10 रुपये देख जज ने दिया इस्तीफा! 😱 बच्चे के एक सवाल ने हिला दी पूरी अदालत!

सत्य की स्याही और दस का नोट: एक जज की अग्निपरीक्षा

परिचय

यह कहानी एक ऐसे न्यायमूर्ति की है जो अपने जीवन के सबसे कठिन दौर में था। एक तरफ पत्नी की जान थी और दूसरी तरफ उसका जमीर। एक १० साल के बच्चे के एक छोटे से सवाल ने कैसे न्याय व्यवस्था की नींव हिला दी और एक भ्रष्ट साम्राज्य का अंत किया, यह इस कहानी का सार है।

अध्याय 1: अदालत का सन्नाटा और कांपते हाथ

अदालत का वह खचाखच भरा हुआ कमरा एकदम शांत था। लेकिन उस शांति में एक अजीब सा शोर गूंज रहा था—यह शोर किसी इंसान का नहीं बल्कि वहां मौजूद हर उस शख्स के जमीर का था जो आज सच को हारते हुए देखने वाला था।

न्यायमूर्ति हेमंत देशमुख अपनी ऊंची कुर्सी पर बैठे थे। लेकिन आज वह कुर्सी उन्हें कांटों के बिस्तर जैसी चुभ रही थी। उनके ठीक पीछे दीवार पर टंगे अशोक स्तंभ के नीचे लिखा था ‘सत्यमेव जयते’, लेकिन आज हेमंत को वह वाक्य धुंधला दिखाई दे रहा था। उनके सामने कटघरे में खड़ा था शहर के सबसे रसूखदार बिल्डर का बिगड़ैल बेटा समर प्रताप। उसके चेहरे पर न कोई पछतावा था, न कोई डर।

हेमंत ने मेज पर रखे फैसले के पन्नों को देखा। यह महज कागज के टुकड़े नहीं थे, यह उस समझौते का दस्तावेज था जो उन्होंने अपनी मजबूरियों के आगे घुटने टेक कर किया था। उनकी पत्नी सुमित्रा अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थी। उसके इलाज के लिए १५ लाख रुपये की जरूरत थी, जो उनकी ईमानदारी की कमाई से जुटाना नामुमकिन था। समर प्रताप के पिता बलवंत राय ने कल रात ही वह रकम उनके घर भिजवाई थी।

हेमंत ने फाउंटेन पेन उठाया। स्याही की निब कागज के करीब पहुंची। बस एक हस्ताक्षर, और समर प्रताप सबूतों के अभाव में बरी हो जाएगा। बस एक हस्ताक्षर, और उनकी पत्नी का ऑपरेशन सुरक्षित हो जाएगा।

अध्याय 2: मासूमियत का हस्तक्षेप

तभी दर्शकों की भीड़ के बीच से एक आवाज आई। वह आवाज ऊंची नहीं थी, लेकिन कांच के टुकड़े जैसी महीन और नुकीली थी। “रुकिए जज साहब!”

भीड़ छट गई और वहां से एक १० साल का बच्चा आगे आया। मैले-कुचैले कपड़े, नंगे पैर और घुटनों पर पुराने घाव। वह उसी रिक्शा चालक का बेटा था जिसे समर प्रताप की तेज रफ्तार गाड़ी ने कुचल दिया था। उसका नाम छोटू था। वह लंगड़ाते हुए जज की कुर्सी के नीचे आकर खड़ा हो गया।

उसने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा १० रुपये का नोट निकाला और कांपते हाथों से उसे जज की मेज की तरफ बढ़ाया। हेमंत ने पूछा, “यह क्या है बेटे?”

बच्चे ने स्पष्ट आवाज में कहा, “वकील साहब ने कहा था कि इंसाफ खरीदने के लिए बहुत पैसा चाहिए। मेरे पास बस यही १० रुपये हैं। क्या इसमें मेरे बाबा का मुजरिम सजा पाएगा? या अमीर लोगों के लिए कानून की किताब अलग होती है?”

उस मासूम सवाल ने हेमंत की आत्मा को एक ही पल में नंगा कर दिया। उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके कान के पास जोर से ताली बजा दी हो। वह १० का नोट, जिस पर तेल और हल्दी के दाग थे, हेमंत को लाखों के उस चेक से कहीं ज्यादा भारी लग रहा था।

अध्याय 3: जमीर की जागृति

समर प्रताप के वकील चिल्लाए, “योर ऑनर, यह क्या तमाशा है? इस लड़के को बाहर निकालिए!”

