईस जमींदार था—नसीब सिंह। नसीब सिंह स्वभाव से बहुत ही चरित्रहीन व्यक्ति था। उसकी नजरें हमेशा गांव की सुंदर महिलाओं पर रहती थीं। उसे पता चला कि लखन आजकल बेरोजगार है और उसे शराब के लिए पैसों की सख्त जरूरत है। नसीब सिंह ने लखन को अपने खेत में काम देने के बहाने बुलाया।
10 फरवरी 2026 को नसीब सिंह लखन के घर गया और उसे काम का लालच दिया। लखन और सुंदरी दोनों बहुत खुश हुए कि अब उनके अच्छे दिन लौट आएंगे।
अध्याय 3: पत्नी का पहला सौदा
17 फरवरी 2026 के दिन लखन खेत में काम कर रहा था। नसीब सिंह ने उसे अपने पास बुलाया और शराब पिलाई। नशे में धुत लखन से नसीब सिंह ने कहा कि उसे सुंदरी देवी बहुत पसंद है। लखन, जो शराब और पैसों के आगे अपना जमीर बेच चुका था, ₹5,000 और एक शराब की बोतल के बदले अपनी पत्नी को खेत में बुलाने के लिए तैयार हो गया।
सुंदरी खेत में पहुंची और लखन की मौजूदगी में नसीब सिंह उसे कमरे के अंदर ले गया। वहाँ सुंदरी और नसीब सिंह के बीच /अ/वै/ध/ संबंध बने। लखन बाहर बैठकर शराब पीता रहा। सुंदरी को भी पैसों का चस्का लग गया और यह सिलसिला चल पड़ा।
अध्याय 4: बेटी का जन्मदिन और नया लालच
24 फरवरी 2026 को अंजलि का जन्मदिन था। उसने अपनी माँ से एक नया मोबाइल फोन मांगा। सुंदरी के पास पैसे नहीं थे, लेकिन वह अपनी बेटी को खुश देखना चाहती थी। लखन ने खेत पर जाकर नसीब सिंह से ₹15,000 की मांग की। उस दिन नसीब सिंह का दोस्त चेतन जमींदार भी वहाँ मौजूद था।
दोनों जमींदारों ने शर्त रखी कि सुंदरी को उन दोनों के साथ वक्त गुजारना होगा। सुंदरी मान गई। उस दिन खेत के उसी कमरे में दो मर्दों ने एक औरत के साथ /ग/ल/त/ काम किया। सुंदरी ₹15,000 लेकर घर आई और अंजलि को नया फोन मिल गया। अंजलि खुश थी, पर वह नहीं जानती थी कि इस फोन की कीमत उसकी माँ ने अपनी इज्जत बेचकर चुकाई है।
अध्याय 5: जब बेटी का भी सौदा हुआ
रात को 10 बजे नसीब और चेतन शराब पीकर लखन के घर पहुंच गए। अंजलि ने अपनी आँखों से अपने पिता को उन जमींदारों के साथ शराब पीते देखा। उसे अपनी माँ और पिता के गलत रास्तों का अहसास होने लगा था।
1 मार्च 2026 को दरिंदगी की सारी हदें पार हो गईं। चेतन जमींदार ने लखन से कहा कि अब उसे सुंदरी नहीं, बल्कि उसकी जवान बेटी अंजलि चाहिए। शुरुआत में लखन झिझका, लेकिन जब ₹1 लाख का लालच दिया गया, तो उसने अपनी ममता और जमीर दोनों का गला घोंट दिया। सुंदरी भी पैसों के लालच में अपनी बेटी का सौदा करने को तैयार हो गई।
अंजलि को धोखे से खेत पर ले जाया गया। वहाँ अंजलि ने अपने माँ-बाप को उन दोनों जमींदारों के साथ देखा। उसे समझ आ गया कि उसका सौदा हो चुका है। उस दिन अंजलि के साथ उन दरिंदों ने /दु/ष्कर्म/ किया। अंजलि अंदर से मर चुकी थी।
अध्याय 6: प्रतिशोध की ज्वाला
अंजलि उदास और खामोश रहने लगी। उसने अपने ताऊ राजेश और ताई मीनाक्षी को सब बताना चाहा, लेकिन उन्होंने इसे परिवार का निजी मामला कहकर टाल दिया। अंजलि ने तय किया कि वह इस नर्क को खत्म कर देगी।
3 मार्च 2026 की रात, चेतन जमींदार ने फिर से लखन को फोन किया और अंजलि को रात में अपने घर भेजने को कहा। लखन और सुंदरी ने अंजलि पर दबाव बनाया। अंजलि ने शांत स्वर में कहा, “ठीक है, मैं चली जाऊंगी।”
जैसे ही रात के 11 बजे लखन और सुंदरी सो गए, अंजलि उठी। उसने चारा काटने वाली दराती उठाई। वह अपने माता-पिता के कमरे में गई। सबसे पहले उसने अपनी माँ सुंदरी देवी का गला /रे/त/ दिया। सुंदरी को चीखने का मौका तक नहीं मिला। फिर उसने अपने सोए हुए पिता लखन का भी गला काट दिया।
अध्याय 7: अंत और न्याय का इंतजार
इस खौफनाक कांड को अंजाम देने के बाद अंजलि सीधे अपने ताऊ के घर गई और सब कुछ सच-सच बता दिया। पुलिस मौके पर पहुंची और खून से सनी अंजलि को /गि/र/फ्तार/ कर लिया। जब पुलिस ने अंजलि की आपबीती सुनी, तो उनकी भी आँखें नम हो गईं।
आज अंजलि जेल में है और समाज इस सवाल से जूझ रहा है—क्या वह एक कातिल है या खुद एक शिकार, जिसने अपना न्याय खुद किया?
निष्कर्ष: यह कहानी हमें चेतावनी देती है कि नशे और लालच की कोई सीमा नहीं होती। जब माता-पिता ही रक्षक के बजाय भक्षक बन जाएं, तो समाज का पतन निश्चित है। (संवेदनशील शब्दों को सुरक्षा मानकों के अनुसार / / के साथ लिखा गया है।)
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