👉 सब्जीवाली बनकर DM मैडम ने रचा प्लान, थप्पड़ मारने वाले दरोगा को जो सबक सिखाया! देखकर हर कोई हैरान

वर्दी की इज्जत – डीएम अंजलि वर्मा की कहानी

प्रस्तावना

जिले की सबसे बड़ी अधिकारी, डीएम अंजलि वर्मा, एक सुबह सादे कपड़ों में बाजार पहुँची। चेहरे पर सादगी, चाल में आत्मविश्वास। कोई नहीं जानता था कि यही महिला जिले की डीएम है। वह सीधे एक ठेले पर गई, जहाँ एक लगभग 30 साल की महिला सब्जी बेच रही थी। अंजलि ने मुस्कुराकर सब्जियों के दाम पूछे ही थे कि तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया – “मम्मी, मुझे स्कूल छोड़ दो ना, लेट हो रहा है।”

सब्जी वाली बोली, “थोड़ी देर रुक जा बेटा, पहले इनको सब्जी दे दूँ, फिर तुझे छोड़ने चलेंगे।” बच्चा जिद करता रहा। डीएम अंजलि का दिल पसीज गया। उन्होंने कहा, “आप बच्चे को स्कूल छोड़ आइए, मैं आपकी दुकान संभालती हूँ।” सब्जी वाली हिचकिचाई, मगर अंजलि के भरोसे ने उसे हिम्मत दी। वह बेटे को लेकर स्कूल चली गई।

ठेले पर डीएम, और पुलिस की हकीकत

अंजलि ठेले पर खड़ी थी, माहौल को गौर से देख रही थी। तभी मोटरसाइकिल पर इंस्पेक्टर राहुल सिंह आया। उसने तंज में पूछा, “तू कब से सब्जी बेचने लगी? यहाँ तो एक औरत हुआ करती थी, वो कहाँ गई?”

अंजलि कुछ कहती, उससे पहले सब्जी वाली लौट आई। इंस्पेक्टर को देखकर उसका चेहरा घबराहट से भर गया। “क्या चाहिए आपको इंस्पेक्टर साहब? जो मन हो ले लीजिए।” इंस्पेक्टर ने बेजा हुक्म दिया – आधा किलो टमाटर, एक किलो भिंडी, आधा किलो परवल। औरत ने सब्जियाँ तौल दीं, इंस्पेक्टर बिना पैसे दिए चला गया।

यह सब देख अंजलि स्तब्ध रह गई। उन्होंने सब्जी वाली से पूछा, “बहन, उसने पैसे क्यों नहीं दिए? आपने कुछ कहा क्यों नहीं?” औरत की आँखों में मजबूरी थी – “यह इंस्पेक्टर रोज ऐसे ही सब्जियाँ ले जाता है। जब बोलती हूँ तो धमकाता है, कहता है – ठेला उठवा दूँगा। डर लगता है, अगर ठेला चला गया तो घर कैसे चलेगा?”

अंजलि का संकल्प

यह सुनकर अंजलि के चेहरे का रंग बदल गया। अंदर तक हिल गईं। कानून के रक्षक खुद कानून का मज़ाक उड़ा रहे थे। उन्होंने कहा, “अब ऐसा नहीं होगा। मैं आपके साथ हूँ। इंसाफ दिलाना मेरा फर्ज़ है। मेरा नंबर लीजिए, कल जब आप ठेला लगाएंगी, आप नहीं मैं वहाँ रहूँगी। देखती हूँ कि इंस्पेक्टर पैसे देता है या नहीं।”

