12 साल के लडके ने कर दिया कारनामा/पुलिस प्रशासन के होश उड़ गए/

अहेरीपुर का न्याय: एक परिवार के सम्मान की गाथा

अध्याय 1: खुशहाल परिवार और सादगी का जीवन

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में अहेरीपुर नाम का एक शांत और सुंदर गाँव बसा है। इसी गाँव में ‘रूपलाल’ अपने परिवार के साथ रहता था। रूपलाल पेशे से एक पशुपालक था। उसके पास करीब 25-30 बकरियाँ थीं, जिन्हें वह रोज सुबह चराने के लिए खेतों की ओर ले जाता था। शाम ढलते ही वह अपनी बकरियों के साथ घर लौट आता और महीने के अंत में उन्हें बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।

रूपलाल का परिवार छोटा और सुखी था। घर में उसकी पत्नी ‘शारदा देवी’, उसकी छोटी बहन ‘निर्मला’ और उसका 12 साल का बेटा ‘अंकुश’ रहते थे। अंकुश छठी कक्षा का छात्र था। वह उम्र में छोटा था, लेकिन उसका शरीर काफी हष्ट-पुष्ट था। वह स्वभाव से शांत लेकिन बेहद साहसी था। पूरा गाँव रूपलाल के परिवार की सादगी और उनकी मेहनत की मिसाल देता था। लेकिन किसी को क्या पता था कि इस शांति के पीछे एक भयानक तूफान छिपा है।

अध्याय 2: एक गलत नजर और नियत में खोट

वक्त का पहिया अपनी गति से घूम रहा था। 6 अक्टूबर 2025 की सुबह, रूपलाल की तबीयत कुछ खराब हो गई। उसे तेज बुखार था, जिसकी वजह से वह बकरियां चराने नहीं जा सका। उसने अपनी पत्नी शारदा से कहा कि वह डॉक्टर के पास जाकर दवा ले आए।

शारदा जब दवा लेने के लिए डॉक्टर की दुकान की ओर जा रही थी, तो रास्ते में गाँव के एक प्रभावशाली व्यक्ति ‘नकुल’ की बैठक पड़ती थी। नकुल एक संपन्न व्यक्ति था, लेकिन उसका चरित्र बेहद खराब था। जैसे ही उसकी नजर शारदा पर पड़ी, उसकी नियत डोल गई। उसने शारदा का पीछा किया और जब वह दवा लेकर लौट रही थी, तो सुनसान रास्ते पर उसका हाथ पकड़ लिया।

नकुल ने शारदा के सामने कुछ अनुचित प्रस्ताव रखे और उसे लालच देने की कोशिश की। शारदा, जो एक स्वाभिमानी महिला थी, उसने बिना डरे नकुल के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। नकुल तिलमिला उठा। उसने शारदा को धमकी दी, “इस थप्पड़ का बदला मैं जरूर लूँगा। तुम्हें और तुम्हारे परिवार को ऐसा सबक सिखाऊँगा कि तुम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहोगी।”

शारदा डर गई, लेकिन उसने यह बात घर पर किसी को नहीं बताई। उसे लगा कि बात बढ़ जाएगी और उसके बीमार पति को और परेशानी होगी। यही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।

अध्याय 3: खेत की वो काली दोपहर

7 अक्टूबर 2025 को रूपलाल की तबीयत अब भी ठीक नहीं थी। बकरियां कल से भूखी थीं, इसलिए शारदा ने तय किया कि आज वह खुद बकरियां चराने खेत में जाएगी।

दोपहर के समय, जब शारदा बकरियां चरा रही थी, तभी नकुल वहाँ अपने एक दोस्त ‘जगदीश’ के साथ पहुँचा। जगदीश पहले पुलिस विभाग में दरोगा था, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उसे सस्पेंड कर दिया गया था। दोनों नशे में धुत थे। उन्होंने देखा कि खेत में शारदा बिल्कुल अकेली है।

मौका पाकर उन दोनों ने शारदा के साथ बेहद अभद्र व्यवहार किया और जबरदस्ती की। उन्होंने शारदा को डराया-धमकाया कि अगर उसने यह बात किसी को बताई, तो वे रूपलाल को झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भिजवा देंगे। शारदा बुरी तरह टूट गई। वह रोते हुए घर लौटी, लेकिन डर के मारे उसने फिर भी चुप्पी साधे रखी।

अध्याय 4: बाज की नजर और बढ़ता अत्याचार

नकुल की दरिंदगी यहीं नहीं रुकी। उसकी नजर अब रूपलाल की छोटी बहन निर्मला पर थी। वह बाज की तरह परिवार की हर हलचल पर नजर रखने लगा। 26 अक्टूबर 2025 को जब रूपलाल और शारदा बाजार गए हुए थे और घर पर निर्मला अकेली थी, तब नकुल और जगदीश मोटरसाइकिल पर सवार होकर वहाँ पहुँचे।

