10 साल के लड़के ने पुलिस दरोगा के साथ कर दिया कारनामा/वजह जानकर S.P साहब के होश उड़ गए/

सत्य की अग्नि: न्याय और प्रतिशोध

भाग 1: एक संघर्षशील परिवार

राजस्थान की वीर भूमि, जहाँ की मिट्टी में साहस और स्वाभिमान की खुशबू रची-बसी है। भरतपुर जिले का एक शांत सा गाँव ‘बहनेरा’। इसी गाँव के एक छोर पर कच्ची दीवारों और खपरैल की छत वाला एक छोटा सा घर था, जहाँ विद्या देवी रहती थीं। विद्या देवी एक विधवा महिला थीं, जिनके पति की मृत्यु कई वर्षों पहले एक लंबी बीमारी के कारण हो गई थी।

पति के जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी विद्या के कंधों पर आ गई थी। लेकिन विद्या कोई कमजोर महिला नहीं थी। उसने अपनी मेहनत और स्वाभिमान से अपने परिवार को संभाला। उसका मुख्य व्यवसाय भेड़-बकरियों का पालन था। हर सुबह जब सूरज की पहली किरण गाँव की गलियों को छूती, विद्या अपनी लाठी लेकर बकरियों को चराने के लिए निकल पड़ती। दो-चार घंटों तक खेतों के आसपास चारा खिलाकर वह दोपहर तक घर लौट आती।

विद्या के परिवार में उसका देवर अंगद और उसके दो बच्चे थे। 22 वर्षीय अंगद शहर के एक कारखाने में मजदूरी करता था। वह एक नेक दिल नौजवान था जो अपनी भाभी को माँ के समान सम्मान देता था। महीने के अंत में मिलने वाली अपनी पूरी पगार वह विद्या के हाथों में रख देता था ताकि उसके बच्चों का भविष्य संवर सके। विद्या की बड़ी बेटी सोनिया कक्षा 12 में पढ़ रही थी और छोटा बेटा किशोर, जो मात्र 11 साल का था, कक्षा पाँच का छात्र था। गाँव की शांति में यह परिवार अपनी छोटी सी खुशियाँ बटोर रहा था, लेकिन उन्हें यह भनक तक नहीं थी कि समय का चक्र उनके लिए कितनी क्रूर परीक्षा लेकर आ रहा है।

भाग 2: गाँव की काली छाया

हर गाँव की अपनी कुछ बुराइयाँ होती हैं। बहनेरा गाँव में वह बुराई सरपंच बलदेव और पुलिस दरोगा बिल्लू के रूप में विद्यमान थी। बलदेव सरपंच एक प्रभावशाली लेकिन चरित्रहीन व्यक्ति था। पद की गरिमा को ताक पर रखकर वह अक्सर भोली-भाली महिलाओं को अपने जाल में फंसाने या डराने-धमकाने का काम करता था।

उसका सबसे करीबी दोस्त था दरोगा बिल्लू। बिल्लू की पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी, जिसके बाद वह और भी अधिक निरंकुश हो गया था। ये दोनों अक्सर शाम को बलदेव के फार्म हाउस पर शराब पीते और गाँव के लोगों को परेशान करने की योजनाएँ बनाते। पद और शक्ति के मद में चूर इन दोनों व्यक्तियों के लिए किसी की मर्यादा का कोई मोल नहीं था।

भाग 3: वह मनहूस दिन – 5 दिसंबर 2025

5 दिसंबर का दिन अन्य दिनों की तरह ही शुरू हुआ। सुबह के साढ़े आठ बजे सोनिया और किशोर तैयार होकर स्कूल चले गए। अंगद भी अपना टिफिन लेकर कारखाने की ओर निकल गया। घर के काम निपटाने के बाद, करीब 10:30 बजे विद्या अपनी बकरियों को लेकर खेतों की तरफ निकल पड़ी।

चलते-चलते दुर्भाग्यवश उसकी कुछ बकरियाँ सरपंच बलदेव के खेतों में घुस गईं। विद्या उन्हें बाहर निकालने के लिए जैसे ही खेत में दाखिल हुई, उसका सामना बलदेव से हो गया। बलदेव अपने नौकर के साथ वहीं मौजूद था। विद्या की सादगी और उसकी गरिमा को देखकर बलदेव के मन में पाप जाग उठा।

उसने विद्या को रोक लिया और उस पर अभद्र टिप्पणियाँ करने लगा। उसने विद्या के सामने एक अत्यंत ही अनुचित और अपमानजनक प्रस्ताव रखा। विद्या ने कड़ा विरोध करते हुए कहा, “सरपंच जी, मैं एक सम्मानजनक परिवार की महिला हूँ। मेहनत करके अपने बच्चों का पेट पालती हूँ। अपनी मर्यादा को सीमाओं में रखिए।”

लेकिन बलदेव कहाँ मानने वाला था। उसने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए नौकर को आदेश दिया कि विद्या की एक बकरी को जबरन ट्यूबवेल के पास ले जाया जाए। उसने धमकी दी कि यदि विद्या ने उसकी बात नहीं मानी, तो वह उस निरीह जानवर को मार डालेगा। विद्या गिड़गिड़ाने लगी, लेकिन बलदेव ने बल प्रयोग किया और उसे जबरन खेत में बने एक कमरे की ओर घसीटने लगा। उस एकांत स्थान पर, विद्या की चीखें सुनने वाला कोई नहीं था। बलदेव ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए विद्या की मर्यादा को ठेस पहुँचाई।

