12 साल के मैकेनिक ने आर्मी टैंक कैसे ठीक किया?

रेगिस्तान का छोटा उस्ताद और ‘काल भैरव’

परिचय

यह कहानी राजस्थान के तपते धोरों और जैसलमेर की उस सरहद की है, जहाँ की हवा में वीरता की सुगंध है। यह कहानी है १२ साल के एक अनाथ लड़के, अर्जुन की, जिसका घर रामू काका का गैरेज है और जिसके खिलौने टूटे हुए इंजन और पुराने पुर्जे हैं। वह स्कूल तो नहीं गया, लेकिन उसने मशीनों की उस भाषा को सीखा है जिसे बड़ी डिग्रियां भी नहीं समझ पातीं। जब भारतीय सेना का गौरव ‘काल भैरव’ टैंक और आधुनिक ‘मरु शक्ति’ वाहन तकनीकी जटिलताओं में फंस जाते हैं, तब अर्जुन का साहस और उसका अनोखा ‘जुगाड़’ देश के सम्मान की रक्षा करता है।

अध्याय 1: धूल, ग्रीस और मशीनों की धड़कन

जैसलमेर की तपती दुपहरी में जब सूरज आग के गोले बरसा रहा था, तब दूर-दूर तक केवल बबूल की झाड़ियाँ और रेत के ऊँचे टीले ही दिखाई देते थे। इसी तपिश के बीच सड़क किनारे एक पुरानी टीन की छत वाली दुकान थी—’रामू काका का गैरेज’। यहाँ १२ साल का अर्जुन अपने छोटे-छोटे हाथों से एक पुराने स्कूटर के कार्बोरेटर को साफ कर रहा था। उसके कपड़े फटे हुए थे, चेहरा ग्रीस और तेल से सना था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

रामू काका अक्सर कहते, “छोटू, तू लोहे की धड़कन सुनता है या लोहे तुझसे बात करते हैं?” अर्जुन बस मुस्कुरा देता। उसके लिए हर मशीन एक जीवित जीव की तरह थी। अचानक, एक गहरी गड़गड़ाहट ने रेगिस्तान की खामोशी को चीर दिया। यह बादलों की गरज नहीं, बल्कि भारतीय सेना के ‘भीष्म’ टैंकों का काफिला था। सबसे आगे ‘काल भैरव’ चल रहा था—एक विशालकाय लोहे का दैत्य। लेकिन अचानक, काल भैरव ने एक हिचकी ली, इंजन से काला जहरीला धुआं निकला और वह अचानक बीच रास्ते में थम गया। काफिला रुक गया और सन्नाटा छा गया।

अध्याय 2: जब किताबी ज्ञान हार गया

टैंक रुकते ही ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह बाहर निकले। ६ फीट का कद और रोबदार मूंछों वाले ब्रिगेडियर के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं, क्योंकि इस मिशन पर हर मिनट कीमती था। सेना के अनुभवी इंजीनियर नायक शर्मा और हवलदार रेड्डी ने तुरंत मोर्चा संभाला। औजारों के बड़े-बड़े बक्से खुले, पसीने से लथपथ होकर उन्होंने इंजन का मुआयना किया। घंटों बीत गए, लेकिन समस्या पकड़ में नहीं आई।

शर्मा ने हताशा में कहा, “सर, ऐसा लगता है कि सैंडस्टॉर्म की वजह से फ्यूल इंजेक्टर जाम हो गया है। पूरा इंजन खोलना होगा, जिसमें कम से कम ४ घंटे लगेंगे।”

सड़क के उस पार खड़ा अर्जुन यह सब देख रहा था। उसे उस ‘खट-खट’ की आवाज याद थी जो टैंक रुकने से ठीक पहले आई थी। वह खुद को रोक नहीं पाया और संतरी की मनाही के बावजूद ब्रिगेडियर के पास पहुँच गया। “साहब जी, यह इंजेक्टर नहीं है। इसकी सांस नली में कुछ फँसा है।”

ब्रिगेडियर ने पहले तो उसे झिड़का, लेकिन अर्जुन की आँखों में अटूट विश्वास देख उन्होंने उसे मौका दिया। अर्जुन टैंक पर चढ़ा, उसकी गर्मी से उसके नंगे पैर जल रहे थे, लेकिन उसका ध्यान केवल इंजन पर था। उसने अपनी जेब से एक पुराना पेचकस और तार का हुक निकाला और एयर इनटेक वाल्व से एक बादाम के आकार का पत्थर बाहर खींच लाया। जैसे ही इंजन स्टार्ट हुआ, ‘काल भैरव’ की दहाड़ ने साबित कर दिया कि हुनर किसी डिग्री का मोहताज नहीं होता।

अध्याय 3: मरु शक्ति और सॉफ्टवेयर की उलझन

उस घटना के एक महीने बाद, अर्जुन की जिंदगी बदल गई। उसे जैसलमेर मिलिट्री स्टेशन बुलाया गया। वहाँ ‘मरु शक्ति’ (एटीवी) नाम का एक अत्यंत आधुनिक वाहन परीक्षण के दौरान बार-बार बंद हो रहा था। मेजर विक्रम, जो एक उच्च शिक्षित इंजीनियर थे, इसे सॉफ्टवेयर का ‘बग’ मान रहे थे। उन्होंने कहा, “यह करोड़ों का सिस्टम है, इसमें सेंसर लगे हैं, यह लड़का क्या समझेगा?”

