Army Officer ka Beta Bhikari Kese Bana | Yeah Kahani Apko Rula dy gi

रक्षक का संकल्प और चांदी का लॉकेट

अध्याय 1: फुटपाथ का वह कोना

शहर की रफ़्तार अपनी चरम सीमा पर थी। गाड़ियां दौड़ रही थीं, लोग अपने गंतव्य की ओर भाग रहे थे, और उस भागदौड़ के बीच मानवीय संवेदनाएं कहीं पीछे छूट गई थीं। फुटपाथ के एक अंधेरे और बदबूदार कोने में, एक बड़े से कूड़ेदान के पास, सात साल का एक बच्चा बैठा था। उसके कपड़े मैले थे, शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था, और उसकी सूजी हुई आंखें किसी का इंतजार कर रही थीं।

“अम्मी… अम्मी…” उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि पास से गुजरने वाले शोर में वह दब जाती थी। लोग उसे देखते, कुछ तिरस्कार से चेहरा मोड़ लेते, और कुछ उसे एक आम भिखारी समझकर आगे बढ़ जाते। किसी को फर्क नहीं पड़ा कि वह बच्चा दो दिनों से वहीं बैठा है।

अचानक, एक सरकारी गाड़ी वहां आकर रुकी। ऐसी गाड़ियां अक्सर इन गलियों में रुकती नहीं थीं। गाड़ी का दरवाजा खुला और एक प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला व्यक्ति नीचे उतरा। उसकी वर्दी पर लगे सितारे और जूते की चमक उसके रुतबे की गवाही दे रहे थे। वह प्रतात्मा थे—एक ऐसे इंसान जिनकी पहचान उनके सख्त अनुशासन और न्यायप्रियता से थी।

सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोकना चाहा, पर प्रतात्मा ने हाथ के इशारे से मना कर दिया। वे सीधे उस बच्चे के पास गए और अपने घुटनों के बल फुटपाथ पर बैठ गए। “बेटा, यहाँ अकेले क्यों बैठे हो?” उनकी आवाज में वह मिठास थी जो उस बच्चे ने शायद हफ्तों से नहीं सुनी थी।

अध्याय 2: कूड़ेदान का रहस्य

बच्चा डरा हुआ था। उसे लगा शायद ये साहब उसे डांटने आए हैं। लेकिन प्रतात्मा के चेहरे की सौम्यता ने उसे बोलने की हिम्मत दी। “दो दिन…” बच्चे ने धीमी आवाज में कहा। उसने बताया कि उसने कुछ नहीं खाया। प्रतात्मा ने तुरंत पानी और बिस्कुट मंगाए, पर बच्चा पीछे हट गया। उसकी प्रतिक्रिया सामान्य नहीं थी; ऐसा लग रहा था जैसे वह पानी या किसी की मदद से भी डर रहा हो।

प्रतात्मा ने महसूस किया कि बच्चा बार-बार कूड़ेदान की ओर देख रहा है। “वहां क्या है?” प्रतात्मा ने पूछा। बच्चे ने कांपते हुए कहा, “अम्मी वहीं है।”

प्रतात्मा सावधान हुए। उन्होंने दस्ताने पहने और कूड़ेदान के पास पड़े एक काले प्लास्टिक बैग को उठाया। अंदर कोई लाश नहीं थी, बल्कि एक मुड़ा हुआ खत था। खत में लिखा था: “मेरा बेटा आर्स है। मैं बीमार हूँ और मेरे पास समय नहीं है। अगर कोई नेक इंसान इसे पढ़े, तो मेरे बेटे को अपना ले।”

प्रतात्मा की उंगलियां ठिठक गईं। यह एक मां की बेबसी थी जिसने अपने बच्चे को सुरक्षित भविष्य की तलाश में एक अनिश्चित मोड़ पर छोड़ दिया था। उन्होंने आर्स का हाथ पकड़ा और कहा, “अब तुम यहाँ नहीं रहोगे। कभी नहीं।”

अध्याय 3: साए और यादें

प्रतात्मा आर्स को अपने घर ले आए। लेकिन आर्स शांत नहीं था। वह नींद में बड़बड़ाता था—”नहीं, मारो मत… मूछों वाला… वह ले जाएगा।” प्रतात्मा समझ गए कि आर्स किसी आपराधिक गिरोह के चंगुल में रह चुका है। आर्स ने बताया कि एक मूछों वाला आदमी उनसे भीख मंगवाता था और उसकी मां का ‘चांदी का लॉकेट’ भी छीन लिया था।