भाग 4: भय और विश्वासघात

उस जघन्य कृत्य के बाद, बलदेव ने विद्या को डराया, “अगर यह बात किसी को बताई, तो तेरे पूरे परिवार को खत्म कर दूँगा।” विद्या कांपती हुई अपनी बकरियों को लेकर घर लौटी। वह अंदर से टूट चुकी थी, लेकिन अपने बच्चों की सुरक्षा के डर से उसने यह बात किसी को नहीं बताई।

रात भर वह सो नहीं सकी। उसे लगा कि शायद दरोगा बिल्लू उसकी मदद कर सकता है क्योंकि वह पुलिस में था। अगले दिन रात के अंधेरे में वह छिपते-छिपाते बिल्लू के घर पहुँची। उसने बिल्लू को सारी बात बताई और मदद की गुहार लगाई।

लेकिन रक्षक ही भक्षक निकला। बिल्लू ने मदद करने के बजाय विद्या की मजबूरी का फायदा उठाना चाहा। उसने भी वही घिनौना प्रस्ताव रखा जो सरपंच ने दिया था। जब विद्या ने उसे धिक्कारा और उसके मुँह पर थूका, तो बिल्लू आगबबूला हो गया। उसने प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए विद्या को धमकी दी, “आज तूने मेरा अपमान किया है, इसका हर्जाना तुझे और तेरी बेटी को भुगतना पड़ेगा।”

भाग 5: क्रूरता की पराकाष्ठा – 19 दिसंबर 2025

समय बीतता गया। 19 दिसंबर को विद्या की तबीयत कुछ नासाज थी। उसने सोनिया से कहा कि आज वह स्कूल न जाकर बकरियों को चराने ले जाए। छोटा किशोर भी सोनिया के साथ जाना चाहता था, लेकिन विद्या ने उसे स्कूल भेज दिया।

सोनिया बकरियों को लेकर खेत गई। वहाँ घात लगाए बैठे बलदेव और बिल्लू ने उसे अकेला पाकर घेर लिया। उन दोनों दरिंदों ने मासूम सोनिया के साथ वही घिनौना अपराध किया जो उन्होंने विद्या के साथ करने की कोशिश की थी। सोनिया रोती-बिलखती घर आई, लेकिन डर के मारे उसने भी कुछ नहीं कहा। उसे लगा कि यदि वह बोलेगी, तो उसकी माँ और भाई की जान खतरे में पड़ जाएगी।

भाग 6: सच का विस्फोट

26 दिसंबर का दिन था। बलदेव और बिल्लू का अहंकार इतना बढ़ गया था कि वे दिन-दहाड़े विद्या के घर पहुँच गए। उस समय घर में विद्या अकेली थी। उन्होंने फिर से उसे डराने की कोशिश की और उपहास उड़ाते हुए कहा कि उन्होंने सोनिया के साथ क्या किया है।

यह सुनते ही विद्या के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी अपनी चुप्पी ने उसकी बेटी का जीवन बर्बाद कर दिया था। उसने तुरंत अपने देवर अंगद को फोन किया। अंगद जब घर पहुँचा और विद्या ने उसे सारी सच्चाई बताई, तो अंगद का खून खौल उठा।

जब सोनिया ने भी रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई, तो अंगद के लिए सहन करना असंभव हो गया। उसने घर में रखी एक पुरानी गंडासी उठाई और सीधे खेत की ओर दौड़ पड़ा। सोनिया और किशोर भी उसके पीछे-पीछे भागे।

भाग 7: अंतिम न्याय

खेत में बलदेव और बिल्लू शराब के नशे में चूर जीत का जश्न मना रहे थे। अंगद को देखते ही बलदेव ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाली। लेकिन इससे पहले कि वह गोली चला पाता, अंगद ने गंडासी से उसके हाथ पर वार किया। रिवॉल्वर जमीन पर गिर गई।

तभी 11 साल का किशोर, जिसकी आँखों में अपनी माँ और बहन के अपमान का प्रतिशोध था, उसने झपटकर रिवॉल्वर उठा ली। उसने बिना सोचे-समझे दरोगा बिल्लू पर गोलियां चला दीं। दूसरी तरफ, अंगद ने बलदेव पर ताबड़तोड़ वार किए। कुछ ही पलों में दोनों अत्याचारियों का अंत हो गया।

भाग 8: परिणाम और समाज का प्रश्न

गाँव में यह खबर आग की तरह फैल गई। पुलिस आई और अंगद, विद्या, सोनिया और किशोर को गिरफ्तार कर लिया गया। कानून की नजर में यह एक हत्या थी, लेकिन गाँव के कई लोगों की नजर में यह एक न्याय था जो वर्षों के दमन के बाद निकला था।

आज भी यह मामला न्यायालय में है। समाज के सामने यह बड़ा प्रश्न है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और कानून रसूखदारों की जेब में हो, तो एक आम आदमी क्या करे? विद्या और उसके परिवार ने जो किया, वह कानूनन गलत हो सकता है, लेकिन क्या उनके पास अपनी मर्यादा बचाने का कोई और रास्ता था?

यह कहानी हमें सिखाती है कि अन्याय को सहना उसे बढ़ावा देने के समान है। यदि विद्या ने पहले ही दिन साहस दिखाया होता, तो शायद उसकी बेटी का भविष्य बच जाता। लेकिन साथ ही, यह हमारी व्यवस्था की विफलता को भी दर्शाती है।

लेखक का संदेश: यह कहानी काल्पनिक पात्रों के माध्यम से समाज की कुछ कड़वी सच्चाइयों को उजागर करती है। किसी भी परिस्थिति में कानून हाथ में लेना सही नहीं है, लेकिन न्याय व्यवस्था का सुलभ और निष्पक्ष होना अनिवार्य है।