लेकिन ब्रिगेडियर का भरोसा अर्जुन पर था। अर्जुन ने गाड़ी के नीचे लेटकर और इंजन की लय सुनकर फिर से एक छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण बात पकड़ी। उसने देखा कि तेज रफ्तार में जब इंजन पूरी ताकत से हवा खींचता है, तो उसका रबर पाइप वैक्यूम की वजह से पिचक जाता है और हवा का रास्ता बंद हो जाता है।

अर्जुन ने अपने थैले से एक पुराना गंदा कपड़ा निकाला और उसे पाइप के चारों ओर लपेटकर एक सहारा दे दिया ताकि वह न पिचके। मेजर विक्रम और उनके कंप्यूटर देखते रह गए, और ‘मरु शक्ति’ रेत के टीलों पर १०० की रफ्तार से दौड़ने लगी। यह एक ‘मास्टर क्लास’ थी कि कभी-कभी सबसे जटिल समस्याओं का हल सबसे सरल होता है।

अध्याय 4: मौत के साये में ‘जुगाड़’ की जीत

असली इम्तिहान अभी बाकी था। ‘मरु शक्ति’ के गुप्त परीक्षण के लिए अर्जुन को ब्रिगेडियर और मेजर विक्रम के साथ सीमा के पास ले जाया गया। रात के सन्नाटे में अचानक दुश्मनों ने आरपीजी (राकेट) से हमला कर दिया। एक जोरदार धमाके ने गाड़ी को हिला दिया। कवच ने उनकी जान तो बचा ली, लेकिन धमाके के झटके से गाड़ी के ‘सेफ्टी सेंसर’ ट्रिगर हो गए और कंप्यूटर ने सुरक्षा कारणों से फ्यूल सप्लाई (ईंधन) पूरी तरह काट दी।

दुश्मन करीब आ रहे थे, गोलियां गाड़ी की बॉडी से टकराकर चिंगारियां पैदा कर रही थीं। कंप्यूटर सिस्टम ‘लॉक’ हो चुका था और उसे रीबूट करने में ३ मिनट लगने थे—३ मिनट जो मौत के समान थे। अर्जुन ने देखा कि मेजर विक्रम बेबस हैं। उसने तुरंत अपनी सीट बेल्ट खोली और पिछले पैनल की ओर रेंगते हुए गया।

“साहब, मुझे बैटरी से सीधा संपर्क करना होगा!” अर्जुन ने चिल्लाकर कहा। तार छोटे पड़ रहे थे। बिना सोचे, अर्जुन ने अपना मिलिट्री हेडफोन उतारा, उसके तार को अपने दांतों से छीला और तांबे के उन पतले तारों को फ्यूल पंप से जोड़ दिया। धमाकों और गोलियों के बीच, अर्जुन का हाथ कांप नहीं रहा था। जैसे ही उसने तार को बैटरी टर्मिनल से छुआ, फ्यूल पंप फिर से जीवित हो उठा। इंजन ने दहाड़ मारी और ‘मरु शक्ति’ मौत के जाल से निकलकर सुरक्षित क्षेत्र की ओर भाग निकली।

अध्याय 5: एक नया सवेरा और असली सम्मान

जब अगली सुबह वे बेस वापस लौटे, तो माहौल बदल चुका था। मेजर विक्रम ने पहली बार अर्जुन का हाथ थामकर उसे सैल्यूट किया। “मैंने किताबी ज्ञान तो बहुत पाया, लेकिन तुमने जो आज किया, वह किसी भी यूनिवर्सिटी में नहीं सिखाया जाता। तुमने ‘इंजीनियरिंग’ को नई परिभाषा दी है।”

ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह ने अर्जुन के माथे पर पट्टी बांधी और घोषणा की कि अर्जुन अब केवल रामू काका का गैरेज सहायक नहीं रहेगा। भारतीय सेना उसकी पढ़ाई और तकनीकी प्रशिक्षण का पूरा खर्च उठाएगी। अर्जुन ने ब्रिगेडियर का दिया हुआ वह काला चश्मा पहना और दूर उन टैंकों को देखा जो अब उसे अपने साथी लग रहे थे।

वह जान गया था कि भले ही उसके पास कोई बड़ी डिग्री न हो, लेकिन उसके पास वो ‘जुगाड़’ और ‘साहस’ था जो हिमालय की तरह अटल था। राजस्थान के धोरों में आज भी लोग उस ‘छोटे उस्ताद’ की कहानी सुनाते हैं जिसने सिर्फ एक तार और एक कपड़े के टुकड़े से देश की रक्षा की थी।

– समाप्त –