प्रतात्मा ने अपनी जांच शुरू की। उनके पास संसाधनों की कमी नहीं थी। जल्द ही उन्हें उस ‘मूछों वाले’ का पता चल गया। वह एक गोदाम से बच्चों की तस्करी और भीख मंगवाने का रैकेट चला रहा था। प्रतात्मा ने अपनी टीम के साथ वहां छापा मारा। वहां का नजारा दिल दहला देने वाला था—दर्जनों मासूम बच्चे एक अंधेरे कमरे में कैद थे।

प्रतात्मा ने उस आदमी को दबोच लिया। तलाशी के दौरान उन्हें वही चांदी का लॉकेट मिला, जिसे आर्स अपनी मां की आखिरी निशानी बताता था।

अध्याय 4: लॉकेट की हकीकत

घर लौटकर जब प्रतात्मा ने उस लॉकेट को ध्यान से देखा, तो उनके होश उड़ गए। लॉकेट के पीछे एक गुप्त बटन था। उसे खोलते ही अंदर एक छोटी तस्वीर दिखी—एक महिला और एक फौजी अफसर। वह अफसर कोई और नहीं, प्रतात्मा का पुराना दोस्त ‘कैप्टन दुर्गा’ था।

कैप्टन दुर्गा की मौत वर्षों पहले एक रहस्यमयी हेलीकॉप्टर हादसे में हुई थी। सरकारी फाइलों में उसे एक दुर्घटना बताकर बंद कर दिया गया था। लेकिन आर्स का उस लॉकेट के साथ होना इस बात का सबूत था कि वह कैप्टन दुर्गा का बेटा है।

प्रतात्मा को फोन पर धमकियां मिलने लगीं। “पुरानी फाइलें मत खोलो, वरना बच्चा सुरक्षित नहीं रहेगा।” लेकिन प्रतात्मा डरने वालों में से नहीं थे। उन्होंने लॉकेट की गहन फॉरेंसिक जांच करवाई और उसमें से एक माइक्रोचिप मिली। उस चिप में कैप्टन दुर्गा की आखिरी रिकॉर्डिंग थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे उनके ही विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने उनके हेलीकॉप्टर के साथ छेड़छाड़ की थी क्योंकि उन्होंने एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश करने की कोशिश की थी।

अध्याय 5: अंतिम न्याय

सच अब प्रतात्मा के हाथ में था। उन्होंने रात के अंधेरे में उन भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जिन्होंने वर्षों से इस सच को दबा रखा था। उन बड़े नामों को बेनकाब किया गया जो समाज में सम्मानित बने बैठे थे। न्याय की देवी ने अपनी आंखें खोलीं और गुनहगारों को उनके अंजाम तक पहुँचाया गया।

प्रतात्मा ने आर्स की मां की कब्र पर उसे सम्मान दिलाया और कानूनी तौर पर आर्स को गोद ले लिया। उन्होंने आर्स से कहा, “आज से यह घर तुम्हारा है।”

उपसंहार: एक चक्र का पूरा होना

वर्ष बीतते गए। आर्स अब वह कमजोर बच्चा नहीं था। प्रतात्मा के अनुशासन और प्यार ने उसे एक जांबाज युवक बना दिया था। कहानी का अंत उस दृश्य पर होता है जहाँ एक जवान फौजी अफसर वर्दी पहने, हाथ में वही चांदी का लॉकेट लिए, अपने पिता समान प्रतात्मा को सैल्यूट कर रहा है।

प्रतात्मा की आंखों में गर्व के आंसू थे। एक कूड़ेदान के पास से शुरू हुई वह बेबसी की कहानी, आज देश के रक्षक के रूप में एक महान मुकाम पर पहुँच चुकी थी।

मुख्य बिंदु:

नायक: प्रतात्मा (एक न्यायप्रिय रक्षक)
सह-नायक: आर्स (कैप्टन दुर्गा का बेटा)
प्रतीक: चांदी का लॉकेट (सच्चाई और मां की ममता का प्रतीक)
सन्देश: न्याय में देरी हो सकती है, पर एक सच्चा इंसान इतिहास बदल सकता है।