उन्होंने घर का दरवाजा खटखटाया। निर्मला ने जैसे ही दरवाजा खोला, वे दोनों जबरन घर के अंदर घुस गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उस दोपहर उन्होंने निर्मला के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया और उसे जान से मारने की धमकी देकर वहाँ से निकल गए। निर्मला अंदर ही अंदर घुटने लगी, लेकिन उसने भी अपने भाई के डर से कुछ नहीं कहा।

अध्याय 5: सच का सामना और प्रतिशोध की ज्वाला

20 नवंबर 2025 को नकुल ने फिर से निर्मला को अपना निशाना बनाने की कोशिश की। वह दीवार फांदकर घर में घुस गया। इस बार पड़ोस में रहने वाले ‘राधेश्याम’ ने यह सब देख लिया। राधेश्याम को पहले से ही नकुल की हरकतों पर शक था।

शाम को जब रूपलाल का 12 साल का बेटा अंकुश स्कूल से लौटा, तो राधेश्याम ने उसे रोककर सारी सच्चाई बता दी। अंकुश का खून खौल उठा। वह दौड़कर घर पहुँचा और अपनी बुआ निर्मला को रोते हुए देखा। उसने तुरंत अपने पिता को फोन किया। जब रूपलाल घर पहुँचा और उसने अपनी पत्नी और बहन की आपबीती सुनी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

शारदा और निर्मला ने रोते हुए सब कुछ सच-सच बता दिया। रूपलाल की आँखों में खून उतर आया। उसने घर में रखी गंडासी (एक तेज धार वाला हथियार) उठा ली। 12 साल का अंकुश भी पीछे नहीं रहा, उसने रसोई से एक चाकू उठाया। शारदा और निर्मला उन्हें रोकती रहीं, लेकिन मान-सम्मान पर लगी चोट ने उन्हें पत्थर बना दिया था।

अध्याय 6: नीम के पेड़ पर लटका न्याय

बाप और बेटा सीधे नकुल की बैठक की ओर चल दिए। नकुल और जगदीश वहाँ शराब के नशे में चूर होकर सो रहे थे। रूपलाल ने बिना कोई आवाज किए नकुल की गर्दन पर गंडासी से वार कर दिया। वहीं, 12 साल के अंकुश ने अपनी बुआ और माँ के अपमान का बदला लेते हुए जगदीश पर चाकू से हमला कर दिया।

देखते ही देखते दोनों अपराधी ढेर हो गए। लेकिन बाप-बेटे का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ। उन्होंने दोनों के शवों को घसीटा और पास ही के एक नीम के पेड़ पर रस्सी से लटका दिया। जब तक गाँव वाले वहाँ इकट्ठा होते, दोनों अपराधी बेजान होकर पेड़ से लटक रहे थे।

गाँव में हड़कंप मच गया। पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर शवों को कब्जे में लिया। रूपलाल और अंकुश वहाँ से फरार हो गए थे, लेकिन अगले ही दिन उन्होंने खुद को कानून के हवाले कर दिया।

अध्याय 7: कानून और नैतिकता की बहस

पुलिस स्टेशन में जब रूपलाल ने अपनी कहानी सुनाई, तो पुलिसकर्मी भी सन्न रह गए। कानून के मुताबिक उन्होंने अपराध किया था, लेकिन नैतिकता और सम्मान की लड़ाई में वे खुद को सही मान रहे थे। पुलिस ने उन पर हत्या का मामला दर्ज किया।

गाँव के लोग और आसपास के इलाके के लोग रूपलाल और छोटे अंकुश के साहस की चर्चा कर रहे थे। मामला अदालत में पहुँचा। जज साहब के सामने यह एक पेचीदा मामला था—एक तरफ कानून था और दूसरी तरफ एक परिवार का आत्मसम्मान।

निष्कर्ष

यह घटना समाज के सामने कई सवाल छोड़ गई। क्या कानून को हाथ में लेना सही था? या फिर जब रक्षक ही भक्षक बन जाए (जैसे सस्पेंडेड दरोगा जगदीश), तब आम आदमी के पास क्या रास्ता बचता है? रूपलाल और अंकुश आज भी जेल में हैं, लेकिन अहेरीपुर गाँव की गलियों में यह कहानी आज भी सुनाई जाती है कि कैसे एक 12 साल के बच्चे और उसके पिता ने अपने घर की महिलाओं के सम्मान के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया।

लेखक की राय: कानून को हाथ में लेना कभी भी अंतिम समाधान नहीं होना चाहिए, लेकिन समाज को यह भी सोचना होगा कि अपराधियों में कानून का डर इतना कम क्यों हो गया है कि वे किसी के घर में घुसकर ऐसी हिमाकत कर सकें।