लेकिन हेमंत ने हाथ उठा दिया। उन्होंने झुककर उस बच्चे को देखा। उन्होंने उस फैसले के ड्राफ्ट को उठाया जिस पर हस्ताक्षर करने थे और सबके सामने उसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया। पूरा कोर्ट रूम सन्न रह गया।

हेमंत ने एक सादा कागज निकाला और तेजी से लिखना शुरू किया। “जिस कुर्सी पर बैठकर न्याय पैसे के तराजू में तोला जाए, वह कुर्सी मेरे लिए नहीं है। आज इस बच्चे ने मुझे बताया है कि मैं जज नहीं, एक सौदागर बन गया था।”

उन्होंने अपना काला रोब उतारकर कुर्सी के पीछे टांग दिया। “मैं अपना इस्तीफा देता हूं, लेकिन जाने से पहले मैं इस केस को ‘सुओ मोटो’ (स्वतः संज्ञान) लेते हुए हाई कोर्ट की निगरानी में दोबारा जांच के आदेश देता हूं और आरोपी की जमानत रद्द करता हूं।”

जब हेमंत कोर्ट से बाहर निकले, तो उनके पास न नौकरी थी, न पत्नी के इलाज के लिए पैसे।

अध्याय 4: बलवंत राय का वार और जनता का सैलाब

अदालत के बाहर बलवंत राय अपनी काली एसयूवी में उनका रास्ता रोक कर खड़ा था। उसने शीशा नीचे किया और कहा, “जमीर तो बचा लिया जज साहब, अब बीवी की सांसे कैसे बचाओगे? जिस अस्पताल में वह भर्ती है, उसका चेयरमैन मैं हूं। मैंने फंड रोक दिया है। दो घंटे में १५ लाख जमा करो वरना लाश ले जाना।”

हेमंत अस्पताल की ओर भागे। वहां सुमित्रा आईसीयू में थी और डॉक्टर पैसे न होने के कारण ऑपरेशन रोकने की बात कर रहे थे। हेमंत फर्श पर बैठ गए। तभी जूतों की आवाज गूंजी। एक बूढ़ा आदमी हाथ में खादी का झोला लिए आया। उसने फर्श पर नोटों का ढेर लगा दिया। “मेरा नाम दीनानाथ है। १० साल पहले आपने मुझे एक झूठे केस से बचाया था। आज टीवी पर आपकी खबर देखी।”

तभी अस्पताल के गेट से इंसानों का सैलाब उमड़ पड़ा। सोशल मीडिया पर छोटू और जज का वीडियो वायरल हो चुका था। कोई अपनी गुल्लक लेकर आया था, कोई अपनी सोने की बालियां। देखते ही देखते रिसेप्शन पर १५ लाख से ज्यादा की रकम जमा हो गई।

अध्याय 5: न्याय का चक्र

सुमित्रा का ऑपरेशन सफल रहा। लेकिन बलवंत राय ने हार नहीं मानी थी। उसने पुलिस इंस्पेक्टर कांटेकर को भेजकर हेमंत को भ्रष्टाचार के झूठे आरोप में गिरफ्तार करवा लिया। जब हेमंत लॉकअप में थे, तो बलवंत राय उनसे मिलने आया और एक कोरा कागज दिया। “बस लिख दो कि तुमने इस्तीफा मानसिक दबाव में दिया था।”

हेमंत ने उस कागज को चाय में डुबोकर गला दिया। “सौदा तो मैं कर चुका बलवंत, उस १० रुपये के नोट के साथ।”

तभी बाहर हजारों लोगों की भीड़ मोमबत्तियां लेकर खड़ी हो गई। हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल खुद रिहाई का आदेश लेकर पहुंचे। बलवंत राय और इंस्पेक्टर कांटेकर को वहीं गिरफ्तार कर लिया गया। सीबीआई की जांच शुरू हुई और बलवंत राय का पूरा काला साम्राज्य ढह गया।

अध्याय 6: ५ साल बाद – मशाल की सुपुर्दगी

५ साल बीत चुके थे। विज्ञान भवन में एक बड़ा समारोह था। हेमंत देशमुख अब न्यायिक सुधार आयोग के अध्यक्ष थे। वे अपना विदाई भाषण दे रहे थे। उन्होंने मंच पर वही १० का नोट दिखाया जो अब एक कांच के फ्रेम में मढ़ा हुआ था।

उन्होंने कहा, “न्याय की कीमत किताबों में अमूल्य है, लेकिन हकीकत में इसकी कीमत बस यह १० रुपये हैं। यह नोट मुझे याद दिलाता है कि जज केवल कानून का रक्षक नहीं, बल्कि उस आखिरी उम्मीद का पहरेदार होता है जो कतार में सबसे पीछे खड़ा है।”

भाषण के बाद, सामने की पंक्ति में बैठा एक नौजवान उठा। उसने काला कोट पहना था। वह छोटू था, जो अब एक वकील बन चुका था। हेमंत ने उसे गले लगाया और अपना फाउंटेन पेन उसे उपहार में दिया।

बाहर निकलते वक्त हेमंत ने देखा कि आसमान साफ था और अशोक स्तंभ के नीचे लिखा ‘सत्यमेव जयते’ सूरज की रोशनी में सोने जैसा चमक रहा था।

समाप्त