औरत की आँखों में राहत और उम्मीद थी।

डीएम का भेष और पुलिस की बदतमीजी

अगली सुबह अंजलि ने गाँव की औरत का भेष बनाया। साधारण साड़ी, सिर पर पल्लू, ठेले पर सब्जियाँ सजाई। कुछ देर में इंस्पेक्टर राहुल सिंह आया। “आज फिर तुम यहाँ? वैसे तुम उसकी क्या लगती हो?”
“मैं उसकी बहन हूँ,” अंजलि बोली।
इंस्पेक्टर ने घिनौनी मुस्कान के साथ कहा, “बहन से भी ज्यादा खूबसूरत निकली। बहुत प्यारी लग रही हो आज।” फिर बेहूदे लहजे में बोला, “एक किलो टमाटर, थोड़ा धनिया, मिर्च भी दे देना।”

अंजलि ने सब्जियाँ तौल दीं। जैसे ही इंस्पेक्टर सब्जियाँ लेकर जाने लगा, अंजलि ने सख्त आवाज में कहा, “रुकिए, आपने सब्जियों के पैसे नहीं दिए। ऐसे नहीं चलेगा।”
इंस्पेक्टर झुंझलाया – “कौन से पैसे? रोज फ्री में लेता हूँ। बहन से पूछ लेना। ज्यादा जुबान मत चलाओ।”
अंजलि ने कहा, “आप मेरी बहन से चाहे जैसे लेते हों, लेकिन मुझसे नहीं। सब्जियों के पैसे देने होंगे। हम भी पैसे खर्च करके सब्जी लाते हैं। अगर एक दिन सब्जी ना बेचे तो घर का चूल्हा नहीं जलता। आप जैसे लोग फ्री में सब्जी ले जाकर हमारे पेट पर लात मारते हैं।”

इंस्पेक्टर का घमंड भड़क उठा। उसने गुस्से में आकर अंजलि को थप्पड़ मार दिया। अंजलि लड़खड़ाई, मगर खुद को संभाल लिया। “आपने एक महिला पर हाथ उठाकर बहुत बड़ी गलती की है। इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा आपको।”

इंस्पेक्टर बाल खींचने लगा, धमकाने लगा – “तेरी इतनी औकात? सब्जी बेचने वाली और मैं इंस्पेक्टर। तुझे यहीं खरीद सकता हूँ। ज्यादा बोलोगी तो जेल में डाल दूँगा।” और चला गया।

डीएम की असली पहचान और थाने का सच

अंजलि ने सब्जी वाली को फोन किया – “अब तुम ठेले पर आ जाओ।” फिर साधारण कपड़े बदलकर पीले रंग का सलवार सूट पहनकर एक सामान्य महिला की तरह थाने पहुँची। इंस्पेक्टर वहाँ नहीं था, हवलदार ने कहा – “इंस्पेक्टर घर गए हैं, एसएचओ फील्ड विजिट पर हैं।”

कुछ देर बाद एसएचओ नरेश कुमार आया। उसने पूछा, “तुम कौन हो?”
“रिपोर्ट दर्ज करवानी है,” अंजलि बोली।
नरेश कुमार व्यंग में बोला, “रिपोर्ट के लिए खर्चा-पानी लाया है? यहाँ 10 से 20,000 लगते हैं।”
अंजलि ने सख्त स्वर में कहा, “रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए कोई शुल्क नहीं लगता। आप रिश्वत क्यों माँग रहे हैं?”
नरेश कुमार हँसते हुए बोला, “यहाँ सब अपनी मर्जी से पैसे देते हैं। नहीं देगा तो रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी।”
अंजलि ने 10 रुपए दिए – “लिजिए, अब रिपोर्ट लिखिए।”

रिपोर्ट लिखते हुए पूछा – “किसके खिलाफ?”
“इंस्पेक्टर राहुल सिंह के खिलाफ। एक सब्जी बेचने वाली औरत से बदतमीजी, बिना पैसे सब्जियाँ उठाना, विरोध करने पर मुझ पर हाथ उठाना। सख्त कानूनी कार्रवाई चाहिए।”

नरेश कुमार घबराया – “वो सीनियर इंस्पेक्टर हैं। पुलिस वाले हैं, थोड़ा बहुत चलता है।”

अंजलि समझ चुकी थी – सिस्टम सड़ चुका है। वर्दी गरीबों की मजबूरी का सौदा कर रही है।

डीएम की सच्चाई और न्याय का फैसला

अगले दिन डीएम अंजलि वर्मा वर्दी पहनकर गाड़ी से थाने पहुँची। स्टाफ हक्का-बक्का। इंस्पेक्टर राहुल सिंह और एसएचओ नरेश कुमार मौजूद थे। दोनों घबराए – “आप कौन हैं? वर्दी क्यों पहनी है?”

“मैं इस जिले की डीएम अंजलि वर्मा हूँ। अब सब जान चुकी हूँ कि गरीबों को धमकाया जाता है, पैसे ऐंठे जाते हैं, कानून के नाम पर अत्याचार होता है।”

दोनों के पाँव तले ज़मीन खिसक गई। “अगर आप वाकई डीएम हैं तो आईडी दिखाइए।”
अंजलि ने पहचान पत्र दिखाया। दोनों हाथ जोड़कर माफी माँगने लगे – “माफ कर दीजिए, गलती हो गई। आगे से कभी नहीं होगा।”

अंजलि ने कठोर स्वर में कहा – “आज से तुम दोनों सस्पेंड हो। वर्दी पहनकर जो किया है उसका हिसाब अब कानून करेगा। इस जिले में अब गरीबों का अपमान नहीं होगा, न ही वर्दी की आड़ में लूटपाट।”

स्टाफ को आदेश दिया – “इन्हें तत्काल निलंबित किया जाए, विभागीय जाँच शुरू हो।”

माफी, बदलाव और नई शुरुआत

थाने में सन्नाटा छा गया। दोनों अधिकारी शर्मिंदगी में सिर झुकाए थे। अंजलि बोली – “तुम दोनों माफी के लायक नहीं हो। आज जो किया, वह अधिकारी नहीं, अपराधी करता है। अगर माफ कर दूँगी, तो फिर वही हरकतें करोगे।”

दोनों पैरों में गिर गए – “मैडम, आखिरी मौका दीजिए। सच में बदल जाएँगे। आगे से किसी गरीब को नहीं सताएँगे, पैसे नहीं लेंगे, हर फरियादी की इज्जत करेंगे। अगर गलती हो गई तो सीधे जेल भेज देना।”

अंजलि कुछ देर चुप रही। फिर गंभीर स्वर में बोली – “ठीक है, आखिरी मौका है। अगली बार अगर किसी गरीब की आवाज मुझ तक पहुँची, तो सस्पेंड नहीं, सलाखों के पीछे डालूँगी। कोई माफी नहीं होगी।”

दोनों ने सिर झुका लिया। आत्मसम्मान चूर-चूर हो चुका था, लेकिन अब उनमें सुधार की सच्ची झलक थी।

कहानी की सीख

अंजलि वर्मा ने जाते-जाते स्टाफ से कहा – “पुलिस की वर्दी डराने के लिए नहीं, भरोसा देने के लिए होती है। इसकी इज्जत तभी होगी जब पहनने वाले खुद इज्जत देना सीखेंगे।”

उस दिन के बाद थाना बदल गया। न रिश्वत, न गरीब की आवाज दबाई जाती थी। हर फरियादी की बात सुनी जाती, रिपोर्ट बिना पैसे के दर्ज होती, पुलिस लोगों की मदद करती नजर आने लगी। सब्जी वाली औरत भी मुस्कान के साथ ठेले पर बैठती थी, अब उसे किसी का डर नहीं था।

अंतिम संदेश

यह कहानी सिखाती है – हिम्मत और ईमानदारी से बड़ी कोई ताकत नहीं। पद पर बैठा व्यक्ति अगर अन्याय करता है, तो उसकी वर्दी नहीं, उसके कर्म बोलते हैं। जब सच बोलने वाला उठ खड़ा होता है, पूरा सिस्टम बदल सकता है।